राम का विभीषण को विदा करना
राम विभीषण को लंका के राज्य का दायित्व सौंपते हैं और धर्मपूर्वक शासन करने का उपदेश देते हैं। विभीषण राम से वचन लेते हैं कि वे समय-समय पर लंका का स्मरण करें।
विवरण
राम ने विभीषण को बुलाकर उनकी निष्ठा और ज्ञान की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि विभीषण ने धर्म के पक्ष में रहकर अपने भाई का भी त्याग किया, जो अत्यंत दुर्लभ है। अब उन्हें लंका का राजा बनकर प्रजा का पालन धर्मपूर्वक करना चाहिए। विभीषण ने राम से निवेदन किया कि वे लंका को कभी न भूलें। राम ने आश्वासन दिया कि वे सदैव उनके मित्र हैं। यह सर्ग त्याग, धर्म और कर्तव्यपालन का अद्भुत संगम है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ११८
(राम का विभीषण को विदा करना)
🔆 प्रस्तावना : रावण के वध के बाद, राम ने विभीषण को लंका का राज्य सौंपा। अब विभीषण विदा हो रहे हैं। यह सर्ग धर्म, मित्रता और कर्तव्य के अद्भुत समन्वय को प्रस्तुत करता है।
👑 राम का विभीषण को राज्याभिषेक का आदेश (श्लोक १-५)
गृहाण राज्यं लङ्कायां धर्मेण पालय प्रजाः ॥
त्वं हि धर्मरतः शूरः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
न्यस्तशस्त्रो रणे त्यक्त्वा रावणं धर्ममास्थितः ॥
अतस्त्वमर्हसे राज्यं सुगृहीतं सराक्षसम् ।
धर्मतः पालयैनं त्वं मा प्रमादं गमः क्वचित् ॥
🙇 विभीषण का विनम्र निवेदन (श्लोक ६-१०)
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
यदि प्रसन्नो भगवान् राज्यं मह्यं प्रयच्छसि ।
वचनं मे त्वया कार्यं सर्वलोकेश्वरेण ह ॥
यथा त्वं मयि धर्मात्मन् स्नेहं कुरुषे नरोत्तम ।
तथा मयापि कर्तव्यं त्वयि स्नेहमनुत्तमम् ॥
त्वया सख्यं मम सदा स्थिरमस्तु नरोत्तम ।
न त्वां त्यक्ष्यामि धर्मज्ञ सत्येनैव च ते शपे ॥
✨ राम का आशीर्वाद और विभीषण का प्रस्थान (श्लोक ११-१५)
विभीषण महाबाहो गच्छ त्वं सुखितः सुखी ॥
यदा त्वं मयि धर्मात्मन् स्नेहं कुरुषे शुभेक्षण ।
तदा मयापि कर्तव्यं त्वयि स्नेहमनुत्तमम् ॥
गच्छ त्वं सह रक्षोभिः स्वपुरं प्रीतमानसः ।
अहमप्ययोध्यां गच्छामि भ्रातृभिः सहितः प्रियैः ॥
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान् विभीषणमपूजयत् ।
माल्यैर्वस्त्रैश्च भूषैश्च ततः स प्रस्थितो नृप ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
⚖️ धर्म और राज्य
राम ने विभीषण को राज्य देकर यह सिद्ध किया कि धर्म का पालन करने वाला ही सच्चा शासक होता है। विभीषण ने अपने भाई का त्याग कर धर्म को चुना, इसलिए वे राज्य के अधिकारी हैं।
💞 मित्रता की अमरता
विभीषण राम से मित्रता का वचन लेते हैं, जो दर्शाता है कि सच्ची मित्रता समय और दूरी से बंधी नहीं होती। यह संबंध आजीवन अटूट रहता है।
🎯 शिक्षा : विभीषण के त्याग और राम की उदारता से हमें सीख मिलती है कि धर्म के मार्ग पर चलने वालों को कभी अकेला नहीं छोड़ा जाता। उनका सम्मान और पुरस्कार अवश्य मिलता है।