युद्ध काण्ड अध्याय 112

राम के राज्य का यश

राम के कीर्ति और यश का वर्णन। देवता, ऋषि और मनुष्य सभी राम की प्रशंसा करते हैं, और उनका नाम तीनों लोकों में फैल जाता है।

विवरण

राम के धर्मपूर्ण शासन और उनके पराक्रम की ख्याति समस्त लोकों में फैल गई। देवराज इंद्र, ब्रह्मा, शिव और अन्य देवता राम की स्तुति करते हैं। ऋषि-मुनि अपने आश्रमों में राम के चरित्र का गान करते हैं। मनुष्य नगर-ग्रामों में राम के नाम का उच्चारण करते हैं। कवि और वंदीजन उनकी वीरता, दानशीलता, और धर्मपरायणता का बखान करते हैं। राम का यश इतना बढ़ा कि वे विष्णु के अवतार के रूप में प्रतिष्ठित हुए। यह सर्ग राम की लोकप्रियता और उनकी कीर्ति के अमर होने का वर्णन करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ११२

(राम के राज्य का यश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्वादशोत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के राज्य की समृद्धि के पश्चात उनकी कीर्ति चारों ओर फैल गई। देवता, ऋषि और मनुष्य सभी उनकी प्रशंसा करने लगे। इस सर्ग में राम के यश के प्रसार का वर्णन है।

🙏 देवताओं द्वारा स्तुति (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः सुरगणाः सर्वे समेत्य सहिता मुदा ।
स्तुवन्ति स्म महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ॥
इन्द्र उवाच – त्वया राम कृतं कर्म सुदुष्करमिदं विभो ।
रावणं दुष्टमहृदयं हत्वा लोकहिताय वै ॥
ब्रह्मा उवाच – धन्यस्त्वं राघव श्रेष्ठ यशस्ते स्थापितं भुवि ।
अवतारो हरेश्च त्वं लोकरक्षार्थमागतः ॥
📖 भावार्थ : तब सभी देवता एकत्रित होकर प्रसन्नतापूर्वक महात्मा सत्यपराक्रमी राम की स्तुति करने लगे। इंद्र ने कहा – हे विभो राम! आपने यह अत्यंत दुष्कर कर्म किया है, दुष्टहृदय रावण को मारकर लोक का हित किया है। ब्रह्मा ने कहा – हे श्रेष्ठ राघव! आप धन्य हैं, आपका यश पृथ्वी पर स्थापित हो गया है। आप स्वयं हरि (विष्णु) के अवतार हैं, लोकरक्षा के लिए प्रकट हुए हैं। देवता राम के इस पराक्रम की प्रशंसा करते हैं और उन्हें विष्णु का अवतार मानकर सम्मान देते हैं। राम का कार्य केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, अपितु देवताओं के लिए भी कल्याणकारी था, क्योंकि रावण के आतंक से देवता भी पीड़ित थे।

📜 ऋषियों का गान और आशीर्वाद (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
तथा ऋषिगणाः सर्वे समागम्य महर्षयः ।
गायन्ति स्म गुणान् राम धर्मज्ञस्य महात्मनः ॥
वसिष्ठः प्राह – धन्योऽसि राघव श्रेष्ठ यशस्ते विश्वतोमुखम् ।
त्वयि धर्मः प्रतिष्ठाता लोके राम सनातनः ॥
अगस्त्यः प्राह – यशो राम त्रिलोकेषु गच्छतु त्वत्कृतं महत् ।
रावणान्तकरं कर्म सर्वलोकैकनायक ॥
📖 भावार्थ : इसी प्रकार सभी ऋषि और महर्षि एकत्र होकर धर्मज्ञ महात्मा राम के गुणों का गान करने लगे। वसिष्ठ ने कहा – हे श्रेष्ठ राघव! आप धन्य हैं, आपका यश विश्व के समस्त मुखों में (सर्वत्र) फैल गया है। हे राम! आपमें सनातन धर्म प्रतिष्ठित है। अगस्त्य ने कहा – हे राम! आपके द्वारा किया गया रावण का अंत, वह महान कर्म, तीनों लोकों में आपके यश को फैलाए, हे सर्वलोकनायक! ऋषियों का यह गान राम के धार्मिक व्यक्तित्व और उनके कार्य की महिमा को उजागर करता है। ऋषि लोकहितैषी होते हैं, वे राम को धर्म का स्तंभ मानते हैं।

🌍 मनुष्यों में यश का प्रसार (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तथा मनुष्या हृष्टाः स्म नगरे ग्राम एव च ।
गायन्ति नृत्यन्ति चैव रामकीर्तिं महाप्रभाम् ॥
नार्यः प्रशंसन्ति सीतां रामं च पुरुषाः सदा ।
बाला अपि च वृद्धाश्च रामनाम्ना सुखान्विताः ॥
रामो राजा महातेजा धर्मात्मा सत्यविक्रमः ।
इति वादः समभवत् सर्वेषां नगरे सदा ॥
📖 भावार्थ : इसी प्रकार नगर और ग्राम में सभी मनुष्य हर्षित होकर राम की महाप्रभा कीर्ति का गान करते और नृत्य करते थे। स्त्रियाँ सीता की प्रशंसा करतीं और पुरुष राम की। बालक और वृद्ध सभी राम के नाम से सुखान्वित रहते। नगर में सदा यही वाद (चर्चा) होती थी – राम महातेजस्वी राजा हैं, धर्मात्मा हैं, सत्यविक्रम हैं। यहाँ जनसामान्य में राम के प्रति अगाध श्रद्धा और प्रेम दिखाया गया है। राम केवल राजा ही नहीं, बल्कि जन-जन के आराध्य बन गए। उनका नाम सुख और शांति का प्रतीक बन गया।
॥ श्लोक १६-२० ॥
एवं यशो महत् प्राप्तं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।
कीर्तिः स्थिता त्रिलोकेषु यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥
य एतत् पठते नित्यं रामयशः समुच्छ्रयम् ।
स याति परमं स्थानं रामभक्तिसमन्वितः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार अक्लिष्टकर्मा (जिनके कर्म सरल और पवित्र हैं) राम का महान यश प्राप्त हुआ। उनकी कीर्ति तीनों लोकों में जब तक चंद्र-सूर्य हैं, स्थित है। जो कोई इस राम के यश के उत्कर्ष का नित्य पाठ करता है, वह रामभक्ति से युक्त होकर परम स्थान (मोक्ष) को प्राप्त होता है। यह फलश्रुति है कि राम के यश का स्मरण करने से भी भक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। राम का यश अमर है, और उसका गान करने वाला भी पुण्य का भागी बनता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌟 यश का तात्त्विक अर्थ

राम का यश केवल प्रसिद्धि नहीं, बल्कि उनके धर्मपालन और लोकहित के कार्यों का परिणाम है। सच्चा यश वही है जो परोपकार और धर्म से उत्पन्न हो।

🤝 देव-मानव एकता

इस सर्ग में देवता, ऋषि और मनुष्य सभी एक सुर में राम की स्तुति करते हैं। यह दर्शाता है कि धर्म के प्रति आस्था सभी को एक सूत्र में बांध सकती है।

📖 कीर्ति का महात्म्य

राम की कीर्ति चंद्र-सूर्य के साथ अमर है – यह कहकर वाल्मीकि ने सत्य और धर्म की स्थायित्व को रेखांकित किया है। कीर्ति ही मनुष्य को युगों तक जीवित रखती है।

📿 भक्ति का मार्ग

अंतिम श्लोक में पाठ के फल की बात कही गई है – यह बताता है कि राम के यश का श्रवण-कीर्तन स्वयं में एक भक्ति साधना है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा यश धर्म और परोपकार से मिलता है। राम का नाम आज भी उतना ही पूज्य है, क्योंकि उनका जीवन आदर्श था। हमें भी ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे हमारी कीर्ति सदा के लिए अमर हो जाए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे द्वादशोत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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