उत्तर काण्ड अध्याय 81

लवणासुर का वध

राम के आदेश पर शत्रुघ्न लवणासुर का वध करने के लिए प्रस्थान करते हैं और मधुपुरी (मथुरा) में उसका संहार करते हैं।

विवरण

राम के राज्य में एक दिन ऋष्यशृंग आदि मुनि आते हैं और राम से लवणासुर के अत्याचारों की शिकायत करते हैं। लवणासुर, मधु नामक राक्षस का पुत्र, शिव के दिए हुए त्रिशूल के बल पर सबको पीड़ित करता है। राम शत्रुघ्न को उसका वध करने का आदेश देते हैं। शत्रुघ्न वनों को पार कर मधुपुरी पहुँचते हैं और लवणासुर से युद्ध करते हैं। त्रिशूल के प्रभाव से शत्रुघ्न मूर्छित हो जाते हैं, किन्तु दिव्य उपाय से वह पुनः चेतन होकर लवणासुर का वध कर देते हैं। इस विजय से मुनियों में हर्ष छा जाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ८१

(लवणासुर का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकाशीतितमः सर्गः ॥

🧘 ऋषियों की शिकायत और राम का आदेश (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामः सह भ्रात्रा निषसाद सभातले।
ऋषयश्च समाजग्मुर्विश्वामित्रपुरोगमाः॥
ऋष्यशृङ्गो महातेजा गालवश्च महातपाः।
शतानन्दश्च धर्मात्मा वसिष्ठश्च महामुनिः॥
ते रामं समुपागम्य कृताञ्जलिपुटास्तदा।
ऊचुः परमधर्मज्ञ रक्षःपीडितभूतलम्॥
लवणो नाम दुष्टात्मा मधोः पुत्रो महाबलः।
शूलं दिव्यं धारयते शूलपाणेर्महात्मनः॥
तेन शूलेन वीर्येण पीड्यते सर्वजन्तवः।
तं निहन्तुं महाबाहो शक्तस्त्वमसि राघव॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; रामः = राम; सह = साथ; भ्रात्रा = भाई के; निषसाद = बैठे; सभातले = सभा में; ऋषयः = ऋषि; च = और; समाजग्मुः = आए; विश्वामित्रपुरोगमाः = विश्वामित्र के नेतृत्व में; ऋष्यशृङ्गः = ऋष्यशृंग; महातेजाः = महान तेजस्वी; गालवः = गालव; च = और; महातपाः = महान तपस्वी; शतानन्दः = शतानन्द; च = और; धर्मात्मा = धर्मात्मा; वसिष्ठः = वसिष्ठ; च = और; महामुनिः = महामुनि; ते = वे; रामम् = राम के पास; समुपागम्य = आकर; कृताञ्जलिपुटाः = हाथ जोड़े हुए; तदा = तब; ऊचुः = बोले; परमधर्मज्ञ = हे परम धर्मज्ञ; रक्षःपीडितभूतलम् = राक्षसों द्वारा पीड़ित भूतल; लवणः = लवण; नाम = नाम; दुष्टात्मा = दुष्टात्मा; मधोः = मधु का; पुत्रः = पुत्र; महाबलः = महान बलवान; शूलम् = त्रिशूल; दिव्यम् = दिव्य; धारयते = धारण करता है; शूलपाणेः = शूलपाणि (शिव) के; महात्मनः = महान आत्मा के; तेन = उस; शूलेन = त्रिशूल से; वीर्येण = वीर्य से; पीड्यते = पीड़ित होते हैं; सर्वजन्तवः = सभी प्राणी; तम् = उसे; निहन्तुम् = मारने के लिए; महाबाहो = हे महाबाहो; शक्तः = समर्थ; त्वम् = तुम; असि = हो; राघव = राघव।
📖 भावार्थ : एक दिन राम अपने भाइयों के साथ सभा में बैठे थे। तभी विश्वामित्र के नेतृत्व में अनेक ऋषि-मुनि वहाँ आए – ऋष्यशृंग, गालव, शतानन्द और वसिष्ठ आदि। उन्होंने हाथ जोड़कर राम से कहा: "हे परम धर्मज्ञ! यह भूतल राक्षसों से पीड़ित है। मधु नामक राक्षस का पुत्र लवणासुर अत्यन्त दुष्ट और बलशाली है। उसके पास महादेव शिव का दिया हुआ दिव्य त्रिशूल है। उसी त्रिशूल के बल पर वह सभी प्राणियों को पीड़ित करता है। हे महाबाहो राघव! आप ही उसका वध करने में समर्थ हैं।" इस प्रकार ऋषियों ने राम से लवणासुर के अत्याचारों का निवेदन किया।

🚩 शत्रुघ्न का प्रस्थान (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा शत्रुघ्नं प्रियदर्शनम्।
गच्छ त्वं सह सैन्येन लवणं जहि राक्षसम्॥
शूलं तस्य महादेवप्रदत्तं दुर्धरं रणे।
उपायेन विनाश्यं तद्राक्षसश्च न संशयः॥
शत्रुघ्नः प्रत्युवाचेदं रामचन्द्रं कृताञ्जलिः।
आज्ञापय महाबाहो याहि युद्धाय निश्चितः॥
ततो रामः परिष्वज्य शत्रुघ्नं भरताग्रजः।
आशिषः प्रययौ दिव्याः सैन्यं च समचोदयत्॥
शत्रुघ्नो राममामन्त्र्य भ्रातृभिः सह नन्दनः।
प्रययौ मधुपुरीं प्रति वाहिनीसमावृतः॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा राम ने शत्रुघ्न से कहा: "हे प्रियदर्शन शत्रुघ्न! तुम सेना के साथ जाकर लवणासुर राक्षस का वध करो। उसके पास महादेव का दिया हुआ त्रिशूल है, जो युद्ध में अत्यन्त दुर्धर है। किन्तु किसी उपाय से उस त्रिशूल को नष्ट करना होगा और राक्षस को मारना होगा – इसमें संशय नहीं।" शत्रुघ्न ने हाथ जोड़कर कहा: "हे महाबाहो! आज्ञा दीजिए, मैं युद्ध के लिए निश्चित हूँ।" तब राम ने शत्रुघ्न को हृदय से लगाकर दिव्य आशीर्वाद दिए और सेना को प्रस्थान की आज्ञा दी। शत्रुघ्न राम को प्रणाम कर, भाइयों से विदा लेकर, विशाल सेना के साथ मधुपुरी की ओर चल पड़े।

⚔️ युद्ध और लवणासुर का वध (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
शत्रुघ्नो मधुपुरीं प्राप्य ददर्श महावनम्।
लवणस्य निवासं च गुप्तं त्रिशूलरक्षितम्॥
स राक्षसो बलोन्मत्तः शूलमादाय दंशितः।
अभिदुद्राव वेगेन शत्रुघ्नं जयकाङ्क्षया॥
ततः शूलेन महता शत्रुघ्नो हृदि ताडितः।
निपपात मूर्छितो भूमौ सैन्यैः सह सुदुःखितः॥
तं दृष्ट्वा पतितं वीरं विषण्णाः सर्वसैनिकाः।
हा हताः स्मेति करुणं प्रारोदन्भयविह्वलाः॥
ततः प्रोवाच देवर्षिर्नारदो मुनिसत्तमः।
मा भैष्ट शत्रुघ्नोऽयं जीविष्यति न संशयः॥
📖 भावार्थ : शत्रुघ्न मधुपुरी पहुँचकर वहाँ के घने वन और लवणासुर के त्रिशूल से सुरक्षित निवास को देखा। लवणासुर बल के मद में चूर होकर, कवच पहने, त्रिशूल लेकर शत्रुघ्न पर धावा बोला। उसने अपने भयंकर त्रिशूल से शत्रुघ्न के हृदय पर आघात किया। शत्रुघ्न मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े, और उनकी समस्त सेना दुःखी हो गई। वीर शत्रुघ्न को गिरा देख सैनिक विषाद में डूब गए और हाय, हम मारे गए कहकर करुण विलाप करने लगे। तभी वहाँ देवर्षि नारद प्रकट हुए और बोले: "डरो मत, यह शत्रुघ्न निश्चय ही जीवित रहेंगे।"
॥ श्लोक १६-२० ॥
नारदस्तु महातेजा दिव्यज्ञानसमन्वितः।
उपदेशं ददौ तस्मै शूलस्यापनयाय वै॥
अन्नं प्रकीर्णं भूमौ तु शूलं गत्वा निवर्तताम्।
एतद्विज्ञाय मुनिना शत्रुघ्नः सहसोत्थितः॥
तथा कृत्वा महाबाहुः शूलमस्य विनाशयत्।
ततो धनुः समायम्य शरेणैनमताडयत्॥
लवणः क्रोधसंरक्तो युयुधे च महाबलः।
अन्ते शरेण शत्रुघ्नश्चिच्छेदास्य शिरो रणे॥
हते तस्मिन्महावीर्ये राक्षसे भीमदर्शने।
मुनयः सिद्धगन्धर्वाः प्रशशंसुः पुनःपुनः॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी नारद, जिन्हें दिव्य ज्ञान था, ने त्रिशूल को निष्क्रिय करने का उपाय बताया: "उस त्रिशूल को भूमि पर बिखरे हुए अन्न के पास जाने से ही वह निवृत्त होता है।" यह जानकर शत्रुघ्न तुरंत उठे और उस उपाय को किया। त्रिशूल का प्रभाव समाप्त हो गया। फिर महाबाहु शत्रुघ्न ने धनुष उठाया और बाणों से लवणासुर को घायल किया। क्रोध में भरे लवणासुर ने युद्ध किया, पर अन्त में शत्रुघ्न ने अपने बाण से उसका सिर काट दिया। उस भयंकर राक्षस के मारे जाने पर मुनियों, सिद्धों और गन्धर्वों ने शत्रुघ्न की बारंबार प्रशंसा की।

🎉 विजयोल्लास (श्लोक २१-२५)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
शत्रुघ्नो राक्षसं हत्वा मुनिभिः पूजितस्तदा।
मधुपुर्यां च नगरीं चकार सुमनोहराम्॥
सीतां प्रति महातेजा राघवं च महाबलम्।
प्रेषयामास दूतांश्च हर्षयुक्तो नरर्षभः॥
रामोऽपि प्रीतिमानासीच्छ्रुत्वा शत्रुघ्नविक्रमम्।
प्रशशंस च धर्मात्मा भ्रातरं प्रियदर्शनम्॥
एवं शत्रुघ्नवीर्येण राक्षसो विनिपातितः।
स्थापिता मधुपुरी च धर्मेण सुसमृद्धिनी॥
📖 भावार्थ : लवणासुर का वध करके शत्रुघ्न ने मुनियों से पूजा ग्रहण की। फिर उन्होंने मधुपुरी में एक सुन्दर नगरी बसाई। प्रसन्नचित्त शत्रुघ्न ने दूतों के द्वारा यह समाचार सीता और राम के पास भेजा। राम ने अपने भाई का पराक्रम सुनकर अत्यन्त हर्षित होकर उनकी प्रशंसा की। इस प्रकार शत्रुघ्न के वीर्य से उस राक्षस का अन्त हुआ और मधुपुरी धर्मपूर्वक समृद्ध हुई।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे एकाशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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