उत्तर काण्ड अध्याय 99

इला की कहानी

राम के पूछने पर अगस्त्य ऋषि इला नामक राजकुमार की कथा सुनाते हैं, जो शिव के शाप से स्त्री और पुरुष दोनों रूपों में परिवर्तित होने वाला बन गया था।

विवरण

राम द्वारा पूछे जाने पर कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति हुआ है जो स्त्री और पुरुष दोनों रूपों में रहा हो, अगस्त्य ऋषि उन्हें राजा इला की कथा सुनाते हैं। इला, जो सूर्यवंशी राजा इक्ष्वाकु के पुत्र थे, एक बार शिकार के दौरान भगवान शिव के एकांत स्थल में प्रवेश कर गए, जहाँ शिव पार्वती के साथ क्रीड़ा कर रहे थे। इस अपराध पर शिव ने शाप दिया कि वे स्त्री बन जाएँगे। पार्वती के अनुरोध पर शिव ने कृपा करते हुए कहा कि इला एक मास पुरुष और एक मास स्त्री रहेगा। इस प्रकार इला बारी-बारी से स्त्री और पुरुष रूप धारण करने लगा। इस सर्ग में इला के इस अद्भुत परिवर्तन और उसके बाद की घटनाओं का वर्णन है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ९९

(इला की कहानी)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ नवनवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने अगस्त्य ऋषि से पूछा कि क्या इस संसार में कोई ऐसा व्यक्ति हुआ है जिसने स्त्री और पुरुष दोनों रूप धारण किए हों? इस पर अगस्त्य ऋषि उन्हें राजा इला की विचित्र और रोचक कथा सुनाते हैं।

❓ राम की जिज्ञासा और इला का वंश (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
राम उवाच।
भगवन्किं नु चरितं पुरा वृत्तं महात्मनाम्।
येषां न दृश्यते लोके स्त्रीपुंसोर्लक्षणं पृथक्॥
अगस्त्य उवाच।
शृणु राम प्रवक्ष्यामि इतिहासं पुरातनम्।
इलायाश्चरितं दिव्यं यथा वृत्तं निबोध मे॥
इक्ष्वाकुवंशजः कश्चिद्राजा परमधार्मिकः।
इलो नाम महाभागः सत्यवादी दृढव्रतः॥
तस्य पुत्रो महातेजाः पुरूरवा इति श्रुतः।
स च राज्यं प्रशास्ति स्म धर्मेण महता युतः॥
📖 भावार्थ : राम ने पूछा: हे भगवन, क्या पूर्वकाल में महात्माओं का कोई ऐसा चरित्र हुआ है, जिनमें स्त्री और पुरुष के लक्षण पृथक-पृथक नहीं दिखाई देते थे? अगस्त्य ऋषि ने कहा: हे राम, सुनिए, मैं आपको एक पुरातन इतिहास सुनाता हूँ। इला के दिव्य चरित्र को, जैसा वृत्त हुआ था, मुझसे जानिए। इक्ष्वाकु वंश में एक परम धार्मिक राजा थे, जिनका नाम इल था। वे महाभाग, सत्यवादी और दृढ़व्रती थे। उनके महातेजस्वी पुत्र पुरूरवा हुए, जो बड़े धर्मयुक्त होकर राज्य का शासन करते थे। राम के इस प्रश्न का कारण यह था कि उन्होंने सुना था कि कोई ऐसा राजा हुआ है जो स्त्री और पुरुष दोनों रूपों में रहा। वे इस अद्भुत घटना के बारे में जानना चाहते थे। अगस्त्य ऋषि ने बताया कि यह कथा अत्यंत प्राचीन और दिव्य है। इला का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ था, जो सूर्यवंश के नाम से भी विख्यात है। यह वही वंश है जिसमें स्वयं राम का जन्म हुआ था। अतः यह कथा राम के लिए विशेष महत्व रखती थी। राजा इल अत्यंत धर्मपरायण, सत्यवादी और प्रजापालक थे। उनके राज्य में सभी प्रजाजन सुखी थे। उनका पुत्र पुरूरवा आगे चलकर चंद्रवंश के प्रवर्तक बने, जो एक अलग ही कथा का विषय है।
॥ श्लोक ६-१० ॥
स कदाचिन्मृगं हन्तुं विवेश विपिनं महत्।
चरन्गहनमार्गेषु प्राप्तः शैलवरं तदा॥
तत्रारामं समासाद्य देवस्य परमेष्ठिनः।
शर्वस्य रम्यं विपुलं क्रीडाभूमिं महात्मनः॥
तत्र प्रविश्य सहसा राजा परमधार्मिकः।
अपश्यत्स महादेवं क्रीडन्तं च गिरौ सह॥
उमया सहितं देवं चन्द्रार्धकृतशेखरम्।
वृषभध्वजं देवेशं त्रिनेत्रं शूलपाणिनम्॥
📖 भावार्थ : एक बार वे राजा मृग का शिकार करने के लिए एक महान वन में प्रविष्ट हुए। घने मार्गों में चलते-चलते वे एक उत्तम पर्वत पर जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने परमेष्ठी देव शर्व (शिव) के रमणीय और विशाल आराम को देखा, जो उस महात्मा की क्रीड़ाभूमि थी। उस स्थान में सहसा प्रवेश करके उस परम धार्मिक राजा ने महादेव को उमा के साथ उस पर्वत पर क्रीड़ा करते हुए देखा। वे देव चन्द्रार्धकृतशेखर (अर्धचन्द्र धारण करने वाले), वृषभध्वज (बैल के ध्वज वाले), देवेश, त्रिनेत्र और शूलपाणि (त्रिशूल धारण करने वाले) थे। यह वह स्थान था जहाँ भगवान शिव और माता पार्वती एकांत में विहार कर रहे थे। यह स्थान अत्यंत सुंदर था - चारों ओर मनोहर वाटिकाएँ, फूलों से लदे वृक्ष, मधुर गंध, और मधुर संगीत से भरा हुआ। देवी-देवता भी इस स्थान पर आने की हिम्मत नहीं करते थे, क्योंकि यह स्वयं भगवान शिव का निजी क्षेत्र था। राजा इल को इस बात का ज्ञान नहीं था। वह केवल एक मृग का पीछा करते-करते अनजाने में इस पवित्र स्थल में प्रवेश कर गए। उन्होंने देखा कि भगवान शिव अपनी अर्धांगिनी पार्वती के साथ आनंद विहार में लीन हैं। उनके मुख पर मंद मुस्कान थी और वे पूर्णतः एकांत में थे। यह दृश्य किसी भी साधारण मनुष्य के लिए देखना वर्जित था।

⚡ शिव का शाप और पार्वती का वरदान (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
तं दृष्ट्वा सहसा राजा विस्मयोत्फुल्ललोचनः।
तस्थौ तत्रैव च मुहूर्तं प्रेक्षमाणो महेश्वरम्॥
ततः क्रुद्धो महादेवः किमिदं मे विचेष्टितम्।
इति मत्वा तदा राज्ञे शापं दातुं समुद्यतः॥
उवाच परमक्रुद्धो राजानं शूलपाणिनः।
यस्मात्त्वं पुरुषो भूत्वा स्त्रीभावमिह चागतः॥
तस्मात्त्वं स्त्री भविष्यसि नररूपं परित्यजन्।
इत्युक्त्वा विररामाथ भगवान्वृषभध्वजः॥
ततः सा पतिता भूमौ राज्ञी विगतचेतना।
हा हतेति ब्रुवाणा वै दुःखशोकसमन्विता॥
📖 भावार्थ : राजा ने उन्हें अचानक देखा तो उनके नेत्र विस्मय से खिल उठे। वे वहाँ मुहूर्तभर खड़े रहे और महेश्वर को देखते रहे। तब महादेव क्रोधित हो गए। उन्होंने सोचा कि यह मेरे साथ कैसा विचेष्टित हुआ? ऐसा सोचकर वे राजा को शाप देने के लिए तत्पर हो गए। शूलपाणि ने परम क्रोधित होकर राजा से कहा: चूँकि तुम पुरुष होते हुए भी यहाँ स्त्रीभाव को प्राप्त हो गए, इसलिए तुम पुरुष रूप का त्याग करके स्त्री बन जाओगे। ऐसा कहकर भगवान वृषभध्वज चुप हो गए। तब वह राजा, जो अब राज्ञी बन गई थी, विगतचेतना होकर भूमि पर गिर पड़ी। वह दुःख और शोक से युक्त होकर हा हता (हाय, मैं मारी गई) कहकर विलाप करने लगी। राजा इल ने यह नहीं सोचा था कि उनके इस कार्य का इतना भयंकर परिणाम होगा। वह तो केवल एक मृग का पीछा कर रहे थे और अनजाने में इस निषिद्ध स्थान में प्रवेश कर गए। अब उनका पुरुष रूप समाप्त हो चुका था। उनके शरीर का हर अंग बदल गया था - कंधे संकीर्ण हो गए, कमर पतली हो गई, वक्ष स्थल उभर आया, और मुख पर स्त्रियों जैसी कोमलता आ गई। वह अब एक सुंदर स्त्री बन चुके थे। उनका नाम अब इला हो गया। वह अत्यंत दुखी थीं, क्योंकि उनका राज्य, उनका परिवार, उनका पुत्र - सब कुछ उनसे दूर हो गया था। वह पुरुष के रूप में नहीं लौट सकती थीं।
॥ श्लोक १८-२५ ॥
ततः सा देवमीशानं प्रसादयितुमुद्यता।
उमां च देवीं राज्ञी तु दुःखशोकसमन्विता॥
ततः प्रसन्नो भगवानुमया सह शंकरः।
उवाच वचनं राज्ञीमिलां परमदुःखिताम्॥
उमयार्थित एवाहं ददामि वरमुत्तमम्।
मासं पुमान्भविष्यसि मासं स्त्री च भविष्यसि॥
एवं ते वर्तमानस्य राज्यं भवति शाश्वतम्।
पुत्रः पौत्रश्च ते राजन्भविष्यति न संशयः॥
इत्युक्त्वा भगवान्रुद्रो देव्या सह महेश्वरः।
तत्रैवान्तरधीयत देवदानवपूजितः॥
📖 भावार्थ : तब वह राज्ञी, जो इला कहलाई, दुःख और शोक से युक्त होकर ईशान देव और देवी उमा को प्रसन्न करने के लिए तत्पर हुई। तब देवी उमा के साथ भगवान शंकर प्रसन्न हुए और उस परम दुःखित राज्ञी इला से बोले: उमा द्वारा प्रार्थना किए जाने पर मैं तुम्हें उत्तम वरदान देता हूँ। तुम एक मास पुरुष रहोगे और एक मास स्त्री रहोगे। इस प्रकार तुम्हारे वर्तमान में रहने पर तुम्हारा राज्य शाश्वत होगा। हे राजन, तुम्हारे पुत्र और पौत्र भी होंगे, इसमें संदेह नहीं। ऐसा कहकर भगवान रुद्र महेश्वर देवी के साथ वहीं अंतर्धान हो गए, जो देवताओं और दानवों द्वारा पूजित हैं। पार्वती ने देखा कि राजा इल ने अनजाने में यह अपराध किया है और वह अत्यंत दुखी है। उन्होंने शिव से प्रार्थना की कि इस राजा पर कृपा करें। शिव ने पार्वती की प्रार्थना स्वीकार कर ली और वरदान दिया कि इला एक मास पुरुष और एक मास स्त्री रहेगा। इस प्रकार शाप और वरदान दोनों का सम्मिश्रण हुआ। अब इला की स्थिति अत्यंत विचित्र थी। वह एक मास पुरुष रहकर राज्य करता, प्रजा का पालन करता, और दूसरे मास स्त्री बनकर किसी एकांत स्थान में रहता। उसके इस रहस्य को कोई नहीं जानता था। उसके पुत्र पुरूरवा को यह ज्ञात नहीं था कि उसके पिता का यह हाल है। इला ने अपने राज्य में व्यवस्था कर दी थी कि वह जब स्त्री रूप में होता, तब उसका पुत्र राजकाज संभालता। इस प्रकार कुछ समय बीता।

🌙 इला का बुध से मिलन (श्लोक २६-४२)

॥ श्लोक २६-३३ ॥
ततः सा नियतं काले स्त्रीभूता सुमनोरमा।
रराज राज्ञी रूपेण देवकन्येव निर्मिता॥
एकदा सा वनं गत्वा रम्यं चन्द्रसुतस्य वै।
बुधस्योद्यानमासाद्य विचचार यदृच्छया॥
तत्रापश्यत सा राज्ञी बुधं चन्द्रसुतं वने।
रूपयौवनसम्पन्नं दीप्यमानं स्वतेजसा॥
स च तां दृष्टवान्राज्ञीमिलां रूपगुणान्विताम्।
विस्मितश्चाभवद्ब्रह्मन्नप्सरःप्रतिमां तदा॥
ततः प्रोवाच तां राज्ञीं बुधः परमधार्मिकः।
का त्वं शुभानने ब्रूहि कस्य पुत्री च सुन्दरि॥
इला तु सहसा प्राह राजपुत्री च वै शृणु।
इलस्य राज्ञः कन्याहं ज्ञातुं त्वामिच्छ मे प्रभो॥
📖 भावार्थ : तब वह नियत काल में स्त्री रूप धारण करने वाली अत्यंत मनोरम राज्ञी इला रूप से ऐसी सुशोभित होती थी मानो देवकन्या ही निर्मित हुई हो। एक बार वह स्त्री रूप में वन में गई। वहाँ चंद्रपुत्र बुध के रमणीय उद्यान में जाकर वह यदृच्छया विचरण करने लगी। वहाँ उस राज्ञी ने वन में चंद्रपुत्र बुध को देखा, जो रूप और यौवन से संपन्न थे और अपने तेज से दीप्तिमान थे। उन्होंने भी उस रूपगुणों से युक्त राज्ञी इला को देखा, जो अप्सरा के समान सुंदर थी, और वे विस्मित हो गए। तब परम धार्मिक बुध ने उस राज्ञी से पूछा: हे शुभानने, तुम कौन हो? हे सुंदरि, तुम किसकी पुत्री हो? बताओ। इला ने तुरंत कहा: हे राजपुत्री, सुनो, मैं राजा इल की कन्या हूँ। हे प्रभो, मैं तुम्हें जानना चाहती हूँ। यहाँ इला ने अपनी वास्तविकता नहीं बताई। उसने स्वयं को राजा इल की पुत्री बताया, क्योंकि वह जानती थी कि अपनी असली पहचान बताने से स्थिति और जटिल हो जाएगी। बुध, जो चंद्रमा के पुत्र थे और अत्यंत ज्ञानी तथा तेजस्वी थे, इला की सुंदरता पर मुग्ध हो गए। उन्होंने इला को पहचान नहीं पाया, क्योंकि इला के स्त्री रूप में कोई भी उसे पहचान नहीं सकता था। बुध ने सोचा कि यह कोई देवकन्या या अप्सरा है। उनके मन में प्रेम का भाव जागृत हुआ।
॥ श्लोक ३४-४२ ॥
बुध उवाच।
चन्द्रपुत्रोऽहं भद्रं ते वनेऽस्मिन्विचराम्यहम्।
त्वया सार्धं प्रिया सुन्दरि भव मे वरवर्णिनि॥
इत्युक्त्वा तां समासाद्य बुधश्चन्द्रसुतस्तदा।
उवास तस्यां राज्ञ्यां वै कामबाणप्रपीडितः॥
तस्यां स जनयामास पुत्रं परमधार्मिकम्।
पुरूरवसमत्युग्रं यः स राजा बभूव ह॥
स च जातमात्रः पुरूरवास्तदा बभूव तेजसा युतः।
इला तु पुत्रं संप्राप्य हर्षेण महतान्विता॥
पुनः सा पुरुषो भूत्वा राज्यं चक्रे यथाविधि।
इत्येषा वै कथा पुण्या इलायाश्चरितं महत्॥
य इदं शृणुयान्नित्यमिलायाश्चरितं शुभम्।
सर्वपापैः प्रमुच्येत रुद्रलोकं स गच्छति॥
📖 भावार्थ : बुध ने कहा: हे सुंदरि, तुम्हारा कल्याण हो। मैं चंद्रपुत्र हूँ और इस वन में विचरण करता हूँ। हे वरवर्णिनि, तुम मेरी प्रिया बनो। ऐसा कहकर चंद्रपुत्र बुध ने उसे प्राप्त किया और कामबाणों से पीड़ित होकर उस राज्ञी के साथ निवास किया। उसने उस राज्ञी में एक परम धार्मिक पुत्र उत्पन्न किया, जिसका नाम पुरूरवा था, जो अत्यंत उग्र तेजस्वी था और आगे चलकर राजा बना। वह पुरूरवा जन्म लेते ही तेज से युक्त हो गया। पुत्र को प्राप्त करके इला अत्यंत हर्ष से युक्त हो गई। फिर वह पुरुष बन गई और यथाविधि राज्य करने लगी। इस प्रकार यह पुण्यमयी कथा, इला का यह महान चरित्र है। जो कोई भी इला के इस शुभ चरित्र को नित्य सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है और रुद्रलोक को प्राप्त होता है। बुध और इला के मिलन से जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह पुरूरवा था, जो चंद्रवंश का प्रवर्तक बना। इस प्रकार सूर्यवंश और चंद्रवंश का संगम हुआ। पुरूरवा एक महान राजा हुए और उन्होंने अपने माता-पिता दोनों का नाम रोशन किया। इला के जीवन की यह विचित्र गाथा यह सिखाती है कि कभी-कभी देवताओं की कृपा और क्रोध दोनों ही मनुष्य के जीवन को अप्रत्याशित दिशा दे सकते हैं। इला ने शिव के शाप को वरदान में बदल लिया और अंततः उन्होंने एक ऐसे पुत्र को जन्म दिया जिसने एक नए वंश की स्थापना की।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🔄 लिंग परिवर्तन की अवधारणा

इला की कथा प्राचीन साहित्य में लिंग परिवर्तन के दुर्लभ उदाहरणों में से एक है। यह दर्शाता है कि प्राचीन ऋषि-मुनि लिंग की तरल अवधारणा से परिचित थे और उसे दैवीय शक्तियों से जोड़ते थे। यह कथा आधुनिक लिंग विविधता की अवधारणाओं से भी जुड़ती है।

👑 सूर्यवंश और चंद्रवंश का संगम

इस सर्ग का ऐतिहासिक महत्व यह है कि यह सूर्यवंश और चंद्रवंश के संगम की कथा प्रस्तुत करता है। इला (सूर्यवंशी) और बुध (चंद्रवंशी) के मिलन से पुरूरवा का जन्म हुआ, जिससे आगे चलकर चंद्रवंश का विस्तार हुआ। यह दो महान वंशों के मिलन का प्रतीक है।

🕉️ शिव और पार्वती की कृपा

यह कथा शिव के शाप और पार्वती की कृपा दोनों को दर्शाती है। शाप के कारण इला को स्त्री बनना पड़ा, परंतु पार्वती की कृपा से उसे एक मास पुरुष और एक मास स्त्री रहने का वरदान मिला। यह दर्शाता है कि देवी की कृपा से शाप भी वरदान में बदल सकता है।

📜 पुरूरवा का जन्म

पुरूरवा के जन्म की यह कथा आगे चलकर महाभारत आदि ग्रंथों में विस्तार पाती है। पुरूरवा और उर्वशी की प्रेम कथा भारतीय साहित्य की अमर कथाओं में से एक है। यह सर्ग उस महान कथा की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में अप्रत्याशित परिवर्तन आ सकते हैं, परंतु उन्हें स्वीकार करके आगे बढ़ना चाहिए। इला ने अपने विचित्र जीवन को स्वीकार किया और अंततः एक महान वंश की जननी/जनक बनी। साथ ही, यह भी सीख मिलती है कि देवताओं के क्षेत्र में अनाधिकार प्रवेश नहीं करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे नवनवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।