उत्तर काण्ड अध्याय 86

नारद का उपदेश

राम के राज्य में एक दुर्घटना घटित होती है जिससे वे अत्यधिक दुःखी हो जाते हैं। तब देवर्षि नारद वहां आते हैं और उन्हें धैर्य बंधाते हुए मृत्यु के रहस्य और काल के प्रभाव का उपदेश देते हैं।

विवरण

एक समय की बात है, अयोध्या के सुखद राज्य में एक अप्रिय घटना घटी। एक ब्राह्मण का पुत्र समय से पूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हो गया। यह देखकर वह ब्राह्मण अत्यंत शोकाकुल हो गया और राम के द्वार पर ले जाकर उन्हें ही उसकी मृत्यु का कारण ठहराने लगा, यह आरोप लगाते हुए कि राज्य में कोई अधर्म के कारण ही ऐसा हुआ है। यह सुनकर राम अत्यंत व्याकुल और दुःखी हो गए। उन्हें यह चिंता सताने लगी कि कहीं उनके राज्य में कोई अधर्म तो नहीं हो रहा। तभी वहां देवर्षि नारद प्रकट हुए। उन्होंने राम को शोकाकुल देखकर उन्हें समझाया कि यह आपका या राज्य का दोष नहीं है, बल्कि यह तो काल का अपरिहार्य नियम है। नारद जी ने मृत्यु के रहस्य, उसकी अनिवार्यता और काल के प्रभाव पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने राम को बताया कि सभी प्राणियों का अंत निश्चित है, इसलिए इस प्राकृतिक नियम के लिए स्वयं को दोषी नहीं ठहराना चाहिए। उनके इस उपदेश से राम को धैर्य और ज्ञान की प्राप्ति हुई।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ८६

(नारद का उपदेश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षडशीतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : इस सर्ग में एक घटना घटती है जो राम के हृदय को गहरे आघात से भर देती है। एक ब्राह्मण के पुत्र की असामयिक मृत्यु के आरोप से व्यथित राम को देवर्षि नारद जीवन और मृत्यु के गूढ़ रहस्यों का उपदेश देते हैं।

😢 ब्राह्मण का शोक और आरोप (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः कस्मिंश्चिदव्यग्रे काले राजा यदृच्छया।
शुश्राव ब्राह्मणं कंचिद्रुदन्तं पुत्रगृद्धिनम्॥
हतपुत्रं महाशोकं द्वारि वैवस्वतस्य च।
विलपन्तं सुसंरब्धं रामं प्रति सुदुःखितम्॥
त्वया राजन्निहन्तव्यो बालो मम न संशयः।
न हि ते विषये राजन्कश्चिद्धर्मं विवर्तते॥
इत्यारोप्य वचो घोरं रामे तस्मिन्नराधिपे।
रुरोद ब्राह्मणो दुःखाद्भृशमश्रूणि मुञ्चन्॥
तच्छ्रुत्वा राघवः सर्वं परमव्यथितोऽभवत्।
किमिदं किल नो राज्ये धर्महानिर्भवेदिति॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कस्मिंश्चित् = किसी; अव्यग्रे = निर्दोष काल में; काले = समय में; राजा = राजा; यदृच्छया = अकस्मात्; शुश्राव = सुना; ब्राह्मणम् = ब्राह्मण को; कञ्चित् = किसी; रुदन्तम् = रोते हुए; पुत्रगृद्धिनम् = पुत्र के लिए व्याकुल; हतपुत्रम् = मृत पुत्र वाला; महाशोकम् = महान शोक से भरा; द्वारि = द्वार पर; वैवस्वतस्य = यमराज के; च = और; विलपन्तम् = विलाप करते हुए; सुसंरब्धम् = अत्यधिक क्रोधित; रामम् = राम के प्रति; सुदुःखितम् = अत्यन्त दुःखी; त्वया = आपके द्वारा; राजन् = हे राजन्; निहन्तव्यः = मारा गया है; बालः = बालक; मम = मेरा; न संशयः = इसमें संशय नहीं; हि = क्योंकि; ते = आपके; विषये = राज्य में; राजन् = हे राजन्; कश्चित् = कोई भी; धर्मम् = धर्म से; विवर्तते = विमुख होता है; इति = इस प्रकार; आरोप्य = आरोप लगाकर; वचः = वचन; घोरम् = भयानक; रामे = राम पर; तस्मिन् = उस; नराधिपे = नरेश पर; रुरोद = रोने लगा; ब्राह्मणः = ब्राह्मण; दुःखात् = दुःख से; भृशम् = अत्यधिक; अश्रूणि = आँसू; मुञ्चन् = बहाते हुए; तत् = वह; श्रुत्वा = सुनकर; राघवः = रघुकुल के राजा राम; सर्वम् = सब कुछ; परमव्यथितः = अत्यधिक व्यथित; अभवत् = हो गए; किम् = क्या; इदम् = यह; किल = निश्चय ही; नः = हमारे; राज्ये = राज्य में; धर्महानिः = धर्म की हानि; भवेत् = हो गई; इति = ऐसा सोचकर।
📖 भावार्थ : उसके बाद एक दिन की बात है। राजा राम ने अचानक सुना कि एक ब्राह्मण, जिसका पुत्र मर गया था, यमराज के द्वार पर (या महल के द्वार पर) बैठा करुण विलाप कर रहा है। वह अत्यधिक शोक और क्रोध से भरा हुआ था और अपने पुत्र की मृत्यु के लिए सीधे राम पर ही दोषारोपण करने लगा। उसने कहा, “हे राजन्! इसमें कोई संदेह नहीं कि आपने ही मेरे बालक का वध किया है। आपके राज्य में तो कोई भी धर्म से विमुख नहीं हो सकता, लेकिन यह घटना सिद्ध करती है कि कहीं न कहीं कोई अधर्म अवश्य ही हुआ है।” इस प्रकार राम पर यह भयानक आरोप लगाकर वह ब्राह्मण दुःख के मारे आँसू बहाता हुआ विलाप करने लगा। जब राम ने ब्राह्मण की यह बात सुनी, तो वे अत्यधिक व्यथित हो गए। उनके मन में तुरंत यह विचार आया कि निश्चय ही मेरे राज्य में कहीं न कहीं धर्म की हानि हुई है, जिसके कारण यह अनर्थ हुआ। राम की यह व्यथा उनके राजधर्म के प्रति अटूट निष्ठा और प्रजा के प्रति गहरी संवेदनशीलता को दर्शाती है। वे स्वयं को प्रजा का पिता मानते थे और प्रजा के कष्ट को अपना निजी कष्ट समझते थे। इसलिए ब्राह्मण के शोक और आरोप ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। उन्हें तुरंत लगा कि कहीं उनसे या उनके राज्य के किसी अधिकारी से कोई अनजाना पाप तो नहीं हुआ, जिसका यह दंड उन्हें मिल रहा है। यह घटना राम के चरित्र की एक महत्वपूर्ण परत को उजागर करती है, जहाँ एक आदर्श राजा होने का भार और उससे उपजी ज़िम्मेदारी उन्हें एक साधारण मनुष्य की भाँति दुःखी और चिंतित कर देती है।

😔 राम का शोक और व्याकुलता (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
स चिन्तयामास तदा धर्मराजो महामतिः।
कथं नु मम राज्येऽस्मिन्बालो म्रियेत कश्चन॥
निरीक्ष्य धर्ममेवैकं सदा यत्नेन पालितम्।
धर्मो हि बलवान्राज्ञां राज्यं पालयते सदा॥
नूनं मयापराद्धं किं नियोगाद्वापि केनचित्।
यद्बालो म्रियते मह्यं राज्येऽस्मिन्निति चिन्तयन्॥
विवर्णवदनो दीनो हतप्रभ इवाभवत्।
न केनचित्समाभाष्य जगाम मनसा बहु॥
तमेव ध्यायते रामं सीता लक्ष्मणपूर्वजाः।
व्यथिता विविधैर्दुःखैः परिवार्योपतस्थिरे॥
📖 भावार्थ : तब वे महामति धर्मराज राम गहरी चिंता में डूब गए। वे सोचने लगे, “मेरे इस धर्मपरायण राज्य में आखिर कैसे किसी बालक की मृत्यु हो सकती है? मैंने तो सदा पूरे यत्न से केवल धर्म का ही पालन किया है।” राम का यह सोचना स्वाभाविक था क्योंकि उनका दृढ़ विश्वास था कि राजा के धर्मपालन से ही प्रजा की रक्षा होती है। उनके मन में यह विचार बार-बार आ रहा था कि “निश्चय ही मुझसे या मेरे किसी आदेश से कोई अपराध हुआ है, जिसके कारण मेरे राज्य में किसी बालक की असामयिक मृत्यु हो रही है।” इसी चिंता में डूबे हुए उनका चेहरा पीला पड़ गया और वे दीन-हीन से दिखने लगे, मानो उनकी सारी प्रभा समाप्त हो गई हो। वे किसी से बातचीत नहीं कर रहे थे और अपने मन-ही-मन अनेक प्रकार के विचार कर रहे थे। राम को इस प्रकार शोकाकुल और चिंतित देखकर, सीता जी और लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न आदि सभी भाई अत्यधिक व्यथित हो गए। वे सब उनके पास आकर खड़े हो गए और उनकी इस दयनीय दशा को देखकर स्वयं भी शोक से भर गए। यह दृश्य अत्यंत मार्मिक है। एक ओर जहाँ राम का यह शोक उनके कर्तव्यनिष्ठ और संवेदनशील राजा होने का परिचय देता है, वहीं दूसरी ओर परिवारजनों की यह व्यथा उनके पारस्परिक प्रेम और एक-दूसरे के दुःख में साझीदार होने का भाव प्रकट करती है। राम के इस अवसाद ने पूरे राजमहल को शोक के सागर में डुबो दिया था। सीता और भाईगण राम के इस दुःख का कारण नहीं जानते थे, केवल इतना जानते थे कि राम बहुत दुःखी हैं, और उनका यह दुःख ही उनके लिए सबसे बड़ा दुःख बन गया था।

🧘 नारद का आगमन और उपदेश (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततस्तु भगवान्नारदो देवर्षिर्महातपाः।
आजगामाश्रमं रामं द्रष्टुकामः सलक्ष्मणम्॥
स तं दृष्ट्वा महातेजा व्यथितं शोककर्शितम्।
उवाच वचनं रामं धर्मज्ञः सत्यविक्रमम्॥
किमिदं राघव शोकस्त्वया धर्मभृतां वर।
नैतद्राज्ञः क्षमं शोकं कर्तुं कालवशं गतम्॥
यदिदं मरणं नाम भूतानामिह निश्चितम्।
सर्वेषामेव जन्तूनां कालपर्यायधर्मतः॥
न शोकस्थानमत्रास्ति यत्त्वं शोचसि राघव।
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः॥
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्॥
📖 भावार्थ : तभी वहाँ भगवान् देवर्षि नारद जी का आगमन हुआ, जो महान तपस्वी थे। वे लक्ष्मण सहित राम से मिलने की इच्छा से उनके आश्रम (महल) में आए। वे महातेजस्वी, धर्मज्ञ और सत्यविक्रम नारद, राम को शोक से व्यथित और कृश देखकर बोले, “हे राघव! हे धर्मवत्सलों में श्रेष्ठ! यह क्या? आप शोक में डूबे हुए हैं? काल के वशीभूत होकर हुई किसी घटना के लिए शोक करना किसी राजा को शोभा नहीं देता।” नारद जी ने राम को समझाना शुरू किया। उन्होंने कहा, “हे राघव, इस संसार में प्राणियों की मृत्यु एक निश्चित और अपरिहार्य सत्य है। यह काल का परम धर्म है। यहाँ शोक करने की कोई बात नहीं है कि आप किसी बात का शोक कर रहे हैं।” नारद जी ने गहन ज्ञान की बात कही, “हे राम, सभी संचयों (एकत्रित वस्तुओं) का अंत क्षय (नाश) होता है। सभी ऊँचाइयों का अंत पतन होता है। सभी संयोगों (मिलनों) का अंत वियोग होता है और जीवन का अंत मृत्यु है।” यह उपदेश अत्यंत सारगर्भित है। नारद जी राम को उस शाश्वत सत्य का बोध करा रहे हैं जिसे स्वीकार करना ही जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान है। वे राम को यह समझाना चाहते हैं कि मृत्यु कोई आकस्मिक या अनैतिक घटना नहीं है, बल्कि यह सृष्टि के संचालन का एक मूलभूत नियम है। इस नियम को न समझना और उसके लिए स्वयं को या राज्य-व्यवस्था को दोष देना अज्ञान है। राजा होने के नाते राम का यह कर्तव्य है कि वे इस नियम को समझें और शोक के बजाय धैर्यपूर्वक अपने राज्य का संचालन करते रहें। नारद जी का यह उपदेश केवल राम के लिए ही नहीं, बल्कि समस्त मानव जाति के लिए एक अमूल्य शिक्षा है, जो जीवन और मृत्यु के रहस्य को सरल शब्दों में समझा देता है।

⏳ काल की महिमा और अपरिहार्यता (श्लोक १६-२५)

॥ श्लोक १६-२० ॥
यथा ह्यरण्ये निम्नेषु काष्ठानि च तृणानि च।
स्वयं प्रयान्ति संयोगं विप्रयोगं च कालतः॥
तथा प्राणिन एवेह संयोगविप्रयोगतः।
कालेनैव प्रलीयन्ते कालः सर्वत्र कारणम्॥
न कालस्य प्रियः कश्चिद्द्वेष्यः कश्चिन्न विद्यते।
न तेजस्वी न मूर्खो वा न बली न दुर्वलः॥
सर्वान्समेन भावेन नयत्यन्ते यमक्षयम्।
कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः॥
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥
📖 भावार्थ : नारद जी ने काल के स्वरूप को समझाते हुए एक अद्भुत उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, “हे राघव, जिस प्रकार जंगल में नदियों के प्रवाह में लकड़ियाँ और घास के तिनके अपने आप ही एक-दूसरे से मिलते और बिछुड़ते रहते हैं, ठीक उसी प्रकार काल के प्रभाव से ही इस संसार में सभी प्राणियों का संयोग और वियोग होता रहता है। काल के द्वारा ही सब कुछ लीन हो जाता है। काल ही सबका कारण है।” इसके बाद उन्होंने काल की निष्पक्षता का वर्णन किया। “काल का न किसी पर विशेष स्नेह होता है और न ही किसी से द्वेष। वह किसी को तेजस्वी, मूर्ख, बलवान या दुर्बल नहीं मानता। वह सभी को एक समान भाव से अंत में यमलोक (मृत्यु) को प्राप्त करा देता है। काल ही सब प्राणियों की रचना करता है और काल ही उनका संहार करता है। सभी के सो जाने पर भी काल जाग्रत रहता है। वह अत्यंत दुस्तर (दुरतिक्रम) है, अर्थात उसके नियम को कोई टाल नहीं सकता।” नारद जी के इस उपदेश का सार यह है कि समय (काल) सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है। वह सृष्टि के हर कण में विद्यमान है और अपने नियमों से सबको संचालित करता है। उसके समक्ष कोई बड़ा या छोटा नहीं है। यहाँ तक कि देवता, असुर, मनुष्य सभी काल के नियम के अधीन हैं। राम का यह शोक इसी नियम को न समझ पाने के कारण था। नारद जी ने उन्हें इसी तथ्य का बोध कराकर उनके शोक को दूर करने का प्रयास किया। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राजा होने के नाते राम का कर्तव्य इस शाश्वत नियम को समझना और उसके अनुसार धैर्यपूर्वक राज्य का संचालन करना है, न कि उसके लिए स्वयं को दोषी ठहराकर व्यर्थ शोक करना। यह उपदेश जीवन की क्षणभंगुरता और अनित्यता का दर्शन कराता है।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
सर्वे क्षयान्ताः निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्॥ (पुनरुक्ति का भाग)
सर्वेषामेव भूतानां स्थितं हृदि च नित्यशः।
तं कालं प्राप्य नियतं मोहादेव न पश्यति॥
तस्मात्त्वं राघव श्रेष्ठ मा शुचः कालधर्मिणाम्।
एष धर्मः सदा सद्भिः सेवितो राजसत्तम॥
📖 भावार्थ : नारद जी ने काल के इसी अटल नियम को दोहराते हुए कहा कि सभी संचयों का अंत क्षय है, सभी ऊँचाइयों का अंत पतन है, सभी मिलनों का अंत वियोग है और जीवन का अंत मृत्यु है। यह सृष्टि का मूलभूत सिद्धांत है। इसके बाद उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने बताया कि यह काल (नियति) सभी प्राणियों के हृदय में नित्य रूप से स्थित है। लेकिन जब उस नियत काल का समय आता है, तो प्राणी मोह के कारण उसे नहीं देख पाता। अर्थात, जीवन के अंत का समय निकट आने पर भी जीव मोहवश यह नहीं समझ पाता कि अब उसका अंत समय आ गया है। यह अज्ञान ही सबसे बड़ा मोह है। अंत में नारद जी ने राम को सांत्वना देते हुए कहा, “इसलिए हे राघवश्रेष्ठ! आप उन प्राणियों के लिए शोक मत कीजिए जो काल के धर्म (मृत्यु) के अधीन हो चुके हैं। हे राजश्रेष्ठ, यही धर्म है, जिसका सदा से सत्पुरुषों द्वारा सेवन किया गया है।” नारद जी के इस अंतिम वाक्य ने राम के शोक का अंत किया। उन्होंने राम को वह ज्ञान दिया जो उनके लिए सबसे बड़ी दवा थी। राम को समझ आ गया कि यह घटना उनके राज्य के अधर्म का परिणाम नहीं, बल्कि काल का अपरिहार्य नियम है। इस ज्ञान ने उन्हें उस गहरे शोक से उबार लिया, जिसमें वे डूबे हुए थे। नारद जी का यह उपदेश उन्हें राजा के रूप में अपने कर्तव्यों का स्मरण कराता है और उन्हें धैर्य और स्थिरता प्रदान करता है।

🙏 राम का धैर्य धारण और नारद का प्रस्थान (श्लोक २६-३२)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
एतच्छ्रुत्वा वचो रामो नारदस्य महात्मनः।
जहौ शोकं महातेजाः प्राप्तज्ञानो नराधिपः॥
उवाच च महात्मानं नारदं प्रश्रयान्वितः।
भगवन्धन्यतां प्राप्ता मतिर्मे प्रसादिता॥
त्वयाहं धर्ममासाद्य ज्ञानं च परमाद्भुतम्।
शोकमोहौ परित्यज्य स्थितः स्वस्थेन चेतसा॥
ततः प्रीतो महातेजा नारदो राघवं तदा।
अनुज्ञाप्य ययौ स्वर्गं देवलोकं सनातनम्॥
रामोऽपि धर्ममासाद्य पालयामास मेदिनीम्।
प्रजाश्च सुखिताः सर्वा बभूवुर्धर्मसंश्रयात्॥
इत्येतदाख्यानमहं पुण्यं रामायणे शुभे।
उत्तरे चरिते रम्ये नारदीयमुदाहृतम्॥
📖 भावार्थ : महात्मा नारद के इन वचनों को सुनकर महातेजस्वी राजा राम को ज्ञान की प्राप्ति हुई और उन्होंने अपना सारा शोक त्याग दिया। अब वे पहले की तरह स्थिर और धैर्यवान हो गए। फिर वे विनयपूर्वक महात्मा नारद से बोले, “हे भगवन्! मैं धन्य हो गया। आपने मेरी बुद्धि को प्रसन्न कर दिया। आपसे धर्म और यह परम अद्भुत ज्ञान पाकर मैंने शोक और मोह को त्याग दिया है और अब मैं स्वस्थ चित्त से स्थित हूँ।” राम के ऐसा कहने पर महातेजस्वी नारद जी अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने राम से आज्ञा ली और फिर अपने सनातन धाम स्वर्गलोक को चले गए। राम भी अब धर्म को धारण करके पृथ्वी का पालन करने लगे। धर्म के सहारे सारी प्रजा सुखी हो गई। इस प्रकार इस शुभ रामायण के रम्य उत्तरकाण्ड में नारद से संबंधित यह पुण्यदायी आख्यान कहा गया। इस सर्ग का समापन राम के शोक से मुक्त होने और पुनः धर्मपूर्वक राज्य संचालन में लग जाने के साथ होता है। नारद के उपदेश ने न केवल राम के व्यक्तिगत शोक को दूर किया, बल्कि उन्हें एक गहन दार्शनिक सत्य से भी अवगत कराया। इस घटना ने राम के राज्य को फिर से सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त किया। यह सर्ग हमें सिखाता है कि जीवन में आने वाले कष्टों और दुखों के समय में हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए और न ही उनके लिए स्वयं को या अन्य को दोषी ठहराना चाहिए। बल्कि, हमें उन शाश्वत सत्यों को समझने का प्रयास करना चाहिए, जिन पर यह सृष्टि टिकी हुई है। ज्ञान और धैर्य ही सबसे बड़ी शक्ति हैं, जो हमें जीवन के हर संकट से उबार सकते हैं। राम का नारद के प्रति कृतज्ञता भाव उनके विनम्र स्वभाव को भी दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राजा का दायित्वबोध

यह सर्ग एक आदर्श राजा के गहरे दायित्वबोध को उजागर करता है। एक सामान्य घटना से भी राम इतने व्यथित हो जाते हैं क्योंकि वे प्रजा के सुख-दुःख को अपने निजी जीवन से जोड़कर देखते हैं। उनका यह चरित्र उन्हें एक अत्यंत संवेदनशील और कर्तव्यनिष्ठ शासक सिद्ध करता है।

⏳ काल का ज्ञान

नारद के उपदेश का केंद्रबिंदु काल (समय) की अटल और अपरिहार्य शक्ति है। यह सर्ग जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य का दर्शन कराता है। यह समझाता है कि मृत्यु कोई दुर्घटना या अधर्म का परिणाम नहीं, बल्कि सृष्टि का एक नियम है। इस नियम को समझना ही सबसे बड़ा ज्ञान है।

🧘 शोक पर विजय

यह सर्ग शोक पर विजय पाने का मार्ग भी दिखाता है। राम का शोक ज्ञान से, तर्क से और धैर्य से दूर होता है। यह संदेश देता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी ज्ञान और धैर्य ही मनुष्य के सबसे बड़े हथियार हैं।

🙏 गुरु का महत्त्व

राम जैसे आदर्श पुरुष को भी जब ज्ञान की आवश्यकता होती है, तो वे नारद जैसे गुरु का सहारा लेते हैं। यह जीवन में गुरु के महत्त्व को रेखांकित करता है। सही मार्गदर्शन ही मनुष्य को मोह और शोक के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में ला सकता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन और मृत्यु सृष्टि के अपरिहार्य सत्य हैं। इनके लिए व्यर्थ शोक नहीं करना चाहिए। राजा को प्रजा के दुःख की चिंता तो करनी चाहिए, लेकिन साथ ही धैर्य और ज्ञान से काम लेना चाहिए। गुरु का उपदेश ही मनुष्य को सही मार्ग दिखा सकता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे षडशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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