युद्ध काण्ड अध्याय 116

वानरों और राक्षसों का प्रस्थान

राम के आदेशानुसार वानर और राक्षस सेनाएँ लंका से प्रस्थान करती हैं। राम सभी को आशीर्वाद देते हैं और मैत्री का संदेश देते हैं।

विवरण

रावण के वध और राम के राज्याभिषेक के पश्चात, राम अब लंका में विदाई की तैयारी करते हैं। वे वानरों और राक्षसों की सेनाओं को उनके-उनके स्थानों को लौटने की आज्ञा देते हैं। यह सर्ग मैत्री, कृतज्ञता और कर्तव्यपालन की भावना से परिपूर्ण है। राम सुग्रीव, विभीषण, हनुमान, अंगद आदि सभी प्रमुख योद्धाओं का आदरपूर्वक अभिनंदन करते हैं और उन्हें विदा करते हैं। वे वानरों को उनके अदम्य साहस और युद्ध में दिए गए अमूल्य योगदान के लिए धन्यवाद देते हैं। साथ ही, राक्षस सेना को भी विभीषण के अधीन रहकर धर्म के मार्ग पर चलने का उपदेश देते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ११६

(वानरों और राक्षसों का प्रस्थान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षोडशाधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के वध और राम का राज्याभिषेक हो चुका है। अब वानर एवं राक्षस सेनाएँ वापस लौटने की तैयारी कर रही हैं। राम सभी का आदरपूर्वक अभिनंदन करते हैं और उन्हें विदा करते हैं। यह सर्ग कृतज्ञता और मैत्री का अद्भुत चित्रण प्रस्तुत करता है।

🦍 राम का वानर सेना को संबोधन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः प्रभाते विमले रामः सुग्रीवमब्रवीत् ।
वानरेन्द्र महावीर्य त्वया साह्यं कृतं महत् ॥
अद्य प्रभृति ते मित्रं मां विद्धि वचनात्मकम् ।
यथेष्टं गम्यतां राजन् स्वपुरं वानरैः सह ॥
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान् सर्वान् वानरपुङ्गवान् ।
पूजयामास धर्मात्मा माल्यैर्वस्त्रैश्च भूषणैः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभाते = प्रातःकाल; विमले = निर्मल; रामः = राम; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; अब्रवीत् = बोले; वानरेन्द्र = हे वानरराज; महावीर्य = महापराक्रमी; त्वया = तुमने; साह्यम् = सहायता; कृतम् = की; महत् = बहुत बड़ी; अद्य = आज से; प्रभृति = आगे; ते = तुम्हारा; मित्रम् = मित्र; माम् = मुझे; विद्धि = जानो; वचनात्मकम् = वचन से; यथेष्टम् = इच्छानुसार; गम्यताम् = जाओ; राजन् = हे राजन्; स्वपुरम् = अपने नगर; वानरैः सह = वानरों के साथ; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; राघवः = राघव; श्रीमान् = श्रीमान्; सर्वान् = सब; वानरपुङ्गवान् = श्रेष्ठ वानरों को; पूजयामास = पूजित किया; धर्मात्मा = धर्मात्मा ने; माल्यैः = मालाओं से; वस्त्रैः = वस्त्रों से; च = और; भूषणैः = आभूषणों से।
📖 भावार्थ : प्रातःकाल निर्मल वातावरण में राम ने सुग्रीव से कहा, "हे वानरराज! महापराक्रमी सुग्रीव! तुमने मेरी महान सहायता की है। आज से तुम मुझे अपना सच्चा मित्र समझो। अब तुम अपनी इच्छानुसार अपने वानरों के साथ अपने नगर को लौट जाओ।" ऐसा कहकर धर्मात्मा राम ने सभी श्रेष्ठ वानरों का माल्यार्पण, वस्त्र और आभूषण देकर सम्मान किया। यह राम के चरित्र की उदारता और मित्र के प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है। वे न केवल युद्ध में सहायता के लिए आभार व्यक्त करते हैं, वरन् उन्हें आशीर्वाद भी देते हैं कि वे सुखी रहें। इस प्रकार राम ने सुग्रीव को राजा के रूप में सम्मानित किया और मैत्री का अटूट बंधन स्थापित किया।

👹 राक्षस सेना को विदाई (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततो विभीषणं राजन् रामो वचनमब्रवीत् ।
त्वया धर्मेण रक्ष्यं वै लङ्काराज्यमकण्टकम् ॥
ये त्वां सेवन्ति रक्षांसि तेषां कार्या परिग्रहः ।
धर्मेण पालयैनांस्त्वं मा प्रमादं गमः क्वचित् ॥
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान् राक्षसान् सर्व एव हि ।
आपृच्छय विधिवत् सर्वान् यथार्हं समपूजयत् ॥
📖 भावार्थ : इसके बाद राम ने विभीषण से कहा, "हे राजन्! अब तुम धर्मपूर्वक इस लंका राज्य का पालन करो, जो कंटकरहित हो गया है। जो राक्षस तुम्हारी सेवा करें, उनका तुम्हें पालन-पोषण करना चाहिए। उन्हें धर्म के मार्ग पर रखो, कभी प्रमाद मत करो।" ऐसा कहक� राम ने सभी राक्षसों को विधिवत् विदा किया और यथोचित सम्मान दिया। यहाँ राम ने विभीषण को एक आदर्श शासक की नीति समझाई – प्रजापालन, धर्म का पालन और आलस्य से बचना। राक्षसों को भी विभीषण के अधीन रहने का आदेश दिया, जिससे लंका में धर्म की स्थापना हो सके।

🚩 सेनाओं का प्रस्थान (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः सुग्रीवसहिता वानराः प्रस्थिताः पुरात् ।
रामस्यानुमते सर्वे हर्षयुक्ता ययुस्तदा ॥
राक्षसाश्च विभीषणेन सह धर्मपरायणाः ।
प्रणम्य रामं विधिवत् स्वं स्वं देशमुपागमन् ॥
एवं ते समनुज्ञाता रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
जग्मुः प्रीतमनसः सर्वे यत्र स्वं निकेतनम् ॥
📖 भावार्थ : तब राम की अनुमति से सुग्रीव सहित सभी वानर हर्षित होकर नगर से प्रस्थित हुए। उनके साथ राक्षस भी, जो विभीषण के साथ धर्मपरायण हो गए थे, राम को प्रणाम करके अपने-अपने देश को चले गए। इस प्रकार राम द्वारा सम्मानपूर्वक विदा किए गए सभी वानर और राक्षस हर्षित मन से अपने-अपने स्थानों को लौट गए। यहाँ यह देखना महत्त्वपूर्ण है कि राम ने सबको समान रूप से सम्मान दिया – चाहे वे वानर हों या राक्षस। उनकी सेना में कोई भेदभाव नहीं था। सभी ने प्रेम और श्रद्धा से राम की आज्ञा मानी। यह राम के व्यक्तित्व की महानता को दर्शाता है कि वे सभी प्राणियों में समान भाव रखते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राम का नेतृत्व

राम ने न केवल युद्ध में विजय प्राप्त की, बल्कि सभी सहयोगियों का आदरपूर्वक विदा करके एक आदर्श शासक का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी कृतज्ञता और उदारता सभी के लिए अनुकरणीय है।

🤝 मैत्री और कर्तव्य

सुग्रीव और विभीषण के साथ राम के व्यवहार से पता चलता है कि सच्ची मैत्री स्वार्थ से परे होती है। राम ने उन्हें उनके कर्तव्य का स्मरण कराया और उन्हें सम्मानित किया।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सफलता के बाद भी हमें अपने सहयोगियों का सम्मान करना चाहिए और उन्हें उनके योगदान के लिए धन्यवाद देना चाहिए। राम का यह व्यवहार हमें कृतज्ञता और विनम्रता का पाठ पढ़ाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे षोडशाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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