अंगद का रावण के पास दूत बनकर जाना
श्रीराम के आदेश पर अंगद लंका में दूत बनकर जाते हैं और रावण को अंतिम बार समझाने का प्रयास करते हैं। वीर अंगद रावण के दरबार में निडरता से धर्म का उपदेश देते हैं और युद्ध अथवा सीता की वापसी का विकल्प रखते हैं।
विवरण
जब सेतुबंधन पूरा हो जाता है और वानर सेना लंका के द्वार पर पहुँच जाती है, तब श्रीराम युद्ध की अनिवार्यता को भली-भाँति समझते हैं। फिर भी वे धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होते। वे चाहते हैं कि रावण को अंतिम बार समझाने का प्रयास किया जाए। वे अंगद को अपना दूत बनाकर रावण के पास भेजते हैं। परम पराक्रमी अंगद लंका में प्रवेश करते हैं और राक्षसराज के सिंहासन के सामने निडर होकर खड़े हो जाते हैं। वे रावण को धर्म का उपदेश देते हुए कहते हैं कि वह श्रीराम की शरण में जाए और सीता माता को लौटा दे। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि यदि वह ऐसा नहीं करता तो उसके सर्वनाश के लिए स्वयं अंगद ही पर्याप्त हैं। रावण का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच जाता है, लेकिन वह दूत की अहिंसा के नियम के कारण अंगद को बंदी नहीं बनाता। अंगद रावण के मुकुट को अपने पैरों से रौंदकर वापस लौट जाते हैं, जो युद्ध का अंतिम निमंत्रण है।
(अंगद का रावण के पास दूत बनकर जाना)
🔆 प्रस्तावना : वानरों ने समुद्र पर सेतु बाँध लिया है। विशाल सेना लंका के द्वार पर खड़ी है। अब युद्ध अवश्यम्भावी है। किन्तु श्रीराम धर्म के पथ पर अंत तक चलते हैं। वे अंतिम बार रावण को सन्मार्ग पर लाने के लिए अपने परम वीर एवं बुद्धिमान दूत अंगद को लंका भेजते हैं। यह सर्ग अंगद के साहस, राजनीति कौशल और रावण के अहंकार का अद्भुत वर्णन करता है।
🏹 दूत के रूप में अंगद का चयन और प्रस्थान (श्लोक १-१०)
सुग्रीवमुख्यैः सचिवैः परिवार्य समन्ततः ॥
उवाच वचनं धीमान् स्नेहपूर्वमिदं तदा ।
केनोपायेन वै देवि लङ्कां गत्वा हनूमता ॥
कृतं कर्म सुदुष्कर्म राक्षसानां भयावहम् ।
अद्यापि न करोत्येव रावणो बुद्धिपौरुषम् ॥
तस्माद् दूतो मया शीघ्रं प्रस्थाप्यो लङ्कया प्रति ।
यो ब्रूयाद् रावणं राजन् धर्मार्थसहितं वचः ॥
ऊचुः प्राञ्जलयो वाक्यमङ्गदं प्रेक्ष्य सन्निधौ ॥
एष राजन् हरीशानां पुत्रो वालिसुतो बली ।
दूतो यास्यति लङ्कायां रावणस्य निवेशनम् ॥
अङ्गदः प्रतिजग्राह दूत्यं कपिचरिष्वथ ।
प्रहृष्टवदनः श्रीमान् राघवस्याभिनन्दयन् ॥
👑 अंगद का रावण के दरबार में प्रवेश (श्लोक ११-२५)
ददर्श रावणं राजा राक्षसैर्बहुभिर्वृतम् ॥
न चास्य भयमापेदे न च व्यथितमानसः ।
उपसंगम्य तेजस्वी स्तम्भे सोपानमास्थितः ॥
ततः प्रोवाच वचनमङ्गदो रावणं प्रति ।
राजदूतोऽहमायातो रामस्य विदितात्मनः ॥
श्रूयतां वचनं राजन् यदर्थमिह चागतः ।
धर्मार्थसहितं वाक्यं हितं च तव रावण ॥
भ्रात्रा लक्ष्मणसंयुक्तो युद्धाय समुपस्थितः ॥
तस्य त्वं शरणं गच्छ जीविताकाङ्क्षया सह ।
देहि सीतां च धर्मज्ञे मा नशः सर्वराक्षसाः ॥
इत्युक्तो रावणः क्रोधात् प्रज्वलन् रोषदीपितः ।
आज्ञापयामास तदा राक्षसान् हरिसूदनान् ॥
⚡ रावण का क्रोध और अंगद का पराक्रम (श्लोक २६-४२)
अङ्गदं ते समासाद्य ग्रहीतुं मन्युचोदिताः ॥
ततः स धीरो विक्रान्तो हरीणां प्रवरः कपिः ।
उत्पपात महावेगः स्तम्भात् स्तम्भमरिंदमः ॥
ते राक्षसा भयोद्विग्ना निपेतुर्धरणीतले ।
अङ्गदस्य प्रभावेण दग्धाः क्रोधाग्निना तदा ॥
ततो राजा स्वयं क्रुद्धः सिंहासनसमाश्रितः ।
उवाच परमोद्विग्नो बध्यतामेष वानरः ॥
उवाच वचनं तत्र रावणं बुद्धिसंमतम् ॥
दूतस्य वध आयत्तो न कर्तव्यः कथंचन ।
धर्मार्थसहितं वाक्यं श्रूयतां यदि रोचते ॥
विभीषणस्य तद् वाक्यं निशम्य रजनीचरः ।
अङ्गदं प्रत्युवाचेदं शृणु वानर यद् ब्रुवे ॥
गच्छ वानर मुक्तस्त्वं रामायाचक्ष्व मद्वचः ।
युद्धेन ते समेष्यामि न हि सीतां प्रदास्यति ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🎙️ दूत का धर्म
यह सर्ग दूत के आदर्श कर्तव्यों को प्रस्तुत करता है। अंगद न केवल अपने स्वामी का संदेश लेकर गए, बल्कि उन्होंने शत्रु के दरबार में अपनी बुद्धिमत्ता और वीरता से राम की सर्वोच्चता स्थापित की। वे निडर, स्पष्टवादी और धर्मज्ञ हैं।
⚖️ अहंकार का पतन
रावण के पास अंतिम अवसर था। वह शांति और धर्म का मार्ग चुन सकता था, लेकिन उसके अहंकार ने उसे युद्ध के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं दिया। उसका यह निर्णय उसके और उसके कुल के सर्वनाश का कारण बना।
🤝 विभीषण की भूमिका
इस सर्ग में विभीषण एक बार फिर धर्म के पक्षधर के रूप में उभरते हैं। वे रावण को दूत-वध जैसे अधर्म से रोकते हैं। उनकी यह सलाह भी रावण के विपरीत उनके धर्मनिष्ठ चरित्र को उजागर करती है।
🦍 अंगद का अद्वितीय पराक्रम
राक्षसों से घिरे होने पर भी अंगद ने न केवल साहस दिखाया, बल्कि अपने बल से राक्षसों को परास्त किया और रावण के मुकुट का अपमान करके उसके अहंकार को चुनौती दी। यह दूत के रूप में उनकी भूमिका से कहीं बढ़कर था।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सत्य और धर्म के पथ पर चलने वाला व्यक्ति अकेला होने पर भी अजेय होता है। अंगद की निर्भीकता और रावण का दुराग्रह यह सिद्ध करता है कि अहंकार के आगे बुद्धि और धर्म दोनों ही परास्त हो जाते हैं, जिसका परिणाम विनाश के अलावा कुछ नहीं होता।