उत्तर काण्ड अध्याय 87

राम का अपने राज्य का निरीक्षण दौरा

राम यह जानने के लिए कि उनके राज्य में कहीं कोई अधर्म तो नहीं हो रहा, प्रजा के बीच गुप्त रूप से भ्रमण करते हैं। इस दौरान उन्हें अपने राज्य की वास्तविक स्थिति और प्रजा के सुख-दुःख का पता चलता है।

विवरण

नारद के उपदेश से तो राम को शांति मिली, लेकिन ब्राह्मण के पुत्र की मृत्यु का प्रश्न अब भी उनके मन में गहराई से बसा हुआ था। उन्हें यह भय सता रहा था कि कहीं सच में उनके राज्य में कोई ऐसा अधर्म तो नहीं हो रहा, जिसके कारण यह दुर्घटना हुई। इस जिज्ञासा और अपने राज्य की वास्तविक स्थिति को जानने की इच्छा से उन्होंने अपने राज्य का निरीक्षण दौरा करने का निर्णय लिया। वे अकेले ही, बिना किसी राजसी ठाठ-बाठ के, साधारण वेश में नगर और राज्य के विभिन्न भागों में घूमने निकल पड़े। इस गुप्त भ्रमण का उद्देश्य यह देखना था कि कहीं प्रजा में कोई असंतोष तो नहीं है, कहीं उनके मंत्री या अधिकारी अन्याय तो नहीं कर रहे, और सबसे महत्वपूर्ण यह कि कहीं उनके राज्य में कोई ऐसा व्यक्ति तो नहीं जो धर्म के विरुद्ध आचरण कर रहा हो। इस भ्रमण के दौरान उन्होंने प्रजा की सुख-सुविधाओं, उनकी समस्याओं और उनके नैतिक स्तर को बहुत करीब से देखा। उन्होंने पाया कि अधिकांश प्रजा सुखी और धर्मपरायण है। कहीं कोई बड़ा असंतोष या अन्याय नहीं दिखा। इससे उन्हें कुछ संतोष तो हुआ, लेकिन ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु का रहस्य अभी भी बना रहा। यह सर्ग राम के एक आदर्श शासक होने का पुनः प्रमाण देता है, जो केवल महल में बैठकर रिपोर्ट सुनने से संतुष्ट नहीं होते, बल्कि स्वयं जनता के बीच जाकर उनकी दशा का जायजा लेते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ८७

(राम का अपने राज्य का निरीक्षण दौरा)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्ताशीतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : नारद के उपदेश के बाद भी राम के मन में ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु का रहस्य और राज्य के प्रति चिंता बनी रही। इस चिंता से प्रेरित होकर वे स्वयं अपने राज्य का निरीक्षण करने का निर्णय लेते हैं।

👑 राम का निरीक्षण का निश्चय (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामो महातेजाः संप्राप्तो धर्मनिश्चयम्।
चकार मतिं धर्मज्ञो राज्यनिर्यापणं प्रति॥
कथं नु मम राज्येऽस्मिन्प्रजाः सन्ति सुखोषिताः।
न चापि धर्मलोपः स्यादिति चिन्तापरोऽभवत्॥
स रात्रौ रजनीनाथे प्रवृत्ते सुमहोदये।
एक एव महातेजा निर्ययौ नगरात्तदा॥
स गत्वा विविधान्देशान्ग्रामान्नगरमालिनः।
ददर्श विविधान्लोकांश्चरन्वै स महीपतिः॥
न चापश्यत्प्रजाः काश्चिद्दुःखिताः शोककर्शिताः।
सर्वाः सुखसमायुक्ता धर्मे चैव व्यवस्थिताः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महातेजाः = महान तेजस्वी; संप्राप्तः = प्राप्त करके; धर्मनिश्चयम् = धर्म का निश्चय; चकार = किया; मतिम् = विचार; धर्मज्ञः = धर्म के ज्ञाता; राज्यनिर्यापणम् = राज्य के संचालन के; प्रति = विषय में; कथम् = कैसे; नु = निश्चय ही; मम = मेरे; राज्ये = राज्य में; अस्मिन् = इस; प्रजाः = प्रजा; सन्ति = हैं; सुखोषिताः = सुख से रहने वाली; न = नहीं; च = और; अपि = भी; धर्मलोपः = धर्म का लोप; स्यात् = होना चाहिए; इति = ऐसा; चिन्तापरः = चिंता में डूबे; अभवत् = हो गए; सः = वे; रात्रौ = रात में; रजनीनाथे = चन्द्रमा के; प्रवृत्ते = उदय होने पर; सुमहोदये = बड़े उदय के समय; एकः = अकेले; एव = ही; महातेजाः = महान तेजस्वी; निर्ययौ = निकल गए; नगरात् = नगर से; तदा = तब; सः = वे; गत्वा = जाकर; विविधान् = अनेक प्रकार के; देशान् = देशों में; ग्रामान् = गाँवों में; नगरमालिनः = नगरों की माला से युक्त; ददर्श = देखा; विविधान् = अनेक प्रकार के; लोकान् = लोगों को; चरन् = भ्रमण करते हुए; वै = निश्चय; सः = वे; महीपतिः = राजा; न = नहीं; च = और; अपश्यत् = देखा; प्रजाः = प्रजा को; काश्चित् = किसी भी; दुःखिताः = दुःखी; शोककर्शिताः = शोक से कृश; सर्वाः = सभी; सुखसमायुक्ताः = सुख से युक्त; धर्मे = धर्म में; च = और; एव = ही; व्यवस्थिताः = स्थित।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात्, महातेजस्वी धर्मज्ञ राम ने धर्म के बारे में पूर्ण निश्चय प्राप्त कर लिया था, फिर भी वे अपने राज्य के संचालन के विषय में गहन चिंतन करने लगे। उनके मन में लगातार यह विचार उठ रहा था कि, “कैसे पता लगाया जाए कि मेरे इस राज्य में सभी प्रजाजन वास्तव में सुखपूर्वक रह रहे हैं? और कहीं मेरे राज्य में धर्म का कोई लोप तो नहीं हो रहा?” यह चिंता उन्हें व्याकुल किए हुए थी। केवल रिपोर्टों और सूचनाओं के भरोसे न रहकर, उन्होंने स्वयं जाकर देखने का निर्णय लिया। एक रात, जब चन्द्रमा का उदय हुआ, उस प्रकाशमयी रात्रि में वे महातेजस्वी राजा बिना किसी को बताए, अकेले ही नगर से बाहर निकल पड़े। उन्होंने साधारण वेश धारण किया था, ताकि कोई उन्हें पहचान न सके। वे राज्य के विभिन्न प्रदेशों, गाँवों और नगरों में घूमते रहे। इस भ्रमण के दौरान उन्होंने अलग-अलग प्रकार के लोगों को देखा, उनके जीवन-स्तर और सुख-दुःख को परखा। उनकी इस निरीक्षण यात्रा का उद्देश्य महज औपचारिकता नहीं था, बल्कि वे प्रजा की वास्तविक स्थिति को जानना चाहते थे। राजा के रूप में यह उनका परम कर्तव्य था। घूमते-घूमते उन्होंने पाया कि उनके राज्य में कोई भी प्रजा दुःखी या शोकाकुल नहीं है। सभी लोग सुख और समृद्धि से युक्त थे और धर्म के मार्ग पर ही स्थिर थे। इससे राम को अत्यधिक संतोष हुआ कि उनके राज्य का अधिकांश भाग धर्म और सुख से परिपूर्ण है। यह दृश्य उनके लिए अत्यंत सुखद था और उनके कठोर परिश्रम की सार्थकता सिद्ध कर रहा था। इसने उनके मन में व्याप्त एक बड़ी चिंता को कुछ हद तक कम किया।

🏞️ नगर और ग्रामों का भ्रमण (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
स चचार महातेजा रामो राजीवलोचनः।
ग्रामेषु नगरेष्वेव गुप्तवेषः प्रतापवान्॥
क्वचित्कृषीवलान्पश्यन्क्वचिद्गोपालकानपि।
क्वचिद्वणिक्समूहांश्च क्वचित्सिद्धान्महीतले॥
क्वचिच्छ्रोत्रियमुख्यांश्च ब्राह्मणान्वेदपारगान्।
क्वचिद्राजभटान्वीरान्क्वचित्क्षत्रियपुंगवान्॥
ते सर्वे सुखिनो दृष्टाः प्रजा धर्मपरायणाः।
रामेण सुमहातेजा नगरे ग्राम एव च॥
न तत्र कश्चिद्दुःखार्तो न च व्याधिप्रपीडितः।
न चैव शोकसंतप्तो न च धर्मविवर्जितः॥
📖 भावार्थ : वे महातेजस्वी, प्रतापी और राजीवलोचन (कमल-नयन) राम ने अपना वेश बदलकर (गुप्तवेष धारण करके) गाँवों और नगरों में भ्रमण किया। वे कहीं किसानों (कृषीवलों) को खेतों में काम करते देख रहे थे, तो कहीं ग्वालों (गोपालकों) को अपने पशुओं के साथ देख रहे थे। कहीं वे व्यापारियों (वणिकों) के समूहों को अपना कार्य करते देख रहे थे, तो कहीं पृथ्वी पर सिद्ध पुरुषों को तपस्या करते देख रहे थे। कहीं वे वेदों के पारंगत विद्वान ब्राह्मणों को वेदाध्ययन या यज्ञ करते देख रहे थे, तो कहीं वीर राजभटों (सैनिकों) को और क्षत्रियों में श्रेष्ठ पुरुषों को अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते देख रहे थे। राम ने नगर और ग्राम सभी जगह यही देखा कि सारी प्रजा सुखी थी और धर्मपरायण थी। उनके राज्य में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं था जो दुःख से आर्त हो, या किसी रोग से पीड़ित हो। कोई भी शोक से संतप्त नहीं था और न ही कोई धर्म से विमुख था। यह वर्णन राम के आदर्श राज्य, जिसे रामराज्य कहा जाता है, का सजीव चित्रण करता है। रामराज्य की कल्पना ही ऐसे राज्य के रूप में की जाती है जहाँ प्रजा सुखी, स्वस्थ, धर्मपरायण और निरोग हो। राम का यह निरीक्षण इस बात की पुष्टि करता है कि उनके राज्य में सचमुच ऐसी ही स्थिति थी। वे विभिन्न वर्गों के लोगों की जीवनशैली को बहुत करीब से देख रहे थे। किसान से लेकर व्यापारी तक, ब्राह्मण से लेकर क्षत्रिय तक, सभी अपने-अपने कर्म में लगे हुए थे और सभी सुखी थे। यह एक ऐसे संतुलित और समृद्ध समाज का सूचक है जहाँ सभी वर्गों का सामंजस्यपूर्ण विकास हो रहा था। राम के इस अवलोकन ने उनके मन में यह दृढ़ विश्वास पैदा किया कि उनके राज्य की नींव बहुत मजबूत है और प्रजा उनसे संतुष्ट है।

😊 प्रजा की सुख-सुविधाओं का वर्णन (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
वाप्यः पूर्णाः सदा तत्र प्रवहन्ति नदास्तथा।
उद्यानानि च रम्याणि सर्वर्तुफलपुष्पिताः॥
वणिजो लाभमिच्छन्ति कृषीवलास्तथा सुखम्।
गोपाला बहुलं क्षीरं याचन्ते च द्विजातयः॥
धर्मे रता महात्मानः सत्ये चैव समाहिताः।
दाने यज्ञे च निरता न च वञ्चकतां गताः॥
न तत्र चौरभी राजन्न दस्युर्न च दुष्टता।
सर्वे धर्मपरा नित्यं स्वे स्वे कर्मणि निर्मलाः॥
एवं दृष्ट्वा महातेजा रामः परमधार्मिकः।
प्रहृष्टवदनो राजा पुनरायान्महापुरीम्॥
📖 भावार्थ : राम ने यह भी देखा कि उनके राज्य में सभी बावड़ियाँ (वापियाँ) और तालाब सदा पानी से भरे रहते थे और नदियाँ निरंतर प्रवाहित होती रहती थीं। चारों ओर रमणीय उद्यान थे, जो सभी ऋतुओं में फलों और फूलों से लदे रहते थे। इससे वहाँ की हरियाली और सौंदर्य अद्वितीय था। राम ने प्रजा के विभिन्न वर्गों की आकांक्षाओं को भी जाना। व्यापारी (वणिक) लाभ की इच्छा रखते थे, किसान (कृषीवल) सुख की कामना करते थे, ग्वाले (गोपाल) अधिक दूध प्राप्त करना चाहते थे और ब्राह्मण (द्विजाति) यज्ञ आदि के लिए दान की याचना करते थे। लेकिन यह सब धर्म के दायरे में ही हो रहा था। सभी लोग महात्मा थे, धर्म में रत थे और सत्य में समाहित थे। वे दान और यज्ञ में निरत थे, और उनमें छल-कपट (वंचकता) बिल्कुल नहीं थी। राज्य में कहीं भी चोर, डाकू या किसी प्रकार की दुष्टता नहीं थी। सभी लोग नित्य धर्मपरायण थे और अपने-अपने निर्धारित कर्मों में निर्मल भाव से लगे हुए थे। इस प्रकार राजा राम ने अपने राज्य की सर्वांगीण समृद्धि और सुखद स्थिति को अपनी आँखों से देख लिया। यह केवल भौतिक सुख-सुविधाओं का ही वर्णन नहीं है, बल्कि इससे भी बढ़कर यहाँ के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान का चित्रण है। प्रकृति का सौंदर्य और समृद्धि यह दर्शाती है कि राज्य का पर्यावरण भी संतुलित और स्वस्थ है। विभिन्न वर्गों की इच्छाएँ उनके स्वाभाविक और धर्मसम्मत कर्मों से जुड़ी हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य में अपराध और दुष्टता का पूर्ण अभाव है, जो एक आदर्श समाज की पहचान है। यह सब देखकर परम धार्मिक और महातेजस्वी राम का मुख प्रसन्नता से खिल उठा। वे संतुष्ट होकर पुनः अपनी राजधानी अयोध्या लौट आए। यह निरीक्षण दौरा उनके लिए एक संतोषजनक अनुभव था, जिसने उनके राज्य और उनके शासन के प्रति उनके विश्वास को और मजबूत किया।

😌 राम का संतोष और अयोध्या लौटना (श्लोक १६-२५)

॥ श्लोक १६-२० ॥
स दृष्ट्वा सर्वमव्यग्रं धर्मेण पृथिवीमिमाम्।
पालितां राजवर्येण प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥
विवेश नगरीं रम्यामयोध्यां पापवर्जितः।
स्तूयमानः सुरैः सर्वैर्देवर्षिभिरलंकृताम्॥
ततः प्रविश्य भवनं सीतया सह राघवः।
रेमे राजर्षिशार्दूलो धर्मेण सहितः सुखी॥
न तु तस्य मनः क्षेमं लेभे तद्बालमृत्युतः।
चिन्तयामास तद्रामो ब्राह्मणस्यात्मजं प्रति॥
कथं मे राज्यमासाद्य बालो म्रियेत कश्चन।
अधर्मो यदि वा कश्चिद्धर्मो वा यदि वा भवेत्॥
📖 भावार्थ : राजाओं में श्रेष्ठ राम ने यह देख लिया कि उनके द्वारा धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का पालन किए जाने के कारण सब कुछ सुचारु और व्यवस्थित रूप से चल रहा है। यह देखकर उनका अंतरात्मा अत्यंत प्रसन्न और हर्षित हो गया। फिर वे पापरहित होकर अपनी रमणीय नगरी अयोध्या में प्रवेश किए। यह नगरी समस्त देवताओं और देवर्षियों द्वारा स्तुत्य और अलंकृत थी। इसके बाद राघव (राम) ने अपने महल में प्रवेश किया और सीता के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। वे राजर्षियों में श्रेष्ठ, धर्मपरायण और अत्यंत सुखी थे। लेकिन उनके मन को पूर्ण शांति और संतोष (क्षेम) नहीं मिल पा रहा था। उन्हें उस ब्राह्मण के पुत्र की असामयिक मृत्यु की घटना बार-बार सताती रहती थी। वे उसी के बारे में चिंता करते रहते थे। उनके मन में लगातार यह प्रश्न उठता रहता था कि “मेरे इस धर्मपरायण राज्य में आखिर कैसे किसी बालक की मृत्यु हो सकती है? इसमें निश्चय ही कोई न कोई अधर्म का कारण होगा, या फिर कोई धर्म का ऐसा विचित्र स्वरूप होगा जो मैं नहीं जानता?” यह चिंता राम के मन में एक कीड़े की तरह घर कर गई थी। यहाँ एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राम ने अपने राज्य को सर्वथा सुखी और समृद्ध पाया था, प्रजा धर्मपरायण थी, अपराध नहीं थे, फिर भी एक छोटी सी घटना उनके मन को अशांत कर रही थी। यह उनके चरित्र की गहराई को दर्शाता है। एक आदर्श राजा के लिए प्रजा का एक भी बालक महत्वपूर्ण है। उसकी असामयिक मृत्यु राज्य के लिए एक कलंक की तरह है। राम की यह चिंता उनकी राजनीतिक और नैतिक संवेदनशीलता का परिचायक है। वे केवल बहुमत की खुशी से संतुष्ट नहीं होना चाहते, बल्कि प्रत्येक प्रजाजन के कल्याण की कामना करते हैं। यही उन्हें एक सामान्य शासक से ऊपर उठाकर एक मर्यादा पुरुषोत्तम बनाता है।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
तस्य चिन्तयमानस्य धर्ममर्थं च राघवः।
अन्तरं नाधिगच्छति स चिन्तापरिपन्थितः॥
एवं रामो महातेजाः प्रजाः परिचरन्सदा।
धर्मेण पालयामास राज्यं परमधार्मिकः॥
इत्येतदाख्यानमहं पुण्यं रामायणे शुभे।
उत्तरे चरिते रम्ये निरीक्षणमुदाहृतम्॥
📖 भावार्थ : राघव राम इसी चिंता में डूबे रहते थे। वे धर्म और अर्थ के विषय में मनन करते हुए भी उस घटना के पीछे छिपे रहस्य (अंतर) को नहीं समझ पा रहे थे। यह चिंता उनके मार्ग में एक बाधा (परिपन्थी) के समान खड़ी हो गई थी। उन्हें इस बात का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिल पा रहा था कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। इस प्रकार, महातेजस्वी और परमधार्मिक राम सदैव अपनी प्रजा की सेवा (परिचर्या) करते हुए, धर्मपूर्वक राज्य का पालन करते रहे। उनके राज्य की यह निरीक्षण यात्रा और उसके बाद भी बनी रही यह चिंता, उनके राज्य-संचालन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह सर्ग हमें बताता है कि एक आदर्श राजा का कार्य केवल राज्य का संचालन करना ही नहीं, बल्कि प्रजा के हर दुःख को अपना दुःख मानकर उसके समाधान के लिए निरंतर चिंतन करना भी है। राम की यह चिंता उनके आगामी कार्यों की नींव रखती है, जिसका वर्णन अगले सर्गों में मिलेगा। वे इसी रहस्य को सुलझाने के लिए आगे बढ़ेंगे। यह सर्ग इस बात का भी प्रतीक है कि बाहरी सफलता और समृद्धि के बावजूद, यदि आंतरिक चिंता और प्रश्न बने रहें तो मन को शांति नहीं मिलती। राम की यह अशांति उनके मानवीय स्वरूप को और अधिक मार्मिक बना देती है। वे केवल एक देव-तुल्य राजा नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे संवेदनशील मनुष्य भी हैं जो प्रजा के एक-एक दुःख से व्यथित हो जाते हैं। इसी के साथ इस सर्ग का समापन होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 आदर्श राजा के गुण

यह सर्ग एक आदर्श राजा के आवश्यक गुणों को उजागर करता है: जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को स्वयं देखना, केवल रिपोर्टों पर निर्भर न रहना, और प्रजा के सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख समझना। राम का यह व्यवहार उन्हें एक कुशल और संवेदनशील शासक सिद्ध करता है।

🏞️ रामराज्य की अवधारणा

इस सर्ग में रामराज्य की झलक मिलती है। एक ऐसा राज्य जहाँ प्रकृति समृद्ध है, प्रजा के सभी वर्ग सुखी और धर्मपरायण हैं, और अपराध का नामोनिशान नहीं है। यह एक आदर्श समाज का सजीव चित्रण है, जो हर शासक का स्वप्न होता है।

🧐 चिंतनशील शासक

बाहरी समृद्धि के बावजूद राम की आंतरिक चिंता उनके गहन चिंतनशील स्वभाव को दर्शाती है। एक सच्चा शासक वही है जो सतही सफलता से संतुष्ट न होकर, व्यवस्था में कहीं कोई खामी तो नहीं, इसकी गहराई से पड़ताल करता रहे।

⚖️ धर्म का रहस्य

यह सर्ग धर्म के उस गूढ़ रहस्य की ओर भी संकेत करता है जो राम को अशांत कर रहा है। यह केवल एक घटना नहीं है, बल्कि धर्म और अधर्म के उस जटिल जाल का प्रतीक है, जिसे समझना एक आदर्श राजा के लिए भी आवश्यक हो जाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि नेतृत्व का अर्थ केवल आदेश देना नहीं, बल्कि जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझना भी है। बाहरी सफलता से संतुष्ट न होकर, व्यवस्था में सुधार के लिए निरंतर चिंतन और प्रयास करते रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे सप्ताशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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