युद्ध काण्ड अध्याय 104

राम का दान-धर्म

राज्याभिषेक के पश्चात श्रीराम अयोध्या में विशाल दान-यज्ञ का आयोजन करते हैं। वे ब्राह्मणों, गरीबों, याचकों और सभी नगरवासियों को अन्न, वस्त्र, धन, रत्न, भूमि आदि का अपार दान देते हैं। कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटता।

विवरण

राम के राज्याभिषेक की समाप्ति पर उन्होंने एक भव्य दान-यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने समस्त ब्राह्मणों, ऋषियों, गरीबों, दीन-हीनों, वृद्धों, महिलाओं और बच्चों को आमन्त्रित किया। राम ने सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के साथ मिलकर सभी को सुवर्ण, रजत, रत्न, मणि, मुक्ता, वस्त्र, अन्न, गायें, घोड़े, हाथी, भूमि और घर दान में दिए। दान की कोई सीमा नहीं थी। ब्राह्मणों ने वेदमन्त्रों से इस दान की प्रशंसा की और राम को आशीर्वाद दिया। राम ने यह भी सुनिश्चित किया कि उनके राज्य में कोई भूखा या नंगा न रहे। यह सर्ग राम की उदारता, दानशीलता और करुणा का अद्भुत उदाहरण है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १०४

(राम का दान-धर्म)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुरुत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राज्याभिषेक के पश्चात श्रीराम ने अनुभव किया कि राज्य की समृद्धि का वास्तविक अर्थ प्रजा के सुख में निहित है। अतः उन्होंने अपने कोष से सभी जरूरतमंदों को उदारतापूर्वक दान देने का निश्चय किया। यह सर्ग उस दान-महिमा का वर्णन करता है।

📢 दान-यज्ञ की घोषणा एवं भव्य आयोजन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः रामः महातेजाः राज्ये स्थित्वा महामतिः ।
दानयज्ञं महान् आसीत् कर्तुं समुद्यतः ॥
आहूय ब्राह्मणान् सर्वान् वेदवेदाङ्गपारगान् ।
याचकांश्च दरिद्रांश्च वृद्धान् स्त्रीबालकानपि ॥
कारयामास विधिवत् यज्ञशालां मनोरमाम् ।
रत्नैर्वस्त्रैः सुवर्णैश्च परिपूर्णां समन्ततः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; रामः = राम; महातेजाः = महान तेजस्वी; राज्ये = राज्य में; स्थित्वा = स्थित होकर; महामतिः = महान बुद्धि वाले; दानयज्ञम् = दान यज्ञ; महान् = महान; आसीत् = था; कर्तुम् = करने के लिए; समुद्यतः = उद्यत हुए; आहूय = बुलाकर; ब्राह्मणान् = ब्राह्मणों को; सर्वान् = सभी; वेदवेदाङ्गपारगान् = वेद और वेदांगों में पारंगत; याचकान् = याचकों को; च = और; दरिद्रान् = गरीबों को; च = और; वृद्धान् = वृद्धों को; स्त्रीबालकान् = स्त्री और बालकों को; अपि = भी; कारयामास = करवाई; विधिवत् = विधिपूर्वक; यज्ञशालाम् = यज्ञशाला; मनोरमाम् = मनोरम; रत्नैः = रत्नों से; वस्त्रैः = वस्त्रों से; सुवर्णैः = सोने से; च = और; परिपूर्णाम् = परिपूर्ण; समन्ततः = चारों ओर से।
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी एवं महामति श्रीराम ने राज्य में स्थित होकर एक महान दान-यज्ञ करने का निश्चय किया। उन्होंने सभी वेद-वेदांग पारंगत ब्राह्मणों, याचकों, दरिद्रों, वृद्धों, स्त्रियों और बालकों को आमंत्रित किया। राम ने विधिपूर्वक एक अत्यन्त मनोरम यज्ञशाला का निर्माण कराया, जो चारों ओर से रत्नों, वस्त्रों और सुवर्ण से परिपूर्ण थी। यह दान-यज्ञ केवल धन देने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि इसमें समस्त प्रजा को सम्मिलित कर उनके कल्याण की भावना निहित थी। राम ने स्वयं इस आयोजन की देखरेख की और सुनिश्चित किया कि कोई भी पात्र व्यक्ति इससे वंचित न रहे। यज्ञशाला का भव्य स्वरूप देखकर सभी आश्चर्यचकित थे।

💰 अपार दान-सामग्री का वितरण (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
सुवर्णं रजतं मुक्ताः मणयो वस्त्रगन्धकम् ।
अन्नपानानि विविधा गावो वाजिगजास्तथा ॥
भूमिं ग्रामांश्च नगरान् दासीदासान् सुसङ्ग्रहान् ।
ददौ रामः स्वयं हस्तैः ब्राह्मणेभ्यः प्रहर्षितः ॥
न कश्चिद् याचकः तत्र निराशः प्रत्यपद्यत ।
सर्वे कामैः समृद्धाश्च ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ॥
🔹 पदच्छेद : सुवर्णम् = सोना; रजतम् = चाँदी; मुक्ताः = मोती; मणयः = मणियाँ; वस्त्रगन्धकम् = वस्त्र और गन्ध; अन्नपानानि = अन्न और पेय; विविधा = अनेक प्रकार के; गावः = गायें; वाजिगजाः = घोड़े और हाथी; तथा = तथा; भूमिम् = भूमि; ग्रामान् = गाँव; च = और; नगरान् = नगर; दासीदासान् = दास-दासियाँ; सुसङ्ग्रहान् = अच्छे संग्रह (धन-सम्पत्ति); ददौ = दिए; रामः = राम; स्वयम् = स्वयं; हस्तैः = हाथों से; ब्राह्मणेभ्यः = ब्राह्मणों को; प्रहर्षितः = अत्यन्त प्रसन्न होकर; न = नहीं; कश्चित् = कोई; याचकः = याचक; तत्र = वहाँ; निराशः = निराश; प्रत्यपद्यत = लौटा; सर्वे = सभी; कामैः = इच्छाओं से; समृद्धाः = समृद्ध; च = और; ययुः = गए; स्वम् स्वम् = अपने-अपने; निवेशनम् = घर को।
📖 भावार्थ : राम ने अत्यन्त प्रसन्न होकर स्वयं अपने हाथों से ब्राह्मणों और याचकों को सोना, चाँदी, मोती, मणियाँ, वस्त्र, सुगन्धित द्रव्य, विविध प्रकार के अन्न-पान, गायें, घोड़े, हाथी, भूमि, गाँव, नगर, दास-दासियाँ और अपार धन-सम्पत्ति दान में दी। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी याचक वहाँ से निराश न लौटे। सभी लोग अपनी-अपनी अभिलाषाओं से पूर्ण होकर अपने घरों को गए। यह दान राम की उदारता और प्रजा के प्रति उनके प्रेम का प्रतीक था। उन्होंने यह भी ध्यान रखा कि दान पाने वालों की आवश्यकताओं के अनुसार वस्तुएँ दी जाएँ। ब्राह्मणों को वेदाध्ययन हेतु भूमि और ग्राम दिए गए, गरीबों को अन्न और वस्त्र, और सभी को सम्मानपूर्वक दिया गया।

🙏 ब्राह्मणों का आशीर्वाद एवं स्तुति (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः ब्राह्मणमुख्यास्ते प्रीताः प्राञ्जलयः स्थिताः ।
ऊचुः रामं महात्मानं सीतां चापि यशस्विनीम् ॥
धन्योऽसि राघवो राजन् यशस्वी च जगत्त्रये ।
त्वया दत्तेन दानेन तृप्ताः स्म इति सादरम् ॥
तव राज्ये न दुर्भिक्षं नाकालमरणं क्वचित् ।
भविष्यति न च व्याधिः सर्वमङ्गलमङ्गलम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; ब्राह्मणमुख्याः = ब्राह्मण श्रेष्ठ; ते = वे; प्रीताः = प्रसन्न; प्राञ्जलयः = हाथ जोड़े; स्थिताः = खड़े हुए; ऊचुः = बोले; रामम् = राम से; महात्मानम् = महात्मा; सीताम् = सीता से; चापि = और भी; यशस्विनीम् = यशस्विनी; धन्यः = धन्य; असि = हो; राघवः = राघव; राजन् = राजन्; यशस्वी = यशस्वी; च = और; जगत्त्रये = तीनों लोकों में; त्वया = तुम्हारे द्वारा; दत्तेन = दिए गए; दानेन = दान से; तृप्ताः = तृप्त; स्मः = हम हैं; इति = इस प्रकार; सादरम् = आदर सहित; तव = तुम्हारे; राज्ये = राज्य में; न = नहीं; दुर्भिक्षम् = अकाल; न = नहीं; अकालमरणम् = अकाल मृत्यु; क्वचित् = कहीं; भविष्यति = होगी; न = नहीं; च = और; व्याधिः = रोग; सर्वमङ्गलम् = सब प्रकार का मंगल; अङ्गलम् = मंगलमय।
📖 भावार्थ : तब वे सभी ब्राह्मण श्रेष्ठ अत्यन्त प्रसन्न हुए और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। उन्होंने महात्मा राम और यशस्विनी सीता से आदरपूर्वक कहा, "हे राजन् राघव! तुम तीनों लोकों में धन्य और यशस्वी हो। तुम्हारे द्वारा दिए गए दान से हम सब अत्यन्त तृप्त हैं। तुम्हारे राज्य में कभी अकाल नहीं होगा, न कभी अकाल मृत्यु होगी, न ही कोई रोग व्याप्त होगा। तुम्हारा राज्य सर्वमंगलमय होगा।" ब्राह्मणों का यह आशीर्वाद राम के दान की सार्थकता को दर्शाता है। दान से ब्राह्मणों की तृप्ति और उनके आशीर्वाद से राज्य में समृद्धि का वास होता है, यह भारतीय मान्यता है। राम ने इस सिद्धांत को मूर्त रूप दिया।

😊 प्रजा का सुख और समृद्धि (श्लोक १६-२८)

॥ श्लोक १६-२८ ॥
रामस्य दानमाहात्म्यात् प्रजाः सर्वाः सुखान्विताः ।
न्यवर्तन्त गृहेष्वेव धर्मकामार्थसंयुताः ॥
न चौरभयं नो राजभयं न दैवतं भयम् ।
सर्वत्र सुखिता लोकाः पूर्णाः सस्यैर्नदीघनैः ॥
एवं रामः प्रजाः पाल्य धर्मेण सुसमाहितः ।
रेमे सीतासमायुक्तो राज्ये वर्षगणान् बहून् ॥
🔹 पदच्छेद : रामस्य = राम के; दानमाहात्म्यात् = दान के माहात्म्य से; प्रजाः = प्रजा; सर्वाः = सभी; सुखान्विताः = सुख से युक्त; न्यवर्तन्त = निवास करने लगीं; गृहेषु = घरों में; एव = ही; धर्मकामार्थसंयुताः = धर्म, काम और अर्थ से युक्त; न = नहीं; चौरभयम् = चोरों का भय; नो = नहीं; राजभयम् = राजा का भय; न = नहीं; दैवतम् = दैवी; भयम् = भय; सर्वत्र = सर्वत्र; सुखिताः = सुखी; लोकाः = लोग; पूर्णाः = परिपूर्ण; सस्यैः = अन्नों से; नदीघनैः = नदियों और बादलों से; एवम् = इस प्रकार; रामः = राम; प्रजाः = प्रजा; पाल्य = पालन कर; धर्मेण = धर्म से; सुसमाहितः = अच्छी तरह से स्थित; रेमे = आनन्दित हुए; सीतासमायुक्तः = सीता के साथ; राज्ये = राज्य में; वर्षगणान् = वर्षों के समूह; बहून् = अनेक।
📖 भावार्थ : राम के दान के माहात्म्य से सभी प्रजा सुखी हो गई। वे धर्म, अर्थ और काम से युक्त होकर अपने-अपने घरों में सुखपूर्वक रहने लगीं। उन्हें न तो चोरों का भय था, न राजा का भय, न ही किसी दैवी आपदा का भय। सब ओर सुख और शान्ति का वातावरण था। खेत अन्न से लहलहा रहे थे, नदियाँ जल से भरी हुई थीं, बादल समय पर वर्षा करते थे। इस प्रकार राम ने धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए सीता के साथ अनेक वर्षों तक राज्य में आनन्दपूर्वक निवास किया। यहाँ वर्षगणान् बहून् से संकेत मिलता है कि राम का राज्य बहुत लम्बे समय तक सुखपूर्वक चला। राम के शासनकाल को रामराज्य कहा जाता है, जिसमें प्रजा सुखी, धन-धान्य से परिपूर्ण और निर्भय होती है। इस सर्ग में उसी आदर्श राज्य का वर्णन है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤲 दान का महत्त्व

यह सर्ग दान के महत्त्व को स्थापित करता है। राम ने अपने राज्याभिषेक के अवसर पर दान देकर यह सन्देश दिया कि राजा का धन वास्तव में प्रजा का ही होता है।

🌾 रामराज्य की अवधारणा

रामराज्य वह आदर्श राज्य है, जहाँ प्रजा निर्भय, सुखी और समृद्ध होती है। इस सर्ग में उसी का सुन्दर चित्रण है।

🙏 ब्राह्मणों का सम्मान

राम ने ब्राह्मणों को विशेष रूप से दान देकर उनके ज्ञान और तपस्या का सम्मान किया। यह राजा के कर्तव्य का अंग है।

📈 समाज का कल्याण

दान से केवल व्यक्ति ही नहीं, सम्पूर्ण समाज का कल्याण होता है। राम के दान से प्रजा में संतोष और समृद्धि आई।

🎯 शिक्षा : हमें राम के समान उदार बनना चाहिए और अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों की सहायता करनी चाहिए। दान से न केवल दूसरों का भला होता है, वरन् दाता को भी अपार आत्मिक सुख मिलता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे चतुरुत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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