युद्ध काण्ड अध्याय 119

राम का हनुमान् को सम्मानित करना

राम हनुमान की अद्वितीय भक्ति, पराक्रम और सेवा की प्रशंसा करते हैं और उन्हें विशेष रूप से सम्मानित करते हैं। हनुमान राम से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

विवरण

राम ने हनुमान को बुलाकर उनके अद्भुत कार्यों का स्मरण किया – समुद्र लाँघना, लंका दहन, सीता को संदेश पहुँचाना, और युद्ध में अद्वितीय वीरता। राम ने कहा कि हनुमान के समान कोई भक्त नहीं है। उन्होंने हनुमान को अपने हृदय से लगाया और अमूल्य उपहार दिए। हनुमान ने विनम्रता से प्रणाम किया और राम के चरणों में रहने की इच्छा व्यक्त की। राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे सदा पूजित रहेंगे। यह सर्ग भक्ति और वीरता का उत्कर्ष है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ११९

(राम का हनुमान् को सम्मानित करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : युद्ध की विजय के बाद, राम ने सभी वीरों का सम्मान किया। विशेष रूप से हनुमान, जिनके अद्वितीय पराक्रम और भक्ति ने संकटमोचक का कार्य किया। यह सर्ग हनुमान की महिमा का वर्णन करता है।

🦸 राम द्वारा हनुमान के कार्यों की प्रशंसा (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामो महातेजा हनूमन्तमथाब्रवीत् ।
हनूमन् त्वत्कृतेनाहं प्राप्तः सीतां यशस्तथा ॥
त्वया सागरमुल्लङ्घ्य लङ्का दग्धा सराक्षसा ।
सीतायाः संनिकर्षश्च प्राप्तः संदेश एव च ॥
युद्धे च विक्रमः श्लाघ्यस्त्वया दर्शित एव च ।
न त्वादृशो मया दृष्टः कश्चिदन्यः प्लवंगमः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; रामः = राम; महातेजाः = महातेजस्वी; हनूमन्तम् = हनुमान को; अथ = फिर; अब्रवीत् = बोले; हनूमन् = हे हनुमान; त्वत्कृतेन = तुम्हारे द्वारा किए हुए कार्यों से; अहम् = मैं; प्राप्तः = प्राप्त कर चुका हूँ; सीताम् = सीता को; यशः = यश; तथा = तथा; त्वया = तुमने; सागरम् = समुद्र; उल्लङ्घ्य = लाँघकर; लङ्का = लंका; दग्धा = जला दी; सराक्षसा = राक्षसों सहित; सीतायाः = सीता का; संनिकर्षः = समीप जाना; च = और; प्राप्तः = प्राप्त किया; संदेशः = संदेश; एव = ही; च = भी; युद्धे = युद्ध में; च = और; विक्रमः = पराक्रम; श्लाघ्यः = प्रशंसनीय; त्वया = तुमने; दर्शितः = दिखाया; एव = ही; च = और; न = नहीं; त्वादृशः = तुम्हारे समान; मया = मैंने; दृष्टः = देखा; कश्चित् = कोई; अन्यः = अन्य; प्लवंगमः = वानर।
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने हनुमान से कहा, "हे हनुमान! तुम्हारे द्वारा किए गए कार्यों से ही मैंने सीता और यश प्राप्त किया है। तुमने समुद्र लाँघकर लंका को राक्षसों सहित जला दिया। तुम सीता के पास पहुँचे और उन्हें मेरा संदेश दिया। युद्ध में भी तुमने प्रशंसनीय पराक्रम दिखाया। मैंने तुम्हारे समान कोई अन्य वानर नहीं देखा।" राम ने हनुमान के सभी प्रमुख कार्यों का स्मरण करते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने हनुमान को अद्वितीय वीर और सेवक बताया। यह राम की कृतज्ञता और हनुमान के प्रति उनके अपार स्नेह को दर्शाता है।

🙇 हनुमान की विनम्रता (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
हनूमांस्तु वचः श्रुत्वा रामस्य प्रियकृत्तदा ।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
न मे किञ्चित् कृतं राम त्वत्प्रसादेन सुव्रत ।
त्वत्प्रसादान्महाबाहो प्राप्तमेतन्मया विभो ॥
त्वयि तुष्टे जगन्नाथ किं न मे स्यादनुत्तमम् ।
त्वत्प्रसादेन मे वीर्यं त्वत्प्रसादेन मे बलम् ॥
न मे माता न पिता राम न बन्धुः स्वजनो न च ।
त्वमेव मम राजेन्द्र गतिर्धर्मपरायणः ॥
📖 भावार्थ : राम के प्रिय कर्म करने वाले हनुमान ने उनके वचन सुनकर हाथ जोड़े, प्रणाम किया और कहा, "हे राम! हे सुव्रत! आपकी कृपा से ही मैंने यह सब किया है। हे महाबाहो विभो! आपकी कृपा से ही मुझे यह सब प्राप्त हुआ है। हे जगन्नाथ! जब आप प्रसन्न हैं तो मेरे लिए क्या अनुत्तम नहीं हो सकता? आपकी कृपा से ही मेरा वीर्य है, आपकी कृपा से ही मेरा बल है। हे राजेन्द्र! मेरे न माता है, न पिता, न बन्धु, न स्वजन। आप ही मेरे धर्मपरायण आश्रय हैं।" हनुमान ने अपनी सफलता का श्रेय पूर्णतः राम की कृपा को दिया। उन्होंने राम को ही अपना सब कुछ माना। यह परम भक्ति का उदाहरण है। हनुमान का विनम्रता और समर्पण अद्वितीय है।

✨ राम का आशीर्वाद और हनुमान का सम्मान (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तमुवाच ततो रामः परिष्वज्य महाबलः ।
हनूमन् भक्तिसंयुक्तः सर्वदा त्वं मम प्रियः ॥
यावल्लोके जनाः सन्ति तावत् त्वं पूजितो भव ।
मत्प्रसादाच्च ते कीर्तिः स्थास्यति जगतीतले ॥
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान् हनूमन्तमपूजयत् ।
माल्यैर्वस्त्रैश्च भूषैश्च प्रीतियुक्तो नरर्षभः ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने हनुमान को गले लगाकर कहा, "हे हनुमान! तुम भक्ति से युक्त होकर सदा मेरे प्रिय रहोगे। जब तक संसार में लोग हैं, तब तक तुम पूजित रहोगे। मेरी कृपा से तुम्हारी कीर्ति जगत् में स्थिर रहेगी।" ऐसा कहकर श्रीमान् राघव ने प्रीतियुक्त होकर हनुमान का माल्यार्पण, वस्त्र और आभूषणों से सम्मान किया। राम ने हनुमान को अमर कीर्ति का आशीर्वाद दिया। आज भी हनुमान की पूजा होती है और वे सबसे प्रिय भक्त माने जाते हैं। यह राम के वचनों की सत्यता को प्रमाणित करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

❤️ भक्ति का आदर्श

हनुमान ने भक्ति का जो आदर्श प्रस्तुत किया, वह अद्वितीय है। वे निःस्वार्थ भाव से राम की सेवा में तत्पर रहे और कभी कोई प्रत्युपकार नहीं चाहा।

🏅 राम का आशीर्वाद

राम ने हनुमान को अमर कीर्ति का आशीर्वाद दिया, जो दर्शाता है कि सच्ची सेवा और भक्ति कभी नष्ट नहीं होती। यह प्रेरणा स्रोत है।

🎯 शिक्षा : हनुमान का जीवन हमें सिखाता है कि विनम्रता, समर्पण और निःस्वार्थ सेवा ही सच्ची भक्ति है। ऐसा भक्त स्वयं भगवान का प्रिय होता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे एकोनविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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