उत्तर काण्ड अध्याय 97

वृत्र का वध

इंद्र और वृत्रासुर के बीच घमासान युद्ध होता है। अंततः इंद्र दधीचि की अस्थियों से बने वज्र से वृत्र का वध कर देते हैं, परंतु वृत्र के ब्राह्मण होने के कारण उन पर ब्रह्महत्या का पाप लग जाता है।

विवरण

अगस्त्य ऋषि राम को वृत्र-इंद्र युद्ध का रोमांचक वर्णन सुनाते हैं। वृत्रासुर अपनी माया और अद्भुत शक्तियों से इंद्र पर भारी पड़ने लगता है। वह इंद्र को निगलने का प्रयास करता है, परंतु देवताओं के आह्वान पर इंद्र वृत्र के मुख से बाहर निकल आते हैं। अंततः इंद्र दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र का प्रयोग करते हैं और वृत्र का सिर धड़ से अलग कर देते हैं। वृत्र के मरते ही तीनों लोकों में हर्ष व्याप्त हो जाता है, परंतु इंद्र पर ब्रह्महत्या का भारी पाप लग जाता है। वह पाप उनका पीछा करने लगता है और इंद्र उससे भयभीत होकर भागने लगते हैं। यह सर्ग इंद्र के पतन और उनके पाप के प्रभाव को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ९७

(वृत्र का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तनवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अगस्त्य ऋषि अब राम को इंद्र और वृत्र के बीच हुए उस भीषण युद्ध का वर्णन सुनाते हैं, जिसके अंत में इंद्र ने वज्र से वृत्र का वध किया। परंतु विजय के साथ ही इंद्र पर ब्रह्महत्या का पाप भी आक्रमण करता है।

⚔️ इंद्र-वृत्र घोर संग्राम (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्य उवाच।
ततो वृत्रः सुसंक्रुद्धः शक्रमाह्वयताम्बरे।
निर्गत्य महतीं मायां दर्शयन्विविधां तदा॥
तयोर्युद्धं समभवदतुलं रोमहर्षणम्।
वासवस्य च वृत्रस्य देवदानवसन्निधौ॥
शक्रः शतसहस्रैस्तु वज्रं चिक्षेप संयुगे।
वृत्रोऽपि गिरिशृङ्गाणि चिक्षेप बहुशस्तदा॥
तैः शृङ्गैः सह वज्रेण समाघातो महानभूत्।
जज्वाल च तदा वह्निर्दिशः सर्वा विदीपयन्॥
एवं तौ समरे वीरावन्योन्यमभिजघ्नतुः।
देवदानवगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने कहा: उसके बाद अत्यधिक क्रोधित वृत्र ने आकाश में इंद्र को युद्ध के लिए ललकारा। वह निकलकर विविध प्रकार की महान मायाओं का प्रदर्शन करने लगा। देवताओं और दानवों के समक्ष वासव (इंद्र) और वृत्र का वह युद्ध अद्वितीय और रोमांचकारी था। इंद्र ने युद्ध में सैकड़ों-हजारों बार वज्र का प्रहार किया। वृत्र ने भी बार-बार पर्वतों के शिखरों को तोड़कर फेंका। उन शिखरों और वज्र के टकराने से महान संघर्ष हुआ। उस समय अग्नि प्रज्वलित हो उठी, जिसने सभी दिशाओं को प्रकाशित कर दिया। इस प्रकार वे दोनों वीर समरांगण में एक-दूसरे पर प्रहार कर रहे थे। देवता, दानव, गंधर्व, सिद्ध और परमर्षि सब यह युद्ध देख रहे थे। युद्ध का स्वरूप इतना भयंकर था कि देखने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते थे। वृत्र ने अपनी माया से अनेक रूप धारण किए। कभी वह बादलों में छिप जाता, कभी पर्वत का रूप धारण कर लेता, कभी अग्नि की लपटों के समान प्रतीत होता। इंद्र भी अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से उसकी हर माया को नष्ट करते रहे। दोनों में से कोई भी किसी से कम नहीं था। वृत्र के पास ब्रह्मा का वरदान था, जिससे वह अमर-सा हो गया था, और इंद्र के पास दधीचि की अस्थियों से निर्मित वह दिव्य वज्र था, जो सब कुछ नष्ट करने में सक्षम था।
॥ श्लोक ६-१० ॥
ततो वृत्रो महाकायः शक्रं दृष्ट्वा महाबलः।
विवृतास्यो महानादं चकार जलदोपमः॥
तस्य नादेन वित्रस्ताः सुराः सर्वे दिशो गताः।
शक्रोऽपि समरे त्रस्तो दुद्राव च दिशो दश॥
ततो वृत्रः समागम्य शक्रमाह्वयताम्बरे।
क्व यास्यसि महाबाहो तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत्॥
निवर्त्य शक्रं तरसा जग्रास स महासुरः।
तं ग्रस्तं सुरपतिं दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत्॥
ततो ब्रह्मा समागम्य विष्णुना सहितः प्रभुः।
स्तुतिभिर्विविधाभिस्तं तोषयामास शंकरम्॥
📖 भावार्थ : उसके बाद महाकाय और महाबली वृत्र ने इंद्र को देखकर अपना मुख फैलाया और बादलों के समान महान गर्जना की। उसकी गर्जना से भयभीत होकर सभी देवता दिशाओं में भाग गए। इंद्र भी युद्ध में भयभीत होकर दसों दिशाओं की ओर भागे। तब वृत्र ने पास जाकर आकाश में इंद्र को ललकारा और कहा: हे महाबाहो, तुम कहाँ जा रहे हो? ठहरो, ठहरो। उस महासुर ने वेगपूर्वक इंद्र को लौटाकर निगल लिया। देवताओं के स्वामी को ग्रसा हुआ देखकर सब ओर हाहाकार मच गया। तब ब्रह्मा, विष्णु के साथ वहाँ आए और विविध प्रकार की स्तुतियों से शंकर (शिव) को प्रसन्न किया। यह दृश्य अत्यंत भयावह था। देवराज इंद्र, जो समस्त देवताओं के स्वामी थे, अब वृत्र के उदर में थे। चारों ओर अंधकार छा गया। देवता लोग हताश होकर एक-दूसरे का मुख देखने लगे। उन्हें लगा कि अब सब कुछ समाप्त हो गया। तभी ब्रह्मा और विष्णु ने मिलकर भगवान शिव की स्तुति की। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने अपनी शक्ति से इंद्र को सशक्त किया। इंद्र के भीतर नवीन ऊर्जा का संचार हुआ। उन्होंने वृत्र के उदर में ही अपने वज्र को और भी अधिक प्रभावशाली बना लिया। अब वे वृत्र के उदर से बाहर निकलने की योजना बनाने लगे।

🔱 इंद्र की मुक्ति और वृत्र का अंत (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१६ ॥
ततः स्तुत्वा महादेवं ब्रह्मा लोकपितामहः।
शक्रस्य मोक्षणार्थाय विष्णुना सहितस्तदा॥
ततो देवाः समागम्य प्रार्थयन्त पिनाकिनम्।
शक्रस्य मोक्षणं देव ज्ञातुं युक्तं सुरोत्तम॥
ततः प्रसन्नो भगवान्पशूनां पतिरीश्वरः।
उवाच वचनं श्लक्ष्णं देवानां हितकाम्यया॥
मुच्यतां सुरपतिर्दैत्यादस्मादचिरादिह।
इत्युक्त्वा भगवान्रुद्रो देवानां पश्यतां तदा॥
शक्रं मुमोच वृत्रस्य मुखाद्बलनिसूदनः।
📖 भावार्थ : तब लोकपितामह ब्रह्मा ने विष्णु के साथ मिलकर महादेव की स्तुति की, जिससे इंद्र की मुक्ति हो सके। उसके बाद सभी देवताओं ने मिलकर पिनाकधारी शिव से प्रार्थना की: हे देव, हे सुरोत्तम, इंद्र की मुक्ति का कोई उचित उपाय बताइए। तब पशुओं के स्वामी भगवान शंकर प्रसन्न हुए और देवताओं के हित की इच्छा से मधुर वचन बोले: शीघ्र ही देवताओं के स्वामी को इस दैत्य से मुक्त कर दो। ऐसा कहकर भगवान रुद्र ने देवताओं के देखते-देखते वृत्र के मुख से इंद्र को मुक्त करा दिया। यह एक चमत्कारिक घटना थी। भगवान शिव की कृपा से इंद्र के शरीर ने वज्र का रूप धारण कर लिया। वृत्र का उदर उस वज्र के तेज से जलने लगा। वृत्र को असहनीय पीड़ा हुई और उसने अपना मुख खोल दिया। उसी क्षण इंद्र उसके मुख से बाहर निकल आए। बाहर निकलते ही इंद्र ने अपने हाथ में उसी दिव्य वज्र को ले लिया, जो पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली हो गया था। अब वृत्र के सामने इंद्र एक नए रूप में खड़े थे। उनके तेज ने सम्पूर्ण आकाश को आलोकित कर दिया। वृत्र भी चकित रह गया कि वह इंद्र को निगल चुका था, फिर भी वह उसके सामने जीवित खड़ा था।
॥ श्लोक १७-२५ ॥
मुक्तमात्रे तु शक्रे तु वृत्रः क्रोधसमन्वितः।
अभ्यधावत सहसा शक्रं प्रति महासुरः॥
ततः शक्रः महावज्रं जग्राह परमां ज्वलन्।
चिक्षेप च शिरस्तस्य वृत्रस्य निशितैः शरैः॥
स तेनाभिहतो वृत्रः शक्रेणामित्रघातिना।
पपात सहसा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः॥
तस्मिन्निपतिते दैत्ये हाहाकारो महानभूत्।
देवानां जयशब्दश्च दानवानां च निस्वनः॥
ततो देवगणाः सर्वे प्रहृष्टाः सम्प्रणेदिरे।
शक्रं पुरस्कृत्य तदा विष्णुना सहितास्तदा॥
अथ शक्रः परं यत्नं कृत्वा वृत्रवधे महत्।
ब्रह्महत्या समाविशत्साश्वमेनमभिद्रुता॥
📖 भावार्थ : इंद्र के मुक्त होते ही वृत्र क्रोध से भर गया और वह तेजी से इंद्र पर झपटा। तब इंद्र ने परम ज्वलंत महावज्र को उठाया और उसे तीक्ष्ण बाणों के साथ वृत्र के सिर पर फेंक दिया। शत्रुओं का नाश करने वाले इंद्र द्वारा वज्र से आहत होकर वृत्र भूमि पर गिर पड़ा, मानो जड़ से कटा हुआ वृक्ष। उस दैत्य के गिरते ही चारों ओर हाहाकार मच गया। देवताओं की जय-जयकार और दानवों की चीत्कारें सुनाई दीं। तब सभी देवताओं ने विष्णु के साथ मिलकर इंद्र को आगे करते हुए हर्षपूर्वक जयघोष किया। इस प्रकार वृत्र के वध का महान प्रयत्न करने के बाद, इंद्र के पास ब्रह्महत्या आ पहुंची और वेग से उनका पीछा करने लगी। वृत्र के शरीर से प्राण निकलते ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड में एक अद्भुत परिवर्तन हुआ। जहाँ कहीं भी वृत्र के आतंक का अंधकार छाया हुआ था, वहाँ प्रकाश फैल गया। नदियाँ फिर से प्रवाहित होने लगीं, वर्षा हुई और सृष्टि का संतुलन पुनः स्थापित हो गया। देवता अपनी विजय से अत्यंत प्रसन्न थे और उन्होंने इंद्र की भूरि-भूरि प्रशंसा की। परंतु इसी विजयोल्लास के बीच एक भयानक घटना घटी। ब्रह्महत्या नामक एक भीषण राक्षसी वहाँ प्रकट हुई। उसका रूप अत्यंत विकराल था - खून से सनी हुई, भयंकर दाँतों वाली, और उसके शरीर से दुर्गंध आ रही थी। वह सीधे इंद्र की ओर बढ़ी और उनमें प्रवेश कर गई।

😔 ब्रह्महत्या का आक्रमण (श्लोक २६-४०)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
सा चैनमन्वधावद्वै ब्रह्महत्या भयंकरी।
यत्र यत्र स्म गच्छेत सा तत्रानुजगाम ह॥
तया ग्रस्तस्तदा शक्रो ब्रह्महत्याभयार्दितः।
न शर्म लेभे दुर्धर्षो विषण्णः स महीयसि॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।
दृष्ट्वा शक्रं तथा ग्रस्तं ब्रह्महत्याभयेन वै॥
चिन्तयामासुरव्यग्राः शक्रस्य परिमोक्षणम्।
कथं मुच्येत देवेन्द्रो ब्रह्महत्याभयान्महत्॥
ततस्ते शरणं जग्मुर्ब्रह्माणं लोकभावनम्।
विष्णुं च देवदेवेशं रुद्रं च प्रभुमीश्वरम्॥
ते प्रोचुः प्राञ्जलो देवान्ब्रह्महत्या हतेश्वरम्।
शक्रं ग्रस्तं महाभाग मोचयस्व नमोऽस्तु ते॥
📖 भावार्थ : वह भयंकर ब्रह्महत्या इंद्र का पीछा करने लगी। इंद्र जहाँ-जहाँ जाते, वह उनके पीछे-पीछे जाती। उस ब्रह्महत्या के भय से पीड़ित होकर इंद्र उससे ग्रसित हो गए। वे दुर्धर्ष होते हुए भी उस महान पाप के कारण अत्यंत विषण्ण हो गए और उन्हें कहीं भी शांति नहीं मिली। तब गंधर्वों, सिद्धों और परमर्षियों सहित सभी देवताओं ने इंद्र को ब्रह्महत्या के भय से ग्रसित देखकर उनकी मुक्ति के लिए चिंतन किया। वे सोचने लगे कि देवराज इंद्र इस महान ब्रह्महत्या के भय से कैसे मुक्त हों। तब वे सब लोकभावन ब्रह्मा, देवदेवेश विष्णु और प्रभु ईश्वर रुद्र की शरण में गए। उन्होंने हाथ जोड़कर उन देवों से कहा: हे महाभाग, आपको नमस्कार है। ब्रह्महत्या ने इंद्र को ग्रस लिया है, कृपया उन्हें मुक्त कीजिए। इंद्र की यह दशा देखकर सभी देवता अत्यंत दुखी हुए। इंद्र, जो कभी समस्त देवताओं के स्वामी थे, आज एक भयभीत व्यक्ति के समान इधर-उधर भटक रहे थे। उनका तेज समाप्त हो गया था, उनका आत्मविश्वास जाता रहा था। वे एक साधारण मनुष्य की भाँति पाप के भार से दबे जा रहे थे। ब्रह्महत्या ने उनके शरीर को जर्जर कर दिया था। उनका रंग पीला पड़ गया, उनकी आँखों में चमक नहीं रही थी, और वे निरंतर कांपते रहते थे। देवता समझ गए कि यह पाप केवल सामान्य पाप नहीं है, यह तो ब्रह्मा के समान तेजस्वी वृत्र के वध का परिणाम है। वृत्र यद्यपि असुर था, फिर भी उसने ब्रह्मा के वरदान से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया था। अतः उसका वध ब्रह्महत्या के समान था।
॥ श्लोक ३३-४० ॥
ततः प्रोवाच भगवान्विष्णुर्देवगणानिदम्।
अश्वमेधेन यज्ञेन शक्रो मोक्ष्यति किल्बिषात्॥
इत्युक्त्वा स ददौ तेभ्यो यज्ञियं विधिमुत्तमम्।
यथाक्रमं यथान्यायं यथाशास्त्रं यथाविधि॥
ततस्ते देवताः सर्वे यज्ञं चक्रुर्यथाक्रमम्।
अश्वमेधं सुरश्रेष्ठं शक्रमोक्षणकारणात्॥
तस्मिन्यज्ञे समाप्ते तु ब्रह्महत्या व्यगच्छत।
शक्रश्चापि विशुद्धात्मा बभूव विगतज्वरः॥
एवं वृत्रवधः प्रोक्तः शक्रस्य च महात्मनः।
शक्रस्य ब्रह्महत्याया मोक्षणं च यथाक्रमम्॥
इत्याख्यानं समाकर्ण्य रामः प्रीतमनाः सुखी।
उवाच मुनिशार्दूलं कृतज्ञः सत्यविक्रमः॥
📖 भावार्थ : तब भगवान विष्णु ने देवताओं से कहा: अश्वमेध यज्ञ से इंद्र इस पाप से मुक्त होंगे। ऐसा कहकर उन्होंने उन्हें यथाक्रम, यथान्याय, यथाशास्त्र और यथाविधि उत्तम यज्ञीय विधि प्रदान की। तब उन सभी देवताओं ने इंद्र की मुक्ति के लिए यथाक्रम सुरश्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया। उस यज्ञ के समाप्त होने पर ब्रह्महत्या दूर हो गई। इंद्र भी विशुद्ध आत्मा और विगतज्वर हो गए। इस प्रकार महात्मा इंद्र के वृत्र वध और ब्रह्महत्या से मुक्ति का वर्णन यथाक्रम किया गया। इस आख्यान को सुनकर राम प्रसन्नचित्त हुए और कृतज्ञ होकर सत्यविक्रम मुनिश्रेष्ठ से बोले। अगस्त्य ऋषि ने आगे बताया कि अश्वमेध यज्ञ का यह विधान भगवान विष्णु ने स्वयं बताया था। उन्होंने देवताओं को निर्देश दिया कि वे एक उत्तम अश्व का चयन करें, उसे एक वर्ष तक सुरक्षित रखें, और फिर उसकी बलि देकर यज्ञ संपन्न करें। यह यज्ञ इतना प्रभावशाली था कि इसके प्रभाव से ब्रह्महत्या रूपी राक्षसी ने इंद्र को छोड़ दिया। वह राक्षसी देवताओं के सामने उपस्थित हुई और बोली कि अब वह कहाँ जाए? देवताओं ने उसे आदेश दिया कि वह अग्नि में, नदियों में, वृक्षों में और उन स्त्रियों में निवास करे जो अपने पतियों से छल करती हैं। इस प्रकार ब्रह्महत्या का विभाजन कर दिया गया और इंद्र पूर्णतः मुक्त हो गए। यह सुनकर राम ने अगस्त्य ऋषि की वंदना की और इस ज्ञान के लिए उनका आभार व्यक्त किया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚖️ कर्म का सिद्धांत

यह सर्ग कर्मफल के सिद्धांत को स्पष्ट करता है। इंद्र ने यद्यपि लोककल्याण के लिए वृत्र का वध किया, फिर भी उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लगा। यह दर्शाता है कि कर्म के फल से कोई नहीं बच सकता, चाहे वह देवराज ही क्यों न हो। पाप का प्रायश्चित आवश्यक है।

🕉️ त्रिदेवों की कृपा

इंद्र की मुक्ति में ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों की भूमिका है। शिव ने इंद्र को मुक्त कराया, विष्णु ने यज्ञ का उपाय बताया और ब्रह्मा ने मार्गदर्शन किया। यह दर्शाता है कि संकट में सभी देवताओं का सहयोग प्राप्त होता है।

🙏 अश्वमेध यज्ञ की महिमा

इस सर्ग में अश्वमेध यज्ञ को सर्वश्रेष्ठ पापनाशक बताया गया है। यह यज्ञ न केवल राजसी ऐश्वर्य प्रदान करता है, बल्कि महान से महान पापों का भी नाश करता है। यही कारण है कि आगे चलकर राम भी अश्वमेध यज्ञ करेंगे।

🛡️ वृत्र का चरित्र

वृत्र यद्यपि असुर था, फिर भी वह एक महान योद्धा और तपस्वी था। उसकी मृत्यु पर देवताओं ने भी उसे सम्मान दिया। यह सिखाता है कि शत्रु को भी उसकी योग्यता के लिए सम्मान देना चाहिए। वृत्र का वध बुराई के अंत का प्रतीक है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग की मुख्य शिक्षा यह है कि विजय के बाद भी विनम्र रहना चाहिए और अपने कर्मों के परिणामों को स्वीकार करना चाहिए। पाप चाहे कितना भी बड़ा हो, सच्चे प्रायश्चित और ईश्वर की कृपा से उसका नाश संभव है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे सप्तनवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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