युद्ध काण्ड अध्याय 109

राम के राज्य में कोई रोग नहीं

इस सर्ग में बताया गया है कि राम के राज्य में किसी भी प्रकार का रोग नहीं था—न शारीरिक, न मानसिक। सभी प्रजाजन स्वस्थ एवं निरोगी जीवन व्यतीत करते थे।

विवरण

राम के राज्य में रोगों का सर्वथा अभाव था। न किसी को ज्वर था, न क्षय, न नेत्ररोग, न त्वचा रोग। प्रजा के सभी लोग पूर्ण स्वस्थ थे। उनके शरीर बलिष्ठ और तेजस्वी थे। वैद्यों के पास कोई काम नहीं था, क्योंकि रोग ही नहीं थे। यह राम के धर्मपरायण शासन का प्रभाव था—उनके राज्य में सभी जीव निरोगी रहते थे। इस सर्ग में रामराज्य की एक और विशेषता का वर्णन है: रोगों की पूर्ण अनुपस्थिति।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १०९

(राम के राज्य में कोई रोग नहीं)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ नवाधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रामराज्य की विशेषताओं में एक और महत्त्वपूर्ण गुण है—रोगों का सर्वथा अभाव। इस सर्ग में वर्णन है कि कैसे राम के धर्ममय शासन में प्रजा के सभी लोग पूर्णतः स्वस्थ और निरोगी थे।

🩺 रोगों का पूर्ण अभाव (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
न व्याधयः प्रजाः काश्चित् पीडयन्ति नृपोत्तम ।
न तासां ज्वरः पित्तं न कासः श्वास एव च ॥
न नेत्ररोगो न शिरोरुजः क्षयो न च ।
न कुष्ठं न च शोथो वा न गुल्मो न विसर्पिणी ॥
सर्वे निरामयाः स्वस्था बलवन्तः सुखान्विताः ।
रामे राज्यं प्रशासति धर्मेण प्रजाः पालयति ॥
🔹 पदच्छेद : न व्याधयः = रोग नहीं; प्रजाः = प्रजा को; काश्चित् = कोई भी; पीडयन्ति = पीड़ित करते हैं; नृपोत्तम = हे राजश्रेष्ठ; न तासाम् = उनमें नहीं; ज्वरः = ज्वर; पित्तं = पित्त विकार; न कासः = न खाँसी; श्वासः = श्वास रोग; एव च = और भी; न नेत्ररोगः = न नेत्र रोग; न शिरोरुजः = न सिर दर्द; क्षयः = क्षय रोग (टीबी); न च = नहीं; न कुष्ठम् = न कोढ़; न च शोथः = न सूजन; वा = या; न गुल्मः = न गुल्म (पेट की गाँठ); न विसर्पिणी = न विसर्प (एक त्वचा रोग); सर्वे = सभी; निरामयाः = रोगरहित; स्वस्थाः = स्वस्थ; बलवन्तः = बलवान; सुखान्विताः = सुख से युक्त; रामे राज्यं प्रशासति = राम के राज्य करते समय; धर्मेण = धर्म से; प्रजाः = प्रजा की; पालयति = रक्षा करते हैं।
📖 भावार्थ : हे राजश्रेष्ठ राम! आपके राज्य में प्रजा को कोई भी रोग पीड़ित नहीं करते थे। उन्हें न ज्वर था, न पित्त विकार, न खाँसी, न श्वास रोग। न नेत्र रोग थे, न सिर दर्द, न क्षय रोग। न कोढ़ था, न सूजन, न गुल्म, न विसर्प। सभी लोग रोगरहित, स्वस्थ, बलवान और सुखी थे। राम जब धर्म से राज्य करते हैं और प्रजा का पालन करते हैं, तब यह स्थिति होती है।

विस्तृत व्याख्या: राम के राज्य में रोगों का पूर्ण अभाव था। यहाँ विभिन्न रोगों के नाम गिनाकर यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी प्रकार का शारीरिक विकार नहीं था। ज्वर, पित्त, कास, श्वास—ये साधारण रोग भी नहीं थे। नेत्र रोग, सिर दर्द, क्षय रोग (टीबी) जैसे गम्भीर रोग तो दूर की बात थी। चर्म रोग, शोथ, गुल्म, विसर्प आदि का भी अभाव था। सभी लोग पूर्णतः स्वस्थ, बलिष्ठ और सुखी थे। यह सब राम के धर्मपरायण शासन का परिणाम था। उनके शासन में प्रजा के आचार-विचार शुद्ध थे, वातावरण स्वच्छ था, भोजन सात्त्विक था, और सभी धर्मपरायण थे—इन्हीं कारणों से रोगों का जन्म ही नहीं होता था।

💪 स्वास्थ्य और बल का वर्णन (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
बलवन्तः सुखिनः सर्वे दृढाङ्गाः सुभगाः प्रजाः ।
न क्षीणाङ्गो न दुर्भगो न दीनो न च दुःखितः ॥
सर्वे तेजस्विनः शूराः सर्वे विद्याविशारदाः ।
सर्वे धर्मपरा नित्यं सर्वे सत्यपरायणाः ॥
रामे राज्यं प्रशासति सर्वे जनाः सुखान्विताः ।
न तेषामल्पिका क्षुन्ना न पिपासा न च क्षतम् ॥
🔹 पदच्छेद : बलवन्तः = बलवान; सुखिनः = सुखी; सर्वे = सभी; दृढाङ्गाः = दृढ़ अंगों वाले; सुभगाः = सौभाग्यशाली; प्रजाः = प्रजा; न क्षीणाङ्गः = क्षीण अंगों वाला कोई नहीं; न दुर्भगः = अभागा कोई नहीं; न दीनः = दीन (दरिद्र) कोई नहीं; न च दुःखितः = और दुःखी कोई नहीं; सर्वे = सभी; तेजस्विनः = तेजस्वी; शूराः = वीर; सर्वे = सभी; विद्याविशारदाः = विद्या में निपुण; सर्वे = सभी; धर्मपराः = धर्मपरायण; नित्यम् = सदा; सर्वे = सभी; सत्यपरायणाः = सत्य में रत; रामे राज्यं प्रशासति = राम के राज्य करते समय; सर्वे जनाः = सभी लोग; सुखान्विताः = सुख से युक्त; न तेषाम् = उन्हें; अल्पिका = थोड़ी भी; क्षुन्ना = भूख; न पिपासा = न प्यास; न च क्षतम् = न चोट।
📖 भावार्थ : सभी प्रजा बलवान, सुखी, दृढ़ अंगों वाले और सौभाग्यशाली थे। कोई क्षीण अंग वाला नहीं था, कोई अभागा नहीं था, कोई दीन-दरिद्र नहीं था, कोई दुःखी नहीं था। सभी तेजस्वी, वीर, विद्या में निपुण, सदा धर्मपरायण और सत्य में रत थे। राम के राज्य करते समय सभी लोग सुखी थे। उन्हें जरा भी भूख या प्यास की पीड़ा नहीं थी, न ही कहीं चोट लगने का भय था।

विस्तृत व्याख्या: राम के राज्य में केवल रोगों का ही अभाव नहीं था, बल्कि प्रजा का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य उत्कृष्ट था। लोगों के शरीर दृढ़ और सुन्दर थे, वे बलवान थे। क्षीणकाय या विकलांग कोई नहीं था। सौभाग्य सबके साथ था। वे विद्या में निपुण थे, जिससे वे तेजस्वी और वीर बने हुए थे। धर्म और सत्य उनके जीवन के मूल मन्त्र थे। इस कारण उनके मन में किसी प्रकार की कुण्ठा या दुःख नहीं था। भूख-प्यास तो प्राकृतिक आवश्यकताएँ हैं, परन्तु उन्हें उसकी भी पीड़ा नहीं थी—अर्थात् उन्हें समय पर भोजन-जल सुलभ था, और कभी चोट-व्यथा नहीं होती थी।

🧘 मानसिक स्वास्थ्य एवं आयु वृद्धि (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
न च मन्युर्न च द्वेषो न च लोभो न मत्सरः ।
सर्वे धर्मरताः शान्ताः सर्वे सत्यपरायणाः ॥
जरा न च प्रबाधन्ते न च मृत्युरकालजः ।
रामे राज्यं प्रशासति धर्मेण प्रजाः पालयति ॥
प्रजाः सर्वे च वर्तन्ते युगे कृतयुगे यथा ।
रामः प्रजाः पालयति पितेव पुत्रवत्सलः ॥
🔹 पदच्छेद : न च मन्युः = न क्रोध; न च द्वेषः = न द्वेष; न च लोभः = न लोभ; न मत्सरः = न ईर्ष्या; सर्वे = सभी; धर्मरताः = धर्म में रत; शान्ताः = शान्त; सर्वे = सभी; सत्यपरायणाः = सत्य में रत; जरा = बुढ़ापा; न च प्रबाधन्ते = पीड़ित नहीं करता; न च मृत्युरकालजः = न अकाल मृत्यु; रामे राज्यं प्रशासति = राम के राज्य करते समय; धर्मेण = धर्म से; प्रजाः = प्रजा की; पालयति = रक्षा करते हैं; प्रजाः = प्रजा; सर्वे = सभी; च = और; वर्तन्ते = रहते हैं; युगे = युग में; कृतयुगे = सतयुग के समान; यथा = जैसे; रामः = राम; प्रजाः = प्रजा की; पालयति = रक्षा करते हैं; पितेव = पिता के समान; पुत्रवत्सलः = पुत्र के प्रति स्नेही।
📖 भावार्थ : राम के राज्य में किसी को क्रोध नहीं था, न द्वेष, न लोभ, न ईर्ष्या। सभी धर्म में रत, शान्त और सत्यपरायण थे। बुढ़ापा उन्हें पीड़ित नहीं करता था और न ही अकाल मृत्यु होती थी। राम जब धर्म से राज्य करते हैं और प्रजा का पालन करते हैं, तब सभी प्रजा ऐसे रहते हैं जैसे सतयुग में। राम पुत्र के समान स्नेही पिता की भाँति प्रजा का पालन करते हैं।

विस्तृत व्याख्या: इस सर्ग के अन्तिम भाग में मानसिक स्वास्थ्य और दीर्घायु का वर्णन है। क्रोध, द्वेष, लोभ, ईर्ष्या जैसे मानसिक रोग भी नहीं थे। सभी लोग शान्त और धर्म में स्थित थे। बुढ़ापा केवल शरीर की अवस्था थी, उससे कोई पीड़ा नहीं होती थी। अकाल मृत्यु का तो नामोनिशान ही नहीं था। सब लोग यथायु जीवन जीते थे। यह स्थिति सतयुग के समान थी—जब धर्म की चारों पाद स्थापित थे। राम के पितृवत् स्नेहिल शासन का यह परिणाम था कि प्रजा न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी पूर्ण स्वस्थ थी। इस प्रकार रामराज्य में आरोग्य की दृष्टि से भी सब कुछ सर्वोत्तम था।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🩻 रोगमुक्त समाज की अवधारणा

यह सर्ग एक ऐसे समाज की कल्पना प्रस्तुत करता है जहाँ रोग ही नहीं हैं। यह आदर्श राज्य की पराकाष्ठा है।

🧠 मानसिक स्वास्थ्य का महत्त्व

केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोगों का अभाव भी दर्शाया गया है। क्रोध, लोभ, ईर्ष्या का न होना ही सच्चा स्वास्थ्य है।

🕊️ अकाल मृत्यु का अभाव

अकाल मृत्यु का न होना यह दर्शाता है कि प्रजा सुरक्षित और संरक्षित है, और प्रकृति भी अनुकूल है।

🌏 सतयुग का स्मरण

रामराज्य की तुलना सतयुग से कर यह बताया गया है कि धर्म के चरमोत्कर्ष पर ही ऐसा सम्भव है।

🎯 शिक्षा : रोग केवल शारीरिक कारणों से ही नहीं, बल्कि मानसिक अशान्ति, अधर्म और अनैतिकता से भी उत्पन्न होते हैं। राम का राज्य हमें सिखाता है कि धर्म, सत्य और शान्ति से युक्त समाज में रोग अपने आप समाप्त हो जाते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे नवाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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