राम का पुष्पक विमान को विदा करना
राम अपने राज्याभिषेक के पश्चात पुष्पक विमान को धन्यवाद देते हैं और उसे उसके असली स्वामी कुबेर के पास वापस भेज देते हैं। विमान राम की आज्ञा से आकाश में उड़कर अलका नगरी की ओर प्रस्थान करता है।
विवरण
राम के राज्याभिषेक के उपरान्त अयोध्या में हर्ष का वातावरण है। राम ने पुष्पक विमान से लंका से अयोध्या आने के बाद उसकी सेवाओं की सराहना की। विमान ने राम, सीता, लक्ष्मण और वानरों को सुगमता से अयोध्या पहुँचाया था। राम ने विमान को सम्बोधित करते हुए उसकी प्रशंसा की और कहा कि अब तुम अपने स्वामी कुबेर के पास लौट जाओ। विमान ने राम की आज्ञा का पालन किया और आकाश मार्ग से उत्तर दिशा की ओर चला गया। यह सर्ग राम की निष्काम भावना और ईश्वरीय सम्पदा के प्रति अनासक्ति को दर्शाता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १२७
(राम का पुष्पक विमान को विदा करना)
🔆 प्रस्तावना : राज्याभिषेक की समाप्ति पर राम पुष्पक विमान को सम्बोधित करते हैं। यह विमान उन्हें लंका से अयोध्या लेकर आया था। राम उसे उसके वास्तविक स्वामी कुबेर के पास लौटने की आज्ञा देते हैं।
✨ राम का पुष्पक विमान के प्रति कृतज्ञता-भाव (श्लोक १-५)
दृष्ट्वा प्रीतमनाः भूत्वा इदम् वचनम् अब्रवीत् ॥
पुष्पक त्वम् महाभाग कुबेरस्य महात्मनः ।
रावणेन बलात् नीतम् लङ्कायाम् धर्षितम् पुरा ॥
त्वया आनीताः वयम् सर्वे लङ्कायाः अयोध्याम् प्रति ।
सुखेन च निरातङ्काः त्वत्प्रसादात् न संशयः ॥
त्वयि तुष्टः अस्मि भद्रम् ते गच्छ वैश्रवणालयम् ।
मम अनुज्ञाम् समासाद्य सुखी भूत्वा व्रज प्रभो ॥
पुष्पकः प्रत्युवाच इदम् राघवम् प्रीतमानसः ।
यद् आज्ञापयसि राम तत् करिष्ये न संशयः ॥
🛸 पुष्पक विमान का प्रस्थान (श्लोक ६-१०)
प्रदक्षिणम् च कृत्वा उच्चैः जगाम गगनम् प्रति ॥
ततः तस्य प्रस्थानम् दृष्ट्वा सर्वे महाबलाः ।
विस्मयम् परमम् जग्मुः साधु साधु इति वादिनः ॥
रामः अपि सीतया सार्धम् लक्ष्मणेन च वीर्यवान् ।
प्रेक्ष्य विमानम् आकाशे प्रीतिमान् अभवत् तदा ॥
धन्यः अस्मि इति च आह एवम् कुबेरस्य महात्मनः ।
यानम् एतत् समागम्य मया विसृष्टम् आदरात् ॥
एवम् ब्रुवति रामे तु पुष्पकः अन्तर्हितः अभवत् ।
दिशम् उत्तरम् आस्थाय कुबेरस्य निवेशनम् ॥
🙏 राम की अनासक्ति एवं धर्मनिष्ठा (श्लोक ११-१५)
प्रविवेश गृहम् रम्यम् सुग्रीवः च विभीषणः ॥
तेषु प्रविष्टेषु सर्वेषु रामः राज्यम् अकारयत् ।
धर्मेण महता राजन् प्रजाः सर्वाः अपालयत् ॥
न तत्र शोको न ग्लानिः न भयं न च विप्लवः ।
रामे राज्यम् प्रशासति सर्वम् आसीत् सुखाय हि ॥
इदम् पुण्यम् इदम् पापम् इति लोके प्रतिष्ठितम् ।
रामेण धर्मतः सर्वम् प्रजाः अनुचरन्ति स्म ॥
पुष्पकस्य विसर्गः च यथा वृत्तः मया श्रुतः ।
रामस्य धर्मनिष्ठा च कथिता तव सुव्रत ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🚀 अनासक्ति का आदर्श
राम पुष्पक विमान को विदा करके दिखाते हैं कि वे किसी भी वस्तु में आसक्त नहीं हैं। यद्यपि विमान दिव्य और अद्भुत था, फिर भी उन्होंने उसे अपने पास नहीं रखा। यह वैराग्य का उच्चतम रूप है।
💎 धर्म की स्थापना
राम न केवल स्वयं धर्म पर चलते हैं, बल्कि प्रजा को भी धर्ममार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। उनके शासन में यह पुण्य है, यह पाप है का बोध सहज ही हो जाता है।
🧘 कर्तव्यपरायणता
राम जानते हैं कि विमान कुबेर का है, इसलिए उसे लौटाना उनका कर्तव्य है। वे कर्तव्य से कभी विमुख नहीं होते, चाहे वह कितना भी कठोर या साधारण क्यों न हो।
🌟 रामराज्य की अवधारणा
यह सर्ग रामराज्य की झलक दिखाता है—जहाँ सब सुखी हैं, कोई भय नहीं, और धर्म की सर्वत्र स्थापना है। यही आदर्श राज्य की परिभाषा है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें किसी भी वस्तु पर स्वामित्व का अहंकार नहीं करना चाहिए। पराई वस्तु को लौटाना ही धर्म है। सच्चा सुख भोग में नहीं, त्याग में है।