युद्ध काण्ड अध्याय 107

राम के राज्य में कोई दुःखी नहीं

इस सर्ग में वर्णन है कि राम के राज्य में किसी भी प्रकार का दुःख नहीं था—न मानसिक, न शारीरिक। सभी प्रजाजन आनन्दमय जीवन व्यतीत करते थे।

विवरण

राम के राज्य में दुःख का तो नामोनिशान ही नहीं था। चाहे वह पुत्र-शोक हो, पति-वियोग हो, धन-हानि हो या कोई अन्य संताप—किसी को कोई कष्ट नहीं था। सभी लोग अपने-अपने धर्म में रत थे, परस्पर प्रेमपूर्वक रहते थे, और उनके मन में किसी प्रकार का भय या चिन्ता नहीं थी। राम के न्यायपूर्ण और कृपालु शासन के कारण प्रजा के सभी दुःख दूर हो गए थे। यह सर्ग रामराज्य के उस स्वर्णिम काल का चित्रण करता है, जहाँ सुख ही सुख था।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १०७

(राम के राज्य में कोई दुःखी नहीं)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्ताधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के राज्य में सुख और शान्ति का वातावरण था। इस सर्ग में बताया गया है कि कैसे उनके शासन में किसी भी प्रकार का दुःख या शोक नहीं था। प्रजा के सभी वर्ग आनन्दपूर्वक जीवन बिता रहे थे।

😊 सुख और शान्ति का वातावरण (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
न शोकः सम्प्रजायेत न व्याधिर्न च दारुणः ।
न च प्रजासु राजेन्द्र म्रियते चापि बालकः ॥
न च विधवयो नार्यो न चार्ता न च दुःखिताः ।
सर्वाः पतिव्रताः नार्यः पतिभिः सह मोदिताः ॥
स्वधर्मेण प्रजाः सर्वाः पाल्यन्ते राघवेण तु ।
धर्म एव प्रधानेन राज्ञा धर्मेण शासता ॥
🔹 पदच्छेद : न शोकः = शोक नहीं; सम्प्रजायेत = उत्पन्न होता था; न व्याधिः = न रोग; न च दारुणः = न भयंकर (पीड़ा); न च प्रजासु = और प्रजा में; राजेन्द्र = राजेन्द्र; म्रियते = मरता है; चापि = भी; बालकः = बालक; न च विधवयः = न विधवाएँ; नार्यः = स्त्रियाँ; न चार्ता = न पीड़ित; न च दुःखिताः = न दुःखी; सर्वाः = सभी; पतिव्रताः = पतिव्रता; नार्यः = स्त्रियाँ; पतिभिः = पतियों के साथ; सह = साथ; मोदिताः = प्रसन्न; स्वधर्मेण = अपने-अपने धर्म से; प्रजाः = प्रजा; सर्वाः = सभी; पाल्यन्ते = पाली जाती हैं; राघवेण = राघव द्वारा; तु = तो; धर्म एव = धर्म ही; प्रधानेन = प्रधान; राज्ञा = राजा द्वारा; धर्मेण = धर्म से; शासता = शासन करते हुए।
📖 भावार्थ : राम के राज्य में न तो कहीं शोक था, न रोग, न ही कोई भयंकर पीड़ा। हे राजेन्द्र राम! प्रजा में किसी भी बालक की अकाल मृत्यु नहीं होती थी। कोई स्त्री विधवा नहीं होती थी, न ही कोई पीड़ित या दुःखी थी। सभी स्त्रियाँ पतिव्रता थीं और अपने पतियों के साथ प्रसन्न रहती थीं। राघव अपने धर्म के अनुसार सभी प्रजा का पालन करते थे। धर्म ही उनका प्रधान था और वे धर्म के मार्ग से ही शासन करते थे।

विस्तृत व्याख्या: इस सर्ग के आरम्भ में ही यह स्पष्ट कर दिया गया है कि राम के राज्य में दुःख जैसी कोई वस्तु थी ही नहीं। शोक, रोग, आकस्मिक मृत्यु, विधवापन, पीड़ा—ये सब यहाँ अनुपस्थित थे। स्त्रियाँ सुहागिन थीं और पति के साथ सुख भोग रही थीं। इसका कारण था राजा का धर्मनिष्ठ होकर शासन करना। राम ने कभी भी धर्म से विमुख होकर कार्य नहीं किया। उनके राज्य का आधार धर्म था, और धर्म के कारण ही प्रजा को सुख की प्राप्ति हुई। यहाँ यह भी संकेत है कि राजा के धर्माचरण से प्रजा के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है।

🤝 परस्पर प्रेम और सहयोग (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
परस्परं प्रियं वाक्यं ब्रुवते नृप सर्वदा ।
न च द्वेषो न च क्रोधो न मात्सर्यं कथंचन ॥
अनसूयाः प्रसन्नाश्च सर्वे धर्मपरायणाः ।
स्वकर्मसु च सज्जन्ते यथाशास्त्रं यथाविधि ॥
न चास्ति क्षुत्पिपासा वा शीतवातातपभयम् ।
रामे राज्यं प्रशासति सर्वे जनाः सुखान्विताः ॥
🔹 पदच्छेद : परस्परम् = एक-दूसरे से; प्रियम् = प्रिय; वाक्यम् = वचन; ब्रुवते = बोलते हैं; नृप = राजन्; सर्वदा = सदा; न च द्वेषः = न द्वेष; न च क्रोधः = न क्रोध; न मात्सर्यम् = न ईर्ष्या; कथंचन = किसी भी प्रकार; अनसूयाः = ईर्ष्यारहित; प्रसन्नाः = प्रसन्न; च = और; सर्वे = सभी; धर्मपरायणाः = धर्मपरायण; स्वकर्मसु = अपने-अपने कर्मों में; च = और; सज्जन्ते = लगे रहते हैं; यथाशास्त्रम् = शास्त्रानुसार; यथाविधि = विधिपूर्वक; न चास्ति = और नहीं है; क्षुत्पिपासा = भूख-प्यास; वा = या; शीतवातातपभयम् = सर्दी, हवा, धूप का भय; रामे राज्यं प्रशासति = राम के राज्य करते समय; सर्वे जनाः = सभी लोग; सुखान्विताः = सुख से युक्त।
📖 भावार्थ : हे राजन्! सभी लोग सदा एक-दूसरे से प्रिय वचन बोलते थे। कहीं भी द्वेष, क्रोध या ईर्ष्या नहीं थी। सभी ईर्ष्यारहित, प्रसन्न और धर्मपरायण थे। वे अपने-अपने कर्मों में शास्त्र के अनुसार और विधिपूर्वक लगे रहते थे। राम के राज्य करते समय किसी को भूख-प्यास की पीड़ा नहीं थी, न ही सर्दी, हवा या धूप का भय था। सभी लोग सुख से युक्त थे।

विस्तृत व्याख्या: राम के शासनकाल में सामाजिक समरसता चरम पर थी। लोग आपस में प्रेमपूर्वक रहते थे, उनके वचन मधुर और हितकारी होते थे। द्वेष, क्रोध, ईर्ष्या जैसे दुर्गुणों का तो अस्तित्व ही नहीं था। सभी लोग ईर्ष्यारहित होकर एक-दूसरे की उन्नति देखकर प्रसन्न होते थे। वे धर्म के मार्ग पर चलते थे और अपने-अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन शास्त्र विधि से करते थे। इससे समाज में व्यवस्था और सुव्यवस्था बनी रहती थी। भौतिक सुखों की भी कमी नहीं थी—भूख-प्यास से त्रस्त कोई नहीं था, और प्राकृतिक आपदाओं का भय भी नहीं था। राम के राज्य में सब कुछ सुलभ और सुखद था।

🌟 आनन्दमय जीवन का वर्णन (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
न तत्र खलु वृत्तान्तं शोचन्ति न च नन्दिताः ।
रामं राज्ये स्थितं दृष्ट्वा प्रजाः सर्वाः सुखान्विताः ॥
आसन् प्रमुदिताः सर्वे देवा इव सुरालये ।
न चौरा न च दस्यवः स्वधर्मनिरता जनाः ॥
रामः प्रजाः पालयति पितेव पुत्रवत्सलः ।
निर्द्वन्द्वा निर्भयाः सर्वे रामे राज्यं प्रशासति ॥
🔹 पदच्छेद : न तत्र = वहाँ नहीं; खलु = निश्चय ही; वृत्तान्तम् = वृत्तान्त (कोई); शोचन्ति = शोक करते हैं; न च नन्दिताः = और न ही हर्षित होते हैं (अर्थात् अति हर्ष भी नहीं, स्थिर रहते हैं); रामम् = राम को; राज्ये स्थितम् = राज्य में स्थित; दृष्ट्वा = देखकर; प्रजाः = प्रजा; सर्वाः = सभी; सुखान्विताः = सुख से युक्त; आसन् = थे; प्रमुदिताः = अत्यन्त प्रसन्न; सर्वे = सभी; देवाः = देवता; इव = जैसे; सुरालये = स्वर्ग में; न चौराः = न चोर; न दस्यवः = न डाकू; स्वधर्मनिरताः = अपने धर्म में रत; जनाः = लोग; रामः = राम; प्रजाः = प्रजा की; पालयति = रक्षा करते हैं; पितेव = पिता के समान; पुत्रवत्सलः = पुत्र के प्रति स्नेही; निर्द्वन्द्वाः = द्वन्द्वरहित; निर्भयाः = भयरहित; सर्वे = सभी; रामे राज्यं प्रशासति = राम के राज्य करते समय।
📖 भावार्थ : वहाँ कोई भी किसी बात का शोक नहीं करता था और न ही अत्यधिक हर्षित होता था—सभी स्थिर चित्त थे। राम को राज्य में देखकर सभी प्रजा सुखी थी। वे सभी अत्यन्त प्रसन्न थे, जैसे स्वर्ग के देवता। न चोर थे, न डाकू; सभी लोग अपने धर्म में रत थे। राम पुत्र के समान स्नेही पिता की भाँति प्रजा का पालन करते थे। राम के राज्य करते समय सभी द्वन्द्वों से रहित और भयरहित थे।

विस्तृत व्याख्या: राम के राज्य में लोगों का मानसिक सन्तुलन अद्भुत था। न तो वे किसी बात का अत्यधिक शोक करते थे, न ही किसी बात का अत्यधिक हर्ष—वे सदा समभाव में रहते थे। राम के राज्याभिषेक ने सभी के हृदय में आनन्द भर दिया था, और वह आनन्द स्थिर था। उनका जीवन स्वर्ग के देवताओं के समान सुखमय था। अपराधों का पूर्ण अभाव था, क्योंकि सभी स्वतः धर्म में रत थे। राम का पितृवत् स्नेहिल शासन प्रजा के लिए ढाल का कार्य करता था। इस प्रकार रामराज्य में भय, द्वन्द्व और अशान्ति का नामोनिशान नहीं था।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

😇 दुःख का अभाव ही सुख नहीं

इस सर्ग में केवल दुःख के अभाव का ही नहीं, बल्कि सकारात्मक सुख का वर्णन है। प्रजा न केवल दुःखों से मुक्त थी, बल्कि वे आनन्द में भी थे।

🕊️ सामाजिक समरसता

परस्पर प्रेम, द्वेष का अभाव, और ईर्ष्यारहित वृत्ति—ये सामाजिक समरसता के सूचक हैं, जो आदर्श राज्य की पहचान है।

👪 राजा का पितृवत् प्रेम

राम का पिता के समान प्रजा का पालन करना यह दर्शाता है कि राजा को प्रजा के प्रति वात्सल्य भाव रखना चाहिए।

⚖️ धर्म का शासन में महत्त्व

राम धर्म के अनुसार शासन करते थे, इसीलिए प्रजा भी धर्म में रत थी। यह राजा और प्रजा के सम्बन्ध का आदर्श उदाहरण है।

🎯 शिक्षा : सच्चा सुख केवल भौतिक सुख-सुविधाओं से नहीं, बल्कि मानसिक शान्ति, परस्पर प्रेम और धर्म के पालन से आता है। राम का राज्य इसका जीता-जागता उदाहरण है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे सप्ताधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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