उत्तर काण्ड अध्याय 90

श्वेत द्वारा अपनी कहानी सुनाना

राम के पूछने पर श्वेत नामक तपस्वी अपनी अद्भुत कहानी सुनाते हैं। वह बताते हैं कि कैसे त्रेता युग में उन्होंने एक विशाल निर्जन वन में तपस्या की, वहाँ एक मृत शरीर देखा, और फिर एक दिव्य रथ से उतरे एक देवता को उस मृत शरीर का मांस खाते देखा। इस घटना ने उन्हें अत्यंत विस्मित कर दिया।

विवरण

राम की जिज्ञासा पर श्वेत ऋषि ने अपनी तपस्या काल की एक विचित्र घटना का वर्णन किया। त्रेता युग की बात है, वे सौ योजन विस्तृत एक विशाल एवं निर्जन वन में घोर तपस्या कर रहे थे। एक दिन भ्रमण के क्रम में वे एक अत्यंत रमणीय सरोवर के पास पहुँचे, जो कमलों से सुशोभित था और जिसमें करण्डव, चक्रवाक आदि पक्षी क्रीड़ा कर रहे थे। उस सरोवर के समीप ही उन्होंने एक प्राचीन एवं पवित्र आश्रम देखा, किन्तु वहाँ कोई जीव-जंतु नहीं था। ग्रीष्म ऋतु थी, उन्होंने रात उसी आश्रम में बिताई। प्रातःकाल जब वे सरोवर के तट पर पहुँचे तो उन्होंने जल में एक स्थूल मृत शरीर देखा, जिसका एक अंग पीला पड़ गया था किन्तु सौन्दर्य नष्ट नहीं हुआ था। वे उसे बाहर निकालकर चिंतन में लीन हो गए। तभी आकाश से मन के समान तीव्रगामी, हंसों द्वारा खींचा जाने वाला एक दिव्य रथ प्रकट हुआ। उसमें एक दिव्य पुरुष थे, जिनकी सेवा में अनेक अप्सराएँ थीं—कोई गा रही थीं, कोई नृत्य कर रही थीं, कोई मृदंग और वीणा बजा रही थीं, और कोई चंद्रकिरणों के समान देदीप्यमान चँवर से उनका संवातन कर रही थीं। वह दिव्य पुरुष रथ से उतरे, उस मृत शरीर का मांस खाया, फिर जल में अवगाहन कर स्नान किया और पुनः रथ पर आरूढ़ होने लगे। यह अद्भुत एवं भयंकर दृश्य देख श्वेत ने उनसे प्रश्न किया, “आप कौन हैं? आपका रूप दिव्य है, फिर यह घृणित आहार क्यों?” इस प्रकार श्वेत ने राम को अपनी कथा सुनाई।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ९०

(श्वेत द्वारा अपनी कहानी सुनाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ नवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में वर्णित घटनाओं के पश्चात् राम की जिज्ञासा पर श्वेत नामक एक तपस्वी अपनी अद्भुत कहानी सुनाते हैं। यह कहानी त्रेता युग के एक रहस्यमय वन, एक दिव्य रथ और एक देवता के विचित्र कृत्य से जुड़ी है, जो श्रोताओं को विस्मय में डाल देती है।

🗣️ श्वेत का राम से संवाद और कथा का आरम्भ (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः कदाचित् काकुत्स्थ श्वेतो नाम महातपाः।
आजगाम महातेजा रामं द्रष्टुं नराधिपम्॥
तं दृष्ट्वा राघवो राजा पूजयामास धर्मवित्।
उपविष्टं सुखं पृष्ट्वा कुशलं तपसः शुभम्॥
किमिदं भगवन् ब्रूहि यद् वृत्तं तपसि स्थितः।
कौतूहलं हि मे मह्यं श्रोतुं त्वत्तः प्रवर्तते॥
इति पृष्टो महातेजा रामेण विदितात्मना।
श्वेतः परमधर्मज्ञः कथयामास तत् कथाम्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कदाचित् = किसी समय; काकुत्स्थ = हे ककुत्स्थवंशी; श्वेतः = श्वेत; नाम = नामक; महातपाः = महान तपस्वी; आजगाम = आए; महातेजा = महातेजस्वी; रामम् = राम को; द्रष्टुम् = देखने के लिए; नराधिपम् = राजा को; तम् = उनको; दृष्ट्वा = देखकर; राघवः = राघव; राजा = राजा; पूजयामास = पूजा की; धर्मवित् = धर्मज्ञ; उपविष्टम् = बैठे हुए; सुखम् = कुशल; पृष्ट्वा = पूछकर; कुशलम् = कुशलता; तपसः = तप की; शुभम् = शुभ; किम् = क्या; इदम् = यह; भगवन् = हे भगवन्; ब्रूहि = बताइए; यत् = जो; वृत्तम् = घटित हुआ; तपसि = तपस्या में; स्थितः = स्थित; कौतूहलम् = कौतूहल; हि = ही; मे = मुझे; मह्यम् = मुझे; श्रोतुम् = सुनने को; त्वत्तः = आपसे; प्रवर्तते = हो रहा है; इति = इस प्रकार; पृष्टः = पूछे गए; महातेजा = महातेजस्वी; रामेण = राम ने; विदितात्मना = आत्मज्ञानी; श्वेतः = श्वेत; परमधर्मज्ञः = परम धर्मज्ञ; कथयामास = कहा; तत् = वह; कथाम् = कथा।
📖 भावार्थ : हे काकुत्स्थ! उन दिनों की बात है, श्वेत नाम के एक महातपस्वी और महातेजस्वी ऋषि राजा राम के दर्शन करने आए। धर्म के ज्ञाता राजा राम ने उनका यथोचित सत्कार किया, आसन दिया और उनके तप की कुशलता पूछी। फिर राम ने विनयपूर्वक कहा, “हे भगवन्! आपने तपस्या में रहते हुए जो अनुभव किए हैं, कृपया मुझे सुनाइए। मेरे मन में यह सब सुनने की अत्यधिक उत्सुकता है।” आत्मज्ञानी राम के इस प्रकार पूछने पर परम धर्मज्ञ महातेजस्वी श्वेत ने अपनी अद्भुत कथा सुनानी आरम्भ की।

🌳 श्वेत का तप और उस निर्जन वन का वैभव (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
हे राम त्रेतायुगे घोरं वनमासीत् महातपः।
शतयोजनविस्तीर्णं निर्मनुष्यं निरामयम्॥
तस्मिन् वने पुरा राम श्वेतो नाम महातपाः।
अतप्यत तपो घोरं नियतो नियताशनः॥
एकदा तु भ्रमन् राम द्रष्टुं वनमनुत्तमम्।
अपश्यं रमणीयं वै सरः शोभासमन्वितम्॥
बहुयोजनविस्तीर्णं निर्मलं शिवशीतलम्।
पद्मैः कुमुदैः ख्यातं हंसकारण्डवैर्युतम्॥
तस्य तीरे मुनिश्रेष्ठ पुराणं ब्रह्मणः सदः।
अपश्यं निर्जनं रम्यं निर्मितं विश्वकर्मणा॥
📖 भावार्थ : श्वेत ने कहा, “हे राम! त्रेता युग में एक अत्यंत भयंकर और विशाल वन था, जो सौ योजन तक फैला हुआ था। वहाँ कोई मनुष्य नहीं रहता था और वह अत्यंत शांत था। उसी वन में मैं, श्वेत नामक तपस्वी, घोर तपस्या कर रहा था, संयमित आहार लेकर नियमपूर्वक रहता था। एक दिन उस अद्भुत वन का भ्रमण करने की इच्छा से मैं घूमने लगा। तब मैंने एक अत्यंत रमणीय सरोवर देखा, जो अपनी शोभा से सम्पन्न था। वह सरोवर कई योजनों तक फैला हुआ था, उसका जल निर्मल, शांत और शीतल था। वह कमलों और कुमुदों से सुशोभित था तथा उसमें हंस और करण्डव पक्षी क्रीड़ा कर रहे थे। उस सरोवर के तट पर, हे मुनिश्रेष्ठ! मैंने ब्रह्मा का एक प्राचीन, रमणीय एवं निर्जन आश्रम देखा, जो स्वयं विश्वकर्मा ने बनाया था।”

🌙 आश्रम में रात्रि-निवास और मृत शरीर का दर्शन (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तत्राहं न्यवसं राम ग्रीष्मकाले समाहितः।
तस्मिन्नाश्रमवर्ये तु नक्तं देवगणैर्वृते॥
प्रभाते तु समुत्थाय स्नातुं तीर्थमनुत्तमम्।
जगाम सरसस्तीरं यत्र श्रेष्ठं सरो महत्॥
तत्रापश्यं जले मग्नं मृतं देहं महाप्रभम्।
स्थूलं पीतैकदेशं तु नष्टशोभं न रूपतः॥
तमुद्धृत्य तु तीरस्थं चिन्तयन् स्थितवानहम्।
किमिदं कस्य वा देहः कथं वा मृतिमागतः॥
📖 भावार्थ : “हे राम! उस समय ग्रीष्म ऋतु थी। मैं उस आश्रम में, जो देवताओं के समान पवित्र था, रात्रि को रुका और एकाग्रचित्त होकर वहीं सो गया। प्रातःकाल उठकर स्नान के लिए उस उत्तम सरोवर के तट पर पहुँचा। वहाँ मैंने जल में डूबे हुए एक मृत शरीर को देखा। वह शरीर स्थूल था, उसका एक अंग पीला पड़ गया था, किन्तु उसकी सुन्दरता नष्ट नहीं हुई थी। उसे जल से बाहर निकालकर तट पर रखकर मैं चिंतन करने लगा—‘यह क्या है? यह किसका शरीर है? और यह मृत्यु को कैसे प्राप्त हुआ?’”

✨ दिव्य रथ का आगमन और देवता का अद्भुत कृत्य (श्लोक १६-२५)

॥ श्लोक १६-२० ॥
ततो ददर्श विमलं दिव्यं यानं मनोजवम्।
हंसैः सम्यग्वृतं दिव्यैर्गन्धर्वैरुपशोभितम्॥
तस्मिन् रथवरे दिव्यं पुरुषं चाप्सरोगणैः।
सेव्यमानं महाभागं दिव्याभरणभूषितम्॥
गायन्त्यः काश्चिदप्सर्यो नृत्यन्त्यश्चापरास्तथा।
वादयन्त्यश्च मृदङ्गान् वीणाश्चापि महास्वनान्॥
चामरैः सूर्यसङ्काशैश्चन्द्रांशुसदृशप्रभैः।
वीजयन्त्यः स्म तं देवं वराभरणभूषिताः॥
स तस्माद्रथमुख्यात्तु देवदेव उपागतः।
अवतीर्य तु तं देहं भक्षयामास राघव॥
📖 भावार्थ : “तभी मैंने आकाश में एक निर्मल, दिव्य और मन के समान वेगवान रथ देखा, जो दिव्य हंसों द्वारा खींचा जा रहा था और गन्धर्वों से सुशोभित था। उस उत्तम रथ में एक दिव्य पुरुष थे, जिनकी सेवा में अनेक अप्सराएँ थीं। वे दिव्य आभूषणों से विभूषित थे। कोई अप्सराएँ गा रही थीं, कोई नृत्य कर रही थीं, और कोई मृदंग एवं वीणा जैसे महानाद वाले वाद्य बजा रही थीं। कुछ अप्सराएँ, जो उत्तम आभूषणों से सजी थीं, सूर्य के समान देदीप्यमान और चन्द्रकिरणों के समान प्रभा वाले चँवरों से उन देवता का संवातन कर रही थीं। हे राघव! फिर वह देवताओं के देवता (या दिव्य पुरुष) उस उत्तम रथ से उतरे और उस मृत शरीर को खाने लगे।”
॥ श्लोक २१-२५ ॥
स भुक्त्वा तु यथाकामं मांसं तस्य महात्मनः।
जगाम सरसस्तीरे स्नानार्थं वरवारिणि॥
स्नात्वा च विधिवद् देवः पुनरायान्महाद्युतिः।
आरुरोक्षुस्तदा यानं दिव्यं हंससमायुतम्॥
तमहं दृष्ट्वा देवेशं यानारूढं समुत्सुकः।
अब्रुवं करुणं वाक्यं किमिदं भो दिवौकसाम्॥
को भवान् देवदेवेति रूपं दिव्यमिदं तव।
कथं भुङ्क्ते जगन्नाथ घृण्यमेतद् विगर्हितम्॥
📖 भावार्थ : “उन्होंने यथेच्छा उस महात्मा के शरीर का मांस भक्षण किया और फिर स्नान के लिए सरोवर के उस उत्तम जल में प्रवेश किया। विधिपूर्वक स्नान करके वे महाद्युति देवता पुनः रथ की ओर आए और उस दिव्य, हंसयुक्त रथ पर आरूढ़ होने लगे। उन्हें रथ पर चढ़ते देख मैं अत्यंत उत्सुक और विस्मित होकर उनसे करुण वाणी में बोला, ‘हे देवताओं में श्रेष्ठ! यह क्या है? आप कौन हैं? आपका यह दिव्य रूप है। हे जगन्नाथ! फिर आप इस घृणित और निन्दित आहार का भक्षण क्यों कर रहे हैं?’”

❓ श्वेत का प्रश्न और देवता का उत्तर (श्लोक २६-३०)

॥ श्लोक २६-३० ॥
त्वादृशैर्देवदेवैश्च नैवं भोक्तव्यमीदृशम्।
अतीव कौतुकं मह्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥
सौम्य त्वां परिपृच्छामि किमिदं भो दिवौकसाम्।
यदेतद् भक्षणं प्रोक्तं न मे रोचत ईदृशम्॥
इति पृष्टो मया राजन् देवदेवो महाद्युतिः।
प्रत्युवाच तदा वाक्यं शृण्वतो मे नराधिप॥
इति श्वेतवचः श्रुत्वा रामः परमधार्मिकः।
विस्मयं परमं गत्वा पप्रच्छानन्तरं कथाम्॥
📖 भावार्थ : “मैंने कहा, ‘आप जैसे देवताओं को ऐसा आहार नहीं करना चाहिए। हे सौम्य! मुझे अत्यधिक कौतुक हो रहा है, मैं सत्य जानना चाहता हूँ। मैं आपसे पूछता हूँ, हे देवताओं में श्रेष्ठ! यह क्या है? आपका यह भक्षण मुझे अच्छा नहीं लग रहा।’ हे राजन्! मेरे इस प्रकार पूछने पर उन महाद्युति देवदेव ने मुझे उत्तर दिया।” इतना कहकर श्वेत ऋषि रुक गए। परमधार्मिक राम ने यह अद्भुत कथा सुनकर अत्यधिक विस्मय प्राप्त किया और आगे की कथा पूछने लगे। (आगे के सर्गों में देवता का उत्तर वर्णित है।)

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

❓ रहस्य और जिज्ञासा

यह सर्ग एक अत्यंत रहस्यमय घटना प्रस्तुत करता है। एक देवता द्वारा मृत शरीर का भक्षण करना सुनकर राम और श्रोता विस्मय में पड़ जाते हैं। यह कथा आगे के सर्गों में इस रहस्य को उजागर करने का मार्ग प्रशस्त करती है, जो संभवतः कर्मफल और पुनर्जन्म के सिद्धांतों से जुड़ा है।

🌿 वन और तपस्या का महत्त्व

इस सर्ग में वन के सौन्दर्य, सरोवर की पवित्रता और प्राचीन आश्रम का वर्णन भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में तपस्या और एकान्तवास के महत्त्व को दर्शाता है। ऐसे स्थानों में ही साधकों को अलौकिक अनुभव होते हैं।

🙏 राम की जिज्ञासा

राम का ऋषि से कथा पूछना उनके ज्ञानप्रिय स्वभाव और धर्म के गूढ़ रहस्यों को जानने की उत्सुकता को दर्शाता है। वे केवल शासक नहीं, बल्कि एक जिज्ञासु और धर्मपरायण व्यक्ति भी हैं।

🔄 कथा का चक्र

यह सर्ग एक कथा के भीतर एक कथा (फ्रेम स्टोरी) का उदाहरण है। श्वेत राम को अपनी कथा सुनाते हैं, और उस कथा के भीतर एक देवता का रहस्यमय व्यवहार छिपा है, जिसका रहस्य आगे खुलेगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि संसार में अनेक रहस्य हैं जो हमारी समझ से परे हैं। धर्म के मार्ग पर चलते हुए भी हमें नई-नई जिज्ञासाओं और अनुभवों का सामना करना पड़ता है। सत्य की खोज कभी समाप्त नहीं होती।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे नवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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