उत्तर काण्ड अध्याय 80

शत्रुघ्न का लवणासुर से सामना

शत्रुघ्न का लवणासुर से घोर युद्ध होता है और अन्त में वे राम के दिए ब्रह्मास्त्र से उस राक्षस का वध कर देते हैं।

विवरण

शत्रुघ्न ने मधुपुरी के निकट डेरा डाला। लवणासुर रात्रि में उन पर आक्रमण करता है। भयंकर युद्ध होता है। लवणासुर अत्यन्त बलशाली है, किन्तु शत्रुघ्न अडिग रहते हैं। जब लवणासुर अपने शूल से शत्रुघ्न पर प्रहार करता है, तो वे राम से प्राप्त ब्रह्मास्त्र का स्मरण कर उसका प्रयोग करते हैं। ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से लवणासुर का वध हो जाता है। देवता पुष्पवर्षा करते हैं। शत्रुघ्न मधुपुरी में प्रवेश करते हैं और वहाँ के निवासी उनका स्वागत करते हैं। यह सर्ग शत्रुघ्न की विजय और धर्म की स्थापना का सूचक है।

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ८०

(शत्रुघ्न का लवणासुर से सामना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अशीतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : शत्रुघ्न मधुपुरी के निकट पड़ाव डाले हुए हैं। लवणासुर उन पर आक्रमण करता है। यह सर्ग उस भीषण युद्ध और शत्रुघ्न की विजय का वर्णन करता है।

🌙 लवणासुर का रात्रि आक्रमण (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-७ ॥
ततः स राक्षसो घोरो लवणो भीमविक्रमः।
रात्रौ सुप्तं बलं द्रष्टुं शत्रुघ्नस्य महात्मनः॥
निश्चक्राम पुरीं त्यक्त्वा गर्जमानो मुहुर्मुहुः।
ददर्श सैन्यं विस्तीर्णं शत्रुघ्नेनाभिरक्षितम्॥
ततः क्रोधसमाविष्टो लवणो राक्षसेश्वरः।
चिक्षेप शूलं घोरं शत्रुघ्नरथमूर्धनि॥
शत्रुघ्नोऽपि महातेजा जागर्ति स्म तदा निशि।
दृष्ट्वा शूलं समायान्तं चिच्छेद निशितैः शरैः॥
📖 भावार्थ : उसके बाद वह घोर राक्षस लवण, जो भीमविक्रमी था, रात्रि में महात्मा शत्रुघ्न की सेना को सोता हुआ देखने के लिए नगरी से बाहर निकला। वह बार-बार गर्जना कर रहा था। उसने शत्रुघ्न द्वारा सुरक्षित विस्तीर्ण सेना को देखा। तब क्रोध से भरकर उस राक्षसेश्वर लवण ने अपना घोर शूल शत्रुघ्न के रथ पर फेंका। महातेजस्वी शत्रुघ्न उस रात्रि में जाग रहे थे। उस शूल को आते देख उन्होंने अपने तीक्ष्ण बाणों से उसे काट डाला।
॥ श्लोक ८-१२ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज लवणो राक्षसेश्वरः।
गदामादाय महतीं शत्रुघ्नाय प्रधावितः॥
शत्रुघ्नोऽपि गदां गुर्वीं गृहीत्वा रिपुघातिनीम्।
अभ्यधावत संक्रुद्धो लवणं प्रति वीर्यवान्॥
तयोर्युद्धं समभवद् गदाभ्यां भीमनादिनोः।
देवदानवगन्धर्वा द्रष्टुं सम्प्रापुरञ्जसा॥
📖 भावार्थ : तब क्रोधित होकर महाराज लवणासुर ने एक महान गदा उठाई और शत्रुघ्न की ओर दौड़ा। शत्रुघ्न ने भी शत्रुघातिनी भारी गदा लेकर क्रोधित होकर लवण की ओर दौड़ लगाई। उन दोनों भीमनादी वीरों का गदाओं से भयंकर युद्ध हुआ। देवता, दानव और गन्धर्व उस युद्ध को देखने के लिए वहाँ एकत्र हो गए।

⚔️ घोर युद्ध और ब्रह्मास्त्र का प्रयोग (श्लोक १३-३०)

॥ श्लोक १३-२० ॥
गदाप्रहारैर्बहुभिस्तौ विचित्रैः परस्परम्।
युयुधाते महावीर्यौ बलिनौ रणमूर्धनि॥
शत्रुघ्नस्य गदा घोरा लवणस्य महात्मनः।
निजघान रणे वीरौ क्षतजार्द्रौ पुनः पुनः॥
ततो दीर्घेण कालेन शत्रुघ्नो बलिनां वरः।
लवणस्य गदां गुर्वीं पातयामास भूतले॥
गदाहीनं ततो दृष्ट्वा लवणं राक्षसेश्वरम्।
शत्रुघ्नः परमप्रीतः स्मरन् रामस्य शासनम्॥
📖 भावार्थ : वे दोनों महावीर्य, बलशाली, रणभूमि में एक-दूसरे पर अनेक विचित्र गदाप्रहार करते हुए युद्ध कर रहे थे। शत्रुघ्न की घोर गदा और लवण की गदा बार-बार वीरों पर आघात कर रही थीं, जिससे वे रक्त से भीग गए। तत्पश्चात् बहुत देर के बाद बलिनां वर शत्रुघ्न ने लवण की भारी गदा को भूमि पर गिरा दिया। राक्षसेश्वर लवण को गदाहीन देखकर शत्रुघ्न अत्यन्त प्रसन्न हुए और राम की आज्ञा का स्मरण किया।
॥ श्लोक २१-३० ॥
ततः शत्रुघ्न आदाय ब्रह्मास्त्रं परमाद्भुतम्।
रामदत्तं महाघोरं जजाप परमं मनुम्॥
संदधे धनुषि क्रुद्धो लवणं प्रति वीर्यवान्।
तन्मुक्तं ब्रह्मदण्डाभं जाज्वल्यमानं महाप्रभम्॥
लवणस्य महाकायं भस्मसात् समपद्यत।
हते तस्मिन् महारौद्रे राक्षसे लोककण्टके॥
प्रहृष्टा देवताः सर्वाः पुष्पवर्षं प्रचक्रिरे।
शत्रुघ्नं पूजयामासुर्ब्राह्मणाश्च तपोधनाः॥
📖 भावार्थ : तब शत्रुघ्न ने रामदत्त परम अद्भुत, महाघोर ब्रह्मास्त्र को उठाया और उसके परम मन्त्र का जाप किया। क्रुद्ध होकर उस वीर ने धनुष पर साधा। वह ब्रह्मदण्ड के समान प्रज्वलित, महाप्रभावशाली अस्त्र छूटा और उसने लवण के महाकाय शरीर को भस्म कर दिया। उस महारौद्र, लोककण्टक राक्षस के मारे जाने पर सभी देवता हर्षित हुए और पुष्पवर्षा की। तपोधन ब्राह्मणों ने शत्रुघ्न की पूजा की।

🏰 शत्रुघ्न का मधुपुरी में प्रवेश और विजय का समाचार (श्लोक ३१-५२)

॥ श्लोक ३१-४० ॥
ततः शत्रुघ्न आनन्द्य सैन्यान् सर्वान् समन्ततः।
मधुपुरीं प्रविवेश राजमार्गेण शोभितः॥
तं दृष्ट्वा नगरं रम्यं हतशत्रुं नरर्षभम्।
पूजयामासुरव्यग्राः प्रजाः सर्वा यथाविधि॥
रामाय प्रेषयामास दूतं शत्रुघ्न आत्मवान्।
हतं लवणमाख्यातुं सर्वं वृत्तं यथातथम्॥
रामोऽपि प्रीतिमान् भूत्वा श्रुत्वा शत्रुघ्नविक्रमम्।
प्रशशंस सुहृत्सर्वैः सहितो धर्मवत्सलः॥
लक्ष्मणो भरतश्चैव सीता देवी च मैथिली।
प्रहर्षमतुलं प्राप्ताः श्रुत्वा शत्रुघ्नविक्रमम्॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् शत्रुघ्न ने समस्त सेना को आनन्दित किया और राजमार्ग से होते हुए मधुपुरी में प्रवेश किया। उस रम्य नगर में शत्रुहीन नरेश को देखकर सभी प्रजाजनों ने विधिपूर्वक उनका पूजन किया। आत्मवान् शत्रुघ्न ने राम के पास दूत भेजा और लवण के वध तथा सम्पूर्ण वृत्तान्त की सूचना दी। राम भी यह समाचार सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और सब मित्रों सहित शत्रुघ्न के पराक्रम की प्रशंसा की। लक्ष्मण, भरत और देवी सीता भी शत्रुघ्न के पराक्रम को सुनकर अपार हर्षित हुए।
॥ श्लोक ४१-५२ ॥
मधुपुर्यां स्थितो राजा शत्रुघ्नः परवीरहा।
प्रशास्ति धर्मतो राज्यं रामस्यानुचरः प्रियः॥
तस्य कीर्तिर्दिवं याता रामभक्त्या समन्विता।
यथा रामस्तथा सोऽपि लोके पूज्यतमोऽभवत्॥
इति शत्रुघ्नविक्रान्तं लवणस्य वधं प्रति।
सर्गेऽस्मिन् वर्णितं सम्यक् शृण्वतां पापनाशनम्॥
य इदं शृणुयान्नित्यं शत्रुघ्नचरितं शुभम्।
सर्वान् कामानवाप्नोति रामभक्तिं च विन्दति॥
📖 भावार्थ : परवीरहा राजा शत्रुघ्न मधुपुरी में स्थित होकर धर्मपूर्वक राज्य का शासन करने लगे, वे राम के प्रिय अनुचर थे। रामभक्ति से युक्त उनकी कीर्ति दिव्यलोक तक पहुँची। जैसे राम पूज्य हैं, वैसे ही शत्रुघ्न भी लोक में अत्यन्त पूज्य हुए। इस प्रकार इस सर्ग में शत्रुघ्न के पराक्रम और लवण के वध का सम्यक् वर्णन किया गया, जो सुनने वालों के पापों का नाश करने वाला है। जो नित्य इस शुभ शत्रुघ्न चरित्र को सुनता है, वह सभी कामनाओं को प्राप्त करता है और रामभक्ति को पाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🛡️ शत्रुघ्न का अद्वितीय पराक्रम

शत्रुघ्न ने न केवल गदा युद्ध में लवण को परास्त किया, बल्कि ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से उसका वध किया। यह उनके अप्रतिम बल और राम के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

👑 राम का आदेश और शत्रुघ्न की निष्ठा

राम की आज्ञा का पालन करते हुए शत्रुघ्न ने धर्म की स्थापना की। यह दर्शाता है कि अनुज का कर्तव्य है कि वह बड़े भाई के आदेश का पालन करे और प्रजा के कल्याण में लगे रहे।

🌟 देवताओं का आशीर्वाद

लवण वध के बाद देवताओं की पुष्पवर्षा यह प्रमाण है कि धर्म की विजय पर सारा विश्व प्रसन्न होता है। अधर्म का नाश होना ही सृष्टि के कल्याण का मार्ग है।

📖 उत्तरकाण्ड का सार

यह सर्ग उत्तरकाण्ड के प्रमुख उपाख्यान का समापन है। शत्रुघ्न की विजय के साथ ही राम के राज्य में सर्वत्र सुख-शांति स्थापित होती है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि साहस, धैर्य और गुरु (बड़े भाई) की आज्ञा का पालन करने से बड़ी से बड़ी बाधा भी पार की जा सकती है। अधर्म का नाश होना निश्चित है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे अशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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