युद्ध काण्ड अध्याय 121

राम का जाम्बवान् को सम्मानित करना

राम विजयी होने के बाद सेना के सभी प्रमुख वीरों का सम्मान करते हैं। इस सर्ग में वे जाम्बवान् की वीरता, बुद्धि और समर्पण की प्रशंसा करते हुए उन्हें हृदय से लगाते हैं और आशीर्वाद देते हैं।

विवरण

रावण का वध होने और अयोध्या लौटने की तैयारी के बीच श्रीराम अपने सभी सहयोगियों का यथोचित सम्मान करना चाहते थे। सबसे पहले उन्होंने जाम्बवान् को बुलाया, जिन्होंने अपनी अद्वितीय बुद्धि, अनुभव और शारीरिक शक्ति से युद्ध में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। जाम्बवान् ने ही संजीवनी बूटी लाने के लिए हनुमान को प्रेरित किया और लक्ष्मण को मूर्छा से उबारने में महती भूमिका निभाई। राम ने जाम्बवान् के गौरवशाली अतीत – वामन अवतार के समय तीनों लोकों की परिक्रमा करने वाले उनके कार्य – को याद करते हुए उन्हें भगवान् का अंश बताया। उन्होंने कहा कि आपकी सेवा के कारण ही हम विजयी हुए। राम ने जाम्बवान् को आलिंगन दिया और उनके दीर्घजीवी होने का आशीर्वाद दिया। यह सर्ग भक्त और भगवान के बीच के अटूट संबंध को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १२१

(राम का जाम्बवान् को सम्मानित करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण-वध के पश्चात श्रीराम अपने सभी सहायकों का सम्मान करना चाहते थे। सबसे पहले उन्होंने जाम्बवान् को बुलाया, जो सेना के सबसे वयोवृद्ध, बुद्धिमान और बलशाली नेता थे।

🦁 जाम्बवान् का आह्वान और राम का सम्बोधन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामो महातेजा जाम्बवन्तमभाषत ।
आगच्छ भद्र शैलेय युद्धेऽस्मिन् दुष्करं कृतम् ॥१॥
त्वया गुह्यक शार्दूल सान्निध्यं च कृतं मम ।
लक्ष्मणस्य च संजीव्या हरीत्वा चौषधीगिरिम् ॥२॥
त्वमेव धन्विनां श्रेष्ठः सर्वेषां प्राणदो भवान् ।
यदर्थे यत्नमातिष्ठंस्त्वं हि मे प्रियसख्यकः ॥३॥
प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते वरं वरय सुव्रत ।
इत्युक्त्वा भगवान् रामो जाम्बवन्तमपूजयत् ॥४॥
जाम्बवान् प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रत्युवाच महामतिः ।
त्वयि प्रसन्ने भगवन् किं वरैः सर्वकामदैः ॥५॥
🔹 पदच्छेद : (संक्षेप में) राम ने जाम्बवान् से कहा – हे भद्र, हे शैलेय (पर्वत-निवासी), इस युद्ध में तुमने असंभव कार्य किया। तुमने मेरा सान्निध्य दिया, लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लाने हेतु औषधि-पर्वत उठाया। तुम धनुर्धारियों में श्रेष्ठ हो, सबके प्राणदाता हो। मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ, तुम कल्याण प्राप्त करो, कोई वर माँगो। जाम्बवान् ने हाथ जोड़कर कहा – हे भगवन्, आपके प्रसन्न होने पर सर्वकामदायक वरों की क्या आवश्यकता?
📖 भावार्थ (विस्तृत) : इस सर्ग के प्रारम्भ में श्रीराम जाम्बवान् को सम्बोधित करते हैं। वे उन्हें शैलेय कहते हैं, क्योंकि जाम्बवान् ऋक्षराज हैं और पर्वतों में निवास करते हैं। राम उनके युद्ध में किए गए अद्भुत कार्यों का स्मरण कराते हैं – सबसे बड़ा कार्य था जब लक्ष्मण मूर्छित हुए और हनुमान संजीवनी हिमालय से लाने गए, परन्तु जड़ी-बूटी पहचानने में असमर्थ थे, तब जाम्बवान् ने अपने अगाध ज्ञान से उन्हें पूरा द्रोण पर्वत ही उठा लाने का उपदेश दिया। यह केवल शारीरिक बल का नहीं, बुद्धि और अनुभव का परिचय था। राम कहते हैं – तुम्हारे कारण ही लक्ष्मण को पुनर्जीवन मिला, इसलिए तुम सबके प्राणदाता हो। राम ने जाम्बवान् को अपना अत्यन्त प्रिय सखा बताते हुए वरदान माँगने को कहा। जाम्बवान् ने भक्तिपूर्वक उत्तर दिया कि आपकी कृपा से ही सब कुछ प्राप्त है, मैं और क्या माँगूँ? यह संवाद भक्त और भगवान के मध्य अद्भुत प्रेम को दर्शाता है।

📜 राम द्वारा जाम्बवान् के गौरवशाली अतीत का स्मरण (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
रामः प्रोवाच धर्मज्ञ शृणु त्वं वचनं मम ।
वामनस्यावतारे त्वं त्रेतायुगमुखे पुरा ॥६॥
बद्ध्वा बलिं महावीर्यं चक्रवर्तिनमाहवे ।
त्रीन् लोकान् प्रददौ विष्णुः पदत्रयमिति प्रभुः ॥७॥
तदा त्वं परिक्रम्यैव लोकान् सर्वान् सनातनान् ।
प्राप्तवान् परमं स्थानं विष्णोरनुचरो भवान् ॥८॥
स त्वमद्य मया सार्धं वैरं कृत्वा निशाचरैः ।
कृतकृत्योऽसि धर्मज्ञ गच्छ स्वस्ति पुरं प्रति ॥९॥
जाम्बवान् प्राह देवेश नाहं यास्यामि साम्प्रतम् ।
यावद् राम त्वया सार्धमयोध्यां न गमिष्यसि ॥१०॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : इस खण्ड में राम जाम्बवान् के प्राचीन गौरव का स्मरण करते हैं। वे कहते हैं कि हे धर्मज्ञ, पूर्व त्रेतायुग में जब भगवान् वामन अवतार में थे, तब आपने उनके साथ रहकर महावीर्य चक्रवर्ती राजा बलि को बाँधने में सहायता की थी। विष्णु ने तीन पगों में तीनों लोक नाप लिए थे। उस समय आपने सभी लोकों की परिक्रमा की थी और विष्णु के अनुचर होने का परम स्थान प्राप्त किया था। राम कहते हैं – वही आप आज मेरे साथ राक्षसों से युद्ध करके कृतकृत्य हो गए। अब आप सकुशल अपने घर (पुरी) लौट सकते हैं। यह सुनकर जाम्बवान् भावुक हो जाते हैं और कहते हैं – हे देवेश, मैं तब तक नहीं लौटूँगा जब तक आपके साथ अयोध्या नहीं जाता। यह उनकी अनन्य भक्ति को दर्शाता है।

🤗 राम द्वारा जाम्बवान् को आलिंगन और आशीर्वाद (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रामः प्रहसिताननः ।
उत्थाय भुजयोरष्टौ जाम्बवन्तमधारयत् ॥११॥
परिष्वज्य च बाहुभ्यां ददौ चाशीर्भिरर्चितम् ।
चिरं जीवेति होवाच धर्मे च स्थिरतामिति ॥१२॥
यशश्च ते सदा भूयाद्बुद्धिश्चापि सनातनी ।
मयि चापि तव प्रीतिरव्यभिचारिणी भवेत् ॥१३॥
इत्युक्त्वा भगवान् रामो जाम्बवन्तमपूजयत् ।
रत्नानि विविधान्यस्य प्रददौ च महाधनम् ॥१४॥
जाम्बवान् प्रतिगृह्याथ पूजितो राघवेण च ।
मेने स्वमात्मानं धन्यं कृतार्थं च न संशयः ॥१५॥
📖 भावार्थ (विस्तृत) : जाम्बवान् की बात सुनकर राम प्रसन्न हुए। वे उठे और अपनी दोनों भुजाओं से जाम्बवान् को (जो भालू के रूप में थे, परन्तु राम ने उन्हें आत्मीयता से गले लगाया) आलिंगन दिया। उन्होंने आशीर्वाद दिया – तुम चिरंजीवी रहो, धर्म में स्थिर रहो, तुम्हारा यश सदा बढ़ता रहे, तुम्हारी बुद्धि सनातनी (शाश्वत) बनी रहे, और मुझमें तुम्हारी प्रीति कभी समाप्त न हो। यह आशीर्वाद बहुत महत्वपूर्ण है – राम ने जाम्बवान् की बुद्धि और धर्मनिष्ठा की सराहना की। इसके बाद राम ने जाम्बवान् को बहुमूल्य रत्न और अपार धन भेंट किया। जाम्बवान् ने उन्हें ग्रहण किया और स्वयं को धन्य तथा कृतार्थ समझा। यह सर्ग राम की कृतज्ञता और जाम्बवान् की निष्काम भक्ति का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙏 कृतज्ञता का आदर्श

राम स्वयं भगवान् होते हुए भी अपने भक्तों के किए हुए उपकारों को स्मरण रखते हैं और उनका सम्मान करते हैं। यह शास्त्रों में सर्वोत्तम आदर्श है।

🧠 बुद्धि और अनुभव की विजय

जाम्बवान् ने युद्ध में शारीरिक बल से अधिक बुद्धि और अनुभव से कार्य किया – संजीवनी का ज्ञान, हनुमान को मार्गदर्शन। राम ने इसकी विशेष रूप से प्रशंसा की।

🕉️ अवतारों में एकता

राम ने जाम्बवान् के वामनावतार के समय के कार्यों का स्मरण किया, जिससे यह सिद्ध होता है कि एक ही भगवान् विभिन्न अवतार लेते हैं और उनके भक्त युगों-युगों से उनके साथ रहते हैं।

🌺 भक्त की अभिलाषा

जाम्बवान् ने वर माँगने से इन्कार कर दिया और राम के साथ अयोध्या चलने की इच्छा व्यक्त की। यह भक्त का परम सौभाग्य है – भगवान् के सान्निध्य की कामना।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सेवा और भक्ति का पुरस्कार भगवान् स्वयं अपने सान्निध्य और आशीर्वाद से देते हैं। सच्चा सम्मान विनम्रता और प्रेम से दिया जाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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