उत्तर काण्ड अध्याय 95

भरत द्वारा राम को राजसूय यज्ञ न करने के लिए मनाना

राम राजसूय यज्ञ करना चाहते हैं, पर भरत उन्हें समझाते हैं कि अभी समय उपयुक्त नहीं है क्योंकि कई राक्षस अभी भी जीवित हैं। राम भरत की बात मान लेते हैं।

विवरण

अयोध्या लौटने के बाद राम ने राजसूय यज्ञ करने की इच्छा व्यक्त की, जो सार्वभौम सम्राट का यज्ञ होता है। भरत ने विनम्रतापूर्वक राम को समझाया कि यद्यपि रावण मारा गया, फिर भी उसके वंशज और अन्य राक्षस अभी भी सक्रिय हैं। उन्होंने कहा कि पहले राज्य को पूर्णतः सुरक्षित कर लेना चाहिए, तत्पश्चात् अश्वमेध यज्ञ किया जा सकता है। भरत ने यह भी बताया कि राजसूय में बहुत समय और संसाधन लगते हैं, और अभी प्रजा को स्थिरता की आवश्यकता है। राम ने भरत की बातों का स्वागत किया और उनकी सलाह मानकर यज्ञ स्थगित कर दिया। इससे भरत की बुद्धिमत्ता और राम के लोकतांत्रिक स्वभाव का पता चलता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ९५

(भरत द्वारा राम को राजसूय यज्ञ न करने के लिए मनाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चनवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अयोध्या लौटने के बाद राम राजसूय यज्ञ की इच्छा व्यक्त करते हैं, किन्तु भरत उन्हें राजनीतिक स्थिति से अवगत कराते हुए यज्ञ स्थगित करने की सलाह देते हैं।

👑 राम का राजसूय प्रस्ताव (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-७ ॥
अयोध्यामागतो रामः पूजितो मुनिभिस्तदा।
राज्यं प्रशास्य धर्मेण प्रजाः सर्वाः सुखान्विताः॥ १॥
कदाचिद् राघवो राजा सभायां मन्त्रिभिः सह।
उवाच भरतं वाक्यं धर्मज्ञं सत्यविक्रमम्॥ २॥
भरत श्रूयतां वाक्यं ममैतद्धर्मसंहितम्।
इच्छामि राजसूयेन यज्ञेन यजितुं प्रभुम्॥ ३॥
येनाहं सर्वराजन्यान् वशे कृत्वा महीमिमाम्।
प्राप्नुयां परमं लोके यशः कीर्तिं च शाश्वतीम्॥ ४॥
त्वं च मे भ्रातरः सर्वे सीता च जनकात्मजा।
एतदर्थे समुत्सुका यज्ञस्य च समृद्धये॥ ५॥
तदनुज्ञातुमर्हसि भरत त्वं मम प्रियम्।
यज्ञारम्भो विधातव्यः सर्वोपस्करसंयुतः॥ ६॥
भरतः प्राह राजानं प्राञ्जलिर्विनयान्वितः।
शृणु राजन् वचो मह्यं हितं तव न संशयः॥ ७॥
📖 भावार्थ : अयोध्या लौटकर राम धर्मपूर्वक राज्य कर रहे थे, प्रजा सुखी थी। एक दिन सभा में उन्होंने भरत से कहा: "हे भरत! मैं राजसूय यज्ञ करना चाहता हूँ, जिससे सब राजाओं को वश में करके अखण्ड कीर्ति प्राप्त कर सकूँ। तुम, मेरे भाई और सीता भी इसके लिए उत्सुक हैं। कृपया अनुमति दो।" भरत ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक कहा: "हे राजन्! मेरी बात सुनिए, जो आपके हित में है।"

🤔 भरत का तर्क (श्लोक ८-१४)

॥ श्लोक ८-१४ ॥
राजसूयो महायज्ञः सर्वसम्भारसंयुतः।
बहुकालप्रसाध्यश्च बहुवित्तव्ययान्वितः॥ ८॥
रावणो निहतो राजन् त्वया दशमुखो रणे।
तथापि राक्षसाः केचित् तिष्ठन्ति पृथिवीतले॥ ९॥
ते सर्वे बलवन्तश्च मायावन्तश्च राघव।
प्रजापीडनशीलाश्च त्वद्भयान्न प्रकाशते॥ १०॥
यदि यज्ञे प्रवृत्ते तु ते विघ्नं कुर्युरञ्जसा।
ततो यज्ञविघातेन हानिः स्यान्नृपसत्तम॥ ११॥
प्रथमं राक्षसाः सर्वे निहन्तव्या नरेश्वर।
ततः पश्चान्महायज्ञः कर्तव्यो धर्मतो नृप॥ १२॥
अश्वमेधः सुलभश्च सर्वसम्भारयुक्ततः।
स च राजन् प्रकर्तव्यो यदि वा त्वं मतिस्तव॥ १३॥
एतद्धितं च राजेन्द्र तव राज्यस्य चैव हि।
यदि मन्यस्व धर्मज्ञ ततः कुरु यथेच्छसि॥ १४॥
📖 भावार्थ : भरत ने कहा: "राजसूय यज्ञ अत्यन्त भव्य है, पर इसमें बहुत समय और धन लगता है। यद्यपि रावण मारा गया, फिर भी बहुत से राक्षस पृथ्वी पर बचे हैं, जो बलवान और मायावी हैं। वे आपके भय से छिपे हैं। यदि यज्ञ के दौरान वे विघ्न उत्पन्न करें, तो बड़ी हानि होगी। अतः पहले उन राक्षसों का नाश करें, फिर यज्ञ करें। अश्वमेध यज्ञ भी सुलभ है और उसे बाद में किया जा सकता है। यह आपके और राज्य के हित में है।"

🧠 राम का भरत के प्रस्ताव पर विचार (श्लोक १५-२१)

॥ श्लोक १५-२१ ॥
रामः श्रुत्वा वचस्तस्य भरतस्य महात्मनः।
प्रीतिमानभवद्राजा सत्यमित्यब्रवीद्वचः॥ १५॥
युक्तमुक्तं त्वया वीर हितं मम च राष्ट्रकम्।
नूनं त्वं बुद्धिसम्पन्नो धर्मज्ञश्च विशेषतः॥ १६॥
यद्यप्यहं महाराज सर्वलोकनमस्कृतः।
तथापि ते वचः कुर्यां यस्माद्धर्मार्थसंहितम्॥ १७॥
राक्षसा हि बहवः सन्ति निहताश्चापरे मया।
तेषामवशिष्टा ये ते निहन्तव्या मया ध्रुवम्॥ १८॥
ततः पश्चान्महायज्ञं करिष्येऽहं न संशयः।
अश्वमेधं च राजेन्द्र यज्ञं वा त्वं यदिच्छसि॥ १९॥
भरत त्वं मम प्राणाः सर्वे भ्रातर एव च।
तव वाक्येन वर्तिष्ये हितं चैव करोम्यहम्॥ २०॥
एवमुक्त्वा तु रामस्तु परिष्वज्य च भरतम्।
प्रशशंस महाबाहुं बुद्धिज्ञानगुणान्वितम्॥ २१॥
📖 भावार्थ : भरत की बात सुनकर राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले: "हे वीर! तुमने हित की बात कही। तुम बुद्धि और धर्मज्ञान में निपुण हो। यद्यपि मैं सब लोकों द्वारा पूजित हूँ, फिर भी तुम्हारे धर्मार्थ वचनों का पालन करूँगा। बहुत से राक्षस बचे हैं, उनका नाश पहले करूँगा। फिर अश्वमेध या अन्य यज्ञ करूँगा। हे भरत! तुम मेरे प्राण हो। तुम्हारे वचन से चलूँगा।" यों कहकर राम ने भरत को गले लगाया और उनकी बुद्धि की प्रशंसा की।

⏸️ यज्ञ स्थगन और भविष्य की योजना (श्लोक २२-२७)

॥ श्लोक २२-२७ ॥
ततः स मन्त्रिणः सर्वानाहूय रघुनन्दनः।
उवाच भरतस्येदं वाक्यं हितमनुत्तमम्॥ २२॥
मन्त्रिणोऽपि प्रशशंसुर्भरतस्य महात्मनः।
बुद्धिं परमधर्मज्ञां रामस्य च नरेश्वर॥ २३॥
ततो रामः समादिदेश सेनां चतुरङ्गिणीम्।
राक्षसान् शोधयित्वा तु यज्ञं कर्तुं मतिर्मम॥ २४॥
भरतश्चाब्रवीद्रामं यदाज्ञापयसे प्रभो।
तत्करिष्यामहे सर्वे राक्षसानां क्षयाय वै॥ २५॥
एवं तयोः समाख्याय संवादं धर्मसंहितम्।
रामो यज्ञं न ववृते भरतस्य मते स्थितः॥ २६॥
इत्येतत् कथितं राजन् भरतस्य हितैषिणः।
रामेण च कृतं यत्तद्धर्मेण नृपसत्तम॥ २७॥
📖 भावार्थ : तब राम ने मन्त्रियों को बुलाकर भरत की बात बताई। सबने भरत की बुद्धि की प्रशंसा की। राम ने चतुरङ्गिणी सेना को राक्षसों के विनाश का आदेश दिया। भरत ने कहा, "हे प्रभो! आप जैसी आज्ञा करेंगे, वैसा ही करेंगे।" इस प्रकार भरत के हितैषी वचनों को मानकर राम ने राजसूय यज्ञ नहीं किया और धर्मपूर्वक राक्षसों के विनाश की योजना बनाई।

📌 सर्ग का उपसंहार (श्लोक २८-३२)

॥ श्लोक २८-३२ ॥
ततः प्रभृति रामस्तु राक्षसान् घोरदर्शनान्।
निहन्तुं सम्मुखो जातो धर्मबुद्ध्या नरेश्वरः॥ २८॥
भरतोऽपि महातेजा रामस्यानुमते स्थितः।
राक्षसानां वधे घोरे सहायत्वं चकार ह॥ २९॥
लक्ष्मणश्च महाबाहुः शत्रुघ्नश्च महाबलः।
रामस्य कार्यनिर्वाहे निरता धर्मनिश्चयाः॥ ३०॥
एवं संवादमाख्याय रामभरतयोः शुभम्।
अगस्त्यो विररामाथ रामः प्रीतो बभूव ह॥ ३१॥
इति श्रीवाल्मीकीये रामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चनवतितमः सर्गः॥ ३२॥
📖 भावार्थ : तब से राम ने राक्षसों के विनाश का संकल्प लिया। भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न ने उनका साथ दिया। अगस्त्य ने यह संवाद समाप्त किया और राम प्रसन्न हुए। इस प्रकार भरत की बुद्धिमत्ता और राम के लोकतांत्रिक स्वभाव का वर्णन हुआ।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧠 भरत की कूटनीति

भरत ने राजनीतिक समझदारी से राम को सही सलाह दी। यह दर्शाता है कि भरत केवल भक्त ही नहीं, बल्कि कुशल मन्त्री भी हैं।

👑 राम की लोकतांत्रिक सोच

राम ने भरत की बात को महत्व दिया, यह उनके खुले विचारों और परामर्श-प्रिय स्वभाव को दर्शाता है।

⚔️ राक्षसों का खतरा

रावण के मारे जाने के बाद भी राक्षसों का अस्तित्व बना हुआ था, जो बाद में राम के अश्वमेध यज्ञ के समय सामने आए।

🕉️ यज्ञों का महत्व

राम राजसूय यज्ञ के माध्यम से अपनी सार्वभौम सत्ता स्थापित करना चाहते थे, किन्तु भरत ने उचित समय की प्रतीक्षा करने की सलाह दी।

🎯 शिक्षा : राजा को सलाह-मशविरा करके ही निर्णय लेना चाहिए। समय और परिस्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चनवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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