राम द्वारा माताओं का सत्कार
राम, सीता और लक्ष्मण सहित अयोध्या लौटकर अपनी माताओं कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी से मिलते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। माताएँ पुत्र के दर्शन कर अत्यंत प्रसन्न होती हैं और हर्ष-विभोर होकर उन्हें आशीर्वाद देती हैं।
विवरण
राज्याभिषेक के उपरान्त श्रीराम अपनी माताओं के दर्शन हेतु जाते हैं। वे सीता, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न के साथ अन्तःपुर में प्रवेश करते हैं। कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी अपने पुत्रों को देखकर अत्यन्त भाव-विह्वल हो जाती हैं। वे राम को हृदय से लगा लेती हैं, उनके सिर पर हाथ फेरती हैं और अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें दीर्घायु एवं अखण्ड सुख की आशीष देती हैं। सीता विशेष रूप से कौसल्या के चरण स्पर्श करती हैं और माताएँ बहू को स्नेह से आशीर्वाद देती हैं। यह सर्ग पारिवारिक मिलन के मार्मिक क्षणों को चित्रित करता है, जहाँ वर्षों के वियोग के बाद परिवार पुनः एकजुट होता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १०१
(राम द्वारा माताओं का सत्कार)
🔆 प्रस्तावना : राम के राज्याभिषेक के पश्चात सभी अयोध्यावासी हर्ष से भर गए। किन्तु माताओं का हृदय पुत्र-वियोग की अग्नि में झुलस रहा था। जब राम, सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न अन्तःपुर में पहुँचे, तो वहाँ स्नेह और करुणा का ऐसा सागर उमड़ा कि सभी की आँखें नम हो गईं। यह सर्ग उस अद्भुत पारिवारिक मिलन का वर्णन करता है।
🏠 अन्तःपुर में प्रवेश एवं माताओं के दर्शन (श्लोक १-५)
कौसल्यां सुमित्रां च कैकेयीं च यशस्विनीम् ॥
सीतया लक्ष्मणेनापि भ्रातृभिः सहितः प्रभुः ।
ववन्दे चरणान् मातॄः प्रणम्य शिरसा भुवि ॥
ताश्च रामं समालिङ्ग्य प्रेम्णा परमविह्वलाः ।
मूर्ध्नि उपाघ्राय चोचुः वचः स्नेहसमन्वितम् ॥
🙏 माताओं के हार्दिक आशीर्वाद (श्लोक ६-१०)
पितृवत् पाहि राज्यं त्वं प्रजाः सर्वाः सदा प्रिय ॥
अपत्यानि च नः सर्वे सीतया सहिता भव ।
यशस्विनी च वैदेही पतिव्रता धृतव्रता ॥
लक्ष्मणं चापि संश्लिष्य सुमित्रा प्ररुरोद ह ।
भरतं शत्रुघ्नं चापि कैकेयी च सिषेविरे ॥
🌸 सीता का मातृ-चरण स्पर्श (श्लोक ११-१५)
ववन्दे चरणौ मातुः साश्रुनयना शनैः ॥
उवाच च महाभागा देवि त्वं मम सुव्रते ।
अनुज्ञाता च रामेण पादौ ग्राह्यौ मया तव ॥
कौसल्या प्राह वैदेहीं वत्से दीर्घायुरस्तु ते ।
पतिव्रता महाभागे भव त्वं सुखिनी सदा ॥
एवं सुमित्रा कैकेयी सीतामाशीर्भिरन्वयुः ।
वर्धयामासुरत्यर्थं स्नुषां हृष्टतमास्तदा ॥
🥳 पारिवारिक उल्लास एवं सुखद समापन (श्लोक १६-२०)
हर्षेण महता युक्ता निषेदुः सुखमासने ॥
कथा विचित्रा आसन्नास्तेषां मध्ये मनोहराः ।
वनवासकृताः सर्वाः राघवस्य यशस्कराः ॥
मातरश्च वरं प्रादुः स्नुषाभ्यः सह पुत्रकैः ।
रत्नानि वस्त्राण्याभरणानि महान्ति च ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👪 मातृ-स्नेह की गरिमा
इस सर्ग में माताओं के हृदय के अथाह स्नेह को दर्शाया गया है। कैकेयी जैसी माता भी, जिनसे वियोग हुआ, राम के प्रति वात्सल्य भाव रखती हैं। यह दर्शाता है कि मातृ-हृदय कभी भी पुत्र से विमुख नहीं होता।
💞 सीता का आदर्श वधूत्व
सीता द्वारा माताओं के चरण स्पर्श करना, उनसे आज्ञा लेना, और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना एक आदर्श बहू के गुणों को प्रदर्शित करता है।
🕊️ वियोग के बाद मिलन
यह सर्ग हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन समय के बाद भी परिवार का मिलन सुखद होता है और धैर्य एवं धर्म की रक्षा करने वालों को अंततः सुख मिलता है।
🎁 उपहारों का महत्त्व
माताओं द्वारा बहुओं को रत्न एवं वस्त्र देने की परंपरा भारतीय संस्कृति में वधू के सम्मान का प्रतीक है। यह परिवार में नवागंतुक के प्रति आदर और स्वीकार्यता दर्शाता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि परिवार के प्रति कर्तव्य, माता-पिता का सम्मान, और क्षमा भाव मानव जीवन के सबसे बड़े मूल्य हैं। राम ने अपनी माताओं के प्रति जो आदर प्रकट किया, वही उनके महान चरित्र की नींव है।