युद्ध काण्ड अध्याय 126

राम का शरभ और गन्धमादन को सम्मानित करना

राम राज्याभिषेक के पश्चात सुग्रीव, अंगद, हनुमान, जाम्बवान, शरभ, गन्धमादन आदि सभी वानरवीरों को उचित सम्मान देते हैं। वे विशेष रूप से शरभ और गन्धमादन की वीरता की प्रशंसा करते हैं तथा उन्हें बहुमूल्य उपहार प्रदान करते हैं।

विवरण

राम के राज्याभिषेक के पश्चात अयोध्या में उत्सव का वातावरण है। राम न केवल अपने परिजनों को, बल्कि उन सभी वानर एवं राक्षस वीरों को भी सम्मानित करते हैं जिन्होंने युद्ध में सहायता की। इसी क्रम में वे शरभ और गन्धमादन नामक दो महान वानर योद्धाओं को विशेष रूप से सम्मानित करते हैं। शरभ ने युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाया था और गन्धमादन ने सेतु निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राम उन्हें हार, अमूल्य वस्त्र तथा आभूषण प्रदान करते हैं तथा उनके योगदान को सभा में सर्वश्रेष्ठ बताते हैं। यह सर्ग राम की कृतज्ञता और उदारता को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १२६

(राम का शरभ और गन्धमादन को सम्मानित करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षड्विंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के राज्याभिषेक के पश्चात अयोध्या में सम्मान समारोह चल रहा है। राम उन सभी वीरों का अभिनन्दन करते हैं जिन्होंने युद्ध में सहायता की। आज वे विशेष रूप से वानरवीर शरभ और गन्धमादन को सम्मानित कर रहे हैं।

🏛️ राम का सम्मान समारोह (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः रामः महातेजाः राज्यस्थः सुसमाहितः ।
सुग्रीवम् अभितः स्थित्वा सर्वान् वानरान् ऐक्षत ॥
शरभः नाम विक्रान्तः गन्धमादन एव च ।
युद्धे अतुल्यपराक्रमौ रामेण समपूजितौ ॥
रामः प्रसन्नवदनः सर्वभूषणभूषितः ।
शरभम् प्रथमम् आहूय इदम् वचनम् अब्रवीत् ॥
शरभ त्वम् महावीर्यः रावणस्य वधे कृते ।
अतुलम् कर्म कृतवान् तेन तुष्टोऽस्मि पुत्रवत् ॥
गन्धमादन वीर त्वम् सेतुबन्धे महाबलः ।
परिश्रमम् च युद्धे च दर्शितम् तत् प्रयत्नतः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महातेजाः = महान तेजस्वी; राज्यस्थः = राज्य में स्थित; सुसमाहितः = अच्छी तरह संयत; सुग्रीवम् = सुग्रीव; अभितः = पास में; स्थित्वा = बैठाकर; सर्वान् = सभी; वानरान् = वानरों को; ऐक्षत = देखा; शरभः = शरभ; नाम = नाम से; विक्रान्तः = पराक्रमी; गन्धमादन = गन्धमादन; एव = ही; च = और; युद्धे = युद्ध में; अतुल्यपराक्रमौ = अद्वितीय पराक्रम वाले; रामेण = राम द्वारा; समपूजितौ = पूजित हुए; रामः = राम; प्रसन्नवदनः = प्रसन्न मुख वाले; सर्वभूषणभूषितः = सर्व आभूषणों से विभूषित; शरभम् = शरभ को; प्रथमम् = पहले; आहूय = बुलाकर; इदम् = यह; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोले; शरभ = हे शरभ; त्वम् = तुम; महावीर्यः = महान वीर; रावणस्य = रावण के; वधे = वध में; कृते = किए गए कार्य से; अतुलम् = अद्वितीय; कर्म = कर्म; कृतवान् = किया है; तेन = उससे; तुष्टः = प्रसन्न; अस्मि = हूँ; पुत्रवत् = पुत्र के समान; गन्धमादन = हे गन्धमादन वीर; त्वम् = तुम; सेतुबन्धे = सेतु के निर्माण में; महाबलः = महान बलशाली; परिश्रमम् = परिश्रम; च = और; युद्धे = युद्ध में; च = और; दर्शितम् = दिखाया; तत् = वह; प्रयत्नतः = प्रयत्नपूर्वक।
📖 भावार्थ : राज्याभिषेक के पश्चात महातेजस्वी राम ने सुग्रीव को पास बिठाकर सभी वानरों की ओर देखा। उनमें शरभ और गन्धमादन नाम के दो वीर थे, जिन्होंने युद्ध में अद्वितीय पराक्रम दिखाया था। राम ने प्रसन्न मुख से सर्वप्रथम शरभ को बुलाया और कहा: "हे शरभ! तुमने रावण के वध में अद्भुत कर्म किया है, उससे मैं पुत्र के समान तुम पर प्रसन्न हूँ।" फिर गन्धमादन से बोले: "हे वीर! तुमने सेतुबन्धन में महान बल दिखाया और युद्ध में भी उत्कृष्ट परिश्रम किया।" यहाँ राम ने दोनों वीरों के विशिष्ट योगदान को रेखांकित किया। इस प्रथम पंचक में राम की कृतज्ञता और उदारता का परिचय मिलता है। राम केवल प्रमुख वानरों को ही नहीं, बल्कि हर उस वीर को पहचानते हैं जिसने संघर्ष में सहयोग दिया। यह उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे छोटे से छोटे योगदान को भी सम्मान देते हैं। शरभ और गन्धमादन जैसे वीर, जिनकी चर्चा पूर्व सर्गों में कम हुई, आज राम की कृपा से अयोध्या की सभा में गौरवान्वित हो रहे हैं। यह सम्मान केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि राम ने उन्हें अपने हृदय से लगाया और उनके बलिदान को अमर कर दिया। इस प्रकार राम ने सबको यह सन्देश दिया कि जो भी धर्म के मार्ग पर साथ देता है, वह सदा पूजनीय है।

⚔️ शरभ और गन्धमादन की वीरगाथा (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
शरभः प्रत्युवाच इदम् राघवम् प्रीतमानसः ।
न मे तुल्यः बले कश्चित् राक्षसेषु नरेषु च ॥
तव प्रसादात् राम अहम् प्राप्तवान् अस्मि सम्पदः ।
यशः कीर्तिम् च विपुलाम् धनम् धान्यम् च शाश्वतम् ॥
गन्धमादनः अपि आह राघवम् प्रश्रितानतः ।
यत् कृतम् तत् मया राजन् सेतुबन्धे न संशयः ॥
युद्धे च राक्षसान् हत्वा प्रीतिम् आप्नोमि ते प्रभो ।
तव प्रसादात् राम अहम् सर्वान् कामान् अवाप्नुयाम् ॥
रामः ताभ्याम् प्रसन्नात्मा ददौ हारान् मनोहरान् ।
वस्त्राणि विविधाकारान् भूषणानि महान्ति च ॥
🔹 पदच्छेद : शरभः = शरभ; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; इदम् = यह; राघवम् = राघव को; प्रीतमानसः = प्रसन्न मन वाला; न = नहीं; मे = मेरे; तुल्यः = समान; बले = बल में; कश्चित् = कोई; राक्षसेषु = राक्षसों में; नरेषु = मनुष्यों में; च = और; तव = तुम्हारे; प्रसादात् = प्रसाद से; राम = हे राम; अहम् = मैं; प्राप्तवान् = प्राप्त किया; अस्मि = हूँ; सम्पदः = सम्पत्तियाँ; यशः = यश; कीर्तिम् = कीर्ति; च = और; विपुलाम् = विपुल; धनम् = धन; धान्यम् = अन्न; च = और; शाश्वतम् = शाश्वत; गन्धमादनः = गन्धमादन; अपि = भी; आह = बोला; राघवम् = राघव को; प्रश्रितानतः = विनम्रतापूर्वक झुककर; यत् = जो; कृतम् = किया; तत् = वह; मया = मैंने; राजन् = हे राजन्; सेतुबन्धे = सेतुबन्धन में; न = नहीं; संशयः = संदेह; युद्धे = युद्ध में; च = और; राक्षसान् = राक्षसों को; हत्वा = मारकर; प्रीतिम् = प्रसन्नता; आप्नोमि = पाता हूँ; ते = तुम्हारी; प्रभो = हे प्रभु; तव = तुम्हारे; प्रसादात् = प्रसाद से; राम = हे राम; अहम् = मैं; सर्वान् = सभी; कामान् = इच्छाओं को; अवाप्नुयाम् = प्राप्त करूँ; रामः = राम ने; ताभ्याम् = उन दोनों को; प्रसन्नात्मा = प्रसन्न मन से; ददौ = दिए; हारान् = हार; मनोहरान् = मनोहर; वस्त्राणि = वस्त्र; विविधाकारान् = विविध आकार वाले; भूषणानि = आभूषण; महान्ति = महान्; च = और।
📖 भावार्थ : शरभ ने प्रसन्न मन से राघव को उत्तर दिया: "हे राम, राक्षसों और मनुष्यों में बल में मेरे समान कोई नहीं है। आपके प्रसाद से ही मैंने यह यश, कीर्ति, धन-धान्य प्राप्त किया है।" तब गन्धमादन ने विनम्रतापूर्वक कहा: "हे राजन्, सेतुबन्धन में मैंने जो कार्य किया, उसमें कोई संदेह नहीं। युद्ध में राक्षसों को मारकर मैं आपको प्रसन्न कर पाया हूँ। आपकी कृपा से ही मैं सब कुछ पा सका।" यह सुनकर राम ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन दोनों को मनोहर हार, विविध वस्त्र और बहुमूल्य आभूषण प्रदान किए। इस द्वितीय पंचक में वीरों की विनम्रता और राम की उदारता का सुन्दर चित्रण है। शरभ और गन्धमादन अपने पराक्रम का श्रेय राम को देते हैं, यह दर्शाता है कि सच्चे वीर अहंकार रहित होते हैं। वे जानते हैं कि उनकी शक्ति का स्रोत राम का आशीर्वाद और धर्म की रक्षा का भाव है। राम भी उनके योगदान को स्वीकार करते हुए उन्हें भौतिक सम्पदा से विभूषित करते हैं। यहाँ यह भी स्पष्ट होता है कि राम के राज्य में योग्यता का सम्मान किया जाता है, चाहे वह किसी भी रूप में हो। शरभ का यह कथन कि वे बल में अद्वितीय हैं, अहंकार न होकर अपने वास्तविक पराक्रम का साक्षी मात्र है, और वे उसे भी राम के चरणों में अर्पित कर देते हैं। यही कारण है कि राम उन पर इतने प्रसन्न होते हैं और उन्हें विशेष सम्मान देते हैं।

🎁 राम का आशीर्वाद और उपहार (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः रामः महाप्राज्ञः शरभाय महात्मने ।
ददौ दिव्यानि वस्त्राणि माल्यानि विविधानि च ॥
गन्धमादन वीराय रत्नानि विविधानि च ।
गजान् अश्वान् रथान् दिव्यान् ग्रामान् देशान् धनानि च ॥
उवाच च महातेजाः प्रीतियुक्तः विशाम्पतिः ।
युष्माकम् बलवीर्येण राक्षसाः निहताः रणे ॥
अहम् च राज्यम् प्राप्तः च धर्मेण सुसमाहितः ।
तस्मात् सर्वे सदा पूज्या मम प्राणसमाः हि यूयम् ॥
एवम् उक्त्वा तु रामः तौ आलिङ्ग्य च मुदा युतः ।
विसर्जयामास तदा स्वम् गृहम् प्रति वीर्यवान् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महाप्राज्ञः = महान बुद्धिमान; शरभाय = शरभ को; महात्मने = महान आत्मा वाले; ददौ = दिया; दिव्यानि = दिव्य; वस्त्राणि = वस्त्र; माल्यानि = मालाएँ; विविधानि = अनेक प्रकार की; च = और; गन्धमादन = गन्धमादन; वीराय = वीर को; रत्नानि = रत्न; विविधानि = अनेक; च = और; गजान् = हाथी; अश्वान् = घोड़े; रथान् = रथ; दिव्यान् = दिव्य; ग्रामान् = गाँव; देशान् = देश; धनानि = धन; च = और; उवाच = बोले; च = और; महातेजाः = महान तेजस्वी; प्रीतियुक्तः = प्रेमयुक्त; विशाम्पतिः = राजा; युष्माकम् = तुम्हारे; बलवीर्येण = बल और पराक्रम से; राक्षसाः = राक्षस; निहताः = मारे गए; रणे = युद्ध में; अहम् = मैं; च = और; राज्यम् = राज्य; प्राप्तः = प्राप्त; च = और; धर्मेण = धर्म से; सुसमाहितः = सुस्थापित; तस्मात् = इसलिए; सर्वे = सब; सदा = सदा; पूज्या = पूजनीय; मम = मेरे; प्राणसमाः = प्राणों के समान; हि = ही; यूयम् = तुम; एवम् = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; तु = फिर; रामः = राम; तौ = उन दोनों को; आलिङ्ग्य = आलिंगन कर; च = और; मुदा = हर्ष से; युतः = युक्त; विसर्जयामास = विदा किया; तदा = तब; स्वम् = अपने; गृहम् = घर; प्रति = की ओर; वीर्यवान् = वीर।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात महाप्राज्ञ राम ने महात्मा शरभ को दिव्य वस्त्र और अनेक प्रकार की मालाएँ भेंट कीं। गन्धमादन वीर को अनेक रत्न, हाथी, घोड़े, दिव्य रथ, गाँव, देश और धन प्रदान किए। तब महातेजस्वी राजा राम प्रेमपूर्वक बोले: "तुम्हारे बल और पराक्रम से ही राक्षस युद्ध में मारे गए और मैंने धर्मपूर्वक यह राज्य प्राप्त किया है। इसलिए तुम सब सदा मेरे पूजनीय हो और मेरे प्राणों के समान हो।" ऐसा कहकर राम ने हर्षपूर्वक उन दोनों को आलिंगन दिया और फिर उन्हें अपने-अपने घर जाने की आज्ञा दी। इस अन्तिम पंचक में राम का वात्सल्य एवं उदार हृदय स्पष्ट झलकता है। वे केवल भौतिक उपहार ही नहीं देते, बल्कि वीरों के हृदय को भी जीत लेते हैं। आलिंगन का क्षण अत्यन्त भावुक है—यह दर्शाता है कि राम अपने सहयोगियों को परिवार के सदस्यों की तरह मानते हैं। गाँव और देश दान में देना उनकी उदारता की पराकाष्ठा है। वे जानते हैं कि इन वीरों ने अपना सब कुछ त्यागकर उनके लिए युद्ध किया, इसलिए वे उन्हें राज्य का अंश देकर सम्मानित करते हैं। साथ ही, यह भी संकेत है कि राम का राज्य सबके सहयोग से चलता है। यह सर्ग हमें सिखाता है कि सच्चा नेता अपने साथियों के योगदान को कभी नहीं भूलता और उन्हें उचित सम्मान देता है। राम का यह चरित्र युगों-युगों तक आदर्श बना रहेगा।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राम की कृतज्ञता

यह सर्ग राम के चरित्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता को उजागर करता है—कृतज्ञता। राम केवल प्रमुख वीरों को ही नहीं, बल्कि शरभ और गन्धमादन जैसे सहायक वीरों को भी सम्मानित करते हैं। यह उनके नेतृत्व कौशल को दर्शाता है।

💡 आदर्श राजा का लक्षण

एक आदर्श राजा वही होता है जो अपने सहयोगियों को उचित सम्मान दे। राम ने न केवल उपहार दिए, बल्कि उन्हें प्राणसमान बताकर उनके आत्मसम्मान को भी बढ़ाया। यह प्रशासन का सर्वोत्तम उदाहरण है।

🧠 वीरों की विनम्रता

शरभ और गन्धमादन अपनी वीरता का श्रेय राम को देते हैं। यह दर्शाता है कि सच्चे वीर अहंकार रहित होते हैं और अपने कर्तव्य को ही सबसे बड़ा मानते हैं।

🌊 युद्ध के पश्चात् सामंजस्य

युद्ध समाप्त होने के बाद सामंजस्य स्थापित करना भी एक बड़ी चुनौती होती है। राम ने सम्मान समारोह के माध्यम से सभी वर्गों को एक सूत्र में बाँध दिया।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने सहयोगियों के योगदान को कभी नहीं भूलना चाहिए। छोटे से छोटे सहयोग का भी सम्मान करना चाहिए। यही सफल नेतृत्व का मूल मंत्र है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे षड्विंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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