युद्ध काण्ड अध्याय 124

राम का नल और नील को सम्मानित करना

राम नल और नील की प्रशंसा करते हैं, जिन्होंने समुद्र पर सेतु का निर्माण किया था, जिससे वानर सेना लंका पहुँच सकी।

विवरण

नल विश्वकर्मा के पुत्र थे और नील अग्नि के अंश से उत्पन्न एक प्रमुख वानर सेनापति थे। दोनों ने मिलकर समुद्र पर पुल का निर्माण किया था, जो एक अद्वितीय इंजीनियरिंग चमत्कार था। राम ने उन्हें बुलाकर कहा – तुम्हारे बिना हम लंका नहीं पहुँच सकते थे। तुमने जो सेतु बनाया, वह युगों-युगों तक प्रसिद्ध रहेगा। राम ने उन्हें बहुमूल्य उपहार दिए और आशीर्वाद दिया कि उनकी कीर्ति अमर रहे। नल और नील ने राम की कृपा से स्वयं को धन्य माना।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १२४

(राम का नल और नील को सम्मानित करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुर्विंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अब राम ने उन दो महान वानरों नल और नील को सम्मानित किया, जिनके अद्भुत शिल्प-कौशल से समुद्र पर सेतु का निर्माण संभव हुआ और वानर सेना लंका तक पहुँच सकी।

🌉 राम का नल-नील को सम्बोधन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामो महातेजा नलं नीलं च वानरौ ।
उवाच परमप्रीतः शिल्पिनौ संशितव्रतौ ॥१॥
युवाभ्यां निर्मितः सेतुः सागरे वरुणालये ।
येन संपारिता सेना वानरी भीमविक्रमा ॥२॥
न हि शक्यमिदं कर्तुं विश्वकर्मणा स्वयम् ।
युवयोः सदृशं शिल्पं न भूतं न भविष्यति ॥३॥
अद्यप्रभृति लोकेऽस्मिन् सेतुबन्ध इति श्रुतः ।
युवयोः कीर्तिमुत्सृज्य स्थास्यतीह न संशयः ॥४॥
गृह्णीतं वरमीशाभ्यां युवां मत्तो यदिच्छथः ॥५॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : राम ने नल और नील से कहा – हे वानरों, हे शिल्पियों, हे दृढ़व्रतियों, तुम दोनों से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुमने वरुण के आवास सागर पर जो सेतु बनाया, उससे भीमविक्रम वानरी सेना पार हो गई। यह कार्य स्वयं विश्वकर्मा से भी नहीं हो सकता था। तुम दोनों के समान शिल्प न तो भूतकाल में हुआ और न भविष्य में होगा। आज से इस लोक में यह सेतु सेतुबन्ध के नाम से जाना जाएगा और तुम्हारी कीर्ति को फैलाता रहेगा। तुम दोनों मुझसे कोई भी वर माँग लो।

🏗️ सेतु निर्माण का वर्णन और उसकी उपयोगिता (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः सुग्रीव आचख्यौ नलनीलकृतं महत् ।
यथा तौ शिल्पिनां श्रेष्ठौ सेतुं बद्ध्वा सुदुष्करम् ॥६॥
नलो विश्वकर्मसूनुः शिल्पज्ञो वानरेश्वरः ।
नीलश्चाग्निसुतस्तेजस्वी तौ चकार महत् किल ॥७॥
पाषाणान् पातयामासुः शतशोऽथ सहस्रशः ।
द्रोणशैलान् वनस्पतीन् यन्त्रयुक्त्या सुयन्त्रितम् ॥८॥
तेन सेतुना दुर्गेण तीर्त्वा सागरमव्ययम् ।
लंकां प्राप्य रणे हत्वा रावणं सह बान्धवम् ॥९॥
श्रुत्वा रामोऽब्रवीत् प्रीतः कृतमेतन्महात्मभिः ॥१०॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : तब सुग्रीव ने नल और नील के उस महान् कार्य का वर्णन किया – कैसे उन श्रेष्ठ शिल्पियों ने दुष्कर सेतु बाँधा। नल विश्वकर्मा के पुत्र थे और शिल्प में निपुण वानरेश्वर थे, और नील अग्निपुत्र तेजस्वी थे। उन्होंने शतों-सहस्रों पत्थर, द्रोण पर्वतों, वृक्षों को यन्त्र-युक्ति से व्यवस्थित करके गिराया। उस दुर्गम सेतु से सागर पार करके लंका पहुँचकर युद्ध में रावण और उसके बन्धुओं को मारा। यह सुनकर राम ने प्रसन्न होकर कहा – यह महान् कार्य महात्माओं ने किया है।

🎁 राम द्वारा उपहार और आशीर्वाद (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततो रामः स्वयं दिव्यौ ददौ ताभ्यां नलाय च ।
नीलाय च महार्हाणि वासांसि विविधानि च ॥११॥
रत्नानि च महार्हाणि केयूराणि च कुण्डले ।
ग्रामान् बहून् प्रदत्त्वा च गजाश्वरथसम्पदः ॥१२॥
उवाच च महातेजा युवां कीर्त्या दिवं गतौ ।
सेतुबन्धश्च युवयोः प्रख्यातो भुवि शाश्वतः ॥१३॥
गच्छतं स्वपुरं वीरौ सुखिनौ सर्वदा भवम् ।
मम स्मृतिं च कुर्वन्तौ स्थास्यथः पृथिवीतले ॥१४॥
एवं संपूज्य भगवान् विससर्ज नलं नीलम् ॥१५॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : फिर राम ने स्वयं नल और नील को दिव्य एवं महार्ह वस्त्र, विविध वस्त्र, रत्न, केयूर, कुण्डल, बहुत से ग्राम, हाथी-घोड़े-रथों की सम्पदा प्रदान की। तथा कहा – हे महातेजस्वियों, तुम अपनी कीर्ति से स्वर्ग पहुँच गए। तुम्हारा सेतुबन्ध पृथ्वी पर सदा प्रख्यात रहेगा। हे वीरों, अपने-अपने पुर को जाओ, सदा सुखी रहो। पृथ्वी पर मेरी स्मृति करते हुए रहोगे। ऐसा कहकर भगवान् ने नल और नील को विदा किया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🛠️ कौशल का सम्मान

राम ने युद्ध के वीरों के साथ-साथ शिल्पकारों का भी सम्मान किया, यह दर्शाता है कि समाज के सभी वर्गों का योगदान महत्त्वपूर्ण है।

🌍 कीर्ति की अमरता

राम ने कहा कि सेतुबन्ध सदा प्रसिद्ध रहेगा – यह वचन आज भी सत्य है, रामेश्वरम का सेतु आज भी पूजनीय है।

🤲 निष्काम कर्म

नल और नील ने बिना किसी अपेक्षा के यह कार्य किया, पर राम ने उन्हें यथोचित पुरस्कार दिया।

🔧 दिव्य शिल्प

विश्वकर्मा पुत्र नल में दिव्य शिल्प कला थी। राम ने उसका उचित मूल्यांकन किया।

🎯 शिक्षा : समाज में प्रत्येक व्यक्ति के कौशल का उचित मूल्यांकन और सम्मान होना चाहिए, चाहे वह योद्धा हो या शिल्पकार।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे चतुर्विंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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