उत्तर काण्ड अध्याय 94

राम द्वारा अगस्त्य से विदा लेना

अगस्त्य ऋषि से विभिन्न कथाएँ सुनने के बाद राम उनसे आज्ञा लेकर अयोध्या लौटने की तैयारी करते हैं। अगस्त्य उन्हें आशीर्वाद देते हैं और राजधर्म का उपदेश देते हैं।

विवरण

कई दिनों तक अगस्त्य ऋषि के आश्रम में रहकर राम ने अनेक पौराणिक कथाएँ सुनीं। अब वे अयोध्या लौटना चाहते थे। उन्होंने अगस्त्य से विदा माँगी। अगस्त्य ने उन्हें राजधर्म का उपदेश दिया – कैसे राजा को प्रजा के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए, कैसे दण्डनीति का पालन करना चाहिए, और कैसे धर्म से शासन करना चाहिए। उन्होंने राम को बताया कि तुम आदर्श राजा हो, और तुम्हारा यश सदा रहेगा। राम ने विनम्रतापूर्वक गुरु की बातें स्वीकार कीं और उन्हें प्रणाम किया। सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न ने भी गुरु से आशीर्वाद लिया। फिर सब अयोध्या के लिए प्रस्थान किए।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ९४

(राम द्वारा अगस्त्य से विदा लेना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुर्नवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अनेक दिनों तक अगस्त्य से कथाएँ सुनने के बाद राम अब अयोध्या लौटने की आज्ञा माँगते हैं। गुरु उन्हें राजधर्म का उपदेश देकर विदा करते हैं।

🙏 राम की विदा माँग (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्यमाश्रमे रामो वसन् बहुतिथाः कथाः।
श्रुत्वा धर्म्याश्च बहुशः प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ १॥
कदाचिद्राघवो राजा प्रणम्य मुनिपुंगवम्।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं विनयावनतो मुनिम्॥ २॥
भगवन् बहवो मासाः कथासु परमर्षिभिः।
अतीता मम देवर्षे त्वत्प्रसादात् सुखावहाः॥ ३॥
इदानीं द्रष्टुमिच्छामि अयोध्यां पितृमन्दिरम्।
प्रजाश्च मम राज्यं च भ्रातरो मातरस्तथा॥ ४॥
तदनुज्ञातुमर्हसि गमनाय महामुने।
त्वत्प्रसादेन धर्मज्ञ धर्ममूलमवाप्नुयाम्॥ ५॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य के आश्रम में राम ने बहुत दिनों तक धर्मयुक्त कथाएँ सुनीं। अब एक दिन उन्होंने मुनि को प्रणाम कर हाथ जोड़कर विनयपूर्वक कहा: "हे भगवन्! मैंने आपकी कृपा से अनेक मास सुखपूर्वक कथाएँ सुनीं। अब मैं अयोध्या, अपने पितृगृह, प्रजा, राज्य और भाइयों एवं माताओं को देखना चाहता हूँ। कृपया मुझे जाने की आज्ञा दीजिए। आपके प्रसाद से ही मैं धर्म का पालन कर सकूँगा।"

📜 अगस्त्य का राजधर्मोपदेश (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
अगस्त्यः प्राह धर्मात्मन् गच्छ राजन् यथासुखम्।
धर्मेण पालय महीं सत्येन च समन्वितः॥ ६॥
राज्ञो धर्मः परो नित्यं प्रजानां परिपालनम्।
यस्मिन् राज्ञि प्रजा नित्यं सुखिनस्तत्र राज्यकम्॥ ७॥
दण्डनीतिः प्रयोक्तव्या शत्रुषु च नरेश्वर।
मित्रेषु च यथान्यायं वर्तितव्यं नरोत्तम॥ ८॥
ब्राह्मणेषु विशेषेण पूजा कार्या नराधिप।
ते हि धर्मस्य मूलं च परं ब्रह्म सनातनम्॥ ९॥
एवं वर्तन् महाराज प्राप्स्यसे परमां गतिम्।
अयोध्यां च समृद्धां त्वं पालयिष्यसि नित्यशः॥ १०॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा: "हे धर्मात्मन्! तुम सुखपूर्वक जाओ। धर्म और सत्य से पृथ्वी का पालन करो। राजा का परम धर्म है प्रजा का पालन। जिस राज्य में प्रजा सुखी हो, वही सच्चा राज्य है। शत्रुओं पर दण्डनीति का प्रयोग करो और मित्रों से न्यायपूर्ण व्यवहार करो। विशेषकर ब्राह्मणों की पूजा करो, क्योंकि वे धर्म के मूल हैं और सनातन ब्रह्म के प्रतीक हैं। इस प्रकार आचरण करने से तुम परम गति को प्राप्त करोगे और अयोध्या का समृद्ध पालन करोगे।"

🙇 राम की विनम्र स्वीकारोक्ति (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
रामः प्रोवाच भगवन् यथाज्ञापयसे मुनि।
तथा करिष्ये सततं नातिक्रामामि ते वचः॥ ११॥
धन्योऽहं भवदाज्ञया राज्यं प्राप्स्यामि निर्मलम्।
यशश्च परमं लोके स्थापयिष्यामि शाश्वतम्॥ १२॥
अगस्त्यः प्राह सन्तुष्टो रामं धर्मभृतां वरम्।
अनुजानामि गच्छ त्वं सीतया भ्रातृभिः सह॥ १३॥
लक्ष्मणश्च भरतश्च शत्रुघ्नश्च महाबलाः।
त्वया सह गमिष्यन्ति मातरश्च यशस्विनीः॥ १४॥
अहं च सततं राजन् ध्यास्यामि त्वां कृताञ्जलिः।
यशो धर्मं च ते राजन् वर्धिष्णु च न संशयः॥ १५॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा: "हे भगवन्! आप जैसी आज्ञा करेंगे, वैसा ही करूँगा। आपके वचन का उल्लंघन नहीं करूँगा। आपकी आज्ञा से मैं निर्मल राज्य प्राप्त करूँगा और लोक में शाश्वत यश स्थापित करूँगा।" अगस्त्य ने प्रसन्न होकर कहा: "हे धर्मवत्सल! मैं तुम्हें विदा करता हूँ। सीता और भाइयों के साथ जाओ। लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और माताएँ तुम्हारे साथ जाएँगी। मैं सदैव तुम्हें ध्याऊँगा। तुम्हारा यश और धर्म निस्संदेह बढ़ेगा।"

🌸 सीता और भाइयों का आशीर्वाद ग्रहण (श्लोक १६-२०)

॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः सीता च वैदेही लक्ष्मणो भरतस्तथा।
शत्रुघ्नश्च महातेजा मुनिं नत्वा ययुर्मुदा॥ १६॥
अगस्त्यस्त्वब्रवीत्सीतां कल्याणि त्वं पतिव्रता।
रामस्य राज्ञो धर्मेण पालयिष्यसि मेदिनीम्॥ १७॥
लक्ष्मणं प्राह धर्मात्मन् भ्रातृभक्तिपरायण।
सेवस्व रामं सततं यथा पूर्वं तथा पुनः॥ १८॥
भरतं प्राह धर्मज्ञं राज्यं पालय राघव।
धर्मेण सह रामेण यथा राज्यं प्रशासितः॥ १९॥
शत्रुघ्नं च महात्मानमुवाच मुनिपुंगवः।
शुश्रूषस्व नरश्रेष्ठ भ्रातॄन् सर्वान् यथाविधि॥ २०॥
📖 भावार्थ : तब सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न ने भी मुनि को प्रणाम किया। अगस्त्य ने सीता से कहा: "हे कल्याणि! तुम पतिव्रता हो। राम के साथ धर्मपूर्वक राज्य का पालन करोगी।" लक्ष्मण से कहा: "हे धर्मात्मन्! तुम भ्रातृभक्त हो, पहले की भाँति सदा राम की सेवा करो।" भरत से कहा: "हे धर्मज्ञ! तुम राम के साथ मिलकर धर्म से राज्य का पालन करो।" शत्रुघ्न से कहा: "हे नरश्रेष्ठ! तुम सब भाइयों की यथोचित सेवा करो।"

🚩 प्रस्थान और आशीर्वाद (श्लोक २१-२५)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततः प्रस्थानमकरोद्रामः सीतासमन्वितः।
भ्रातृभिः सहितो वीरो मुनिं प्रदक्षिणीकृत्य॥ २१॥
अगस्त्योऽपि महातेजा ददौ तस्मै वरान् बहून्।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं यशो धर्मं च शाश्वतम्॥ २२॥
प्रयाते राघवे राज्ञि मुनिः स्वाश्रममाविशत्।
ध्यायन् रामस्य रूपाणि धर्मज्ञानि पुनः पुनः॥ २३॥
रामोऽपि सहितो भ्रात्रा प्रययौ पुरुषोत्तमः।
अयोध्यां प्रति धर्मात्मा प्रजानां हितकाम्यया॥ २४॥
इत्याख्यानं समाख्यातं रामागस्त्यसमागमम्।
पुण्यं धर्म्यं यशस्यं च सर्वपापप्रणाशनम्॥ २५॥
📖 भावार्थ : तब राम ने सीता और भाइयों के साथ मुनि की प्रदक्षिणा कर प्रस्थान किया। अगस्त्य ने उन्हें आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, यश और शाश्वत धर्म का आशीर्वाद दिया। राम के जाने पर मुनि अपने आश्रम में गए और राम के धर्ममय रूप का ध्यान करते रहे। राम भी प्रजा के हित के लिए अयोध्या की ओर प्रस्थान किए। इस प्रकार राम-अगस्त्य के समागम की यह पुण्य, धर्म्य और यशस्वी कथा कही गई, जो सब पापों का नाश करने वाली है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राजधर्म की शिक्षा

अगस्त्य द्वारा दिया गया राजधर्मोपदेश राम के आदर्श शासन की नींव रखता है। यह बताता है कि राजा का मुख्य कर्तव्य प्रजापालन है।

🧘 गुरु-शिष्य सम्बन्ध

राम की विनम्रता और गुरु के प्रति समर्पण आदर्श शिष्यत्व को दर्शाता है।

🙏 आशीर्वाद का महत्व

गुरु का आशीर्वाद राजा के लिए सफलता और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।

🚩 अयोध्या प्रत्यावर्तन

यह सर्ग राम के अयोध्या लौटने का प्रस्थान बिन्दु है, जहाँ वे पुनः राज्य सम्भालेंगे।

🎯 शिक्षा : गुरु की आज्ञा लेकर ही कार्य आरम्भ करना चाहिए। राजा को धर्म, सत्य और प्रजापालन में रत रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे चतुर्नवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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