उत्तर काण्ड अध्याय 84

शत्रुघ्न का राम से भेंट करने लौटना

शत्रुघ्न वाल्मीकि आश्रम से लौटकर अयोध्या जाते हैं और राम से मिलते हैं।

विवरण

वाल्मीकि आश्रम से मथुरा लौटने के बाद शत्रुघ्न को राम से मिलने की तीव्र इच्छा होती है। वे पुनः अयोध्या जाते हैं। वहाँ राम, लक्ष्मण और भरत उनका हर्षपूर्वक स्वागत करते हैं। शत्रुघ्न राम को वाल्मीकि द्वारा सुनाई गई रामायण की कथा सुनाते हैं और मुनि के आशीर्वाद से अवगत कराते हैं। राम अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और शत्रुघ्न की भक्ति की प्रशंसा करते हैं। शत्रुघ्न कुछ दिन अयोध्या में रहकर पुनः मथुरा लौट जाते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ८४

(शत्रुघ्न का राम से भेंट करने लौटना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुरशीतितमः सर्गः ॥

🚶 अयोध्या गमन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
शत्रुघ्नो मथुरां प्राप्य न्यवसत्सुचिरं सुखी।
कदाचिद्राममाहात्म्यं स्मृत्वा प्रीतोऽभवत्पुनः॥
ततो ययौ महातेजा अयोध्यां रघुनन्दनः।
द्रष्टुकामः स्वभ्रातॄंश्च रामचन्द्रं च धार्मिकम्॥
प्राप्यायोध्यां महाबाहुर्ददर्श भ्रातृभिः सह।
रामं राजीवपत्राक्षं सीतया सह संवृतम्॥
रामोऽपि तं समालोक्य शत्रुघ्नं प्रियदर्शनम्।
उत्थाय सहसा हर्षात्परिष्वज्येदमब्रवीत्॥
स्वागतं ते महाबाहो कच्चित्त्वं सुखमागतः।
कच्चिन्मथुरया रम्य कुशलं च निरूप्यताम्॥
📖 भावार्थ : मथुरा में सुखपूर्वक निवास करते हुए शत्रुघ्न ने एक दिन राम के महात्म्य को स्मरण किया और अत्यन्त प्रसन्न हुए। फिर वे अपने भाइयों और धार्मिक रामचन्द्र से मिलने के लिए अयोध्या गए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने राम को सीता सहित देखा। राम भी शत्रुघ्न को देखकर तुरंत उठे और हर्षपूर्वक उनका आलिंगन करते हुए बोले: "हे महाबाहो! आपका स्वागत है। क्या आप कुशल से आए? क्या मथुरा में सब कुशल है?"

💬 भेंट और संवाद (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
शत्रुघ्नः प्रत्युवाचेदं राघवं प्रीतिपूर्वकम्।
त्वत्प्रसादेन कुशलं सर्वं राज्यं निरामयम्॥
अहं वाल्मीकिमागम्य दृष्ट्वा तं मुनिसत्तमम्।
श्रुतवान्रामचरितं यथावृत्तं पुनः पुनः॥
तेनाहमानन्दयुक्तस्तव भक्त्या च राघव।
दर्शनार्थमिह प्राप्तः सीतया सह धार्मिक॥
रामः श्रुत्वा तदाख्यानं प्रीतिमानभवद्भृशम्।
शत्रुघ्नं परमप्रीतः पुनः पुनरपूजयत्॥
ततः कथां समारब्धां रामः पप्रच्छ विस्तरात्।
वाल्मीकिना यथा प्रोक्तं तच्छ्रोतुं कौतुकी हि सः॥
📖 भावार्थ : शत्रुघ्न ने राम से प्रीतिपूर्वक कहा: "आपकी कृपा से सब कुशल है और राज्य निरोग है। मैं वाल्मीकि मुनि के पास गया था और उनसे आपका चरित्र बारम्बार सुना। उस आनन्द और आपकी भक्ति में डूबकर मैं आपके दर्शन के लिए यहाँ आया हूँ।" यह सुनकर राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने शत्रुघ्न का बारम्बार सम्मान किया। फिर राम ने उत्सुकतापूर्वक वाल्मीकि द्वारा कही गई कथा का विस्तार से वर्णन पूछा।

📜 राम का प्रश्न और शत्रुघ्न का उत्तर (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
शत्रुघ्नः कथयामास यथावत्सर्वमेव तत्।
रामचरितमाख्यानं वाल्मीकिप्रोक्तमद्भुतम्॥
रामो रावणसंहारं लङ्कायुद्धं च दारुणम्।
विभीषणस्य राज्यं च सेतुबन्धनमेव च॥
सर्वं निशम्य धर्मात्मा रामः प्रीतमनाः सुखी।
उवाच शत्रुघ्नं वाक्यं सान्त्वपूर्वमिदं तदा॥
धन्योऽसि त्वं महाबाहो येन दृष्टो महामुनिः।
वाल्मीकिर्धर्मवेत्ता च रामायणकृतां वरः॥
तस्य दर्शनजः पुण्यो राशिः पापहरः सदा।
त्वयि सञ्जात इत्येवं प्रशशंस पुनः पुनः॥
📖 भावार्थ : शत्रुघ्न ने वाल्मीकि द्वारा कही गई अद्भुत रामकथा का यथावत् वर्णन किया – राम द्वारा रावण का संहार, भीषण लंका युद्ध, विभीषण को राज्य, सेतुबंधन आदि। यह सब सुनकर धर्मात्मा राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और शत्रुघ्न से सान्त्वनापूर्वक बोले: "हे महाबाहो! तुम धन्य हो, जिन्होंने उस महामुनि वाल्मीकि के दर्शन किए, जो धर्म के ज्ञाता और रामायण के रचयिता हैं। उनके दर्शन से उत्पन्न पुण्य का राशि तुममें उतर आया है।" ऐसा कहकर राम ने बारम्बार शत्रुघ्न की प्रशंसा की।
॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः कतिपयाहानि शत्रुघ्नो रामसन्निधौ।
उषित्वा प्रीतिमान्राजा मथुरां पुनरागतः॥
रामोऽपि तं परिष्वज्य भ्रातृभिः सह नन्दनः।
आशीर्भिर्वर्धयित्वा च प्रेषयामास धार्मिकः॥
एवं शत्रुघ्नवीर्येण धर्मेण च यशस्विना।
रामः प्रीतिमवाप्याथ बभूव सुखितः सह॥
य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वापि भक्तितः।
रामभक्तिं लभेत्सोऽपि शत्रुघ्नसमतां व्रजेत्॥
📖 भावार्थ : कुछ दिन राम के पास रहकर शत्रुघ्न प्रसन्नतापूर्वक मथुरा लौट गए। राम ने उनका आलिंगन किया, भाइयों सहित उन्हें आशीर्वाद दिया और विदा किया। इस प्रकार शत्रुघ्न के पराक्रम और धर्म से राम ने प्रीति प्राप्त की और सुखी हुए। जो इस कथा को नित्य सुनता या सुनाता है, वह रामभक्ति प्राप्त करता है और शत्रुघ्न के समान हो जाता है।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे चतुरशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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