उत्तर काण्ड
अध्याय 83
शत्रुघ्न का वाल्मीकि ऋषि से मिलने जाना
शत्रुघ्न मथुरा में रहते हुए वाल्मीकि ऋषि के आश्रम जाते हैं और उनसे भेंट करते हैं।
विवरण
मथुरा में राज्य स्थापित करने के बाद शत्रुघ्न एक दिन वाल्मीकि ऋषि के आश्रम जाने की इच्छा प्रकट करते हैं। वे यमुना पार करके तमसा नदी के तट पर स्थित वाल्मीकि आश्रम पहुँचते हैं। वहाँ वे ऋषि का यथोचित सम्मान करते हैं। वाल्मीकि उन्हें रामकथा सुनाते हैं और आशीर्वाद देते हैं। शत्रुघ्न वहाँ कुछ दिन रुककर धार्मिक चर्चा करते हैं और फिर मथुरा लौट जाते हैं। यह सर्ग शत्रुघ्न की ऋषि भक्ति और विनम्रता को दर्शाता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ८३
(शत्रुघ्न का वाल्मीकि ऋषि से मिलने जाना)
ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्र्यशीतितमः सर्गः ॥
🌿 आश्रम गमन की इच्छा (श्लोक १-५)
॥ श्लोक १-५ ॥
शत्रुघ्नो मथुरावासी कदाचित्सुसमाहितः।
वाल्मीकिं द्रष्टुमिच्छामि मुनिं ब्रह्मर्षिसत्तमम्॥
इति संचिन्त्य धर्मात्मा यमुनापारमागतः।
ततस्तमसातीरं गत्वाश्रमपदं शुभम्॥
ददर्श तापसवृतं वाल्मीकिं ज्वलितप्रभम्।
उपास्यमानं मुनिभिर्वेदवेदाङ्गपारगैः॥
स दृष्ट्वा परमप्रीतः शत्रुघ्नो रघुनन्दनः।
अवतीर्य रथात्तूर्णं मुनिं प्राञ्जलिरभाषत॥
भगवन्वाल्मीके महर्षे त्वां द्रष्टुं समुपागतः।
अनुग्रहं कुरुष्वेति प्रणामं च चकार ह॥
वाल्मीकिं द्रष्टुमिच्छामि मुनिं ब्रह्मर्षिसत्तमम्॥
इति संचिन्त्य धर्मात्मा यमुनापारमागतः।
ततस्तमसातीरं गत्वाश्रमपदं शुभम्॥
ददर्श तापसवृतं वाल्मीकिं ज्वलितप्रभम्।
उपास्यमानं मुनिभिर्वेदवेदाङ्गपारगैः॥
स दृष्ट्वा परमप्रीतः शत्रुघ्नो रघुनन्दनः।
अवतीर्य रथात्तूर्णं मुनिं प्राञ्जलिरभाषत॥
भगवन्वाल्मीके महर्षे त्वां द्रष्टुं समुपागतः।
अनुग्रहं कुरुष्वेति प्रणामं च चकार ह॥
📖 भावार्थ : मथुरा में निवास करते हुए एक दिन धर्मात्मा शत्रुघ्न ने सोचा कि मैं ब्रह्मर्षि वाल्मीकि के दर्शन करना चाहता हूँ। यह विचार कर वे यमुना पार करके तमसा नदी के तट पर पहुँचे, जहाँ वाल्मीकि का पवित्र आश्रम था। वहाँ उन्होंने तेजस्वी वाल्मीकि को देखा, जो वेद-वेदांग के पारंगत मुनियों से घिरे हुए थे। शत्रुघ्न अत्यन्त प्रसन्न हुए, रथ से उतरकर मुनि के पास गए और हाथ जोड़कर बोले: "हे भगवन् वाल्मीके! हे महर्षे! मैं आपके दर्शनों के लिए आया हूँ। कृपया अनुग्रह कीजिए।" और उन्होंने प्रणाम किया।
🙌 वाल्मीकि का स्वागत (श्लोक ६-१०)
॥ श्लोक ६-१० ॥
वाल्मीकिरपि तं दृष्ट्वा शत्रुघ्नं रघुनन्दनम्।
प्रत्युत्थाय महातेजा आलिलिङ्ग सभाजयन्॥
स्वागतं ते महाबाहो कुशलं ते निरूप्यताम्।
कच्चित्ते मथुरा रम्या कच्चिद्राज्यं सुखावहम्॥
शत्रुघ्नः प्रत्युवाचेदं भगवन्सर्वमेव हि।
त्वत्प्रसादेन कुशलं राज्यं च सुखदं मम॥
वाल्मीकिरासनं दत्त्वा पाद्यार्घ्यं च न्यवेदयत्।
कुशलं परिपप्रच्छ रामस्य च भरस्य च॥
शत्रुघ्नः सर्वमाख्यातुं प्रवृत्तो राघवं प्रति।
वाल्मीकिः श्रुतवान् प्रीत्या रामचरितमुत्तमम्॥
प्रत्युत्थाय महातेजा आलिलिङ्ग सभाजयन्॥
स्वागतं ते महाबाहो कुशलं ते निरूप्यताम्।
कच्चित्ते मथुरा रम्या कच्चिद्राज्यं सुखावहम्॥
शत्रुघ्नः प्रत्युवाचेदं भगवन्सर्वमेव हि।
त्वत्प्रसादेन कुशलं राज्यं च सुखदं मम॥
वाल्मीकिरासनं दत्त्वा पाद्यार्घ्यं च न्यवेदयत्।
कुशलं परिपप्रच्छ रामस्य च भरस्य च॥
शत्रुघ्नः सर्वमाख्यातुं प्रवृत्तो राघवं प्रति।
वाल्मीकिः श्रुतवान् प्रीत्या रामचरितमुत्तमम्॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी वाल्मीकि ने शत्रुघ्न को देखकर उठकर उनका आलिंगन किया और स्वागत करते हुए कहा: "हे महाबाहो! आपका स्वागत है। आप कुशल तो हैं? क्या मथुरा रमणीय है? क्या राज्य सुखपूर्वक चल रहा है?" शत्रुघ्न ने उत्तर दिया: "हे भगवन्! आपकी कृपा से सब कुशल है और राज्य सुखद है।" वाल्मीकि ने उन्हें आसन, पाद्य और अर्घ्य दिया तथा राम और भरत के कुशलक्षेम पूछे। शत्रुघ्न ने राम का सब वृत्तान्त कहना आरम्भ किया। वाल्मीकि ने प्रेमपूर्वक राम के उत्तम चरित्र को सुना।
📖 रामकथा श्रवण (श्लोक ११-१५)
॥ श्लोक ११-१५ ॥
वाल्मीकिः कथयामास रामायणमनुत्तमम्।
शत्रुघ्नः श्रुतवान्सर्वं भक्त्या परमया युतः॥
यथा रामो वनं गत्वा सीतया सह लक्ष्मणः।
हत्वा रावणमासाद्य लङ्कां विधिवशात्पुनः॥
शत्रुघ्नो विस्मयं प्राप्तो रामस्य चरितं श्रुत्वा।
स्तुतिं चक्रे महात्मानं मुनिं च पर्यपूजयत्॥
ततः कतिपयाहानि तत्रोष्य स महायशाः।
आमन्त्र्य मुनिमुख्यं तं मथुरां पुनरागतः॥
शत्रुघ्नः श्रुतवान्सर्वं भक्त्या परमया युतः॥
यथा रामो वनं गत्वा सीतया सह लक्ष्मणः।
हत्वा रावणमासाद्य लङ्कां विधिवशात्पुनः॥
शत्रुघ्नो विस्मयं प्राप्तो रामस्य चरितं श्रुत्वा।
स्तुतिं चक्रे महात्मानं मुनिं च पर्यपूजयत्॥
ततः कतिपयाहानि तत्रोष्य स महायशाः।
आमन्त्र्य मुनिमुख्यं तं मथुरां पुनरागतः॥
📖 भावार्थ : वाल्मीकि ने शत्रुघ्न को अनुत्तम रामायण सुनाई। शत्रुघ्न ने परम भक्ति से सब कुछ सुना – कैसे राम सीता और लक्ष्मण के साथ वन गए, रावण को मारा, लंका पर विजय प्राप्त की और अयोध्या लौटे। राम का चरित्र सुनकर शत्रुघ्न आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने महात्मा राम की स्तुति की तथा मुनि का पूजन किया। कुछ दिन वहाँ रहकर महायशस्वी शत्रुघ्न ने मुनि से आज्ञा ली और मथुरा लौट आए।
✨ आशीर्वाद एवं प्रस्थान (श्लोक १६-२०)
॥ श्लोक १६-२० ॥
वाल्मीकिराशिषश्चास्मै ददौ दिव्याः समाहितः।
पुत्रपौत्रविवृद्धिं च राज्यस्थैर्यं सुखानि च॥
शत्रुघ्नोऽपि च तं नत्वा प्रदक्षिणपुरःसरम्।
आरुरोह रथं शीघ्रं मथुरां प्रति सत्वरः॥
एवं शत्रुघ्नवर्येण मुनिदर्शनमुत्तमम्।
कृतं धर्म्यं यशस्यं च सर्वपापप्रणाशनम्॥
य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वापि भक्तितः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥
पुत्रपौत्रविवृद्धिं च राज्यस्थैर्यं सुखानि च॥
शत्रुघ्नोऽपि च तं नत्वा प्रदक्षिणपुरःसरम्।
आरुरोह रथं शीघ्रं मथुरां प्रति सत्वरः॥
एवं शत्रुघ्नवर्येण मुनिदर्शनमुत्तमम्।
कृतं धर्म्यं यशस्यं च सर्वपापप्रणाशनम्॥
य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वापि भक्तितः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥
📖 भावार्थ : वाल्मीकि ने एकाग्रचित्त होकर शत्रुघ्न को दिव्य आशीर्वाद दिए – पुत्र-पौत्रों की वृद्धि, राज्य की स्थिरता और सुख। शत्रुघ्न ने उन्हें प्रणाम कर, प्रदक्षिणा कर, रथ पर चढ़कर शीघ्र मथुरा को प्रस्थान किया। इस प्रकार शत्रुघ्न ने मुनि के दर्शन किए, जो धर्म्य, यशस्वी और सब पापों का नाश करने वाले थे। जो व्यक्ति इस कथा को नित्य सुनता या सुनाता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे त्र्यशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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