राम का शरभ और गन्धमादन को सम्मानित करना
राम राज्याभिषेक के पश्चात सुग्रीव, अंगद, हनुमान, जाम्बवान, शरभ, गन्धमादन आदि सभी वानरवीरों को उचित सम्मान देते हैं। वे विशेष रूप से शरभ और गन्धमादन की वीरता की प्रशंसा करते हैं तथा उन्हें बहुमूल्य उपहार प्रदान करते हैं।
विवरण
राम के राज्याभिषेक के पश्चात अयोध्या में उत्सव का वातावरण है। राम न केवल अपने परिजनों को, बल्कि उन सभी वानर एवं राक्षस वीरों को भी सम्मानित करते हैं जिन्होंने युद्ध में सहायता की। इसी क्रम में वे शरभ और गन्धमादन नामक दो महान वानर योद्धाओं को विशेष रूप से सम्मानित करते हैं। शरभ ने युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाया था और गन्धमादन ने सेतु निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राम उन्हें हार, अमूल्य वस्त्र तथा आभूषण प्रदान करते हैं तथा उनके योगदान को सभा में सर्वश्रेष्ठ बताते हैं। यह सर्ग राम की कृतज्ञता और उदारता को दर्शाता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १२६
(राम का शरभ और गन्धमादन को सम्मानित करना)
🔆 प्रस्तावना : राम के राज्याभिषेक के पश्चात अयोध्या में सम्मान समारोह चल रहा है। राम उन सभी वीरों का अभिनन्दन करते हैं जिन्होंने युद्ध में सहायता की। आज वे विशेष रूप से वानरवीर शरभ और गन्धमादन को सम्मानित कर रहे हैं।
🏛️ राम का सम्मान समारोह (श्लोक १-५)
सुग्रीवम् अभितः स्थित्वा सर्वान् वानरान् ऐक्षत ॥
शरभः नाम विक्रान्तः गन्धमादन एव च ।
युद्धे अतुल्यपराक्रमौ रामेण समपूजितौ ॥
रामः प्रसन्नवदनः सर्वभूषणभूषितः ।
शरभम् प्रथमम् आहूय इदम् वचनम् अब्रवीत् ॥
शरभ त्वम् महावीर्यः रावणस्य वधे कृते ।
अतुलम् कर्म कृतवान् तेन तुष्टोऽस्मि पुत्रवत् ॥
गन्धमादन वीर त्वम् सेतुबन्धे महाबलः ।
परिश्रमम् च युद्धे च दर्शितम् तत् प्रयत्नतः ॥
⚔️ शरभ और गन्धमादन की वीरगाथा (श्लोक ६-१०)
न मे तुल्यः बले कश्चित् राक्षसेषु नरेषु च ॥
तव प्रसादात् राम अहम् प्राप्तवान् अस्मि सम्पदः ।
यशः कीर्तिम् च विपुलाम् धनम् धान्यम् च शाश्वतम् ॥
गन्धमादनः अपि आह राघवम् प्रश्रितानतः ।
यत् कृतम् तत् मया राजन् सेतुबन्धे न संशयः ॥
युद्धे च राक्षसान् हत्वा प्रीतिम् आप्नोमि ते प्रभो ।
तव प्रसादात् राम अहम् सर्वान् कामान् अवाप्नुयाम् ॥
रामः ताभ्याम् प्रसन्नात्मा ददौ हारान् मनोहरान् ।
वस्त्राणि विविधाकारान् भूषणानि महान्ति च ॥
🎁 राम का आशीर्वाद और उपहार (श्लोक ११-१५)
ददौ दिव्यानि वस्त्राणि माल्यानि विविधानि च ॥
गन्धमादन वीराय रत्नानि विविधानि च ।
गजान् अश्वान् रथान् दिव्यान् ग्रामान् देशान् धनानि च ॥
उवाच च महातेजाः प्रीतियुक्तः विशाम्पतिः ।
युष्माकम् बलवीर्येण राक्षसाः निहताः रणे ॥
अहम् च राज्यम् प्राप्तः च धर्मेण सुसमाहितः ।
तस्मात् सर्वे सदा पूज्या मम प्राणसमाः हि यूयम् ॥
एवम् उक्त्वा तु रामः तौ आलिङ्ग्य च मुदा युतः ।
विसर्जयामास तदा स्वम् गृहम् प्रति वीर्यवान् ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👑 राम की कृतज्ञता
यह सर्ग राम के चरित्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता को उजागर करता है—कृतज्ञता। राम केवल प्रमुख वीरों को ही नहीं, बल्कि शरभ और गन्धमादन जैसे सहायक वीरों को भी सम्मानित करते हैं। यह उनके नेतृत्व कौशल को दर्शाता है।
💡 आदर्श राजा का लक्षण
एक आदर्श राजा वही होता है जो अपने सहयोगियों को उचित सम्मान दे। राम ने न केवल उपहार दिए, बल्कि उन्हें प्राणसमान बताकर उनके आत्मसम्मान को भी बढ़ाया। यह प्रशासन का सर्वोत्तम उदाहरण है।
🧠 वीरों की विनम्रता
शरभ और गन्धमादन अपनी वीरता का श्रेय राम को देते हैं। यह दर्शाता है कि सच्चे वीर अहंकार रहित होते हैं और अपने कर्तव्य को ही सबसे बड़ा मानते हैं।
🌊 युद्ध के पश्चात् सामंजस्य
युद्ध समाप्त होने के बाद सामंजस्य स्थापित करना भी एक बड़ी चुनौती होती है। राम ने सम्मान समारोह के माध्यम से सभी वर्गों को एक सूत्र में बाँध दिया।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने सहयोगियों के योगदान को कभी नहीं भूलना चाहिए। छोटे से छोटे सहयोग का भी सम्मान करना चाहिए। यही सफल नेतृत्व का मूल मंत्र है।