युद्ध काण्ड अध्याय 118

राम का विभीषण को विदा करना

राम विभीषण को लंका के राज्य का दायित्व सौंपते हैं और धर्मपूर्वक शासन करने का उपदेश देते हैं। विभीषण राम से वचन लेते हैं कि वे समय-समय पर लंका का स्मरण करें।

विवरण

राम ने विभीषण को बुलाकर उनकी निष्ठा और ज्ञान की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि विभीषण ने धर्म के पक्ष में रहकर अपने भाई का भी त्याग किया, जो अत्यंत दुर्लभ है। अब उन्हें लंका का राजा बनकर प्रजा का पालन धर्मपूर्वक करना चाहिए। विभीषण ने राम से निवेदन किया कि वे लंका को कभी न भूलें। राम ने आश्वासन दिया कि वे सदैव उनके मित्र हैं। यह सर्ग त्याग, धर्म और कर्तव्यपालन का अद्भुत संगम है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ११८

(राम का विभीषण को विदा करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टादशाधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के वध के बाद, राम ने विभीषण को लंका का राज्य सौंपा। अब विभीषण विदा हो रहे हैं। यह सर्ग धर्म, मित्रता और कर्तव्य के अद्भुत समन्वय को प्रस्तुत करता है।

👑 राम का विभीषण को राज्याभिषेक का आदेश (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामो महाप्राज्ञो विभीषणमथाब्रवीत् ।
गृहाण राज्यं लङ्कायां धर्मेण पालय प्रजाः ॥
त्वं हि धर्मरतः शूरः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
न्यस्तशस्त्रो रणे त्यक्त्वा रावणं धर्ममास्थितः ॥
अतस्त्वमर्हसे राज्यं सुगृहीतं सराक्षसम् ।
धर्मतः पालयैनं त्वं मा प्रमादं गमः क्वचित् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; रामः = राम; महाप्राज्ञः = महाबुद्धिमान; विभीषणम् = विभीषण को; अथ = फिर; अब्रवीत् = बोले; गृहाण = ग्रहण करो; राज्यम् = राज्य; लङ्कायाम् = लंका में; धर्मेण = धर्म से; पालय = पालन करो; प्रजाः = प्रजा की; त्वम् = तुम; हि = निश्चय ही; धर्मरतः = धर्म में रत; शूरः = वीर; सत्यवादी = सत्यवादी; जितेन्द्रियः = जितेन्द्रिय; न्यस्तशस्त्रः = शस्त्र त्याग किए हुए; रणे = युद्ध में; त्यक्त्वा = त्यागकर; रावणम् = रावण को; धर्मम् = धर्म; आस्थितः = आश्रित; अतः = इसलिए; त्वम् = तुम; अर्हसे = योग्य हो; राज्यम् = राज्य के लिए; सुगृहीतम् = सुशोभित; सराक्षसम् = राक्षसों सहित; धर्मतः = धर्म से; पालय = पालन करो; एनम् = इसका; त्वम् = तुम; मा प्रमादम् = प्रमाद मत करो; गमः = जाना; क्वचित् = कभी।
📖 भावार्थ : तब महाप्राज्ञ राम ने विभीषण से कहा, "तुम लंका के राज्य को ग्रहण करो और धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करो। तुम धर्मपरायण, वीर, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हो। युद्ध में शस्त्र त्यागकर तुमने रावण का साथ छोड़ दिया और धर्म का आश्रय लिया। इसलिए तुम राक्षसों सहित इस राज्य के सुशोभित होने के योग्य हो। धर्म से इसका पालन करो और कभी प्रमाद मत करो।" राम ने विभीषण के त्याग और धर्मनिष्ठा की प्रशंसा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य का अधिकारी वही है जो धर्म का पालन करता है। यह राम के न्याय और योग्यता-आधारित शासन को दर्शाता है।

🙇 विभीषण का विनम्र निवेदन (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
विभीषणस्तु वचनं श्रुत्वा रामस्य धीमतः ।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
यदि प्रसन्नो भगवान् राज्यं मह्यं प्रयच्छसि ।
वचनं मे त्वया कार्यं सर्वलोकेश्वरेण ह ॥
यथा त्वं मयि धर्मात्मन् स्नेहं कुरुषे नरोत्तम ।
तथा मयापि कर्तव्यं त्वयि स्नेहमनुत्तमम् ॥
त्वया सख्यं मम सदा स्थिरमस्तु नरोत्तम ।
न त्वां त्यक्ष्यामि धर्मज्ञ सत्येनैव च ते शपे ॥
📖 भावार्थ : धीमान् राम के वचन सुनकर विभीषण ने हाथ जोड़कर, प्रणाम करके कहा, "हे भगवन्! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे राज्य दे रहे हैं, तो हे सर्वलोकेश्वर, मेरी एक बात मानिए। हे धर्मात्मन् नरोत्तम! आप मुझ पर जैसा स्नेह करते हैं, वैसे ही मुझे भी आपके प्रति अनुत्तम स्नेह करना चाहिए। हे नरोत्तम! मेरी आपसे मैत्री सदा स्थिर रहे। हे धर्मज्ञ! मैं आपको कभी नहीं त्यागूँगा, यह सत्य है, आपको शपथ है।" विभीषण ने राम से मैत्री का वचन लिया। वे राज्य से अधिक राम की मित्रता को महत्त्व देते हैं। उनका यह भाव दर्शाता है कि वे राम के प्रति पूर्ण समर्पित हैं।

✨ राम का आशीर्वाद और विभीषण का प्रस्थान (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तमुवाच ततो रामः प्रहसन्निव भारत ।
विभीषण महाबाहो गच्छ त्वं सुखितः सुखी ॥
यदा त्वं मयि धर्मात्मन् स्नेहं कुरुषे शुभेक्षण ।
तदा मयापि कर्तव्यं त्वयि स्नेहमनुत्तमम् ॥
गच्छ त्वं सह रक्षोभिः स्वपुरं प्रीतमानसः ।
अहमप्ययोध्यां गच्छामि भ्रातृभिः सहितः प्रियैः ॥
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान् विभीषणमपूजयत् ।
माल्यैर्वस्त्रैश्च भूषैश्च ततः स प्रस्थितो नृप ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने मुस्कुराते हुए विभीषण से कहा, "हे महाबाहो विभीषण! तुम सुखी होकर जाओ। हे धर्मात्मन् शुभेक्षण! तुम मुझ पर जैसा स्नेह करते हो, वैसा ही अनुत्तम स्नेह मुझे भी तुम पर करना चाहिए। तुम राक्षसों के साथ प्रसन्न मन से अपने नगर को जाओ। मैं भी अपने प्रिय भाइयों के साथ अयोध्या जाऊँगा।" ऐसा कहकर श्रीमान् राघव ने विभीषण का माल्यार्पण, वस्त्र और आभूषणों से सम्मान किया। तब वे प्रस्थित हुए। राम ने विभीषण को आशीर्वाद दिया और स्नेह का प्रत्याभूत किया। उनका यह व्यवहार मित्रता के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚖️ धर्म और राज्य

राम ने विभीषण को राज्य देकर यह सिद्ध किया कि धर्म का पालन करने वाला ही सच्चा शासक होता है। विभीषण ने अपने भाई का त्याग कर धर्म को चुना, इसलिए वे राज्य के अधिकारी हैं।

💞 मित्रता की अमरता

विभीषण राम से मित्रता का वचन लेते हैं, जो दर्शाता है कि सच्ची मित्रता समय और दूरी से बंधी नहीं होती। यह संबंध आजीवन अटूट रहता है।

🎯 शिक्षा : विभीषण के त्याग और राम की उदारता से हमें सीख मिलती है कि धर्म के मार्ग पर चलने वालों को कभी अकेला नहीं छोड़ा जाता। उनका सम्मान और पुरस्कार अवश्य मिलता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे अष्टादशाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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