युद्ध काण्ड अध्याय 122

राम का ऋक्षराज को सम्मानित करना

राम ऋक्षराज (भालुओं के राजा) को बुलाकर उनकी वीरता और निष्ठा की प्रशंसा करते हैं। उन्हें उपहार देते हैं और आशीर्वाद देते हैं।

विवरण

ऋक्षराज, जो भालुओं के अधिपति हैं, ने युद्ध में अदम्य साहस दिखाया था। राम ने उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया क्योंकि उन्होंने अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ राम का साथ दिया था। राम ने कहा कि आपके बिना यह विजय संभव नहीं थी। आपने जिस प्रकार राक्षसों से संघर्ष किया, वह अविस्मरणीय है। राम ने उन्हें बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और रत्न भेंट किए। ऋक्षराज ने विनम्रतापूर्वक उन्हें स्वीकार किया और राम के चरणों में अपनी भक्ति अर्पित की। यह सर्ग राम की उदारता और सेना के प्रति आदर को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १२२

(राम का ऋक्षराज को सम्मानित करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्वाविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : विजय के उपरान्त राम ने ऋक्षराज (भालुओं के राजा) को भी सम्मानित किया, जिन्होंने अपनी समस्त सेना सहित राम के लिए अदम्य शौर्य का प्रदर्शन किया था।

🐻 राम द्वारा ऋक्षराज का अभिनन्दन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामो महाप्राज्ञ ऋक्षराजमथाब्रवीत् ।
उपसर्प महाबाहो पूजां गृहाण शोभनाम् ॥१॥
त्वया राजन् कृतं कर्म सुदुष्करमरिन्दम ।
यद्बलेन समेत्याजौ राक्षसानां बलं हतम् ॥२॥
त्वद्बलेन वयं सर्वे तारिताः शत्रुसङ्कटात् ।
धन्योऽस्मि यस्य मे सख्यं भवान् प्राप्तो वनौकसाम् ॥३॥
अद्यप्रभृति मे राजन् प्रियस्त्वं नात्र संशयः ।
यदिच्छसि महाराज तद्गृहाण नमोऽस्तु ते ॥४॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच ऋक्षराजो महामतिः ।
प्रसाद एव राजेन्द्र त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥५॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : राम ने ऋक्षराज से कहा – हे महाबाहो, हे राजन्, मेरे समीप आइए और मेरी ओर से यह सत्कार स्वीकार कीजिए। आपने युद्ध में अत्यन्त दुष्कर कार्य किया है। आप अपने बल से राक्षसों की सेना से जा भिड़े और उनका संहार किया। आपके बल से हम सब शत्रुओं के संकट से पार हुए हैं। मैं धन्य हूँ कि आप जैसे वनवासी ने मुझसे मित्रता की। आज से आप मेरे अत्यन्त प्रिय हैं, इसमें संशय नहीं। हे राजन्, आप जो चाहें वह ग्रहण करें, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। ऋक्षराज ने उत्तर दिया – हे राजेन्द्र, आपकी कृपा ही सब कुछ है, सब कुछ आपमें ही प्रतिष्ठित है।

⚔️ ऋक्षराज के पराक्रम का वर्णन (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः स्मरन् रामवाक्यं लक्ष्मणः प्रत्यभाषत ।
भ्रातः शृणु यथा राज्ञा ऋक्षराजेन संयुगे ॥६॥
निहता राक्षसाः शूराः कोटिशोऽथ सहस्रशः ।
न च कश्चिद्विचेष्टन्तं दृष्ट्वा तं समरे स्थितम् ॥७॥
अहमप्यनुगच्छामि विक्रमं तस्य धीमतः ।
यदि नाम भवेद् वीर्यं तादृशं मम संप्रति ॥८॥
तच्छ्रुत्वा रामः प्रहसन्नुवाच लक्ष्मणं वचः ।
सत्यमाह महाबाहो ऋक्षराजो महाबलः ॥९॥
न तुल्यो विद्यते लोके वीर्ये बुद्धौ च तेन वै ।
इत्युक्त्वा भगवान् रामस्तूष्णीमासीत् समाहितः ॥१०॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : इस अंश में लक्ष्मण राम के समक्ष ऋक्षराज के पराक्रम का स्मरण करते हैं। वे कहते हैं – भ्राता श्रीराम, सुनिए कि किस प्रकार ऋक्षराज ने युद्ध में कोटि-कोटि शूरवीर राक्षसों का संहार किया। उन्हें युद्ध में कभी किसी ने विचलित नहीं देखा। लक्ष्मण कहते हैं – यदि मुझमें भी उनके समान वीर्य होता, तो मैं भी उनका अनुसरण करता। यह सुनकर राम मुस्कुराए और बोले – हे लक्ष्मण, तुमने सत्य कहा, ऋक्षराज महाबली हैं। उनके समान वीर्य और बुद्धि में संसार में कोई नहीं है। फिर राम मौन हो गए।

🎁 राम द्वारा उपहार और आशीर्वाद (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततो रामो महातेजा ऋक्षराजाय धीमते ।
ददौ वस्त्रयुगं चित्रं मणिकुण्डलमुत्तमम् ॥११॥
केयूरांगदकेयूरान् हारान् विविधभूषणान् ।
रत्नानि च महार्हाणि यानानि शयनानि च ॥१२॥
ग्रामांश्च बहवो दत्त्वा सुवर्णं रजतं तथा ।
प्रीतिपूर्वमिदं वाक्यमुवाच परमं वचः ॥१३॥
गच्छ राजन् स्वकं राज्यं सुखी भव सदा प्रिय ।
मयि भक्तिश्च ते नित्या वर्धतां शत्रुसूदन ॥१४॥
इत्युक्त्वा भगवान् रामः पूजयित्वा व्यसर्जयत् ।
ऋक्षराजोऽपि संप्राप्य पूजां प्रीतो वनं ययौ ॥१५॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : फिर राम ने ऋक्षराज को चित्र-विचित्र वस्त्रयुग्म, उत्तम मणिकुण्डल, केयूर, अंगद, हार, विविध आभूषण, बहुमूल्य रत्न, यान और शयनाएँ भेंट कीं। उन्हें अनेक ग्राम, सुवर्ण और रजत भी दिए। फिर प्रेमपूर्वक यह परम वचन कहे – हे राजन्, हे प्रिय, आप अपने राज्य को जाइए, सदा सुखी रहिए। मुझमें आपकी भक्ति सदा बढ़ती रहे, हे शत्रुओं का संहार करने वाले। ऐसा कहकर राम ने उनकी पूजा की और उन्हें विदा किया। ऋक्षराज भी पूजा पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और अपने वन को चले गए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤝 नेतृत्व का गुण

राम ने अपने सहयोगियों को उचित सम्मान देकर आदर्श नेतृत्व प्रस्तुत किया। उन्होंने ऋक्षराज की वीरता को सर्वजन के समक्ष उद्घोषित किया।

🛡️ विनम्रता

ऋक्षराज ने सम्मान पाकर भी विनम्रता दिखाई और सब कुछ राम की कृपा माना। यह सत्पात्र का लक्षण है।

📿 भक्ति का महत्त्व

राम ने अन्त में ऋक्षराज के लिए भक्ति की नित्य वृद्धि की कामना की – यह दर्शाता है कि भक्ति ही सर्वोपरि है।

🏆 उचित पुरस्कार

राम ने केवल भावनात्मक सम्मान ही नहीं दिया, अपितु भौतिक वस्तुएँ भी प्रदान कीं, जिससे युद्ध में सहयोग का उचित मूल्य चुकाया गया।

🎯 शिक्षा : सच्चा नेता अपने साथियों के योगदान को कभी नहीं भूलता। उनका सम्मान करना और उन्हें उचित पुरस्कार देना सफल सहयोग की नींव है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे द्वाविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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