युद्ध काण्ड अध्याय 123

राम का मैन्द और द्विविद को सम्मानित करना

राम मैन्द और द्विविद नामक दो वानर योद्धाओं को सम्मानित करते हैं, जिन्होंने युद्ध में अद्वितीय पराक्रम दिखाया था।

विवरण

मैन्द और द्विविद अश्विनीकुमारों के पुत्र थे और अत्यन्त बलशाली वानर थे। उन्होंने युद्ध में अनेक राक्षसों का संहार किया था। राम ने उन्हें बुलाकर कहा कि आप दोनों भाइयों ने जिस प्रकार एक साथ युद्ध किया, वह अद्वितीय है। आपकी शक्ति और साहस ने हमारी सेना को बल दिया। राम ने उन्हें बहुमूल्य आभूषण, वस्त्र और धन प्रदान किए। साथ ही उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे सदा सुखी रहें और उनकी कीर्ति अक्षय रहे। मैन्द और द्विविद ने राम की कृपा स्वीकार की और प्रसन्न होकर अपने स्थान को लौट गए।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १२३

(राम का मैन्द और द्विविद को सम्मानित करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने अब उन दो वीर वानर भाइयों – मैन्द और द्विविद – को सम्मानित किया, जो अश्विनीकुमारों के पुत्र थे और जिन्होंने युद्ध में अपूर्व शौर्य दिखाया था।

🐒 राम का मैन्द और द्विविद को सम्बोधन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामो महातेजा मैन्दद्विविदावब्रवीत् ।
आगच्छतं सुविक्रान्तौ युवां युद्धेऽतिमानितौ ॥१॥
युवाभ्यां सहितः सैन्ये राक्षसानां भयंकरौ ।
कृतौ युधि न संदेहो निहताश्च निशाचराः ॥२॥
युवयोः सदृशं वीर्यं नान्यः कर्तुं क्षमो भुवि ।
अद्यप्रभृति मे प्रीतौ युवां भ्रातरावुत्तमौ ॥३॥
यदिच्छथो महावीर्यौ तद् गृह्णीतं वरं मम ।
धनानि रत्नानि चैव वासांसि विविधानि च ॥४॥
तौ प्रणम्य महात्मानौ प्रत्यूचतुर्मुदान्वितौ ।
त्वया प्रसन्ने भगवन् कृतार्थौ स्मः सलक्ष्मण ॥५॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : राम ने सुविक्रान्त (सुन्दर पराक्रम वाले) मैन्द और द्विविद से कहा – आप दोनों युद्ध में अत्यन्त सम्मानित हुए। आप दोनों के साथ सेना में रहकर राक्षस भयभीत हो गए थे। युद्ध में संदेह नहीं, निशाचर मारे गए। आप दोनों के समान वीर्य इस पृथ्वी पर और कोई नहीं कर सकता। आज से आप दोनों मेरे परम प्रिय भाई हैं। हे महावीर्यवानों, तुम जो चाहो मुझसे वर ग्रहण करो, धन, रत्न, वस्त्र आदि। तब वे दोनों महात्मा प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक बोले – हे भगवन्, हे लक्ष्मणसहित राम, आपके प्रसन्न होने से हम कृतार्थ हो गए।

⚔️ युद्ध में मैन्द और द्विविद के कारनामे (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः सुग्रीव आख्यातुमुपचक्रमे वीर्यम् ।
यथा तौ युधि विक्रान्तौ राक्षसानां भयंकरौ ॥६॥
एक एव महाकायो मैन्दो रणविशारदः ।
निजघान रणे क्रुद्धो राक्षसान् सपदानुगान् ॥७॥
द्विविदश्च महावीर्यः परिघान् प्रासशक्तिभिः ।
पोथयामास संग्रामे रथिनश्च महारथान् ॥८॥
न तयोः सदृशं किंचिद्बलं दृष्ट्वा तदा रणे ।
प्रशशंसुर्वरारोहाः सिद्धचारणगुह्यकाः ॥९॥
श्रुत्वा तद् भगवान् रामः प्रहसन् प्रत्यभाषत ।
सत्यमेव महावीर्यौ युवां नास्त्यत्र संशयः ॥१०॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : इस बीच सुग्रीव ने युद्ध में उन दोनों के पराक्रम का वर्णन करना प्रारम्भ किया। उन्होंने बताया कि कैसे महाकाय मैन्द ने क्रोध में आकर राक्षसों और उनके अनुयायियों का संहार किया। द्विविद ने परिघों, प्रासों और शक्तियों से रथियों और महारथियों को युद्ध में नष्ट किया। उन दोनों के समान बल युद्ध में किसी ने नहीं देखा। सिद्ध, चारण और गुह्यक उनकी प्रशंसा करते थे। यह सुनकर राम मुस्कुराए और बोले – सचमुच तुम दोनों महावीर्यवान हो, इसमें संशय नहीं।

🎁 राम द्वारा उपहार और विदाई (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततो रामः स्वयं ताभ्यां ददौ माल्यानि भूषणम् ।
वस्त्रयुग्मं च विपुलं मणिहेम सुशोभनम् ॥११॥
ग्रामान् बहून् प्रदत्त्वा च गजानश्वान् धनानि च ।
उवाच परमप्रीतो गच्छतं वानरोत्तमौ ॥१२॥
स्वराज्यं प्राप्नुतं वीरौ सुखं वसत सर्वदा ।
मम स्नेहश्च वो नित्यं वर्धतां वानरेश्वरौ ॥१३॥
एवं संपूज्य भगवान् विससर्ज महामतीन् ।
तौ चापि पूजां संप्राप्य जग्मतुः स्वालयं प्रति ॥१४॥
इति श्रीमद्रामायणे युद्धकाण्डे त्रयोविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥१५॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : तब राम ने स्वयं उन दोनों को माल्य, आभूषण, विपुल वस्त्रयुग्म, मणि और सुन्दर हेम (स्वर्ण) प्रदान किए। बहुत से ग्राम, हाथी, घोड़े और धन देकर परम प्रीतिपूर्वक कहा – हे वानरोत्तमो, जाओ। हे वीरो, अपने राज्य को प्राप्त करो, सदा सुखपूर्वक रहो। तुम दोनों वानरेश्वरों के प्रति मेरा स्नेह सदा बढ़ता रहे। इस प्रकार पूजा करके भगवान् ने उन महामतियों को विदा किया। वे दोनों भी पूजा पाकर अपने-अपने घर चले गए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👥 सामूहिक शक्ति

मैन्द और द्विविद दो भाई थे, जिन्होंने एक साथ मिलकर युद्ध किया। राम ने उनकी सामूहिक वीरता की प्रशंसा की।

🙌 देवांश का गौरव

अश्विनीकुमारों के पुत्र होने के कारण उनमें दिव्य शक्ति थी। राम ने उनकी दिव्यता का सम्मान किया।

🎁 उदारता

राम ने उन्हें केवल भावनात्मक रूप से ही नहीं, भरपूर भौतिक संसाधन देकर भी सम्मानित किया।

🚩 प्रेरणास्रोत

उनके पराक्रम का वर्णन सुग्रीव करते हैं, जिससे अन्य योद्धा भी प्रेरणा ले सकें। यह एक प्रकार की मान्यता है।

🎯 शिक्षा : पराक्रमी सहयोगी ही विजय की आधारशिला होते हैं। उनका उचित सम्मान करना नेता का कर्तव्य है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे त्रयोविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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