युद्ध काण्ड अध्याय 125

राम का गज और गवाक्ष को सम्मानित करना

राम गज और गवाक्ष नामक दो वानर योद्धाओं को सम्मानित करते हैं, जिन्होंने युद्ध में अद्वितीय साहस दिखाया और अनेक राक्षसों का वध किया।

विवरण

गज और गवाक्ष वानर सेना के प्रमुख सेनानायक थे। उन्होंने रावण के पुत्रों और प्रमुख राक्षस योद्धाओं से संघर्ष किया था। राम ने उन्हें बुलाकर उनके पराक्रम की सराहना की – आप दोनों ने जिस प्रकार रण में राक्षसों को छिन्न-भिन्न किया, वह वर्णनीय है। आपके बल ने हमारी जीत सुनिश्चित की। राम ने उन्हें आभूषण, वस्त्र और धन प्रदान किए। उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे सदा सुखी रहें और उनकी वीरता की चर्चा सदा होती रहे। गज और गवाक्ष ने राम की कृपा से स्वयं को धन्य माना और अपने स्थान को प्रस्थान किया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १२५

(राम का गज और गवाक्ष को सम्मानित करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अन्त में राम ने दो और वीर वानरों – गज और गवाक्ष – को सम्मानित किया, जिन्होंने युद्ध में राक्षसों के विरुद्ध अदम्य साहस दिखाया था।

🐒 राम का गज और गवाक्ष को सम्बोधन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामो महातेजा गजं गवाक्षमेव च ।
उवाच परमप्रीतो वानरौ युद्धदुर्मदौ ॥१॥
युवां रणे महावीर्यौ राक्षसानां भयंकरौ ।
निहताश्च महावीर्याः प्रमाथिनो रणाजिरे ॥२॥
गजेन निहतः कुम्भः कुम्भकर्णसुतो बली ।
गवाक्षेण च निहतो महोदरमहापरौ ॥३॥
तौ दृष्ट्वा विस्मितो रामः प्रशशंस पुनः पुनः ।
धन्योऽस्मि यस्य मे युद्धे युवां सहायकौ स्थितौ ॥४॥
गृह्णीतं वरमीशाभ्यां युवां मत्तो यदिच्छथः ॥५॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : राम ने गज और गवाक्ष से कहा – हे युद्धदुर्मद (युद्ध के मद से उन्मत्त) वानरों, तुम दोनों महावीर्यवान हो और राक्षसों के लिए भयानक हो। तुमने रणक्षेत्र में प्रमाथी महावीर्य राक्षसों का वध किया। गज ने कुम्भकर्ण के पुत्र कुम्भ को मारा, और गवाक्ष ने महोदर और महापार्श्व को। उन दोनों को देखकर राम विस्मित हुए और बार-बार प्रशंसा करते हुए बोले – मैं धन्य हूँ, जिसके युद्ध में तुम दोनों सहायक बने। तुम दोनों मुझसे कोई भी वर माँग लो।

⚔️ युद्ध में गज-गवाक्ष के अन्य पराक्रम (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः सुग्रीव आचख्यौ गजगवाक्षयोः पुनः ।
यथा तौ युधि विक्रान्तौ राक्षसानां क्षयंकरौ ॥६॥
गजस्तु रथिनां श्रेष्ठः शरवर्षैरवाकिरत् ।
राक्षसान् सगणान् सर्वान् निजघान च संयुगे ॥७॥
गवाक्षश्च महावीर्यः शूलपट्टिशपाणिना ।
चकार रुधिरोद्गारी राक्षसानां महद्बलम् ॥८॥
न तयोः सदृशो वीर्ये कश्चिदासीत् प्लवंगमः ।
तदा रामो महातेजा बहु मेने तयोर्बलम् ॥९॥
श्रुत्वा रामः प्रशंसन् वै उवाच वचनं शुभम् ॥१०॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : सुग्रीव ने गज और गवाक्ष के और भी पराक्रम बताए – कैसे वे युद्ध में राक्षसों का क्षय करने वाले थे। गज रथियों में श्रेष्ठ थे, उन्होंने शरवर्षों से राक्षसों और उनके गणों को ढक दिया और संहार किया। गवाक्ष ने शूल और पट्टिश धारण कर राक्षसों के महान बल को रुधिरोद्गारी (खून से लथपथ) कर दिया। उन दोनों के समान वीर्यवान कोई वानर नहीं था। राम ने उनके बल की बहुत प्रशंसा की।

🎁 राम द्वारा उपहार और आशीर्वाद (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततो रामः स्वयं ताभ्यां ददौ दिव्यानि वाससी ।
आभरणानि मुख्यानि मणिहेम सुशोभनम् ॥११॥
ग्रामान् बहून् प्रदत्त्वा च गजानश्वान् धनानि च ।
उवाच परमप्रीतो गच्छतं वानरोत्तमौ ॥१२॥
स्वराज्यं प्राप्नुतं वीरौ सुखं वसत सर्वदा ।
मम स्नेहश्च वो नित्यं वर्धतां वानरेश्वरौ ॥१३॥
एवं संपूज्य भगवान् विससर्ज महामतीन् ।
तौ चापि पूजां संप्राप्य जग्मतुः स्वालयं प्रति ॥१४॥
इति श्रीमद्रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥१५॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : तब राम ने स्वयं उन दोनों को दिव्य वस्त्र, मुख्य आभूषण, मणि और सुन्दर स्वर्ण दिए। बहुत से ग्राम, हाथी, घोड़े और धन देकर परम प्रीतिपूर्वक कहा – हे वानरोत्तमो, जाओ। हे वीरो, अपने राज्य को प्राप्त करो, सदा सुखपूर्वक रहो। तुम दोनों वानरेश्वरों के प्रति मेरा स्नेह सदा बढ़ता रहे। इस प्रकार पूजा करके भगवान् ने उन महामतियों को विदा किया। वे दोनों भी पूजा पाकर अपने-अपने घर चले गए। इस प्रकार युद्धकाण्ड का यह एक सौ पच्चीसवाँ सर्ग समाप्त होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🗡️ वीरों का सम्मान

राम ने प्रत्येक वीर का नाम लेकर उनके द्वारा किए गए विशिष्ट कार्यों का स्मरण किया – यह सच्चे नेतृत्व का लक्षण है।

👑 कृतज्ञता

गज और गवाक्ष जैसे योद्धा, जिनका नाम अन्यत्र कम सुनने को मिलता, राम ने उन्हें भी उतना ही महत्त्व दिया जितना सुग्रीव या हनुमान को।

📜 युद्धकाण्ड की समाप्ति

यह युद्धकाण्ड का अन्तिम सर्ग है। इसके बाद उत्तरकाण्ड या फिर अयोध्या प्रत्यागमन का वर्णन होता है।

🌺 सामूहिक विजय

विजय केवल राम की नहीं, बल्कि उन सभी की थी जिन्होंने उनका साथ दिया। यह भाव सर्ग में स्पष्ट है।

🎯 शिक्षा : बड़े से बड़े कार्य में छोटे से छोटे सहयोगी का भी योगदान होता है, उसे भी सम्मान मिलना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।