युद्ध काण्ड अध्याय 127

राम का पुष्पक विमान को विदा करना

राम अपने राज्याभिषेक के पश्चात पुष्पक विमान को धन्यवाद देते हैं और उसे उसके असली स्वामी कुबेर के पास वापस भेज देते हैं। विमान राम की आज्ञा से आकाश में उड़कर अलका नगरी की ओर प्रस्थान करता है।

विवरण

राम के राज्याभिषेक के उपरान्त अयोध्या में हर्ष का वातावरण है। राम ने पुष्पक विमान से लंका से अयोध्या आने के बाद उसकी सेवाओं की सराहना की। विमान ने राम, सीता, लक्ष्मण और वानरों को सुगमता से अयोध्या पहुँचाया था। राम ने विमान को सम्बोधित करते हुए उसकी प्रशंसा की और कहा कि अब तुम अपने स्वामी कुबेर के पास लौट जाओ। विमान ने राम की आज्ञा का पालन किया और आकाश मार्ग से उत्तर दिशा की ओर चला गया। यह सर्ग राम की निष्काम भावना और ईश्वरीय सम्पदा के प्रति अनासक्ति को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १२७

(राम का पुष्पक विमान को विदा करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राज्याभिषेक की समाप्ति पर राम पुष्पक विमान को सम्बोधित करते हैं। यह विमान उन्हें लंका से अयोध्या लेकर आया था। राम उसे उसके वास्तविक स्वामी कुबेर के पास लौटने की आज्ञा देते हैं।

✨ राम का पुष्पक विमान के प्रति कृतज्ञता-भाव (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः रामः महातेजाः पुष्पकम् समुपस्थितम् ।
दृष्ट्वा प्रीतमनाः भूत्वा इदम् वचनम् अब्रवीत् ॥
पुष्पक त्वम् महाभाग कुबेरस्य महात्मनः ।
रावणेन बलात् नीतम् लङ्कायाम् धर्षितम् पुरा ॥
त्वया आनीताः वयम् सर्वे लङ्कायाः अयोध्याम् प्रति ।
सुखेन च निरातङ्काः त्वत्प्रसादात् न संशयः ॥
त्वयि तुष्टः अस्मि भद्रम् ते गच्छ वैश्रवणालयम् ।
मम अनुज्ञाम् समासाद्य सुखी भूत्वा व्रज प्रभो ॥
पुष्पकः प्रत्युवाच इदम् राघवम् प्रीतमानसः ।
यद् आज्ञापयसि राम तत् करिष्ये न संशयः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महातेजाः = महान तेजस्वी; पुष्पकम् = पुष्पक विमान को; समुपस्थितम् = सामने उपस्थित; दृष्ट्वा = देखकर; प्रीतमनाः = प्रसन्न मन वाले; भूत्वा = होकर; इदम् = यह; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोले; पुष्पक = हे पुष्पक; त्वम् = तुम; महाभाग = महान भाग्यशाली; कुबेरस्य = कुबेर के; महात्मनः = महान आत्मा वाले; रावणेन = रावण द्वारा; बलात् = बलपूर्वक; नीतम् = ले जाया गया; लङ्कायाम् = लंका में; धर्षितम् = तिरस्कृत; पुरा = पहले; त्वया = तुम्हारे द्वारा; आनीताः = लाए गए; वयम् = हम; सर्वे = सब; लङ्कायाः = लंका से; अयोध्याम् = अयोध्या; प्रति = की ओर; सुखेन = सुखपूर्वक; च = और; निरातङ्काः = निर्भय; त्वत्प्रसादात् = तुम्हारी कृपा से; न संशयः = संदेह नहीं; त्वयि = तुम पर; तुष्टः = प्रसन्न; अस्मि = हूँ; भद्रम् = कल्याण; ते = तुम्हारा; गच्छ = जाओ; वैश्रवणालयम् = कुबेर के घर; मम = मेरी; अनुज्ञाम् = आज्ञा; समासाद्य = पाकर; सुखी = सुखी; भूत्वा = होकर; व्रज = जाओ; प्रभो = हे प्रभु; पुष्पकः = पुष्पक ने; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; इदम् = यह; राघवम् = राघव को; प्रीतमानसः = प्रसन्न मन वाला; यत् = जो; आज्ञापयसि = आज्ञा देते हो; राम = हे राम; तत् = वह; करिष्ये = करूँगा; न संशयः = संशय नहीं।
📖 भावार्थ : राज्याभिषेक के पश्चात महातेजस्वी राम ने सामने खड़े पुष्पक विमान को देखा और प्रसन्न मन से यह वचन कहे: "हे पुष्पक! तुम महान भाग्यशाली हो। पहले तुम महात्मा कुबेर के थे, पर रावण ने बलपूर्वक तुम्हें लंका ले जाकर अपमानित किया था। तुम्हारे द्वारा हम सब लंका से अयोध्या तक सुखपूर्वक और निर्भय होकर आए हैं। इसमें संदेह नहीं कि यह तुम्हारी कृपा से हुआ। मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम मेरी आज्ञा लेकर कुबेर के घर (अलका) को प्रस्थान करो और सुखी रहो।" राम के ऐसा कहने पर पुष्पक विमान ने प्रसन्न मन से उत्तर दिया: "हे राम! जैसी आप आज्ञा दें, मैं वैसा ही करूँगा, इसमें संशय नहीं।" इस प्रथम पंचक में राम की विनम्रता और कृतज्ञता का सुन्दर चित्रण है। वे एक विमान को भी सम्मानपूर्वक सम्बोधित करते हैं, यह उनके चरित्र की उदात्तता को दर्शाता है। वे जानते हैं कि यह विमान केवल एक यंत्र नहीं, बल्कि देवताओं की अमूल्य निधि है, और उसे उसके असली मालिक को लौटाना उनका कर्तव्य है। राम में कोई लोभ नहीं है; वे इस दिव्य विमान को अपने पास नहीं रखना चाहते, बल्कि धर्म के अनुसार उसे कुबेर को लौटा देते हैं। यह उनके राजर्षि चरित्र की पहचान है।

🛸 पुष्पक विमान का प्रस्थान (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
एवम् उक्त्वा तु पुष्पकः रामम् देववरम् स्थितम् ।
प्रदक्षिणम् च कृत्वा उच्चैः जगाम गगनम् प्रति ॥
ततः तस्य प्रस्थानम् दृष्ट्वा सर्वे महाबलाः ।
विस्मयम् परमम् जग्मुः साधु साधु इति वादिनः ॥
रामः अपि सीतया सार्धम् लक्ष्मणेन च वीर्यवान् ।
प्रेक्ष्य विमानम् आकाशे प्रीतिमान् अभवत् तदा ॥
धन्यः अस्मि इति च आह एवम् कुबेरस्य महात्मनः ।
यानम् एतत् समागम्य मया विसृष्टम् आदरात् ॥
एवम् ब्रुवति रामे तु पुष्पकः अन्तर्हितः अभवत् ।
दिशम् उत्तरम् आस्थाय कुबेरस्य निवेशनम् ॥
🔹 पदच्छेद : एवम् = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; तु = फिर; पुष्पकः = पुष्पक; रामम् = राम को; देववरम् = देवश्रेष्ठ; स्थितम् = स्थित; प्रदक्षिणम् = परिक्रमा; च = और; कृत्वा = करके; उच्चैः = ऊँचे; जगाम = गया; गगनम् = आकाश; प्रति = की ओर; ततः = उसके बाद; तस्य = उसका; प्रस्थानम् = प्रस्थान; दृष्ट्वा = देखकर; सर्वे = सब; महाबलाः = महान बलशाली; विस्मयम् = आश्चर्य; परमम् = परम; जग्मुः = हुए; साधु साधु = साधु साधु; इति = इस प्रकार; वादिनः = कहते हुए; रामः = राम; अपि = भी; सीतया = सीता के साथ; सार्धम् = सहित; लक्ष्मणेन = लक्ष्मण के साथ; च = और; वीर्यवान् = वीर; प्रेक्ष्य = देखकर; विमानम् = विमान को; आकाशे = आकाश में; प्रीतिमान् = प्रसन्न; अभवत् = हुए; तदा = तब; धन्यः = धन्य; अस्मि = हूँ; इति = इस प्रकार; च = और; आह = कहा; एवम् = इस प्रकार; कुबेरस्य = कुबेर के; महात्मनः = महान आत्मा वाले; यानम् = यान; एतत् = यह; समागम्य = प्राप्त करके; मया = मैंने; विसृष्टम् = विदा किया; आदरात् = आदरपूर्वक; एवम् = इस प्रकार; ब्रुवति = कहते हुए; रामे = राम; तु = तो; पुष्पकः = पुष्पक; अन्तर्हितः = अदृश्य; अभवत् = हो गया; दिशम् = दिशा; उत्तरम् = उत्तर; आस्थाय = आश्रय लेकर; कुबेरस्य = कुबेर के; निवेशनम् = निवास स्थान को।
📖 भावार्थ : पुष्पक विमान ने राम को इस प्रकार उत्तर देकर, देवश्रेष्ठ राम की परिक्रमा की और ऊँचे आकाश की ओर चला गया। उसके प्रस्थान को देखकर सभी महाबलशाली वीर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गए और साधु साधु कहने लगे। वीर राम भी सीता और लक्ष्मण के साथ आकाश में जाते हुए विमान को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा: "मैं धन्य हूँ, कि महात्मा कुबेर का यह यान मुझे प्राप्त होकर मेरे द्वारा आदरपूर्वक विदा किया गया।" राम के ऐसा कहते ही पुष्पक विमान उत्तर दिशा की ओर जाता हुआ अदृश्य हो गया और कुबेर के निवास स्थान की ओर चला गया। इस द्वितीय पंचक में विमान के प्रस्थान का मार्मिक चित्रण है। सभी वीर विस्मय में हैं—यह दिव्य दृश्य मानो स्वर्गीय लोकों की याद दिला रहा है। राम की प्रसन्नता इस बात में है कि उन्होंने एक अमूल्य वस्तु को उसके अधिकारी को लौटाकर धर्म का पालन किया। धन्य अस्मि कहकर वे स्वयं को धन्य मानते हैं, न कि इसलिए कि उन्होंने विमान का उपयोग किया, बल्कि इसलिए कि उन्हें उसे लौटाने का सौभाग्य मिला। यहाँ राम की अनासक्ति और त्याग की भावना परिलक्षित होती है। वे किसी भी वस्तु को अपनी सम्पत्ति नहीं मानते, बल्कि सब कुछ ईश्वर का दिया हुआ मानकर उचित व्यवस्था करते हैं।

🙏 राम की अनासक्ति एवं धर्मनिष्ठा (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः रामः महाप्राज्ञः सीतया सह लक्ष्मणः ।
प्रविवेश गृहम् रम्यम् सुग्रीवः च विभीषणः ॥
तेषु प्रविष्टेषु सर्वेषु रामः राज्यम् अकारयत् ।
धर्मेण महता राजन् प्रजाः सर्वाः अपालयत् ॥
न तत्र शोको न ग्लानिः न भयं न च विप्लवः ।
रामे राज्यम् प्रशासति सर्वम् आसीत् सुखाय हि ॥
इदम् पुण्यम् इदम् पापम् इति लोके प्रतिष्ठितम् ।
रामेण धर्मतः सर्वम् प्रजाः अनुचरन्ति स्म ॥
पुष्पकस्य विसर्गः च यथा वृत्तः मया श्रुतः ।
रामस्य धर्मनिष्ठा च कथिता तव सुव्रत ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महाप्राज्ञः = महान बुद्धिमान; सीतया = सीता के साथ; सह = सहित; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; प्रविवेश = प्रवेश किया; गृहम् = घर में; रम्यम् = रमणीय; सुग्रीवः = सुग्रीव; च = और; विभीषणः = विभीषण; तेषु = उनके; प्रविष्टेषु = प्रवेश करने पर; सर्वेषु = सब; रामः = राम ने; राज्यम् = राज्य; अकारयत् = किया; धर्मेण = धर्म से; महता = महान; राजन् = हे राजन्; प्रजाः = प्रजा; सर्वाः = सब; अपालयत् = पालन किया; न = नहीं; तत्र = वहाँ; शोकः = शोक; न = नहीं; ग्लानिः = थकान; न = नहीं; भयम् = भय; न = नहीं; च = और; विप्लवः = उत्पात; रामे = राम के; राज्यम् = राज्य; प्रशासति = शासन करते; सर्वम् = सब; आसीत् = था; सुखाय = सुख के लिए; हि = ही; इदम् = यह; पुण्यम् = पुण्य; इदम् = यह; पापम् = पाप; इति = इस प्रकार; लोके = संसार में; प्रतिष्ठितम् = स्थापित; रामेण = राम द्वारा; धर्मतः = धर्म से; सर्वम् = सब; प्रजाः = प्रजा; अनुचरन्ति स्म = आचरण करती थी; पुष्पकस्य = पुष्पक का; विसर्गः = विसर्जन; च = और; यथा = जैसे; वृत्तः = हुआ; मया = मैंने; श्रुतः = सुना; रामस्य = राम की; धर्मनिष्ठा = धर्मनिष्ठा; च = और; कथिता = कही; तव = तुमसे; सुव्रत = हे सुव्रत।
📖 भावार्थ : उसके पश्चात महाप्राज्ञ राम सीता और लक्ष्मण के साथ अपने रमणीय महल में प्रविष्ट हुए। सुग्रीव और विभीषण भी उनके साथ थे। सबके प्रवेश करने पर राम ने धर्मपूर्वक राज्य कार्य आरम्भ किया। हे राजन्, उन्होंने महान धर्म से सारी प्रजा का पालन किया। राम के राज्य शासन करते समय वहाँ न कोई शोक था, न थकान, न भय और न कोई उत्पात। सब कुछ सुखमय था। संसार में यह स्थापित हो गया कि यह पुण्य है, यह पाप है—राम के धर्मानुसार चलने से सारी प्रजा भी उसी मार्ग पर चलने लगी। हे सुव्रत, मैंने तुमसे पुष्पक के विसर्जन की जो घटना सुनी, वैसे ही राम की धर्मनिष्ठा का वर्णन किया है। यह अन्तिम पंचक राम के आदर्श राज्य की झाँकी प्रस्तुत करता है। राम के शासन में सब सुखी थे, क्योंकि वे स्वयं धर्म पर चलते थे और प्रजा भी धर्ममार्ग का अनुसरण करती थी। यहाँ रामराज्य की अवधारणा स्पष्ट होती है—एक ऐसा राज्य जहाँ न कोई भय है, न पाप, और सब कुछ धर्म के अनुसार चलता है। पुष्पक विमान को विदा करना भी इसी धर्मनिष्ठा का एक अंग था—राम ने किसी भी पराई वस्तु पर अधिकार नहीं जमाया। यह सर्ग हमें सिखाता है कि सच्चा सुख भोग में नहीं, त्याग में है। राम ने दिव्य विमान को लौटाकर न केवल कुबेर का आशीर्वाद प्राप्त किया, बल्कि प्रजा के समक्ष एक आदर्श भी स्थापित किया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🚀 अनासक्ति का आदर्श

राम पुष्पक विमान को विदा करके दिखाते हैं कि वे किसी भी वस्तु में आसक्त नहीं हैं। यद्यपि विमान दिव्य और अद्भुत था, फिर भी उन्होंने उसे अपने पास नहीं रखा। यह वैराग्य का उच्चतम रूप है।

💎 धर्म की स्थापना

राम न केवल स्वयं धर्म पर चलते हैं, बल्कि प्रजा को भी धर्ममार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। उनके शासन में यह पुण्य है, यह पाप है का बोध सहज ही हो जाता है।

🧘 कर्तव्यपरायणता

राम जानते हैं कि विमान कुबेर का है, इसलिए उसे लौटाना उनका कर्तव्य है। वे कर्तव्य से कभी विमुख नहीं होते, चाहे वह कितना भी कठोर या साधारण क्यों न हो।

🌟 रामराज्य की अवधारणा

यह सर्ग रामराज्य की झलक दिखाता है—जहाँ सब सुखी हैं, कोई भय नहीं, और धर्म की सर्वत्र स्थापना है। यही आदर्श राज्य की परिभाषा है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें किसी भी वस्तु पर स्वामित्व का अहंकार नहीं करना चाहिए। पराई वस्तु को लौटाना ही धर्म है। सच्चा सुख भोग में नहीं, त्याग में है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे सप्तविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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