राम द्वारा सीता को आभूषण और वस्त्र देना
राम सीता को बहुमूल्य आभूषण और वस्त्र प्रदान करते हैं, जो उनके पुनर्मिलन और सीता के सम्मान का प्रतीक है।
विवरण
युद्ध की समाप्ति और विभीषण के राज्याभिषेक के पश्चात् राम सीता से मिलते हैं। वे सीता को अनेक बहुमूल्य आभूषण, वस्त्र और उपहार देते हैं। यह उनके पुनर्मिलन की खुशी और सीता के प्रति उनके सम्मान को दर्शाता है। राम सीता को वे आभूषण भी देते हैं जो उन्होंने पहले उन्हें भेंट किए थे, और नए भी। सीता इन उपहारों को विनम्रता से स्वीकार करती हैं और राम के चरणों में बैठ जाती हैं। यह सर्ग युद्धकाण्ड के अन्तिम भाग का एक मधुर प्रसंग है, जो राम और सीता के अटूट प्रेम और कर्तव्यपालन को दर्शाता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १००
(राम द्वारा सीता को आभूषण और वस्त्र देना)
🔆 प्रस्तावना : रावण के वध और विभीषण के राज्याभिषेक के पश्चात् राम सीता से मिलते हैं। यह सर्ग उनके पुनर्मिलन की खुशी और राम द्वारा सीता को दिए गए सम्मान का वर्णन करता है।
🌸 सीता का आगमन और राम का स्नेहिल स्वागत (श्लोक १-१०)
प्रणम्य शिरसा रामं स्थिता प्राञ्जलिरग्रतः ॥
रामोऽपि तां समालोक्य प्रीतिमानिदमब्रवीत् ।
सीते त्वत्कारणं सर्वं कृतं युद्धं सुदारुणम् ॥
रावणश्च हतो राजा त्वत्प्रसादेन जानकि ।
त्वमद्य शोभना देवी सर्वाभरणभूषिता ॥
आभूषणानि दिव्यानि वासांसि विविधानि च ॥
यानि रावणभवने सीतायै पूर्वमेव हि ।
रामेण प्रेषितान्यासन् हनूमता प्रधानतः ॥
तानि सीता प्रतिगृह्य रामस्यानुमते स्थिता ।
बभूव परमप्रीता रामचन्द्रेण संगता ॥
💎 सीता का श्रृंगार और उपहारों की अधिकता (श्लोक ११-२०)
आनिन्युः सीतया दिव्यं भूषणं बहुरत्नकम् ॥
रामः सीतां समालोक्य भूषितां सर्वभूषणैः ।
बभूव परमप्रीतो लक्ष्मणेन सह प्रभुः ॥
सीतापि रामं सम्प्रेक्ष्य मुमुदे च मुदान्विता ।
आशीर्भिश्च समस्ताभिर्ववन्दे राघवं प्रिया ॥
शुशुभे परया लक्ष्म्या साक्षादिव पितामहः ॥
वानराश्चापि राक्षसाश्च दृष्ट्वा रामं सह सीतया ।
मुमुदुः परया प्रीत्या प्रणेमुश्च मुदान्विताः ॥
इत्येष शततमः सर्गो युद्धकाण्डस्य रोचकः ।
रामसीतासमायोगो वर्णितः सुखदः सदा ॥
🌟 राम-सीता के मिलन का महत्त्व और सर्ग का समापन (श्लोक २१-३०)
विभीषणमुख्याश्च राक्षसाश्च महाबलाः ॥
रामं सीतां च सम्प्रेक्ष्य मुमुदुः सह लक्ष्मणम् ।
आशीर्वादैश्च सम्पूज्य प्रणेमुश्च मुदान्विताः ॥
रामोऽपि ताननुज्ञाप्य वासांसि विविधानि च ।
ददौ तेभ्यो यथाशक्ति प्रीतिमानिदमब्रवीत् ॥
रामसीतासमायोगो वर्णितः सुखदः शुभः ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं रामायणमनुत्तमम् ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत रामलोकं स गच्छति ॥
श्रीरामचन्द्रचरणौ स्मृत्वा सीतापतिं प्रभुम् ।
युद्धकाण्डमिदं सम्यक् समाप्तं सुखदं नृणाम् ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
💞 राम-सीता का आदर्श प्रेम
यह सर्ग राम और सीता के अटूट प्रेम और सम्मान का प्रतीक है। राम द्वारा सीता को दिए गए आभूषण उनके वैवाहिक बन्धन और सीता की पवित्रता को दर्शाते हैं।
📖 युद्धकाण्ड का उपसंहार
यह सर्ग युद्धकाण्ड का समापन करता है। राम-सीता का मिलन विजय की खुशी को चरम पर पहुँचाता है और अयोध्या लौटने की तैयारी का संकेत देता है।