युद्ध काण्ड अध्याय 106

राम के राज्य की विशेषताएँ

यह सर्ग राम के राज्याभिषेक के पश्चात उनके आदर्श राज्य का वर्णन करता है, जहाँ सभी प्रजाजन धर्मपरायण, सुखी और रोगमुक्त थे।

विवरण

राम के राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में एक नए युग का आरम्भ हुआ। प्रजा धर्म और नीति के मार्ग पर चलने लगी। कोई भी व्यक्ति दुःखी नहीं था, सभी के चेहरे पर प्रसन्नता थी। वर्षा समय पर होती, फसलें लहलहातीं, वृक्ष सदा फलों से लदे रहते। कोई रोग नहीं था, न ही किसी प्रकार का भय। स्त्री-पुरुष सभी धर्मपरायण थे और वेदाध्ययन में रत रहते। राम के शासन में अकाल, चोरी, डाकू, द्वेष आदि का नामोनिशान नहीं था। यह सर्ग रामराज्य के उस आदर्श स्वरूप का वर्णन करता है, जिसे युगों-युगों तक स्मरण किया जाता रहा।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १०६

(राम के राज्य की विशेषताएँ)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षडधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के राज्याभिषेक के पश्चात सम्पूर्ण अयोध्या में एक नवीन चेतना का संचार हुआ। प्रजा धर्म के पथ पर चलने लगी और चारों ओर सुख-समृद्धि छा गई। इस सर्ग में उस आदर्श रामराज्य का वर्णन है, जहाँ न दुःख है, न रोग, न भय।

🏛️ प्रजा का धार्मिक जीवन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
रामे राज्यं प्रशासति सर्वे जनाः सुखिनोऽभवन् ।
धर्मपरा नरा नार्यो वेदाध्ययनतत्पराः ॥
न कश्चिद् व्याधितस्तासां न च शोकपरायणः ।
न चौराः न च दस्यवः स्वधर्मनिरता जनाः ॥
स्वकर्मभिर्विराजन्ते प्रजा धर्मेण शोभिताः ।
रामः प्रजाः पालयति पितेव पुत्रवत्सलः ॥
🔹 पदच्छेद : रामे = राम के; राज्यं प्रशासति = राज्य करते समय; सर्वे = सभी; जनाः = लोग; सुखिनः = सुखी; अभवन् = हुए; धर्मपराः = धर्म में तत्पर; नराः = पुरुष; नार्यः = स्त्रियाँ; वेदाध्ययनतत्पराः = वेदों के अध्ययन में लीन; न कश्चित् = कोई भी नहीं; व्याधितः = रोगी; तासाम् = उनमें; न च = और न ही; शोकपरायणः = शोक में डूबा हुआ; न चौराः = न चोर; न दस्यवः = न डाकू; स्वधर्मनिरताः = अपने धर्म में रत; जनाः = लोग; स्वकर्मभिः = अपने-अपने कर्मों से; विराजन्ते = शोभित होते हैं; प्रजाः = प्रजा; धर्मेण = धर्म से; शोभिताः = सुशोभित; रामः = राम; प्रजाः = प्रजा की; पालयति = रक्षा करते हैं; पितेव = पिता के समान; पुत्रवत्सलः = पुत्र के प्रति स्नेही।
📖 भावार्थ : जब राम राज्य का संचालन करने लगे, तब सभी प्रजाजन परम सुखी हो गए। पुरुष और स्त्रियाँ सभी धर्मपरायण थे और वेदों के अध्ययन में लीन रहते थे। उनमें कोई भी रोगी नहीं था, न ही कोई शोक से ग्रस्त था। राज्य में न तो चोर थे और न ही डाकू; सभी लोग अपने-अपने धर्म में रत थे। प्रजा अपने-अपने कर्मों से सुशोभित होती थी और धर्म के मार्ग पर चलती थी। राम पुत्र के समान वात्सल्य रखने वाले पिता की भाँति प्रजा का पालन करते थे। इस प्रकार आदर्श राजा के आदर्श शासन का यह प्रथम लक्षण वर्णित हुआ।

विस्तृत व्याख्या: राम के राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में एक अलौकिक वातावरण का निर्माण हुआ। प्रत्येक नर-नारी धर्म के मार्ग पर चल पड़े। वेदों का अध्ययन-अध्यापन निरन्तर चलता रहा। लोगों के मन से पाप-संकल्प समाप्त हो गए और सभी सात्त्विक वृत्ति के हो गए। राज्य में कहीं भी चोरी, डकैती या अन्य कोई अपराध नहीं होता था। प्रजा स्वेच्छा से धर्म का पालन करती थी, क्योंकि राजा स्वयं धर्ममूर्ति थे। राम ने कभी भी प्रजा के साथ पक्षपात नहीं किया; वे सबको समान दृष्टि से देखते थे। उनके शासन में प्रजा को माता-पिता का सा संरक्षण प्राप्त था। इसी कारण प्रजा भी राजा के प्रति अगाध श्रद्धा और भक्ति रखती थी।

🌾 प्राकृतिक समृद्धि का वर्णन (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
निरामया निरातङ्का निर्द्वन्द्वाः सुखिनो जनाः ।
काले वर्षति पर्जन्यः सस्यसम्पद् विराजते ॥
वृक्षाः फलैः सदा युक्ताः पुष्पैरुपचिताः सदा ।
वाताः सुखाः सदा वान्ति न च दुर्भिक्षशङ्कया ॥
न च प्रजासु राजेन्द्र म्रियन्तेऽप्यकालतः ।
सर्वे धर्मपरा लोकाः पूजयन्ति च देवताः ॥
🔹 पदच्छेद : निरामयाः = रोगरहित; निरातङ्काः = भयरहित; निर्द्वन्द्वाः = द्वन्द्वरहित; सुखिनः = सुखी; जनाः = लोग; काले = समय पर; वर्षति = वर्षा करता है; पर्जन्यः = मेघ; सस्यसम्पद् = फसलों की सम्पदा; विराजते = शोभित होती है; वृक्षाः = वृक्ष; फलैः = फलों से; सदा = सदा; युक्ताः = युक्त; पुष्पैः = फूलों से; उपचिताः = भरे; सदा = सदा; वाताः = वायु; सुखाः = सुखद; सदा = सदा; वान्ति = बहती हैं; न च = और नहीं; दुर्भिक्षशङ्कया = अकाल की आशंका; न च प्रजासु = और प्रजा में; राजेन्द्र = राजेन्द्र; म्रियन्ते = मरते हैं; अपि = भी; अकालतः = अकाल मृत्यु; सर्वे = सभी; धर्मपराः = धर्मपरायण; लोकाः = लोग; पूजयन्ति = पूजा करते हैं; च = और; देवताः = देवताओं की।
📖 भावार्थ : प्रजा के सभी लोग रोगों से मुक्त थे, किसी प्रकार का भय नहीं था, द्वन्द्वों से रहित थे और सुखी थे। मेघ समय पर वर्षा करते थे, जिससे फसलें लहलहाती थीं और सम्पूर्ण पृथ्वी शोभायमान होती थी। वृक्ष सदा फलों और पुष्पों से लदे रहते थे। वायु सदा सुखद रूप से बहती थी और अकाल की कोई आशंका नहीं रहती थी। हे राजेन्द्र राम! प्रजा में किसी की भी अकाल मृत्यु नहीं होती थी। सभी लोग धर्मपरायण थे और देवताओं की पूजा-अर्चना में तत्पर रहते थे।

विस्तृत व्याख्या: राम के शासनकाल में प्रकृति भी मानो उनके धर्मपरायण शासन की अनुगामिनी हो गई। ऋतुएँ अपने नियत समय पर आतीं और मेघ समय पर वर्षा करते, जिससे कभी सूखा या बाढ़ की स्थिति नहीं बनती। खेत हरी-भरी फसलों से लदे रहते और धरती सोने की सी प्रतीत होती। वन-उपवन सदा फल-फूलों से भरे रहते, वृक्षों की डालियाँ फलों के भार से झुकी रहतीं। वायु इतनी सुखद और सुगन्धित होती कि मन प्रसन्न हो जाता। अकाल, महामारी, अनावृष्टि जैसी कोई प्राकृतिक विपदा नहीं आती। इस प्रकार राम के राज्य में भौतिक समृद्धि चरम पर थी, क्योंकि राजा के धार्मिक आचरण से प्रकृतिदेवी भी संतुष्ट थीं।

🕊️ रोग, शोक एवं भय का अभाव (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
नाधयो व्याधयः क्लेशा न चौरा न च दस्यवः ।
न भयं न च दुःखानि रामे राज्यं प्रशासति ॥
अल्पव्यया महाभोगाः सर्वे धर्मपरायणाः ।
जरामरणहीनाश्च प्रजाः सुखमनुत्तमम् ॥
रामस्य शासने सक्ताः परस्परहिते रताः ।
नित्यं प्रमुदिताः सर्वे यथा देवाः सुरालये ॥
🔹 पदच्छेद : नाधयः = मानसिक रोग नहीं; व्याधयः = शारीरिक रोग नहीं; क्लेशाः = क्लेश नहीं; न चौराः = न चोर; न च दस्यवः = न डाकू; न भयम् = भय नहीं; न च दुःखानि = और दुःख नहीं; रामे राज्यं प्रशासति = जब राम राज्य का शासन करते हैं; अल्पव्ययाः = कम व्यय वाले; महाभोगाः = बड़े भोग; सर्वे = सभी; धर्मपरायणाः = धर्मपरायण; जरामरणहीनाः = बुढ़ापे और मृत्यु से रहित (अकाल मृत्यु रहित); च = और; प्रजाः = प्रजा; सुखम् = सुख; अनुत्तमम् = उत्तम; रामस्य = राम के; शासने = शासन में; सक्ताः = आसक्त; परस्परहिते = परस्पर हित में; रताः = रत; नित्यम् = नित्य; प्रमुदिताः = प्रसन्न; सर्वे = सभी; यथा = जैसे; देवाः = देवता; सुरालये = स्वर्ग में।
📖 भावार्थ : जब राम राज्य का शासन करते हैं, तब न तो मानसिक रोग होते हैं, न शारीरिक व्याधियाँ, न क्लेश, न चोर, न डाकू, न भय और न ही दुःख। प्रजा के लोग अल्प व्यय में महान भोगों को भोगते हैं, सभी धर्मपरायण हैं और अकाल मृत्यु से रहित हैं। वे अनुपम सुख का अनुभव करते हैं। राम के शासन में आसक्त होकर वे परस्पर हित में रत रहते हैं। सभी नित्य प्रसन्न रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे स्वर्ग के देवता।

विस्तृत व्याख्या: राम के राज्य में सभी प्रकार के रोगों का सर्वथा अभाव था। न किसी को मानसिक तनाव था, न शारीरिक पीड़ा। लोगों के मन में किसी प्रकार का भय नहीं था—न चोरों का, न शत्रुओं का, न राजदण्ड का। वे सभी परस्पर स्नेह और सहयोग से रहते थे। अकाल मृत्यु का तो नामोनिशान नहीं था; सभी यथायु जीवन जीते थे। आर्थिक दृष्टि से भी वे सम्पन्न थे—कम परिश्रम से ही उन्हें पर्याप्त फल मिल जाता था। उनका जीवन स्वर्ग के सुखों से भी बढ़कर था। राम का शासन इतना प्रभावी और धर्ममय था कि प्रजा स्वतः धर्म का पालन करती थी और उनके हृदय में सदा उल्लास बना रहता था। यही कारण था कि रामराज्य को आदर्श राज्य के रूप में सदा स्मरण किया जाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 आदर्श राज्य की अवधारणा

यह सर्ग रामराज्य के उस स्वरूप को प्रस्तुत करता है जिसकी कल्पना भारतीय राजनीतिक चिन्तन में सर्वोत्तम मानी गई है। यहाँ राजा पूर्णतः धर्मनिष्ठ और प्रजावत्सल है, और प्रजा भी धर्म का पालन करती है।

💡 धर्म और राज्य का समन्वय

राम के राज्य में धर्म और राज्य का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। राजा का कर्तव्य केवल प्रजा की रक्षा करना नहीं, बल्कि उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाना भी है।

🧠 प्राकृतिक समृद्धि का रहस्य

इस सर्ग में बताया गया है कि जब राजा धर्मपरायण होता है, तो प्रकृति भी उसके अनुकूल हो जाती है। यह पर्यावरणीय संतुलन का सूचक है।

🌊 आगामी सर्गों की भूमिका

इस सर्ग में रामराज्य की स्थापना का वर्णन है। अगले सर्गों में इसी आदर्श राज्य के अन्य पहलुओं का विस्तार से चित्रण किया जाएगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि आदर्श राज्य की स्थापना के लिए राजा का धर्मपरायण, न्यायप्रिय और प्रजावत्सल होना आवश्यक है। जब राजा ऐसा होता है, तो प्रजा स्वतः धर्म का पालन करती है और चारों ओर सुख-शान्ति छा जाती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे षडधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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