युद्ध काण्ड अध्याय 115

राम का वानरों और राक्षसों को विदा करना

राम अपने सहायक वानरों एवं राक्षसों को सम्मानपूर्वक विदा करते हैं, उन्हें उपहार और आशीर्वाद देकर उनके राज्य भेजते हैं। यह युद्धकाण्ड का अंतिम सर्ग है।

विवरण

रामराज्य की स्थापना के बाद, राम ने सुग्रीव, विभीषण, हनुमान, अंगद, जाम्बवान और अन्य सभी वानर एवं राक्षस योद्धाओं को बुलाया। उन्होंने सभी का हृदय से धन्यवाद किया और कहा कि उनकी सहायता के बिना यह विजय संभव नहीं थी। फिर उन्होंने सभी को बहुमूल्य उपहार, रत्न, वस्त्र और आभूषण भेंट किए। सुग्रीव को उनके राज्य की सुरक्षा का आश्वासन दिया, विभीषण को लंका का राज्य सौंपा। सभी ने राम से भावभीनी विदाई ली और अपने-अपने स्थानों को प्रस्थान किया। यह सर्ग युद्धकाण्ड का समापन करता है और एक सुखद अंत प्रस्तुत करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ११५

(राम का वानरों और राक्षसों को विदा करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चदशोत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रामराज्य की स्थापना और न्याय-शांति के पश्चात अब समय आया उन वीर सहायकों को विदा करने का, जिन्होंने राम के लिए असंभव को संभव किया। यह सर्ग युद्धकाण्ड का अंतिम और अत्यंत भावुक सर्ग है।

🎁 राम का आभार और उपहार (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः सुग्रीवसहितो विभीषणपुरोगमः ।
रामः सर्वान् समानीय वानरान् राक्षसांस्तथा ॥
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा भक्त्या परमया युतः ।
भवद्भिर्वानराः सर्वे राक्षसाश्च महाबलाः ॥
अहं कृतार्थः सुहृदो भवन्तो मम जीवितम् ।
युष्माकं साहाय्येन रावणोऽसौ निपातितः ॥
ततः प्रहृष्टमनसो वानरा राक्षसास्तथा ।
प्रतिपूज्य महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने सुग्रीव और विभीषण के साथ सभी वानरों और राक्षसों को एकत्रित किया। वे हाथ जोड़कर परम भक्ति से युक्त होकर बोले – हे सभी वानरों और महाबलशाली राक्षसों! आप लोगों के कारण मैं कृतार्थ हुआ। आप मेरे सुहृद (हितैषी) हैं, मेरा जीवित रहना आपकी कृपा है। आपके सहायता से ही उस रावण का वध हुआ। राम के ऐसे वचन सुनकर सभी वानर और राक्षस हर्षित हुए और सत्यपराक्रमी महात्मा राम का सम्मान किया। यहाँ राम की विनम्रता और कृतज्ञता दिखती है। वे विजय का श्रेय स्वयं न लेकर अपने सहायकों को देते हैं।

👑 सुग्रीव और विभीषण को विदा (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः सुग्रीवमामन्त्र्य रामो वचनमब्रवीत् ।
गच्छ त्वं किष्किन्धां राजन् सुहृद्भिः सह वानरैः ॥
त्वया मे साह्यकर्तारो वानराः सर्व एव हि ।
नित्यं त्वयि मम प्रीतिर्गच्छ राज्यं प्रशाधि च ॥
तथा विभीषणं चापि परिष्वज्य महाभुजः ।
उवाच राघवो राजा लङ्का तुभ्यं निवेदिता ॥
गच्छ त्वं राक्षसैः सार्धं प्रजाः पालय धर्मतः ।
नित्यं मयि सखित्वं ते स्थापितं राक्षसाधिप ॥
📖 भावार्थ : फिर राम ने सुग्रीव को बुलाकर कहा – हे राजन्! आप अपने सुहृद वानरों के साथ किष्किन्धा जाइए। आपके द्वारा मुझे सहायता देने वाले सभी वानर हैं। मेरी आप पर सदा प्रीति है। जाइए और अपने राज्य का शासन कीजिए। इसी प्रकार महाबाहु राघव ने विभीषण को आलिंगन कर कहा – लंका आपको समर्पित है। आप राक्षसों के साथ जाइए और धर्मपूर्वक प्रजा का पालन कीजिए। हे राक्षसाधिप! आपसे मेरी मित्रता सदा के लिए स्थापित है। राम ने सुग्रीव और विभीषण को उनके राज्य लौटने की आज्ञा दी और उनके प्रति अपने स्नेह और विश्वास को दोहराया। विभीषण को विशेष रूप से धर्मपूर्वक शासन करने का निर्देश दिया।

🙏 हनुमान और अन्य वीरों को विदा (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततो हनूमन्तं प्रेम्णा परिष्वज्य महाबलम् ।
उवाच राघवो वाक्यं स्नेहादश्रुपरिप्लुतः ॥
हनूमन् मम नास्त्यन्यस्त्वत्तः प्रियतरः सखा ।
त्वया कृतमिदं कर्म सुमहत् सुदुष्करम् ॥
यदिच्छेयं मया सार्धं त्वं वसेथाः सदा प्रिय ।
किं तु राज्यं तव स्नेहात् सुग्रीवेण समर्पितम् ॥
गच्छ त्वं किष्किन्धां वीर सुखी भव सदा प्रभो ।
मम स्मरणमात्रेण त्वयि प्रीतिर्भविष्यति ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने महाबलशाली हनुमान को प्रेम से आलिंगन किया और स्नेह से अश्रुपूरित होकर वचन कहा – हे हनूमन्! मेरा आपसे अधिक प्रिय दूसरा कोई सखा नहीं है। आपने यह अत्यंत दुष्कर महान कार्य किया है। हे प्रिय! मेरी इच्छा है कि आप सदा मेरे साथ रहें। परंतु सुग्रीव ने स्नेहवश आपको राज्य (किष्किन्धा में उच्च पद) प्रदान किया है। हे वीर! आप किष्किन्धा जाइए, सदा सुखी रहिए। मेरा स्मरण मात्र होने पर आप पर मेरी प्रीति बनी रहेगी। राम ने हनुमान के प्रति अपने असीम स्नेह को प्रकट किया, परंतु कर्तव्यवश उन्हें सुग्रीव के साथ जाने को कहा। यहाँ राम के हृदय की कोमलता और कर्तव्यपरायणता दोनों दिखती है।
॥ श्लोक १६-२० ॥
अंगदं जाम्बवन्तं च नलं नीलं च वीर्यवान् ।
रामः सम्पूजयामास रत्नैर्वस्त्रैश्च भूषणैः ॥
सर्वे ते पूजिता रामात् प्रहृष्टा वानरर्षभाः ।
प्रणम्य शिरसा रामं जग्मुः स्वान् स्वान् निवेशनान् ॥
राक्षसाश्च महावीर्याः प्रहृष्टा रामपूजया ।
ययुर्विभीषणेनैव लङ्कां प्रति नरर्षभ ॥
एवं रामेण राज्ञा ते विसृष्टा वानरर्षभाः ।
राक्षसाश्च ययुः सर्वे यथास्थानं यथागतम् ॥
📖 भावार्थ : फिर राम ने वीर्यवान् अंगद, जाम्बवान, नल, नील आदि सभी वानरश्रेष्ठों को रत्न, वस्त्र और आभूषण देकर सम्मानित किया। राम से पूजित होकर वे सभी प्रसन्न हुए और सिर झुकाकर राम को प्रणाम कर अपने-अपने निवास स्थानों को चले गए। महावीर्य राक्षस भी राम की पूजा से प्रसन्न होकर विभीषण के साथ लंका को लौट गए। इस प्रकार राजा राम द्वारा विसर्जित किए गए वे सभी वानर और राक्षस यथास्थान और यथागत (जिधर से आए थे) चले गए।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
एतद्युद्धकथां कृत्स्नां ये श्रोष्यन्ति समाहिताः ।
ते यास्यन्ति परं स्थानं रामलोकं सनातनम् ॥
युद्धकाण्डमिदं पुण्यं पठन्ते ये द्विजोत्तमाः ।
ते सर्वपापनिर्मुक्ता यान्ति रामस्य सार्ष्टिताम् ॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं युद्धकाण्डं महात्मनः ।
रामस्य चरितं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार संपूर्ण युद्धकाण्ड की कथा को जो समाहित होकर सुनेंगे, वे परम सनातन रामलोक को प्राप्त होंगे। इस पुण्यमय युद्धकाण्ड को पढ़ने वाले द्विजोत्तम सभी पापों से मुक्त होकर राम के सार्ष्टित्व (समान लोक) को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार वाल्मीकि द्वारा कहा गया महात्मा राम का यह युद्धकाण्ड पुण्यमय और सभी पापों का नाश करने वाला है। अंत में फलश्रुति दी गई है और युद्धकाण्ड की समाप्ति की घोषणा की गई है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤲 कृतज्ञता का भाव

राम ने विजय का श्रेय अपने सहायकों को दिया। यह एक आदर्श नेता का गुण है – दूसरों के योगदान को स्वीकार करना और उनका सम्मान करना।

💞 हनुमान के प्रति स्नेह

राम ने हनुमान को सबसे प्रिय बताया और उन्हें अपने पास रखने की इच्छा व्यक्त की। यह हनुमान की अद्वितीय भक्ति और सेवा का परिणाम था।

🏛️ राज्य का सम्मान

सुग्रीव और विभीषण को उनके राज्य भेजकर राम ने यह सिद्ध किया कि वे किसी के अधिकारों का हनन नहीं करते। मित्रता का अर्थ पराधीनता नहीं, बल्कि स्वतंत्रता है।

📖 युद्धकाण्ड की फलश्रुति

अंत में युद्धकाण्ड के पाठ से मोक्ष और पापनाश की बात कही गई है। यह ग्रंथ की महिमा को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि सफलता के बाद भी विनम्र और कृतज्ञ बने रहना चाहिए। राम की तरह हमें भी उन सबका सम्मान करना चाहिए जिन्होंने हमारी सहायता की। यह युद्धकाण्ड का समापन मानवीय मूल्यों की स्थापना करता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चदशोत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
॥ समाप्तोऽयं युद्धकाण्डः ॥
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