युद्ध काण्ड अध्याय 120

राम का अंगद को सम्मानित करना

राम अंगद के साहस, बुद्धि और वीरता की प्रशंसा करते हैं, विशेष रूप से रावण के दरबार में उनके दूतत्व की। अंगद को सम्मानित करते हैं और आशीर्वाद देते हैं।

विवरण

राम ने अंगद को बुलाकर उनके अद्वितीय साहस का स्मरण किया, जब वे रावण के दरबार में दूत बनकर गए थे और अपनी बुद्धि से राक्षसों को चुनौती दी थी। राम ने अंगद के बल, पराक्रम और निष्ठा की सराहना की। अंगद ने विनम्रतापूर्वक राम की स्तुति की और उनके प्रति अपनी भक्ति व्यक्त की। राम ने अंगद को आशीर्वाद दिया कि वे सदा सम्मानित रहेंगे। यह सर्ग वीरता और कूटनीति का उत्कृष्ट उदाहरण है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १२०

(राम का अंगद को सम्मानित करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ विंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : युद्ध के बाद राम ने सभी वीरों का यथोचित सम्मान किया। अब वे अंगद को बुलाते हैं, जिन्होंने रावण के दरबार में दूत बनकर अद्वितीय साहस और बुद्धि का परिचय दिया था।

🦁 राम द्वारा अंगद के साहस की प्रशंसा (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामो महातेजा अङ्गदं समभाषत ।
अङ्गद त्वत्कृतं कर्म स्मरामि सुमहत् प्रियम् ॥
रावणस्य सभामध्ये गत्वा यत् साहसं कृतम् ।
यत्र रक्षांसि दुर्धर्षा भवता तर्जितानि च ॥
बालेनापि त्वया वीर्यं दर्शितं रावणस्य ह ।
न त्वादृशो मया दृष्टः कश्चिदन्यः प्लवंगमः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; रामः = राम; महातेजाः = महातेजस्वी; अङ्गदम् = अंगद को; समभाषत = बोले; अङ्गद = हे अंगद; त्वत्कृतम् = तुम्हारे द्वारा किया हुआ; कर्म = कार्य; स्मरामि = स्मरण करता हूँ; सुमहत् = बहुत महान; प्रियम् = प्रिय; रावणस्य = रावण की; सभामध्ये = सभा के मध्य में; गत्वा = जाकर; यत् = जो; साहसम् = साहस; कृतम् = किया; यत्र = जहाँ; रक्षांसि = राक्षस; दुर्धर्षा = दुर्धर्ष; भवता = आपके द्वारा; तर्जितानि = धमकाए गए; च = और; बालेन = बालक होते हुए; अपि = भी; त्वया = तुमने; वीर्यम् = वीरता; दर्शितम् = दिखाई; रावणस्य = रावण की; ह = ही; न = नहीं; त्वादृशः = तुम्हारे समान; मया = मैंने; दृष्टः = देखा; कश्चित् = कोई; अन्यः = अन्य; प्लवंगमः = वानर।
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने अंगद से कहा, "हे अंगद! मैं तुम्हारे उस महान और प्रिय कार्य को स्मरण करता हूँ, जो तुमने रावण की सभा में जाकर किया। वहाँ दुर्धर्ष राक्षसों को तुमने धमकाया और साहस दिखाया। बालक होते हुए भी तुमने रावण के सामने वीरता प्रदर्शित की। मैंने तुम्हारे समान कोई अन्य वानर नहीं देखा।" राम ने अंगद के उस दूतत्व का विशेष उल्लेख किया, जब उन्होंने रावण के दरबार में निडर होकर संदेश दिया और अपनी बुद्धि से सभी को चकित कर दिया। यह अंगद के साहस और कूटनीति की प्रशंसा है।

🙇 अंगद की विनम्रता (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
अङ्गदस्तु वचः श्रुत्वा रामस्य प्रियकृत्तदा ।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
न मया किञ्चिदप्यत्र कृतं राम तव प्रभो ।
त्वत्प्रसादादिदं प्राप्तं यत्किञ्चित् साधु वाsसाधु ॥
त्वं गतिस्त्वं महाबाहो त्वं नाथस्त्वं परायणः ।
न मेऽन्यदस्ति राजेन्द्र त्वत्पादाब्जात् परायणम् ॥
यदा त्वं मयि धर्मात्मन् प्रसन्नो रघुनन्दन ।
तदा मे सर्वमेवेदं सुखं जयपराजयौ ॥
📖 भावार्थ : राम के प्रिय कर्म करने वाले अंगद ने उनके वचन सुनकर हाथ जोड़े, प्रणाम किया और कहा, "हे प्रभो राम! मैंने यहाँ कुछ भी नहीं किया है। आपकी कृपा से ही मुझे जो कुछ भी साधु या असाधु प्राप्त हुआ है। हे महाबाहो! आप ही मेरी गति हैं, आप ही नाथ हैं, आप ही परायण हैं। हे राजेन्द्र! आपके चरणकमलों के अतिरिक्त मेरा कोई अन्य परायण नहीं है। हे धर्मात्मन् रघुनन्दन! जब आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरे लिए सब कुछ सुख, जय और पराजय समान है।" अंगद ने पूर्णतः राम की कृपा को सर्वोपरि माना। वे राम के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित करते हैं। यह अंगद की विनम्रता और भक्ति को दर्शाता है।

✨ राम का आशीर्वाद और अंगद का सम्मान (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तमुवाच ततो रामः परिष्वज्य महाबलः ।
अङ्गद प्रीतोsस्मि भद्रं ते सर्वदा त्वं मम प्रियः ॥
मत्प्रसादाच्च ते वीर्यं बुद्धिश्चापि विवर्धताम् ।
यशश्च तव धर्मात्मन् स्थास्यति जगतीतले ॥
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान् अङ्गदं समपूजयत् ।
माल्यैर्वस्त्रैश्च भूषैश्च प्रीतियुक्तो नरर्षभः ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने अंगद को गले लगाकर कहा, "हे अंगद! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो। तुम सदा मेरे प्रिय रहोगे। मेरी कृपा से तुम्हारी वीरता और बुद्धि सदा बढ़ती रहे। हे धर्मात्मन्! तुम्हारा यश जगत् में स्थिर रहेगा।" ऐसा कहकर श्रीमान् राघव ने प्रीतिपूर्वक अंगद का माल्यार्पण, वस्त्र और आभूषणों से सम्मान किया। राम ने अंगद को आशीर्वाद दिया कि उनकी वीरता और बुद्धि सदा बढ़े और यश अमर रहे। यह राम की उदारता और अंगद के प्रति उनके स्नेह को प्रदर्शित करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧠 बुद्धि और साहस

अंगद ने रावण के दरबार में जो साहस और बुद्धि का परिचय दिया, वह अद्वितीय है। उन्होंने अकेले ही सभी राक्षसों को चुनौती दी और राम का संदेश प्रभावी ढंग से पहुँचाया।

👑 राम का नेतृत्व

राम ने अंगद को सम्मानित करके यह सिद्ध किया कि वे प्रत्येक योद्धा के योगदान को महत्त्व देते हैं, चाहे वह कितना भी युवा हो। यह एक कुशल नेता का गुण है।

🎯 शिक्षा : अंगद का चरित्र हमें सिखाता है कि सच्चा साहस और बुद्धि किसी भी आयु में प्रकट हो सकती है। साथ ही, विनम्रता और समर्पण ही व्यक्तित्व को निखारते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे विंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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