युद्ध काण्ड अध्याय 110

राम के राज्य में सभी धर्मपरायण

इस सर्ग में वर्णन है कि राम के राज्य में सभी प्रजाजन धर्मपरायण थे, वेदों का अध्ययन करते थे, यज्ञ-अनुष्ठान करते थे और सत्य एवं अहिंसा के मार्ग पर चलते थे।

विवरण

राम के राज्य की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वहाँ की सम्पूर्ण प्रजा धर्मपरायण थी। लोग वेदों का अध्ययन करते, यज्ञ-याग करते, अतिथियों का सत्कार करते। वे सत्यवादी, दयालु, और परोपकारी थे। कोई भी व्यक्ति अधर्म का आचरण नहीं करता था। राजा स्वयं धर्ममूर्ति थे, अतः प्रजा भी धर्म का पालन करती थी। यह सर्ग रामराज्य के आध्यात्मिक पक्ष को उजागर करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग ११०

(राम के राज्य में सभी धर्मपरायण)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ दशाधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रामराज्य की चरम विशेषता है—सभी प्रजाजनों का धर्मपरायण होना। इस सर्ग में बताया गया है कि कैसे राम के प्रभाव से सम्पूर्ण प्रजा धर्म, सत्य और नैतिकता के उच्चतम आदर्शों पर चलती थी।

📿 वेदाध्ययन एवं यज्ञ-अनुष्ठान (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
सर्वे वेदविदो विप्राः सर्वे यज्ञेषु दीक्षिताः ।
सर्वे धर्मपरा नित्यं सर्वे सत्यपरायणाः ॥
अतिथीन् पूजयन्ति स्म यथान्यायं यथाविधि ।
दानशीला दयावन्तः सर्वे सर्वोपकारकाः ॥
रामे राज्यं प्रशासति धर्मेण प्रजाः पालयति ।
न कश्चिद् धर्ममुत्सृज्य वर्तते नृपशासने ॥
🔹 पदच्छेद : सर्वे = सभी; वेदविदः = वेदों के ज्ञाता; विप्राः = ब्राह्मण (यहाँ विप्र शब्द सभी वर्गों के लिए आदरसूचक हो सकता है); सर्वे = सभी; यज्ञेषु = यज्ञों में; दीक्षिताः = दीक्षित; सर्वे = सभी; धर्मपरा = धर्मपरायण; नित्यम् = नित्य; सर्वे = सभी; सत्यपरायणाः = सत्य में रत; अतिथीन् = अतिथियों का; पूजयन्ति स्म = पूजा करते थे; यथान्यायम् = न्याय के अनुसार; यथाविधि = विधिपूर्वक; दानशीला = दानशील; दयावन्तः = दयालु; सर्वे = सभी; सर्वोपकारकाः = सबका उपकार करने वाले; रामे राज्यं प्रशासति = राम के राज्य करते समय; धर्मेण = धर्म से; प्रजाः = प्रजा की; पालयति = रक्षा करते हैं; न कश्चित् = कोई भी नहीं; धर्मम् = धर्म को; उत्सृज्य = त्यागकर; वर्तते = रहता है; नृपशासने = राजा के शासन में।
📖 भावार्थ : राम के राज्य में सभी ब्राह्मण (और अन्य वर्ण) वेदों के ज्ञाता थे, सभी यज्ञों में दीक्षित थे। सभी नित्य धर्मपरायण और सत्य में रत थे। वे अतिथियों का न्यायपूर्वक और विधिपूर्वक सत्कार करते थे। वे दानशील, दयालु और सबका उपकार करने वाले थे। राम जब धर्म से राज्य करते हैं और प्रजा का पालन करते हैं, तब राजा के शासन में कोई भी धर्म को त्यागकर नहीं रहता।

विस्तृत व्याख्या: राम के राज्य में धर्म का सर्वोच्च स्थान था। लोग वेदों का अध्ययन करते और उनके ज्ञाता होते थे। यज्ञ-अनुष्ठान नियमित रूप से होते थे, जिससे वातावरण शुद्ध और सात्त्विक बना रहता। धर्म और सत्य उनके जीवन के आधार थे। अतिथि सत्कार की परम्परा जीवित थी—लोग अतिथियों को देवता तुल्य मानकर उनकी सेवा करते। दान देना, दया करना, और दूसरों का उपकार करना उनकी दिनचर्या का अंग था। राजा राम के धर्ममय शासन के कारण प्रजा भी धर्म का पालन करती थी। कोई भी व्यक्ति अधर्म का आचरण नहीं करता था, क्योंकि राजा स्वयं धर्म का प्रतिमूर्ति था।

🙏 सत्य, अहिंसा और दया (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
सत्यं वदन्ति धर्मज्ञा अहिंसानिरता जनाः ।
दयावन्तश्च भूतानां सर्वे सर्वहिते रताः ॥
न च परुषवादिनो न च मिथ्याभिशंसिनः ।
न च द्रोहरता लोका न च मानसमन्विताः ॥
रामे राज्यं प्रशासति सर्वे धर्मपरायणाः ।
प्रजाः सुखेन वर्तन्ते यथा देवाः सुरालये ॥
🔹 पदच्छेद : सत्यम् = सत्य; वदन्ति = बोलते हैं; धर्मज्ञाः = धर्म के ज्ञाता; अहिंसानिरताः = अहिंसा में रत; जनाः = लोग; दयावन्तः = दयालु; च = और; भूतानाम् = प्राणियों के प्रति; सर्वे = सभी; सर्वहिते = सबके हित में; रताः = रत; न च = नहीं; परुषवादिनः = कठोर वचन बोलने वाले; न च मिथ्याभिशंसिनः = न झूठा दोष लगाने वाले; न च द्रोहरताः = न द्रोह में रत; लोकाः = लोग; न च मानसमन्विताः = न घमण्ड से युक्त; रामे राज्यं प्रशासति = राम के राज्य करते समय; सर्वे = सभी; धर्मपरायणाः = धर्मपरायण; प्रजाः = प्रजा; सुखेन = सुख से; वर्तन्ते = रहते हैं; यथा = जैसे; देवाः = देवता; सुरालये = स्वर्ग में।
📖 भावार्थ : धर्म के ज्ञाता लोग सत्य बोलते थे, अहिंसा में रत थे, सभी प्राणियों पर दया करते थे और सबके हित में तत्पर रहते थे। वे कठोर वचन नहीं बोलते थे, न ही झूठा दोष लगाते थे। वे द्रोह में नहीं रत थे और न ही घमण्ड से युक्त थे। राम के राज्य करते समय सभी धर्मपरायण थे। प्रजा सुख से रहती थी, जैसे स्वर्ग के देवता।

विस्तृत व्याख्या: राम के राज्य की प्रजा में नैतिक गुण चरम पर थे। वे सत्यवादी थे, झूठ का उनके जीवन में कोई स्थान नहीं था। अहिंसा उनके आचरण का मूल था—वे किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाते थे। दया और करुणा उनके हृदय में निरन्तर बहती थी। वे सभी प्राणियों के हित में कार्य करते थे। उनकी वाणी मधुर और परुषता से रहित थी। वे किसी की निन्दा नहीं करते थे, न ही किसी से द्रोह करते थे। अहंकार और अभिमान उन्हें छू भी नहीं सका था। इन सब गुणों के कारण उनका जीवन स्वर्गीय सुखों से भी बढ़कर था।

🌟 राजा के धर्म का प्रजा पर प्रभाव (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
यथा राजा तथा प्रजा इति वेदविदो विदुः ।
रामे धर्मेण वर्तमाने प्रजा धर्मेण वर्तते ॥
नास्ति चौरो न दस्युश्च न क्षुद्रो न च दुर्मतिः ।
सर्वे धर्मपरा लोकाः सर्वे सत्यपरायणाः ॥
एवं रामस्य राज्ये तु वर्तमाने महात्मनः ।
निर्विकाराः प्रजाः सर्वा निर्द्वन्द्वा निर्भयाः सुखम् ॥
🔹 पदच्छेद : यथा = जैसा; राजा = राजा; तथा = वैसी; प्रजा = प्रजा; इति = ऐसा; वेदविदः = वेद के ज्ञाता; विदुः = जानते हैं; रामे = राम; धर्मेण = धर्म से; वर्तमाने = वर्तमान (रहते हुए); प्रजा = प्रजा; धर्मेण = धर्म से; वर्तते = रहती है; नास्ति = नहीं है; चौरः = चोर; न दस्युः = न डाकू; च = और; न क्षुद्रः = न क्षुद्र व्यक्ति; न च दुर्मतिः = न दुष्ट बुद्धि; सर्वे = सभी; धर्मपराः = धर्मपरायण; लोकाः = लोग; सर्वे = सभी; सत्यपरायणाः = सत्य में रत; एवम् = इस प्रकार; रामस्य = राम के; राज्ये = राज्य में; तु = तो; वर्तमाने = वर्तमान में; महात्मनः = महात्मा के; निर्विकाराः = विकाररहित; प्रजाः = प्रजा; सर्वाः = सभी; निर्द्वन्द्वाः = द्वन्द्वरहित; निर्भयाः = भयरहित; सुखम् = सुख से।
📖 भावार्थ : जैसा राजा होता है, वैसी प्रजा होती है—ऐसा वेद के ज्ञाता कहते हैं। राम जब धर्म से रहते हैं, तब प्रजा भी धर्म से रहती है। न कोई चोर है, न डाकू, न क्षुद्र व्यक्ति, न दुर्बुद्धि। सभी लोग धर्मपरायण और सत्य में रत हैं। इस प्रकार महात्मा राम के राज्य में सभी प्रजा विकाररहित, द्वन्द्वरहित, भयरहित और सुखी थी।

विस्तृत व्याख्या: इस सर्ग का सबसे महत्त्वपूर्ण सूत्र है—यथा राजा तथा प्रजा। राजा का आचरण प्रजा के आचरण को निर्धारित करता है। राम धर्ममूर्ति थे, इसलिए प्रजा भी धर्ममयी थी। उनके राज्य में अपराधों का पूर्ण अभाव था। चोर, डाकू, दुष्ट, कुबुद्धि वाला कोई नहीं था। सभी लोग धर्म और सत्य पर चलते थे। परिणामस्वरूप, प्रजा मानसिक विकारों, द्वन्द्वों और भय से मुक्त थी। यही रामराज्य की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। राम का शासन केवल भौतिक सुख-समृद्धि ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान भी लेकर आया था।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राजा का आदर्श

यह सर्ग राजा के आदर्श स्वरूप को स्थापित करता है। राजा को धर्मपरायण होना चाहिए, क्योंकि उसके आचरण का प्रभाव सम्पूर्ण प्रजा पर पड़ता है।

🛕 धर्म की सार्वभौमिकता

रामराज्य में धर्म केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग था। यहाँ धर्म ही सर्वोच्च शक्ति थी।

🕊️ अहिंसा और दया

अहिंसा और दया का पालन सम्पूर्ण प्रजा करती थी, जिससे समाज में करुणा का संचार था।

✨ युग-निर्माण का आदर्श

रामराज्य ने युगों के लिए एक आदर्श स्थापित किया कि कैसे धर्म, सत्य और नैतिकता पर आधारित राज्य की रचना की जा सकती है।

🎯 शिक्षा : राम का राज्य हमें सिखाता है कि यदि शासक धर्मपरायण हो, तो प्रजा भी धर्म का पालन करती है। एक आदर्श समाज की स्थापना के लिए राजा का धर्मनिष्ठ होना आवश्यक है। हमें अपने जीवन में भी धर्म, सत्य और दया को स्थान देना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे दशाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

🚩 इस प्रकार श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के युद्धकाण्ड का समापन होता है। तदनन्तर उत्तरकाण्ड प्रारभ्यते। 🚩

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