उत्तर काण्ड
अध्याय 85
एक ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु
एक ब्राह्मण अपने मृत पुत्र को लेकर राम के दरबार में आता है और राम पर अन्याय का आरोप लगाता है। यह घटना राम के राज्य से सीता के निर्वासन का कारण बनती है।
विवरण
राम के राज्य में एक दिन एक वृद्ध ब्राह्मण अपने मृत पुत्र की देह लेकर राजद्वार पर आता है और विलाप करते हुए राम पर आरोप लगाता है कि राजा के किसी पाप के कारण उसका पुत्र मरा है। राम अत्यन्त दुःखी होते हैं और इस घटना का कारण जानने के लिए नारद आदि ऋषियों से पूछते हैं। नारद बताते हैं कि यह घटना किसी शूद्र के तपस्या करने के कारण हुई है। राम दण्डकारण्य में जाकर शम्बूक नामक शूद्र को तपस्या करते हुए पाते हैं और उसका वध कर देते हैं। इससे ब्राह्मण का पुत्र पुनर्जीवित हो जाता है। यह सर्ग राम के धर्मपरायणता और युगधर्म की रक्षा का प्रतीक है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ८५
(एक ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु)
ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चाशीतितमः सर्गः ॥
😢 ब्राह्मण का विलाप (श्लोक १-५)
॥ श्लोक १-५ ॥
एकदा तु महाराज रामो धर्मरतः सदा।
निशम्य करुणं शब्दं पप्रच्छ सह भ्रातृभिः॥
किमेतत्करुणं ब्रह्मन्प्ररुदितं सुदुःखितैः।
इत्युक्त्वा प्रेषयामास द्वाःस्थं ज्ञातुं तदन्तरम्॥
द्वाःस्थ आगत्य तं प्राह राजन्ब्राह्मणपुत्रकः।
मृतो हि धार्यते बालो द्वारि रुदन्पुनः पुनः॥
रामः श्रुत्वा महाबाहुः सभृत्यबलबान्धवः।
अभिगम्य द्विजं दीनं विलोक्येदमुवाच ह॥
किमेतद्ब्राह्मणश्रेष्ठ कस्य पुत्रो हतस्त्वया।
धार्यते च किमर्थं त्वं रुदन्करुणया गिरा॥
निशम्य करुणं शब्दं पप्रच्छ सह भ्रातृभिः॥
किमेतत्करुणं ब्रह्मन्प्ररुदितं सुदुःखितैः।
इत्युक्त्वा प्रेषयामास द्वाःस्थं ज्ञातुं तदन्तरम्॥
द्वाःस्थ आगत्य तं प्राह राजन्ब्राह्मणपुत्रकः।
मृतो हि धार्यते बालो द्वारि रुदन्पुनः पुनः॥
रामः श्रुत्वा महाबाहुः सभृत्यबलबान्धवः।
अभिगम्य द्विजं दीनं विलोक्येदमुवाच ह॥
किमेतद्ब्राह्मणश्रेष्ठ कस्य पुत्रो हतस्त्वया।
धार्यते च किमर्थं त्वं रुदन्करुणया गिरा॥
📖 भावार्थ : एक दिन धर्मरत राम ने करुण ध्वनि सुनी और भाइयों सहित पूछा: "यह करुण रुदन क्यों हो रहा है?" उन्होंने द्वारपाल को भेजकर कारण जानने को कहा। द्वारपाल ने आकर बताया: "राजन! एक ब्राह्मण अपने मृत पुत्र को लेकर द्वार पर बारम्बार रो रहा है।" राम तुरंत वहाँ गए और उस दीन ब्राह्मण को देखकर बोले: "हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! यह क्या है? किसका पुत्र मरा है? और तुम क्यों रो रहे हो?"
⚖️ ब्राह्मण का आरोप (श्लोक ६-१०)
॥ श्लोक ६-१० ॥
ब्राह्मणः प्राह राजानं रामं सत्यपराक्रमम्।
राजन्नयं मम सुतो बाल एको हतः किल॥
न जाने केन दुष्टेन न च व्याधिनिपीडितः।
अकालमृत्युमापन्नस्तव राज्ञि जनाधिप॥
त्वयि राज्ञि धर्मात्मन्न यदि पापं भवेत्क्वचित्।
न म्रियेत मम पुत्रः कथं बालोऽकृतव्रणः॥
तस्मात्त्वं पालयस्वेनं धर्मेण सह राघव।
नो चेत्प्राणान्विमोक्ष्यामि तव द्वारि न संशयः॥
एतच्छ्रुत्वा वचो घोरं रामः शोकसमन्वितः।
प्रोवाच ब्राह्मणं वाक्यमश्रुपूर्णेक्षणस्तदा॥
राजन्नयं मम सुतो बाल एको हतः किल॥
न जाने केन दुष्टेन न च व्याधिनिपीडितः।
अकालमृत्युमापन्नस्तव राज्ञि जनाधिप॥
त्वयि राज्ञि धर्मात्मन्न यदि पापं भवेत्क्वचित्।
न म्रियेत मम पुत्रः कथं बालोऽकृतव्रणः॥
तस्मात्त्वं पालयस्वेनं धर्मेण सह राघव।
नो चेत्प्राणान्विमोक्ष्यामि तव द्वारि न संशयः॥
एतच्छ्रुत्वा वचो घोरं रामः शोकसमन्वितः।
प्रोवाच ब्राह्मणं वाक्यमश्रुपूर्णेक्षणस्तदा॥
📖 भावार्थ : ब्राह्मण ने सत्यपराक्रमी राम से कहा: "राजन्! यह मेरा इकलौता पुत्र है। न जाने किस दुष्ट ने मारा, न कोई रोग था। हे राजन्! आपके राज्य में यह अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ। यदि आप धर्मात्मा राजा हैं और आपसे कोई पाप नहीं होता, तो मेरा निरपराध बालक कैसे मर सकता है? अतः हे राघव! आप धर्मपूर्वक इसकी रक्षा करें, अन्यथा मैं आपके द्वार पर प्राण त्याग दूँगा।" यह भयंकर वचन सुनकर राम शोकाकुल हो गए और अश्रुपूर्ण नेत्रों से बोले।
🤔 राम की चिंता और ऋषियों का आगमन (श्लोक ११-२०)
॥ श्लोक ११-१५ ॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा ब्राह्मणं शोककर्शितम्।
अहमद्य प्रयत्नेन जीवयिष्यामि ते सुतम्॥
यदि मे धर्मतः किञ्चिद्व्यलीकं नोपपद्यते।
अन्यथा तु भवेदेष मृतो नास्त्यत्र संशयः॥
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान्सभां नीत्वा द्विजोत्तमम्।
उपविश्य मुनिश्रेष्ठान्पप्रच्छ धर्मसंशयम्॥
किमेतद्ब्राह्मणस्यास्य मृतो बालो युवा सुतः।
मम राज्ञि सति धर्मे किमेतत्कारणं मुने॥
तत ऊचुर्मुनिश्रेष्ठा नारदप्रमुखास्तदा।
शृणु राजन्वक्ष्यामो हि यथाशास्त्रं यथाक्रमम्॥
अहमद्य प्रयत्नेन जीवयिष्यामि ते सुतम्॥
यदि मे धर्मतः किञ्चिद्व्यलीकं नोपपद्यते।
अन्यथा तु भवेदेष मृतो नास्त्यत्र संशयः॥
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान्सभां नीत्वा द्विजोत्तमम्।
उपविश्य मुनिश्रेष्ठान्पप्रच्छ धर्मसंशयम्॥
किमेतद्ब्राह्मणस्यास्य मृतो बालो युवा सुतः।
मम राज्ञि सति धर्मे किमेतत्कारणं मुने॥
तत ऊचुर्मुनिश्रेष्ठा नारदप्रमुखास्तदा।
शृणु राजन्वक्ष्यामो हि यथाशास्त्रं यथाक्रमम्॥
📖 भावार्थ : राम ने शोकाकुल ब्राह्मण से कहा: "मैं आज प्रयत्नपूर्वक तुम्हारे पुत्र को जीवित करूँगा। यदि मुझसे कोई धर्मभ्रष्ट कार्य नहीं हुआ है, तो वह जीवित होगा, अन्यथा नहीं।" ऐसा कहकर राम उस ब्राह्मण को सभा में ले गए और वहाँ मुनियों से धर्म के संशय को पूछा: "मेरे राज्य में ऐसा क्यों हुआ कि इस ब्राह्मण का बालक मर गया?" तब नारद आदि मुनियों ने कहा: "हे राजन्! सुनो, हम शास्त्रानुसार कहते हैं।"
॥ श्लोक १६-२० ॥
नारदः प्राह राजानं शृणु राम महामते।
कस्मिंश्चित्कारणे राज्ञां प्रजा मृत्युं व्रजन्ति हि॥
यदा शूद्रस्तपः कुर्याद्विपरीतं कलौ युगे।
तदा ब्राह्मणपुत्राणां मृत्युरेव न संशयः॥
तस्मात्त्वं गच्छ दण्डारण्यं यत्र शूद्रस्तपोधनः।
शम्बूको नाम दुष्टात्मा तप्यते तप उत्तमम्॥
तं हत्वा ब्राह्मणपुत्रो जीविष्यति न संशयः।
धर्मश्च स्थापितस्तात त्वया भवति राघव॥
इत्युक्त्वा विररामाथ नारदो मुनिसत्तमः।
कस्मिंश्चित्कारणे राज्ञां प्रजा मृत्युं व्रजन्ति हि॥
यदा शूद्रस्तपः कुर्याद्विपरीतं कलौ युगे।
तदा ब्राह्मणपुत्राणां मृत्युरेव न संशयः॥
तस्मात्त्वं गच्छ दण्डारण्यं यत्र शूद्रस्तपोधनः।
शम्बूको नाम दुष्टात्मा तप्यते तप उत्तमम्॥
तं हत्वा ब्राह्मणपुत्रो जीविष्यति न संशयः।
धर्मश्च स्थापितस्तात त्वया भवति राघव॥
इत्युक्त्वा विररामाथ नारदो मुनिसत्तमः।
📖 भावार्थ : नारद ने कहा: "हे महामते राम! सुनो, राजाओं के कारण प्रजा की मृत्यु होती है। जब कलियुग में शूद्र विपरीत रीति से तप करता है, तब ब्राह्मण पुत्रों की मृत्यु होती है – इसमें संशय नहीं। अतः तुम दण्डकारण्य जाओ, जहाँ शम्बूक नामक शूद्र कठोर तप कर रहा है। उसे मारने पर यह ब्राह्मणपुत्र जीवित हो जाएगा और धर्म की स्थापना होगी।" यह कहकर नारद मुनि चुप हो गए।
⚔️ शम्बूक वध (श्लोक २१-३०)
॥ श्लोक २१-२५ ॥
रामस्तु वचनं श्रुत्वा नारदस्य महात्मनः।
शत्रुघ्नं सह लक्ष्मणं भरतं च समादिशत्॥
रक्षध्वं नगरीं यावद्गच्छामि द्विजकारणात्।
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान्रथमारुह्य वीर्यवान्॥
जगाम दण्डकारण्यं यत्र शूद्रस्तपोधनः।
ददर्श तं महातेजाः शम्बूकं लम्बितेक्षणम्॥
ऊर्ध्वबाहुं नभो दृष्ट्वा तप्यन्तं तप उत्तमम्।
रामः प्रोवाच धर्मात्मा को भवान्किं तपस्यसि॥
शम्बूकः प्राह राजानं शूद्रोऽहं तप्यते तपः।
स्वर्गलोकाभिकामेन नान्यदिच्छामि राघव॥
शत्रुघ्नं सह लक्ष्मणं भरतं च समादिशत्॥
रक्षध्वं नगरीं यावद्गच्छामि द्विजकारणात्।
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान्रथमारुह्य वीर्यवान्॥
जगाम दण्डकारण्यं यत्र शूद्रस्तपोधनः।
ददर्श तं महातेजाः शम्बूकं लम्बितेक्षणम्॥
ऊर्ध्वबाहुं नभो दृष्ट्वा तप्यन्तं तप उत्तमम्।
रामः प्रोवाच धर्मात्मा को भवान्किं तपस्यसि॥
शम्बूकः प्राह राजानं शूद्रोऽहं तप्यते तपः।
स्वर्गलोकाभिकामेन नान्यदिच्छामि राघव॥
📖 भावार्थ : नारद के वचन सुनकर राम ने शत्रुघ्न, लक्ष्मण और भरत को अयोध्या की रक्षा का आदेश दिया और स्वयं रथ पर सवार होकर दण्डकारण्य गए। वहाँ उन्होंने शम्बूक को देखा, जो आकाश की ओर देखते हुए, ऊर्ध्वबाहु होकर घोर तप कर रहा था। राम ने पूछा: "तुम कौन हो? क्यों तप कर रहे हो?" शम्बूक ने उत्तर दिया: "हे राघव! मैं शूद्र हूँ और स्वर्ग की कामना से तप कर रहा हूँ।"
॥ श्लोक २६-३० ॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा शूद्र त्वं तपसे कुतः।
विपरीतमिदं राज्ये मम जातं द्विजातिषु॥
इत्युक्त्वा खड्गमादाय शिरस्तस्याच्छिनत्प्रभुः।
शम्बूके निहते तस्मिन्ब्राह्मणस्य सुतो युवा॥
जीवितः सम्प्रजज्ञे च दिव्यरूपो महायशाः।
तमादाय द्विजं प्रीतो रामो राज्यमथागतः॥
ब्राह्मणाय ददौ पुत्रं रामः प्रीतिपुरःसरम्।
स ब्राह्मणः सुतं दृष्ट्वा जीवितं हर्षमागतः॥
प्रशशंस महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्॥
विपरीतमिदं राज्ये मम जातं द्विजातिषु॥
इत्युक्त्वा खड्गमादाय शिरस्तस्याच्छिनत्प्रभुः।
शम्बूके निहते तस्मिन्ब्राह्मणस्य सुतो युवा॥
जीवितः सम्प्रजज्ञे च दिव्यरूपो महायशाः।
तमादाय द्विजं प्रीतो रामो राज्यमथागतः॥
ब्राह्मणाय ददौ पुत्रं रामः प्रीतिपुरःसरम्।
स ब्राह्मणः सुतं दृष्ट्वा जीवितं हर्षमागतः॥
प्रशशंस महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा: "हे शूद्र! तुम तप क्यों कर रहे हो? इससे मेरे राज्य में ब्राह्मणों को हानि हो रही है।" ऐसा कहकर राम ने तलवार से उसका सिर काट दिया। शम्बूक के मारे जाते ही वह ब्राह्मणपुत्र पुनर्जीवित हो गया और दिव्य रूप धारण करके प्रकट हुआ। राम उसे लेकर अयोध्या लौटे और उस ब्राह्मण को प्रसन्नतापूर्वक पुत्र सौंप दिया। ब्राह्मण ने पुत्र को जीवित देखा, तो अत्यन्त हर्षित हुआ और सत्यपराक्रमी राम की प्रशंसा की।
⚙️ धर्म की स्थापना और उपसंहार (श्लोक ३१-३८)
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा ब्राह्मणं प्रीतिपूर्वकम्।
गृहाण पुत्रं भद्रं ते धर्मेण स्थापितं मया॥
ब्राह्मणः प्राह राजानं धन्योऽस्म्यनुगृहीतश्च।
त्वया राज्ञा जगत्पाल किमन्यच्छरणं मम॥
ततो रामः प्रजाः सर्वा आहूय प्रीतिपूर्वकम्।
धर्ममेव प्रशंसन्वै शम्बूकवधकारणम्॥
इत्याख्यानं समाकर्ण्य रामः प्रीतमनाः सुखी।
उवाच मुनिशार्दूलं कृतज्ञः सत्यविक्रमः॥
भगवन्धन्यतां प्राप्ता अयोध्या नगरी मया।
यद् भवद्भिः कृता पूजा मुनीन्द्रैः सुरसत्तमैः॥
गृहाण पुत्रं भद्रं ते धर्मेण स्थापितं मया॥
ब्राह्मणः प्राह राजानं धन्योऽस्म्यनुगृहीतश्च।
त्वया राज्ञा जगत्पाल किमन्यच्छरणं मम॥
ततो रामः प्रजाः सर्वा आहूय प्रीतिपूर्वकम्।
धर्ममेव प्रशंसन्वै शम्बूकवधकारणम्॥
इत्याख्यानं समाकर्ण्य रामः प्रीतमनाः सुखी।
उवाच मुनिशार्दूलं कृतज्ञः सत्यविक्रमः॥
भगवन्धन्यतां प्राप्ता अयोध्या नगरी मया।
यद् भवद्भिः कृता पूजा मुनीन्द्रैः सुरसत्तमैः॥
📖 भावार्थ : राम ने ब्राह्मण से कहा: "अपने पुत्र को ग्रहण करो, तुम्हारा कल्याण हो। मैंने धर्म की स्थापना की है।" ब्राह्मण बोला: "हे राजन्! मैं धन्य हूँ, आपने अनुग्रह किया। आप जगत्पालक हैं, मुझे अन्य क्या शरण है?" फिर राम ने सब प्रजा को बुलाकर धर्म की प्रशंसा की और शम्बूक वध का कारण समझाया। इस आख्यान को सुनकर राम प्रसन्न हुए और मुनियों की स्तुति की।
॥ श्लोक ३६-३८ ॥
अद्यप्रभृति वक्ष्यामि पालयिष्ये महीमिमाम्।
धर्मेण नातिचारेण भवतामाज्ञया मुने॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा मुनीनां प्रददौ बहु।
ततस्ते मुनयः सर्वे ययुः स्वं स्वं निवेशनम्॥
एवं रामेण धर्मज्ञ शम्बूको विनिपातितः।
ब्राह्मणस्य सुतश्चैव जीवितः समपद्यत॥
य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वापि भक्तितः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो रामलोकं स गच्छति॥
धर्मेण नातिचारेण भवतामाज्ञया मुने॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा मुनीनां प्रददौ बहु।
ततस्ते मुनयः सर्वे ययुः स्वं स्वं निवेशनम्॥
एवं रामेण धर्मज्ञ शम्बूको विनिपातितः।
ब्राह्मणस्य सुतश्चैव जीवितः समपद्यत॥
य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वापि भक्तितः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो रामलोकं स गच्छति॥
📖 भावार्थ : "आज से मैं धर्म का उल्लंघन किए बिना इस पृथ्वी का पालन करूँगा।" ऐसा कहकर राजा राघव ने मुनियों को बहुत दान दिया। तब सब मुनि अपने-अपने आश्रमों को चले गए। इस प्रकार राम ने शम्बूक का वध किया और ब्राह्मणपुत्र को जीवनदान दिया। जो इस कथा को नित्य सुनता या सुनाता है, वह सब पापों से मुक्त होकर रामलोक को प्राप्त होता है।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चाशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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