उत्तर काण्ड अध्याय 98

इंद्र की मुक्ति

देवताओं द्वारा अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान से इंद्र ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होते हैं। पाप का विभाजन करके अग्नि, नदियों, वृक्षों और स्त्रियों में स्थापित किया जाता है।

विवरण

अगस्त्य ऋषि राम को इंद्र के पापमुक्त होने की विस्तृत कथा सुनाते हैं। देवताओं ने भगवान विष्णु के निर्देशानुसार अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ के पूर्णाहुति के बाद ब्रह्महत्या रूपी राक्षसी इंद्र के शरीर से बाहर निकल आई। वह राक्षसी देवताओं से पूछती है कि अब वह कहाँ निवास करे। देवता उसे आदेश देते हैं कि वह अग्नि, नदियों, वृक्षों और उन स्त्रियों में निवास करे जो अपने पतियों से छल करती हैं। इस प्रकार ब्रह्महत्या का चार भागों में विभाजन होता है। इंद्र पूर्णतः पापमुक्त होकर पुनः देवराज के पद पर प्रतिष्ठित होते हैं। समस्त सृष्टि में सुख-शांति लौट आती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ९८

(इंद्र की मुक्ति)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टनवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अगस्त्य ऋषि अब राम को बताते हैं कि कैसे देवताओं ने अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करके इंद्र को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त कराया और उस पाप का विभाजन कैसे किया गया।

🔥 अश्वमेध यज्ञ का आयोजन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्य उवाच।
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।
अश्वमेधं महायज्ञं प्रचक्रुः शक्रमोक्षणम्॥
यथोक्तविधिना सर्वे यथाशास्त्रं यथाक्रमम्।
सम्भारान्सम्भृत्य तदा यूपांश्च विविधांस्तथा॥
तस्मिन्यज्ञे समारब्धे सर्व एव सुरोत्तमाः।
ब्रह्माणं पुरतः कृत्वा विष्णुं च प्रभुमीश्वरम्॥
ऋत्विजः सम्प्रवरयन्वेदविद्याविशारदान्।
यज्ञांगानि समस्तानि कल्पयामासुरव्ययाः॥
ततो यूपान्समुच्छ्रित्य काञ्चनान्मणिमण्डितान्।
अग्निमाधाय विधिवत्पशुं चैवायजन्क्रमात्॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने कहा: तब गंधर्वों, सिद्धों और परमर्षियों सहित सभी देवताओं ने इंद्र की मुक्ति के लिए अश्वमेध महायज्ञ का अनुष्ठान आरंभ किया। उन्होंने यथोक्त विधि से, यथाशास्त्र और यथाक्रम सभी सामग्रियों को एकत्रित किया और विविध प्रकार के यूप (यज्ञ के खंभे) स्थापित किए। उस यज्ञ के आरंभ होने पर सभी देवताओं ने ब्रह्मा और प्रभु ईश्वर विष्णु को आगे करके वेदविद्या में निष्णात ऋत्विजों का चयन किया। उन अव्यय देवताओं ने यज्ञ के समस्त अंगों की व्यवस्था की। फिर उन्होंने सोने के और मणियों से सजाए गए यूपों को स्थापित किया, विधिपूर्वक अग्नि की स्थापना की और क्रमशः पशु की आहुति दी। यह यज्ञ इतना भव्य था कि उसकी शोभा देखते ही बनती थी। चारों ओर मंत्रों की गूंज से वातावरण पवित्र हो रहा था। सुवर्ण के यूप सूर्य के समान चमक रहे थे। यज्ञ की वेदी पर देवता, ऋषि-मुनि, गंधर्व, किन्नर, सिद्ध सभी उपस्थित थे। ब्रह्मा स्वयं यज्ञ के अध्यक्ष थे और भगवान विष्णु ने यज्ञ की रक्षा का दायित्व संभाला था। अग्निदेव यज्ञ की आहुतियों को ग्रहण कर रहे थे। समस्त दिशाओं से देवता और ऋषि-मुनि इस यज्ञ में भाग लेने के लिए एकत्रित हो रहे थे। यज्ञमंडप को पुष्पमालाओं, ध्वजाओं और पताकाओं से सजाया गया था। चारों ओर सुगंधित धूप फैली हुई थी। यज्ञ की वेदी पर निरंतर घी की आहुति डाली जा रही थी, जिससे अग्नि की लपटें और भी प्रज्वलित हो रही थीं।
॥ श्लोक ६-१० ॥
एवं प्रवर्तमाने तु यज्ञे परमभास्वरे।
ब्रह्महत्या समागम्य शक्रं मोक्तुमथार्हति॥
सा समागम्य देवांस्तु ब्रह्महत्या भयानका।
उवाच वचनं घोरं सर्वेषां शृण्वतां तदा॥
यद्यप्येष मया मुक्तो देवेन्द्रो विगतज्वरः।
तथापि स्थानमिच्छामि दीयतां मम सुव्रताः॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्या देवाः साग्निपुरोगमाः।
प्रोचुः प्राञ्जलयः सर्वे ब्रह्माणं लोकभावनम्॥
किमत्र युक्तं भगवन्ब्रूहि तत्त्वेन नो विभो।
ब्रह्महत्या वचः श्रुत्वा स्थानं याचति साम्प्रतम्॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार उस परम तेजस्वी यज्ञ के संपन्न होते ही ब्रह्महत्या ने आकर इंद्र को मुक्त कर दिया। वह भयंकर ब्रह्महत्या देवताओं के पास आई और सबके सुनते हुए भयानक वचन बोली: यद्यपि देवेंद्र मेरे द्वारा मुक्त कर दिए गए हैं और उनके सारे ज्वर दूर हो गए हैं, फिर भी मैं अब निवास स्थान चाहती हूँ। हे सुव्रतों, मुझे वह प्रदान कीजिए। उसके ये वचन सुनकर अग्नि सहित सभी देवताओं ने हाथ जोड़कर लोकभावन ब्रह्मा से कहा: हे भगवन, अब क्या उचित है? हे विभो, आप हमें तत्त्व से बताइए। ब्रह्महत्या ने हमारी बात सुनकर अब निवास स्थान मांगा है। देवता अब इस समस्या में पड़ गए थे। ब्रह्महत्या रूपी वह भयानक राक्षसी अब उनके सामने खड़ी थी और अपने लिए स्थान की मांग कर रही थी। उसे कोई स्थान देना भी आवश्यक था, अन्यथा वह क्रोधित होकर फिर से इंद्र पर आक्रमण कर सकती थी या किसी अन्य देवता को ग्रस सकती थी। देवता समझ गए कि पाप का नाश तो हो सकता है, परंतु उसे पूर्णतः मिटाना असंभव है। उसे कहीं न कहीं निवास तो देना ही होगा। अतः उन्होंने ब्रह्मा जी से इसका हल पूछा। ब्रह्मा जी ने ध्यानमग्न होकर इस समस्या का समाधान ढूंढना आरंभ किया।

⚖️ पाप का चार भागों में विभाजन (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
ततः प्रोवाच भगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः।
शृणु पापे वचो मह्यं स्थानं तुभ्यं ददाम्यहम्॥
अग्नौ च ये च नद्यश्च वृक्षाश्च स्थावराश्च ये।
स्त्रियश्च पापशीला यास्तासु त्वं वस पाप्मनि॥
ये च वै मनुजा लोके ब्रह्महत्याकृतं त्विह।
उपभुञ्जन्ति पापेन तेषु त्वं वस पाप्मनि॥
इत्युक्त्वा भगवान्ब्रह्मा देवानामग्रतः स्थितः।
ततोऽग्निरपि तां प्राह नद्यश्च वृक्ष एव च॥
न शक्यं स्थापनं कर्तुं भगवन्ब्रूहि यत्नतः।
यथा भवति नो दोषस्तथा कुरु जगत्पते॥
📖 भावार्थ : तब लोकपितामह भगवान ब्रह्मा ने कहा: हे पापे, मेरे वचन सुनो, मैं तुम्हें स्थान देता हूँ। अग्नि में, जो नदियाँ हैं, जो वृक्ष और स्थावर हैं, तथा जो पापशीला स्त्रियाँ हैं, उनमें तुम निवास करो। हे पाप्मनि, और जो मनुष्य इस लोक में ब्रह्महत्या के समान पाप का उपभोग करते हैं, उनमें भी तुम निवास करो। ऐसा कहकर भगवान ब्रह्मा देवताओं के सामने स्थित रहे। तब अग्नि, नदियों और वृक्षों ने उससे कहा: हे भगवन, हम इनका स्थापन नहीं कर सकते। हे जगत्पते, आप यत्नपूर्वक कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे हमें दोष न लगे। अग्नि ने कहा, "मैं तो पवित्र हूँ, मेरा धर्म है सब कुछ पवित्र करना। यदि यह पाप मुझमें निवास करेगा तो मैं अशुद्ध हो जाऊंगा और मेरा पावन करने वाला गुण समाप्त हो जाएगा।" नदियों ने कहा, "हम तो सबके पाप धोकर उन्हें पवित्र करती हैं। यदि यह पाप हममें वास करेगा तो हम स्वयं अशुद्ध हो जाएंगी और हमारा जल पीने वाले सभी लोग पाप के भागी बनेंगे।" वृक्षों ने कहा, "हम तो सबको फल-फूल और छाया देते हैं। यदि यह पाप हममें वास करेगा तो हमारे फल खाने वाले सभी प्राणी पापग्रस्त हो जाएंगे।" इस प्रकार सभी ने ब्रह्मा जी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
॥ श्लोक १८-२५ ॥
ततः प्रोवाच भगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः।
न भयं विद्यते तात यथा वक्ष्ये तथा कुरु॥
अग्नौ प्रविश्य पापिष्ठे दह्यमाने न संशयः।
तवांशो न भवेद्दोषस्तस्मादग्नौ प्रविश्यताम्॥
नदीषु च प्रविष्टासु गच्छन्त्यापः समुद्रगाः।
तत्र त्वं वस पापिष्ठे नदीभागे व्यवस्थितः॥
वृक्षेषु च प्रविष्टेषु छेदने जात एव तु।
न दोषस्तव पापिष्ठे तस्माद्वृक्षेषु संविश॥
स्त्रियश्च पापशीला या नास्तिकाश्च विशेषतः।
तासु त्वं वस पापिष्ठे नान्यथा वचनं मम॥
📖 भावार्थ : तब लोकपितामह भगवान ब्रह्मा ने कहा: हे तात, कोई भय नहीं है। जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो। हे पापिष्ठे, अग्नि में प्रवेश करने पर तुम जल जाओगी, इसमें संदेह नहीं। तुम्हारा वह अंश दोषरहित हो जाएगा, इसलिए अग्नि में प्रवेश करो। नदियों में प्रवेश करने पर उनका जल समुद्र में चला जाता है। वहाँ तुम नदियों के भाग में स्थित होकर निवास करो, हे पापिष्ठे। वृक्षों में प्रवेश करने पर उनके कट जाने पर तुम्हें दोष नहीं लगेगा, इसलिए वृक्षों में भी निवास करो। और जो स्त्रियाँ पापशीला हैं, विशेषकर जो नास्तिक हैं, उनमें तुम निवास करो। मेरा यह वचन अन्यथा नहीं हो सकता। ब्रह्मा जी ने इस प्रकार पाप का विभाजन करने की योजना बनाई। उन्होंने बताया कि पाप के चार भाग किए जाएंगे - एक भाग अग्नि में, एक नदियों में, एक वृक्षों में और एक कपटिनी स्त्रियों में। अग्नि में प्रवेश करने पर पाप जल जाएगा और अग्नि पुनः पवित्र हो जाएगी। नदियों में प्रवेश करने पर पाप का वह अंश समुद्र में चला जाएगा और समुद्र की विशालता में विलीन हो जाएगा। वृक्षों में प्रवेश करने पर जब वृक्ष काटे जाएंगे या सूखेंगे, तब पाप का वह अंश नष्ट हो जाएगा। स्त्रियों में प्रवेश करने पर वह उनके मासिक धर्म के रूप में प्रकट होगा और शरीर से बाहर निकल जाएगा। इस प्रकार पाप का नाश हो जाएगा।

👑 इंद्र का पुनः देवराज पद पर अभिषेक (श्लोक २६-३६)

॥ श्लोक २६-३१ ॥
एवं सा ब्रह्मणा तेन स्थापिता ब्रह्महत्या।
यथोक्तेन विधानेन प्रीता प्रववृते तदा॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।
शक्रं शतक्रतुं दृष्ट्वा प्रीतिमन्तोऽभवंस्तदा॥
तमश्वमेधं ते सर्वे प्रशशंसुः पुनः पुनः।
यज्ञानां प्रवरं यज्ञं पावनं सर्वपाप्मनाम्॥
शक्रोऽपि विमलात्मा सन्प्रीतिमानभवत्तदा।
देवराज्यं प्रशास्ति स्म निर्विकारो निरामयः॥
एवं वृत्रवधः प्रोक्तः शक्रस्य च महात्मनः।
शक्रस्य ब्रह्महत्याया मोक्षणं च यथाक्रमम्॥
इत्याख्यानं समाकर्ण्य रामः प्रीतमनाः सुखी।
उवाच मुनिशार्दूलं कृतज्ञः सत्यविक्रमः॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार ब्रह्मा द्वारा यथोक्त विधान से ब्रह्महत्या की स्थापना की गई, जिससे वह प्रसन्न हो गई और उसने वैसा ही किया। तब गंधर्वों, सिद्धों और परमर्षियों सहित सभी देवताओं ने शतक्रतु इंद्र को निर्विकार और निरामय देखकर अत्यंत प्रसन्नता प्राप्त की। उन सबने उस अश्वमेध यज्ञ की बारंबार प्रशंसा की, जो समस्त यज्ञों में श्रेष्ठ और सभी पापों का नाश करने वाला था। इंद्र भी विमल आत्मा होकर अत्यंत प्रसन्न हुए और बिना किसी विकार और रोग के देवराज्य का शासन करने लगे। इस प्रकार महात्मा इंद्र के वृत्र वध और ब्रह्महत्या से मुक्ति का वर्णन यथाक्रम किया गया। इस आख्यान को सुनकर राम प्रसन्नचित्त हुए और कृतज्ञ होकर सत्यविक्रम मुनिश्रेष्ठ से बोले। अब समस्त सृष्टि में पुनः सुख-शांति का वातावरण बन गया। इंद्र का तेज पहले से भी अधिक बढ़ गया। उन्होंने देवताओं को पुनः उनके स्थानों पर प्रतिष्ठित किया। वर्षा सामान्य रूप से होने लगी, नदियाँ प्रवाहित होने लगीं, और सम्पूर्ण सृष्टि में हर्ष का वातावरण बन गया। ऋषि-मुनि पुनः अपनी तपस्या में लीन हो गए। देवता लोग इंद्र की सेवा में तत्पर हो गए। इंद्र ने दधीचि ऋषि का स्मरण किया और उनके बलिदान को नमन किया। उन्होंने घोषणा की कि जो भी अश्वमेध यज्ञ करेगा, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा और उसे अक्षय लोकों की प्राप्ति होगी।
॥ श्लोक ३२-३६ ॥
राम उवाच।
भगवन्धन्यतां प्राप्तो देवराजः पुरंदरः।
यस्यैवं विधिना यज्ञः कृतोऽयं पापनाशनः॥
अहमप्यश्वमेधेन यक्ष्ये पापभयातुरः।
तन्मेऽनुज्ञातुमर्हस्त्वं मुनिशार्दूल सत्तम॥
अगस्त्य उवाच।
यजस्व राजशार्दूल यथेष्टं नात्र संशयः।
अश्वमेधसहस्रेण त्वं यक्ष्यसि न संशयः॥
इत्युक्त्वा स मुनिश्रेष्ठो रामेण प्रीतमानसः।
जगाम सहितो देवैः स्वमाश्रमपदं प्रति॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि।
वृत्रस्य चरितं दिव्यं शक्रस्य च महात्मनः॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा: हे भगवन, देवराज पुरंदर धन्य हैं, जिनके लिए यह पापनाशक यज्ञ इस प्रकार किया गया। मैं भी पाप के भय से व्याकुल होकर अश्वमेध यज्ञ करना चाहता हूँ। हे मुनिशार्दूल, हे सत्तम, आप मुझे इसकी अनुज्ञा दीजिए। अगस्त्य ने कहा: हे राजशार्दूल, आप यथेष्ट यज्ञ कीजिए, इसमें संदेह नहीं। आप अश्वमेध यज्ञ ही नहीं, अपितु हजारों अश्वमेध यज्ञ करेंगे, इसमें भी संदेह नहीं। ऐसा कहकर राम से प्रसन्न मन वाले वे मुनिश्रेष्ठ देवताओं के साथ अपने आश्रम पद को चले गए। हे राम, आपने मुझसे जो पूछा था, वह सब मैंने आपको बता दिया - वृत्र का दिव्य चरित्र और महात्मा इंद्र का वृत्तांत। राम ने अगस्त्य ऋषि की इस कथा को सुनकर अश्वमेध यज्ञ करने का दृढ़ संकल्प कर लिया। उन्होंने सोचा कि यदि अश्वमेध यज्ञ देवराज इंद्र को ब्रह्महत्या जैसे महापाप से मुक्त कर सकता है, तो निश्चय ही यह मनुष्यों के समस्त पापों का नाश करने में सक्षम होगा। यहीं से राम के अश्वमेध यज्ञ की पृष्ठभूमि तैयार होती है, जो आगे चलकर इस काण्ड का एक महत्वपूर्ण भाग बनेगा। अगस्त्य ऋषि के जाने के बाद राम ने अपने भाइयों और मंत्रियों के साथ अश्वमेध यज्ञ की योजना बनानी आरंभ की।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌀 पाप की अवधारणा

यह सर्ग पाप की गतिशील अवधारणा को स्पष्ट करता है। पाप को नष्ट नहीं किया जा सकता, केवल उसका स्थानांतरण या विभाजन किया जा सकता है। ब्रह्महत्या का विभाजन यह दर्शाता है कि पाप के भी विभिन्न अंश होते हैं जो विभिन्न माध्यमों से प्रकट होते हैं।

🔥 अश्वमेध यज्ञ की महिमा

अश्वमेध यज्ञ को सर्वश्रेष्ठ यज्ञ बताया गया है, जो सभी पापों का नाश करने वाला है। यह केवल राजसी ऐश्वर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का भी माध्यम है। इंद्र का पापमुक्त होना इस यज्ञ के प्रभाव को दर्शाता है।

🚺 स्त्रियों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण

इस सर्ग में पाप के एक अंश को पापशीला और नास्तिक स्त्रियों में निवास करने का आदेश दिया गया है। यह प्राचीन समाज में स्त्रियों की नैतिकता के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसे आधुनिक संदर्भ में समझना आवश्यक है।

🌳 प्रकृति और पाप

अग्नि, नदियों और वृक्षों में पाप के अंश का निवास यह दर्शाता है कि प्रकृति भी पाप के प्रभाव को ग्रहण करती है और उसे शुद्ध करती है। अग्नि की दहन क्षमता, नदियों की प्रवाह क्षमता और वृक्षों की परिवर्तनशीलता पाप के नाश के प्राकृतिक साधन हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कोई भी पाप इतना बड़ा नहीं होता जिसका प्रायश्चित न हो सके। सच्चे मन से किए गए यज्ञ और तप से मनुष्य सबसे बड़े पापों से भी मुक्त हो सकता है। पाप का विभाजन यह भी सिखाता है कि हमें अपने कर्मों के परिणामों को समझना चाहिए और उनके लिए तत्पर रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे अष्टनवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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