युद्ध काण्ड अध्याय 103

राम द्वारा देवताओं का पूजन

राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में श्रीराम इन्द्र सहित समस्त देवताओं का पूजन करते हैं, उन्हें अर्घ्य देते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। देवतागण राम की स्तुति करते हैं और उन्हें धर्मपूर्वक राज्य करने का वरदान देते हैं।

विवरण

अयोध्या में राम के राज्याभिषेक की घोषणा के बाद, राम ने समस्त देवताओं को आमंत्रित कर उनका विधिवत पूजन करने का निश्चय किया। इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण, कुबेर, शिव, ब्रह्मा तथा अन्य देवता सभी अयोध्या में उपस्थित हुए। राम ने भक्तिपूर्वक प्रत्येक देवता का अर्घ्य, पुष्प, धूप आदि से पूजन किया और उनकी स्तुति की। देवताओं ने राम की महिमा का गान करते हुए उन्हें राजा के रूप में सफलता, अखण्ड आनन्द और प्रजा के सुख की कामना की। विशेष रूप से इन्द्र ने राम को वरदान दिया कि उनके राज्य में कभी अकाल, रोग या भय नहीं होगा। यह सर्ग देवताओं के प्रति राम की श्रद्धा और उनकी सार्वभौमिक स्वीकार्यता को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १०३

(राम द्वारा देवताओं का पूजन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्र्युत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के राज्याभिषेक की तैयारियाँ चल रही थीं। राम ने सोचा कि जिस राज्य की बागडोर वे संभालने जा रहे हैं, उसकी सफलता के लिए देवताओं का आशीर्वाद आवश्यक है। अतः उन्होंने समस्त देवताओं का आह्वान कर भव्य पूजन का आयोजन किया।

✨ देवताओं का अयोध्या में आगमन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
आजग्मुरयोध्यायां रामाभिषेककाङ्क्षया ॥
इन्द्रो वरुणः सोमोऽग्निर्वायुः कुबेर एव च ।
यमश्च वसवो रुद्रा मरुतः सपरिग्रहाः ॥
ब्रह्मा च भगवान् देवः शिवश्च प्रमथैः सह ।
विष्णुश्च देवताः सर्वाः समेताः रामपूजनम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; देवाः = देवता; सगन्धर्वाः = गन्धर्वों सहित; सिद्धाः = सिद्ध; च = और; परमर्षयः = परमर्षि; आजग्मुः = आए; अयोध्यायाम् = अयोध्या में; रामाभिषेककाङ्क्षया = राम के अभिषेक की इच्छा से; इन्द्रः = इन्द्र; वरुणः = वरुण; सोमः = सोम; अग्निः = अग्नि; वायुः = वायु; कुबेरः = कुबेर; एव = ही; च = और; यमः = यम; च = और; वसवः = वसुगण; रुद्राः = रुद्रगण; मरुतः = मरुतगण; सपरिग्रहाः = परिजनों सहित; ब्रह्मा = ब्रह्मा; च = और; भगवान् = भगवान; देवः = देव; शिवः = शिव; च = और; प्रमथैः = प्रमथगणों के साथ; सह = सहित; विष्णुः = विष्णु; च = और; देवताः = देवताएँ; सर्वाः = सभी; समेताः = एकत्र हुए; रामपूजनम् = राम के पूजन के लिए।
📖 भावार्थ : तब सभी देवता, गन्धर्व, सिद्ध और परमर्षि राम के राज्याभिषेक के अवसर पर अयोध्या में एकत्र हुए। इन्द्र, वरुण, सोम, अग्नि, वायु, कुबेर, यम, वसुगण, रुद्रगण, मरुतगण अपने परिजनों के साथ पधारे। भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव अपने प्रमथगणों के साथ, तथा भगवान विष्णु भी वहाँ उपस्थित हुए। सभी देवता राम की पूजा और उनके अभिषेक में शामिल होने के लिए उत्सुक थे। यह दृश्य अत्यन्त दिव्य और भव्य था। अयोध्या का आकाश देवताओं के विमानों से भर गया। पृथ्वी पर देवताओं के पदचिह्नों से पवित्रता छा गई। राम के प्रति देवताओं के इस प्रेम ने यह सिद्ध किया कि राम केवल एक मानव नहीं, अपितु साक्षात् विष्णु के अवतार हैं, जिनका सम्मान सम्पूर्ण देवमण्डल कर रहा है।

🙌 राम द्वारा देवताओं का विधिवत पूजन (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
तान् दृष्ट्वा राघवो देवान् प्रणम्य शिरसा भुवि ।
उपचारैः षोडशभिः पूजयामास भक्तितः ॥
अर्घ्यं पाद्यं तथाचम्य स्नानीयं वस्त्रगन्धके ।
पुष्पधूपैश्च नैवेद्यैर्दीपैश्च विविधैरपि ॥
ततः स्तुतिभिरग्र्याभिः तोषयामास देवताः ।
रामः परमधर्मात्मा सीतया सहितस्तदा ॥
🔹 पदच्छेद : तान् = उन; दृष्ट्वा = देखकर; राघवः = राघव; देवान् = देवताओं को; प्रणम्य = प्रणाम कर; शिरसा = सिर से; भुवि = भूमि पर; उपचारैः = उपचारों से; षोडशभिः = सोलह; पूजयामास = पूजा की; भक्तितः = भक्तिपूर्वक; अर्घ्यम् = अर्घ्य; पाद्यम् = पाद्य; तथा = तथा; आचम्य = आचमन; स्नानीयम् = स्नान; वस्त्रगन्धके = वस्त्र और गन्ध; पुष्पधूपैः = पुष्प, धूप; च = और; नैवेद्यैः = नैवेद्य से; दीपैः = दीपों से; च = और; विविधैः = विविध; अपि = भी; ततः = तब; स्तुतिभिः = स्तुतियों से; अग्र्याभिः = श्रेष्ठ; तोषयामास = संतुष्ट किया; देवताः = देवताओं को; रामः = राम; परमधर्मात्मा = परम धर्मात्मा; सीतया = सीता के साथ; सहितः = सहित; तदा = तब।
📖 भावार्थ : उन सभी देवताओं को देखकर परम धर्मात्मा राम ने भूमि पर सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। फिर उन्होंने सीता के साथ मिलकर भक्तिपूर्वक सोलह उपचारों (षोडशोपचार) से देवताओं का पूजन किया। उन्होंने अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्नानीय, वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप, नैवेद्य और दीप आदि अर्पित किए। इसके बाद राम ने श्रेष्ठ स्तुतियों द्वारा सभी देवताओं को संतुष्ट किया। राम का यह पूजन अत्यन्त भव्य, विधिवत और हार्दिक श्रद्धा से परिपूर्ण था। सीता के साथ मिलकर वे देवताओं के समक्ष अत्यन्त विनम्र भाव से खड़े रहे। इस पूजा के माध्यम से राम ने यह सन्देश दिया कि राजा को देवताओं के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए और उनका आशीर्वाद लेना चाहिए, क्योंकि राज्य का संचालन दैवीय शक्तियों के सहयोग से ही सम्भव होता है।

🌟 देवताओं द्वारा राम की स्तुति और आशीर्वाद (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः इन्द्रः प्रसन्नात्मा राममूचे कृताञ्जलिम् ।
राम त्वयि सदा प्रीता देवाः सर्षिपरिग्रहाः ॥
त्वमेव धर्मभूतानां धर्मः परम उच्यते ।
त्वयि राज्यं प्रशासति सुखिनः सर्वमानवाः ॥
नाकालवृष्टिः नो दुर्भिक्षं न रोगा न भयं क्वचित् ।
भविष्यति तव राज्ये धर्मेण परिपालिते ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; इन्द्रः = इन्द्र; प्रसन्नात्मा = प्रसन्न चित्त; रामम् = राम से; ऊचे = बोले; कृताञ्जलिम् = हाथ जोड़े हुए; राम = हे राम; त्वयि = तुम पर; सदा = सदा; प्रीताः = प्रसन्न; देवाः = देवता; सर्षिपरिग्रहाः = ऋषियों सहित; त्वम् = तुम; एव = ही; धर्मभूतानाम् = धर्मात्माओं में; धर्मः = धर्म; परमः = परम; उच्यते = कहे जाते हो; त्वयि = तुम्हारे द्वारा; राज्यम् = राज्य; प्रशासति = शासन किए जाने पर; सुखिनः = सुखी; सर्वमानवाः = सभी मनुष्य; न = नहीं; अकालवृष्टिः = अकाल वृष्टि; नो = नहीं; दुर्भिक्षम् = दुर्भिक्ष; न = नहीं; रोगाः = रोग; न = नहीं; भयम् = भय; क्वचित् = कहीं; भविष्यति = होगा; तव = तुम्हारे; राज्ये = राज्य में; धर्मेण = धर्म से; परिपालिते = पालन किए जाने पर।
📖 भावार्थ : तब प्रसन्नचित्त इन्द्र ने हाथ जोड़े खड़े राम से कहा, "हे राम! तुम पर सभी देवता और ऋषिगण सदा प्रसन्न हैं। तुम धर्मात्माओं में परम धर्म कहे जाते हो। तुम्हारे राज्य शासन में सभी मनुष्य सुखी होंगे। तुम्हारे धर्मपूर्वक पालन किए गए राज्य में न तो अकाल होगा, न अनावृष्टि, न दुर्भिक्ष, न रोग और न ही किसी प्रकार का भय होगा।" इन्द्र का यह वरदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह राम के धर्मपरायण शासन के परिणामस्वरूप प्रजा के सुख-समृद्धि का सूचक है। देवताओं ने भी यह स्वीकार किया कि राम का राज्य आदर्श राज्य होगा, जहाँ कोई संकट नहीं आएगा। यह राम राज्य की अवधारणा का आधार है, जहाँ प्रजा सुखी और धर्म से युक्त होती है।

🙏 अन्य देवताओं का आशीर्वाद (श्लोक १६-२२)

॥ श्लोक १६-२२ ॥
वरुणः प्राह राजेन्द्र सागराः सर्व एव ते ।
वश्या भविष्यन्ति नित्यं त्वयि धर्मेण शासति ॥
अग्निरुवाच तेजस्वी यज्ञेषु च हविः प्रियम् ।
भविष्यति सदा तुभ्यं प्रजाश्चापि सुखावहाः ॥
वायुः प्राह सदा त्वत्तः प्रवात्स्यामि शुभानिलः ।
यमः प्राह च धर्मेण नियन्तासि जनं सदा ॥
🔹 पदच्छेद : वरुणः = वरुण; प्राह = बोले; राजेन्द्र = राजेन्द्र; सागराः = सागर; सर्व = सभी; एव = ही; ते = तुम्हारे; वश्याः = वश में; भविष्यन्ति = होंगे; नित्यम् = नित्य; त्वयि = तुम्हारे द्वारा; धर्मेण = धर्म से; शासति = शासन करने पर; अग्निः = अग्नि; उवाच = बोले; तेजस्वी = तेजस्वी; यज्ञेषु = यज्ञों में; च = और; हविः = हवि; प्रियम् = प्रिय; भविष्यति = होगा; सदा = सदा; तुभ्यम् = तुम्हारे लिए; प्रजाः = प्रजा; चापि = भी; सुखावहाः = सुख देने वाली; वायुः = वायु; प्राह = बोले; सदा = सदा; त्वत्तः = तुमसे; प्रवात्स्यामि = प्रवाहित होऊँगा; शुभानिलः = शुभ वायु के रूप में; यमः = यम; प्राह = बोले; च = और; धर्मेण = धर्म से; नियन्तासि = नियन्त्रण करोगे; जनम् = प्रजा को; सदा = सदा।
📖 भावार्थ : वरुण ने कहा, "हे राजेन्द्र! धर्म से शासन करने पर सभी सागर तुम्हारे वश में रहेंगे।" अग्नि ने आशीर्वाद दिया, "तुम्हारे यज्ञों में हवि सदा प्रिय होगी और प्रजा सुखी रहेगी।" वायु ने कहा, "मैं तुम्हारे राज्य में सदा शुभ वायु बनकर प्रवाहित होऊँगा।" यम ने कहा, "तुम धर्मपूर्वक प्रजा का नियन्त्रण करोगे।" इस प्रकार सभी देवताओं ने राम को आशीर्वाद दिया। प्रत्येक देवता ने अपने-अपने क्षेत्र से सम्बन्धित वरदान दिए। वरुण ने जल पर नियन्त्रण, अग्नि ने यज्ञों की सफलता, वायु ने स्वास्थ्यवर्धक वायु, और यम ने न्यायपूर्ण शासन का आश्वासन दिया। इन सबने मिलकर राम के राज्य को समृद्ध, सुखी और दिव्य बना दिया। देवताओं का यह आशीर्वाद राम के शासन की सफलता के लिए मानो एक सामूहिक घोषणा थी।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🔱 राम का दैवीय स्वरूप

देवताओं का राम के प्रति सम्मान और उनकी स्तुति यह सिद्ध करती है कि राम केवल मनुष्य नहीं, अपितु साक्षात् विष्णु के अवतार हैं। उनका राज्याभिषेक देवलोक में भी उत्सव का विषय है।

🌍 आदर्श राज्य की परिकल्पना

इन्द्र के वरदान में राम राज्य की अवधारणा स्पष्ट होती है, जहाँ कोई अकाल, रोग या भय नहीं होता। यह एक आदर्श राज्य का स्वप्न है, जहाँ प्रजा सुखी और धर्मपरायण होती है।

🙏 देवपूजन का महत्त्व

राम द्वारा देवताओं का पूजन यह सन्देश देता है कि राजा को दैवीय शक्तियों का सम्मान करना चाहिए और उनसे मार्गदर्शन लेना चाहिए।

🤝 देवताओं का सहयोग

प्रत्येक देवता ने अपने-अपने क्षेत्र में सहयोग का वचन दिया। यह दर्शाता है कि जब राजा धर्मपरायण होता है, तो समस्त प्रकृति और देवता उसकी सहायता करते हैं।

🎯 शिक्षा : हमें भी राम की भाँति ईश्वर एवं देवताओं के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए। उनका आशीर्वाद हमारे जीवन में सुख, शान्ति और समृद्धि लाता है। धर्मपूर्वक जीवन जीने से प्रकृति भी हमारा साथ देती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे त्र्युत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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