उत्तर काण्ड अध्याय 82

शत्रुघ्न का मधुपुरी (मथुरा) में निवास स्थापित करना

लवणासुर का वध करने के बाद शत्रुघ्न मधुपुरी में एक नई नगरी बसाते हैं और वहीं निवास करने लगते हैं।

विवरण

लवणासुर का वध करने के बाद शत्रुघ्न मधुपुरी में ही रुक जाते हैं। वे उस स्थान को अत्यन्त रमणीय पाते हैं और राम की आज्ञा से वहाँ एक सुन्दर नगरी बसाते हैं। वे यमुना नदी के तट पर मधुवन में नगर का निर्माण करवाते हैं, जिसे मथुरा के नाम से जाना जाता है। शत्रुघ्न वहाँ का राज्य सम्भालते हैं और प्रजा का पालन धर्मपूर्वक करते हैं। कुछ समय पश्चात वे राम से मिलने अयोध्या जाते हैं, किन्तु पुनः मथुरा लौटकर वहाँ शासन करते हैं। यह सर्ग मथुरा नगरी की स्थापना का ऐतिहासिक वर्णन प्रस्तुत करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ८२

(शत्रुघ्न का मधुपुरी में निवास स्थापित करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्वयशीतितमः सर्गः ॥

🏗️ नगर निर्माण का संकल्प (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
शत्रुघ्नो राक्षसं हत्वा मधुपुर्यां महाबलः।
रम्यं स्थानं समालोक्य निवासाय मनो दधे॥
स मुनिं नारदं प्राह यथावृत्तं निवेद्य च।
इच्छामि स्थापयितुं च नगरीमत्र शोभनाम्॥
नारदः प्राह रामस्य समीपं गच्छ सत्वरम्।
आज्ञां प्राप्य ततः कुरु यदभिप्रेतमात्मनः॥
ततः शत्रुघ्न आगत्य रामचन्द्रमपूजयत्।
प्रणम्य शिरसा भूमौ न्यवेदयत चेष्टितम्॥
रामः प्रहर्षितो वाक्यं शत्रुघ्नं प्रत्यभाषत।
साधु साधु महाबाहो यत्त्वया राक्षसो हतः॥
📖 भावार्थ : लवणासुर का वध करने के बाद महाबलशाली शत्रुघ्न मधुपुरी के रमणीय स्थान को देखकर वहाँ निवास करने की इच्छा करने लगे। उन्होंने नारद मुनि को बुलाकर सारा वृत्तान्त कहा और वहाँ एक सुन्दर नगरी स्थापित करने की अभिलाषा व्यक्त की। नारद ने कहा: "पहले राम के पास जाकर आज्ञा ले लो, फिर जो चाहो करो।" शत्रुघ्न तुरन्त अयोध्या गए और रामचन्द्र को प्रणाम करके सब निवेदन किया। राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले: "साधु-साधु महाबाहो! तुमने राक्षस का वध किया।"

🙏 राम की आज्ञा (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा शत्रुघ्नं भरताग्रजः।
यदिच्छसि निवासं त्वं मधुपुर्यां करिष्यसि॥
तत्र गच्छ महाबाहो नगरीं स्थापयाद्भुताम्।
यमुनातीररम्ये च मधुवने मनोरमे॥
शत्रुघ्नः प्रत्युवाचेदं राघवं प्रियदर्शनम्।
यथाज्ञापयसीदानीं करिष्ये नात्र संशयः॥
ततो रामः परिष्वज्य शत्रुघ्नं सान्त्वयन्निव।
ददौ कोटिश्च धनुषा रथानश्वान्धनानि च॥
शत्रुघ्नो राममामन्त्र्य भ्रातृभिः सह नन्दनः।
प्रययौ मधुपुरीं प्रति पुनरेव महायशाः॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा राम ने शत्रुघ्न से कहा: "यदि तुम मधुपुरी में निवास करना चाहते हो, तो वहाँ जाकर एक अद्भुत नगरी बसाओ। यमुना के रमणीय तट पर मधुवन अत्यन्त मनोरम है।" शत्रुघ्न ने उत्तर दिया: "हे राघव! आप जैसी आज्ञा दें, मैं वैसा ही करूँगा, इसमें संशय नहीं।" तब राम ने शत्रुघ्न को हृदय से लगाकर सान्त्वना दी और असंख्य धन, रथ, घोड़े तथा अन्य धन दिए। शत्रुघ्न राम से आज्ञा लेकर, भाइयों से मिलकर, पुनः मधुपुरी को प्रस्थित हुए।

🏰 मथुरा नगरी का निर्माण (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
प्राप्य मधुपुरीं शूरः शत्रुघ्नः परवीरहा।
नगरीं स्थापयामास विश्वकर्मसमो यथा॥
स चकार महाप्राकारं परिखाभिश्च संवृतम्।
राजमार्गान्सुविहितान् चत्वरांश्च सुशोभनान्॥
हेमप्रासादसंयुक्तां देवगन्धर्वनिर्मिताम्।
नानामणिविचित्रां च मथुरां नाम विश्रुताम्॥
तत्र वासं चकाराशु सह सैन्येन धार्मिकः।
प्रजाः पालयतां श्रेष्ठो रामस्यानुमते स्थितः॥
यमुनायास्तटे रम्ये मधुवने मनोरमे।
नानावृक्षसमाकीर्णे पुष्पिते फलशालिनि॥
📖 भावार्थ : मधुपुरी पहुँचकर शत्रुघ्न ने विश्वकर्मा के समान कुशलता से नगरी का निर्माण आरम्भ किया। उन्होंने ऊँची-ऊँची प्राचीरें बनवाईं, चारों ओर गहरी खाइयाँ खुदवाईं, सुन्दर राजमार्ग और चौराहे बनवाए। सोने के महलों से युक्त, अनेक मणियों से विचित्र वह नगरी "मथुरा" नाम से प्रसिद्ध हुई। धार्मिक शत्रुघ्न ने वहाँ सेना सहित निवास किया और राम की आज्ञा से प्रजापालन में लग गए। यह नगरी यमुना के रमणीय तट पर, मधुवन में स्थित थी, जो तरह-तरह के वृक्षों, पुष्पों और फलों से सम्पन्न थी।
॥ श्लोक १६-२० ॥
शत्रुघ्नः प्रतिवासं च कृत्वा धर्मेण पालयन्।
बभूव प्रीतिमान्राजा प्रजानां पालने रतः॥
कदाचित्स महातेजा रामं द्रष्टुं समुत्सुकः।
जगामायोध्यया रम्यां भ्रातृभिः सह मोदितः॥
रामोऽपि दृष्ट्वा सम्प्रीत्या शत्रुघ्नं परिषस्वजे।
पप्रच्छ कुशलं राज्ये प्रजानां च यथासुखम्॥
शत्रुघ्नः कथयामास सर्वं यत्कृतवान्पुरा।
रामः श्रुत्वा परां प्रीतिमवाप सह भ्रातृभिः॥
पुनः स राघवं प्राह मथुरां गन्तुमिच्छया।
रामः समनुजज्ञे तं प्रेषयामास बान्धवान्॥
📖 भावार्थ : मथुरा में निवास करके शत्रुघ्न धर्मपूर्वक राज्य का पालन करने लगे और प्रजापालन में रत रहकर प्रसन्न रहते थे। एक दिन वे राम से मिलने के लिए उत्सुक हुए और अयोध्या गए। वहाँ भाइयों के साथ आनन्दित हुए। राम ने उनसे भेंट करके राज्य और प्रजा के कुशलक्षेम पूछे। शत्रुघ्न ने सब वृत्तान्त कह सुनाया। सब सुनकर राम अत्यन्त प्रसन्न हुए। फिर शत्रुघ्न ने मथुरा लौटने की आज्ञा माँगी और राम ने उन्हें आज्ञा देकर बन्धु-बान्धवों सहित विदा किया।

🏡 स्थायी निवास (श्लोक २१-२५)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
शत्रुघ्नो मथुरां प्राप्य पुनरेव न्यवेशयत्।
स राजा धार्मिको भूत्वा प्रजाः पालयतां वरः॥
तस्य राज्ञः प्रभावेण मथुरा सम्प्रवर्धिता।
धनधान्यसमाकीर्णा सुखिता निरुपद्रवा॥
एवं शत्रुघ्नवीर्येण स्थापिता मथुरा पुरी।
रामाज्ञया धर्मपूर्वं यशो लेभे महात्मना॥
इतिहासं पुराणं च यः पठेत्सुसमाहितः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो रामलोकं स गच्छति॥
📖 भावार्थ : मथुरा लौटकर शत्रुघ्न ने पुनः वहाँ निवास किया। धार्मिक राजा होकर उन्होंने प्रजापालन में उत्कृष्टता प्राप्त की। उनके प्रभाव से मथुरा का विस्तार हुआ, धन-धान्य से परिपूर्ण होकर सुखी और निरुपद्रव बनी। इस प्रकार शत्रुघ्न के पराक्रम से, राम की आज्ञा से धर्मपूर्वक मथुरा नगरी स्थापित हुई और उन्होंने महान यश प्राप्त किया। जो व्यक्ति इस प्राचीन इतिहास को एकाग्रचित्त होकर पढ़ता है, वह सब पापों से मुक्त होकर रामलोक को प्राप्त होता है।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे द्वयशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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