युद्ध काण्ड अध्याय 105

राम की प्रजा का सुखी जीवन

राम के धर्मपूर्वक शासन में अयोध्या की प्रजा अत्यन्त सुखी, समृद्ध और निर्भय होकर रहती है। कोई भी व्यक्ति दुःखी, रोगी या असंतुष्ट नहीं है। सभी धर्मपरायण हैं और राम में अनन्य प्रेम रखते हैं। यह सर्ग रामराज्य के आदर्श स्वरूप का सुन्दर चित्रण करता है।

विवरण

राम के राज्य में सभी प्रजाजन सुख और समृद्धि से जीवन व्यतीत करते हैं। वर्णाश्रम धर्म का पालन होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए धन, धान्य और आनन्द से परिपूर्ण है। न कोई चोर है, न कोई दुष्ट। न किसी को किसी प्रकार का भय है। वृद्धजन अपने पुत्र-पौत्रों के साथ सुखपूर्वक जीते हैं, स्त्रियाँ पतिव्रत धर्म का पालन करती हैं, युवक बल और पराक्रम में निपुण हैं। वन-उपवन हरे-भरे हैं, नदियाँ जल से भरी रहती हैं, वर्षा समय पर होती है। धर्म, अर्थ और काम का सन्तुलित पालन होता है। सभी राम में अनन्य भक्ति रखते हैं और उनका यश गाते हैं। यह सर्ग रामराज्य की अवधारणा को चरितार्थ करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १०५

(राम की प्रजा का सुखी जीवन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चोत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : यह युद्धकाण्ड का अन्तिम सर्ग है, जहाँ राम के राज्य में प्रजा के सुखी जीवन का चित्रण है। इसे रामराज्य की संज्ञा दी जाती है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति धर्मपूर्वक, निर्भय और समृद्ध जीवन जीता है। यह सर्ग एक आदर्श राज्य का स्वप्न प्रस्तुत करता है।

😊 प्रजा के सुख के विविध रूप (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
रामे राज्यं प्रशासति सर्वे लोका यथासुखम् ।
वर्णाश्रमाचारयुता धर्मेण परिपालिताः ॥
नाधयो व्याधयः क्लेशा दारिद्र्यं च न विद्यते ।
पुत्रदारगृहैः सार्धं नराः सुखमुपासते ॥
न चौरभयं नो राजभयं न दैवतं भयम् ।
सर्वत्र सुखिताः सर्वे राममेवानुपश्यति ॥
🔹 पदच्छेद : रामे = राम के द्वारा; राज्यम् = राज्य; प्रशासति = शासन किए जाने पर; सर्वे = सभी; लोकाः = लोग; यथासुखम् = यथासुख; वर्णाश्रमाचारयुता = वर्णाश्रमाचार से युक्त; धर्मेण = धर्म से; परिपालिताः = पालित; न = नहीं; आधयः = मानसिक रोग; व्याधयः = शारीरिक रोग; क्लेशाः = क्लेश; दारिद्र्यम् = दरिद्रता; च = और; न = नहीं; विद्यते = होती है; पुत्रदारगृहैः = पुत्र, पत्नी और घर के साथ; सार्धम् = सहित; नराः = मनुष्य; सुखम् = सुख; उपासते = प्राप्त करते हैं; न = नहीं; चौरभयम् = चोरों का भय; नो = नहीं; राजभयम् = राजा का भय; न = नहीं; दैवतम् = दैवी; भयम् = भय; सर्वत्र = सर्वत्र; सुखिताः = सुखी; सर्वे = सभी; रामम् = राम को; एव = ही; अनुपश्यति = देखते हैं (आदर्श मानकर)।
📖 भावार्थ : जब राम राज्य का शासन कर रहे थे, तब सभी लोग वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए धर्मपूर्वक यथासुख जीवन व्यतीत कर रहे थे। किसी को कोई मानसिक या शारीरिक रोग नहीं था, न ही कोई क्लेश या दरिद्रता थी। सभी मनुष्य अपने पुत्र, पत्नी और घर के साथ सुखपूर्वक रहते थे। न किसी को चोरों का भय था, न राजा का भय, न ही किसी दैवी आपदा का भय। सभी लोग सुखी थे और सबकी दृष्टि में राम ही आदर्श थे। यहाँ राम के शासन की सर्वांगीण समृद्धि और सुरक्षा का वर्णन है। प्रजा को न तो आन्तरिक (चोर) से भय है, न बाह्य (राजा) से, न प्राकृतिक (दैवी) से। यह पूर्ण सुरक्षा और कल्याण की स्थिति है।

🌿 प्राकृतिक समृद्धि (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
नद्यः फलन्ति सस्यानि वृक्षाः पुष्पफलानि च ।
वर्षन्ति च घनाः काले वाति वायुः सुखः सदा ॥
प्रजाः प्रहृष्टाः पुष्टाश्च सधना धर्मतत्पराः ।
न तासु वर्णसङ्करो वर्तते न च दस्यवः ॥
सीतापि राममासाद्य पतिव्रता महायशाः ।
रेमे तेन समं राज्ये प्रजाभिः परिरक्षिते ॥
🔹 पदच्छेद : नद्यः = नदियाँ; फलन्ति = फलती हैं; सस्यानि = फसलें; वृक्षाः = वृक्ष; पुष्पफलानि = फूल-फल; च = और; वर्षन्ति = वर्षा करते हैं; च = और; घनाः = बादल; काले = समय पर; वाति = बहती है; वायुः = वायु; सुखः = सुखद; सदा = सदा; प्रजाः = प्रजा; प्रहृष्टाः = अत्यन्त प्रसन्न; पुष्टाः = पुष्ट; च = और; सधना = धन से युक्त; धर्मतत्पराः = धर्म परायण; न = नहीं; तासु = उनमें; वर्णसङ्करः = वर्णसंकर (मिश्रित जाति का दोष); वर्तते = होता है; न = नहीं; च = और; दस्यवः = डाकू; सीतापि = सीता भी; रामम् = राम को; आसाद्य = प्राप्त कर; पतिव्रता = पतिव्रता; महायशाः = महायशस्विनी; रेमे = आनन्दित हुई; तेन = उनके साथ; समम् = समान; राज्ये = राज्य में; प्रजाभिः = प्रजा के द्वारा; परिरक्षिते = अच्छी तरह रक्षित।
📖 भावार्थ : राम के राज्य में नदियाँ फसलें उत्पन्न करती थीं, वृक्ष समय पर फूल-फल देते थे। बादल समय पर वर्षा करते थे और वायु सदा सुखद रूप से बहती थी। प्रजा अत्यन्त प्रसन्न, पुष्ट, धन-धान्य से परिपूर्ण और धर्म परायण थी। उनमें वर्णसंकर दोष नहीं था और न ही कोई डाकू थे। महायशस्विनी पतिव्रता सीता भी राम को प्राप्त कर, प्रजा द्वारा सुरक्षित राज्य में उनके साथ आनन्दित रहती थीं। यहाँ प्राकृतिक समृद्धि का वर्णन है। प्रकृति और मनुष्य के बीच सामंजस्य है। वर्णाश्रम धर्म के पालन से समाज में स्थिरता है। डाकुओं का अभाव सुरक्षा व्यवस्था को दर्शाता है। सीता का उल्लेख यह बताता है कि राम के साथ वे भी इस सुख का अनुभव कर रही हैं।

❤️ प्रजा का राम के प्रति अनन्य प्रेम (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
रामे सीताप्रिये नित्यं प्रजाः प्रीताः सुखान्विताः ।
राममेव गुणैर्युक्तं प्रशंसन्ति सदा जनाः ॥
न कश्चित् कस्यचित् द्वेष्टि न च दम्भोऽनृतं नृणाम् ।
सर्वे धर्मरताः शान्ता रामे राज्यं प्रशासति ॥
एवं प्रजासुखं दृष्ट्वा रामः परमधर्मवित् ।
रेमे सीतासमायुक्तो धर्मेण परिपालयन् ॥
🔹 पदच्छेद : रामे = राम के प्रति; सीताप्रिये = सीता के प्रिय (राम); नित्यम् = नित्य; प्रजाः = प्रजा; प्रीताः = प्रसन्न; सुखान्विताः = सुख से युक्त; रामम् = राम की; एव = ही; गुणैः = गुणों से; युक्तम् = युक्त; प्रशंसन्ति = प्रशंसा करते हैं; सदा = सदा; जनाः = लोग; न = नहीं; कश्चित् = कोई; कस्यचित् = किसी से; द्वेष्टि = द्वेष करता है; न = नहीं; च = और; दम्भः = दम्भ; अनृतम् = झूठ; नृणाम् = मनुष्यों में; सर्वे = सभी; धर्मरताः = धर्म में रत; शान्ताः = शान्त; रामे = राम के द्वारा; राज्यम् = राज्य; प्रशासति = शासन किए जाने पर; एवम् = इस प्रकार; प्रजासुखम् = प्रजा के सुख को; दृष्ट्वा = देखकर; रामः = राम; परमधर्मवित् = परम धर्मज्ञ; रेमे = आनन्दित हुए; सीतासमायुक्तः = सीता के साथ; धर्मेण = धर्म से; परिपालयन् = पालन करते हुए।
📖 भावार्थ : सीता के प्रिय राम के प्रति सभी प्रजा नित्य प्रसन्न और सुखी रहती थी। लोग सदा राम के गुणों की प्रशंसा करते थे। कोई किसी से द्वेष नहीं करता था, लोगों में न दम्भ था, न झूठ। सभी धर्मरत और शान्त थे, क्योंकि राम राज्य का शासन कर रहे थे। प्रजा के इस सुख को देखकर परम धर्मज्ञ राम, सीता के साथ आनन्दित होते थे और धर्मपूर्वक राज्य का पालन करते थे। यहाँ प्रजा और राजा के बीच पारस्परिक प्रेम और विश्वास का चित्रण है। प्रजा राम के गुणों से अनुराग रखती है और राम प्रजा के सुख से आनन्दित होते हैं। समाज में धर्म की सर्वत्र स्थापना है। द्वेष, दम्भ और असत्य का अभाव आदर्श समाज के लक्षण हैं।

🕊️ सार्वभौमिक कल्याण एवं युद्धकाण्ड का समापन (श्लोक १६-३५)

॥ श्लोक १६-३५ ॥
सर्वे वर्णा यथाधर्मं स्वकर्मनिरताः सदा ।
रामे राज्यं प्रशासति नराः स्वर्गमिवाप्नुयुः ॥
न म्रियन्तेऽकालमृत्युना न च व्याधिपीडिताः ।
सर्वे दीर्घायुषो लोका रामे शासति मेदिनीम् ॥
एवमेतद् युद्धकाण्डं रामस्य चरितं महत् ।
पठन् शृण्वन् च मनुजो मुच्यते सर्वपातकैः ॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायणमनुत्तमम् ।
युद्धकाण्डमिदं पुण्यं सर्गः पञ्चोत्तरशतं गतः ॥
🔹 पदच्छेद : सर्वे = सभी; वर्णाः = वर्ण; यथाधर्मम् = धर्म के अनुसार; स्वकर्मनिरताः = अपने-अपने कर्मों में लगे; सदा = सदा; रामे = राम के द्वारा; राज्यम् = राज्य; प्रशासति = शासन किए जाने पर; नराः = मनुष्य; स्वर्गम् = स्वर्ग; इव = समान; आप्नुयुः = प्राप्त करते थे; न = नहीं; म्रियन्ते = मरते थे; अकालमृत्युना = अकाल मृत्यु से; न = नहीं; च = और; व्याधिपीडिताः = रोगों से पीड़ित; सर्वे = सभी; दीर्घायुषः = दीर्घायु वाले; लोकाः = लोग; रामे = राम के द्वारा; शासति = शासन करने पर; मेदिनीम् = पृथ्वी की; एवम् = इस प्रकार; एतत् = यह; युद्धकाण्डम् = युद्धकाण्ड; रामस्य = राम का; चरितम् = चरित्र; महत् = महान; पठन् = पढ़कर; शृण्वन् = सुनकर; च = और; मनुजः = मनुष्य; मुच्यते = मुक्त हो जाता है; सर्वपातकैः = सभी पापों से; इति = इस प्रकार; वाल्मीकिना = वाल्मीकि द्वारा; प्रोक्तम् = कहा गया; रामायणम् = रामायण; अनुत्तमम् = उत्तम; युद्धकाण्डम् = युद्धकाण्ड; इदम् = यह; पुण्यम् = पुण्यमय; सर्गः = सर्ग; पञ्चोत्तरशतम् = एक सौ पाँच; गतः = समाप्त हुआ।
📖 भावार्थ : जब राम पृथ्वी का शासन कर रहे थे, तब सभी वर्णों के लोग धर्म के अनुसार अपने-अपने कर्मों में निरत थे। मनुष्य स्वर्ग के समान सुख भोग रहे थे। कोई भी अकाल मृत्यु से नहीं मरता था और न ही कोई रोगों से पीड़ित था। सभी लोग दीर्घायु थे। इस प्रकार यह युद्धकाण्ड राम के महान चरित्र का वर्णन करता है। इसे पढ़ने और सुनने वाला मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। वाल्मीकि द्वारा कथित यह उत्तम रामायण का युद्धकाण्ड इस प्रकार समाप्त होता है। यह सर्ग युद्धकाण्ड का समापन है। इसमें रामराज्य की स्थापना के बाद की स्थिति का चित्रण है। अन्त में युद्धकाण्ड के पठन-श्रवण के फल का भी वर्णन किया गया है। यहाँ पञ्चोत्तरशतं गतः से 105 सर्गों की पूर्ति का संकेत है। युद्धकाण्ड का यह अन्तिम सर्ग अत्यन्त शुभ और कल्याणकारी माना जाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏛️ रामराज्य की अवधारणा

यह सर्ग रामराज्य की व्याख्या करता है। यह एक आदर्श राज्य है, जहाँ प्रजा निर्भय, सुखी, धर्मपरायण और समृद्ध होती है। प्रकृति भी मनुष्य के साथ सहयोग करती है।

👥 सामाजिक समरसता

सभी वर्णों के लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं, किन्तु परस्पर द्वेष नहीं है। यह सामाजिक समरसता का आदर्श रूप है।

📜 युद्धकाण्ड का फलश्रुति

अन्त में युद्धकाण्ड के पठन-श्रवण का फल बताया गया है। यह शास्त्रों की परम्परा है कि ग्रन्थ के अन्त में फलश्रुति दी जाती है।

🕉️ राम का आदर्श शासन

राम का शासन इतना आदर्श है कि प्रजा स्वर्ग के समान सुख भोगती है। यह एक सफल राजा के गुणों को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें एक आदर्श समाज और राज्य का स्वप्न दिखाता है। हमें प्रयास करना चाहिए कि हमारे समाज में भी धर्म, समृद्धि, परस्पर प्रेम और सुरक्षा का वातावरण हो। राम के समान आदर्शों का पालन कर हम भी अपने जीवन को सुखी बना सकते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे पञ्चोत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ समाप्तोऽयं युद्धकाण्डः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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