विष्णु और माल्यवान के बीच युद्ध

राक्षसों के एक प्रमुख योद्धा माल्यवान ने भगवान विष्णु को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में घोर संग्राम हुआ, जिसमें अंततः विष्णु विजयी रहे।

विवरण

इस सर्ग में राक्षसों के प्रमुख सेनापति माल्यवान का वर्णन है। वह अत्यंत बलवान और युद्धकला में निपुण था। पिछले युद्ध में अपने भाइयों और सेना को मरता देख वह क्रोधित हो उठा और उसने स्वयं विष्णु से युद्ध करने का निश्चय किया। माल्यवान ने विष्णु पर अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन विष्णु उसे सहजता से परास्त करते रहे। माल्यवान ने अपनी माया का भी सहारा लिया, किंतु विष्णु ने उसकी सभी मायाओं को नष्ट कर दिया। अंततः विष्णु ने अपने चक्र से माल्यवान का वध कर दिया। इस युद्ध में माल्यवान की वीरता और विष्णु के पराक्रम का सुंदर चित्रण है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ८

(विष्णु और माल्यवान के बीच युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में राक्षसराज का वध हुआ। अब उसका भाई या सेनापति माल्यवान क्रोध से भरकर युद्ध के लिए आगे आता है। वह अत्यंत बलवान और मायावी है।

👹 माल्यवान का आगमन (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
हते राक्षसराजे तु माल्यवान् नाम राक्षसः।
श्रुत्वा स्वबान्धवान् सर्वान् निहतान् विष्णुना रणे॥
क्रोधसंरक्तनयनो निशश्वास महाबलः।
गदामुद्यम्य घोरां तामभ्यधावत केशवम्॥
तमापतन्तं वेगेन माल्यवन्तं महाबलम्।
ददर्श गरुडारूढो विष्णुः शत्रुनिबर्हणः॥
सिंहनादं विमुञ्चन्तं कम्पयन्तं धरातलम्।
गदापाणिं महाकायं प्रलयाम्बुदनिःस्वनम्॥
विष्णुस्तमभिनिघ्नन्तं गदया मूर्ध्नि वेगितः।
ताडयामास संक्रुद्धः शार्ङ्गमुक्तैः शिलीमुखैः॥
🔹 पदच्छेद : हते = मारे जाने पर; राक्षसराजे = राक्षसराज के; तु = तो; माल्यवान् = माल्यवान; नाम = नामक; राक्षसः = राक्षस; श्रुत्वा = सुनकर; स्वबान्धवान् = अपने बंधुओं को; सर्वान् = सब; निहतान् = मारे गए; विष्णुना = विष्णु द्वारा; रणे = युद्ध में; क्रोधसंरक्तनयनः = क्रोध से लाल नेत्र वाला; निशश्वास = साँस छोड़ी; महाबलः = महान बलशाली; गदाम् = गदा; उद्यम्य = उठाकर; घोराम् = भयंकर; ताम् = उस; अभ्यधावत = दौड़ा; केशवम् = केशव पर; तम् = उस; आपतन्तम् = आते हुए; वेगेन = वेग से; माल्यवन्तम् = माल्यवान को; महाबलम् = महान बलशाली; ददर्श = देखा; गरुडारूढः = गरुड़ पर सवार; विष्णुः = विष्णु ने; शत्रुनिबर्हणः = शत्रुओं का नाश करने वाले; सिंहनादम् = सिंहनाद; विमुञ्चन्तम् = छोड़ते हुए; कम्पयन्तम् = कंपाते हुए; धरातलम् = पृथ्वीतल को; गदापाणिम् = हाथ में गदा लिए; महाकायम् = विशाल शरीर वाले; प्रलयाम्बुदनिःस्वनम् = प्रलय के बादल के समान गर्जना करते हुए; विष्णुः = विष्णु ने; तम् = उसे; अभिनिघ्नन्तम् = प्रहार करते हुए; गदया = गदा से; मूर्ध्नि = सिर पर; वेगितः = वेग से; ताडयामास = मारा; संक्रुद्धः = अत्यंत क्रोधित होकर; शार्ङ्गमुक्तैः = शार्ङ्ग से छोड़े गए; शिलीमुखैः = बाणों से।
📖 भावार्थ : जब राक्षसराज का वध हो गया, तो माल्यवान नामक राक्षस ने यह सुना कि विष्णु ने उसके सभी बांधवों को युद्ध में मार डाला है। वह महाबली था। क्रोध से उसकी आँखें लाल हो गईं और उसने जोर से साँस छोड़ी। फिर उसने अपनी भयंकर गदा उठाई और केशव पर दौड़ पड़ा। शत्रुओं का नाश करने वाले गरुड़ पर सवार विष्णु ने उस महाबली माल्यवान को वेग से आते देखा। वह सिंहनाद कर रहा था, पृथ्वी को कंपा रहा था, हाथ में गदा लिए हुए उसका विशाल शरीर प्रलय के बादल के समान गर्जना कर रहा था। जब उसने गदा से विष्णु के सिर पर प्रहार किया, तो अत्यंत क्रोधित विष्णु ने अपने शार्ङ्ग धनुष से छोड़े गए बाणों द्वारा उस पर प्रहार किया। यहाँ माल्यवान का रौद्र रूप अत्यंत प्रभावशाली है। उसका क्रोध, उसकी गर्जना और उसका आक्रमण उसे एक अद्वितीय योद्धा के रूप में प्रस्तुत करता है। किंतु विष्णु उसके आक्रमण से विचलित नहीं हुए और तत्काल प्रत्याक्रमण किया। यह दृश्य युद्ध की भीषणता को और बढ़ा देता है।
॥ श्लोक ७-१२ ॥
ततो माल्यवता विष्णुः समागम्य महारणे।
गदाभिः परिघैः शूलैश्चक्रैर्बाणैः परस्परम्॥
जघ्नतुर्वीर्यसंपन्नौ क्षणदाचरकेशवौ।
देवदानवगन्धर्वाः सिद्धचारणपन्नगाः॥
समेतास्तत्र तद्युद्धं द्रष्टुकामाः समन्ततः।
तयोर्युद्धं महद्घोरं विस्मयं परमं गताः॥
न शेकतुस्तदान्योन्यं जेतुं युद्धे महाबलौ।
ततो माल्यवता माया प्रयुक्ता विविधा रणे॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; माल्यवता = माल्यवान के साथ; विष्णुः = विष्णु; समागम्य = युद्ध करके; महारणे = महान युद्ध में; गदाभिः = गदाओं से; परिघैः = परिघों से; शूलैः = शूलों से; चक्रैः = चक्रों से; बाणैः = बाणों से; परस्परम् = परस्पर; जघ्नतुः = मारा; वीर्यसंपन्नौ = वीर्य से संपन्न; क्षणदाचरकेशवौ = राक्षस और केशव; देवदानवगन्धर्वाः = देव, दानव, गन्धर्व; सिद्धचारणपन्नगाः = सिद्ध, चारण, पन्नग; समेताः = एकत्रित; तत्र = वहाँ; तत् = उस; युद्धम् = युद्ध को; द्रष्टुकामाः = देखने की इच्छा वाले; समन्ततः = चारों ओर से; तयोः = उन दोनों का; युद्धम् = युद्ध; महत् = महान; घोरम् = भयंकर; विस्मयम् = आश्चर्य; परमम् = परम; गताः = प्राप्त हुए; न शेकतुः = समर्थ नहीं हुए; तदा = तब; अन्योन्यम् = एक दूसरे को; जेतुम् = जीतने में; युद्धे = युद्ध में; महाबलौ = महान बलशाली; ततः = तब; माल्यवता = माल्यवान द्वारा; माया = माया; प्रयुक्ता = प्रयुक्त की गई; विविधा = अनेक प्रकार की; रणे = युद्ध में।
📖 भावार्थ : तब उस महान युद्ध में माल्यवान और विष्णु में भयंकर संग्राम आरंभ हुआ। दोनों वीर्य से संपन्न थे। वे गदाओं, परिघों, शूलों, चक्रों और बाणों से एक दूसरे पर प्रहार करने लगे। यह युद्ध देखने के लिए चारों ओर से देवता, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, चारण और पन्नग एकत्रित हो गए। वे उन दोनों के उस महान, भयंकर युद्ध को देखकर परम आश्चर्य में पड़ गए। वे दोनों महाबली योद्धा एक दूसरे को जीतने में समर्थ नहीं हो रहे थे। तब माल्यवान ने युद्ध में अनेक प्रकार की मायाओं का प्रयोग किया। इस भाग में युद्ध का रोमांच और विस्मय का वर्णन है। देवता भी यह देखकर चकित थे कि दोनों में से कौन विजयी होगा। माल्यवान का विष्णु के समान स्तर पर युद्ध करना उसकी महानता को दर्शाता है। उसकी माया का प्रयोग यह बताता है कि वह केवल बल से ही नहीं, बल्कि छल से भी युद्ध करने में सक्षम था। किंतु विष्णु उसकी माया से भी परे थे।

🪄 माल्यवान की माया और उसका निवारण (श्लोक १३-२६)

॥ श्लोक १३-१९ ॥
स मायया महाघोर्या राक्षसान् सृजते बहून्।
व्याघ्रसिंहांश्च शार्दूलान् गजान् क्रूरान् महोरगान्॥
ते विष्णुं सहसा सर्वे वेष्टयामासुरोजसा।
न चचाल महातेजा विष्णुः शत्रुनिबर्हणः॥
ततः प्रहस्य देवेशः शार्ङ्गचापधरो हरिः।
बाणजालेन महता तान् सर्वान् विनिवारयत्॥
ततो माया विनष्टा सा माल्यवतो दुरात्मनः।
दृष्ट्वा नष्टां तु मायां स्वां पुनरेवाभ्यधावत॥
गदां गृहीत्वा तीक्ष्णाग्रां वज्रसारमयीं दृढाम्।
जघान केशवं मूर्ध्नि गदया च महाबलः॥
गदाप्रहारसंभ्रान्तो न चचाल जनार्दनः।
ताडयामास च गदां चक्रेण च सुदर्शना॥
चक्रनुन्ना गदा तस्य खण्डशः समपद्यत।
अथ चक्रं महावेगं माल्यवति न्यपातयत्॥
🔹 पदच्छेद : स = उसने; मायया = माया से; महाघोर्या = अत्यंत भयंकर; राक्षसान् = राक्षसों को; सृजते = उत्पन्न किया; बहून् = बहुत से; व्याघ्रसिंहांश्च = बाघ, सिंह; शार्दूलान् = शार्दूल (शेर); गजान् = हाथी; क्रूरान् = क्रूर; महोरगान् = बड़े सर्प; ते = उन्होंने; विष्णुम् = विष्णु को; सहसा = सहसा; सर्वे = सब; वेष्टयामासुः = घेर लिया; ओजसा = बल से; न चचाल = नहीं डिगे; महातेजाः = महान तेजस्वी; विष्णुः = विष्णु; शत्रुनिबर्हणः = शत्रुओं का नाश करने वाले; ततः = तब; प्रहस्य = हँसकर; देवेशः = देवों के ईश; शार्ङ्गचापधरः = शार्ङ्ग धनुष धारण करने वाले; हरिः = हरि; बाणजालेन = बाणों के जाल से; महता = महान; तान् = उन; सर्वान् = सबको; विनिवारयत् = रोक दिया; ततः = तब; माया = माया; विनष्टा = नष्ट हो गई; सा = वह; माल्यवतः = माल्यवान की; दुरात्मनः = दुष्ट की; दृष्ट्वा = देखकर; नष्टाम् = नष्ट हुई; तु = तो; मायाम् = माया; स्वाम् = अपनी; पुनरेव = फिर से; अभ्यधावत = दौड़ा; गदाम् = गदा; गृहीत्वा = लेकर; तीक्ष्णाग्राम् = तीखे अग्रभाग वाली; वज्रसारमयीम् = वज्र के समान सार वाली; दृढाम् = मजबूत; जघान = मारा; केशवम् = केशव को; मूर्ध्नि = सिर पर; गदया = गदा से; च = और; महाबलः = महान बलशाली; गदाप्रहारसंभ्रान्तः = गदा के प्रहार से संभ्रांत (विचलित); न चचाल = नहीं डिगे; जनार्दनः = जनार्दन; ताडयामास = मारा; च = और; गदाम् = गदा को; चक्रेण = चक्र से; च = और; सुदर्शना = सुदर्शन चक्र से; चक्रनुन्ना = चक्र से नष्ट; गदा = गदा; तस्य = उसकी; खण्डशः = टुकड़े-टुकड़े; समपद्यत = हो गई; अथ = तब; चक्रम् = चक्र; महावेगम् = महान वेग वाला; माल्यवति = माल्यवान पर; न्यपातयत् = गिराया।
📖 भावार्थ : माल्यवान ने अपनी अत्यंत भयंकर माया से बहुत से राक्षस, बाघ, सिंह, शेर, क्रूर हाथी और बड़े-बड़े सर्प उत्पन्न कर दिए। उन सबने विष्णु को चारों ओर से बलपूर्वक घेर लिया। किंतु शत्रुओं का नाश करने वाले महातेजस्वी विष्णु तनिक भी विचलित नहीं हुए। तब देवेश हरि ने हँसते हुए अपने शार्ङ्ग धनुष से बाणों के महान जाल द्वारा उन सबको रोक दिया। इस प्रकार उस दुष्ट माल्यवान की माया नष्ट हो गई। अपनी माया को नष्ट हुआ देखकर माल्यवान ने फिर से आक्रमण किया। उसने तीखे अग्रभाग वाली वज्र के समान मजबूत गदा उठाई और महाबली होकर केशव के सिर पर गदा से प्रहार किया। गदा के प्रहार से भी जनार्दन विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से उस गदा पर प्रहार किया, जिससे चक्र के प्रहार से वह गदा टुकड़े-टुकड़े हो गई। फिर उन्होंने उसी महावेगशाली चक्र को माल्यवान पर गिरा दिया। यहाँ माल्यवान की माया और उसके अस्त्र-बल का वर्णन है, लेकिन विष्णु की शक्ति के आगे वह सब निष्फल हो गया। विष्णु का हँसते हुए उसका निवारण करना उनकी सहजता और श्रेष्ठता को दर्शाता है। माल्यवान का पुनः आक्रमण उसके धैर्य और वीरत्व को दिखाता है, किंतु अंततः उसे हार का सामना करना पड़ा।
॥ श्लोक २०-२६ ॥
चक्रनुन्नः स रक्षस्तु पपात धरणीतले।
हाहाकारो महानासीत्सर्वेषां तत्र पश्यताम्॥
तस्मिन्हते महावीर्ये माल्यवति महासुरे।
देवाः सर्षिगणाः सर्वे विष्णुं जयिनमैडयन्॥
ववृषुः पुष्पवर्षाणि गन्धर्वाः प्राणदन्मुदा।
दुन्दुभ्यश्च प्रणेदुश्च शङ्खाश्च विविधस्वनाः॥
विष्णुः प्रीतमनाः प्राह सुरान्सर्वानुपस्थितान्।
वरं वृणीध्वं भद्रं वो यथेष्टं प्रतिपादये॥
देवा ऊचुः प्रसन्नस्त्वं यदि नो वरदो भवान्।
रक्षां कुरु जगत्स्थस्य यथावदनुपूर्वशः॥
विष्णुरुवाच युष्माकं भक्तिरस्तु मयि नित्यदा।
लोकाश्च निरुपद्रवाः सन्तु सर्वे सुरोत्तमाः॥
इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुस्तत्रैवान्तरधीयत।
देवाश्च सर्वे सम्प्राप्ताः स्वं स्वं धाम यथाक्रमम्॥
🔹 पदच्छेद : चक्रनुन्नः = चक्र से पीड़ित; सः = वह; रक्षः = राक्षस; तु = तो; पपात = गिरा; धरणीतले = भूमि पर; हाहाकारः = हाहाकार; महान् = बड़ा; आसीत् = हुआ; सर्वेषाम् = सबके; तत्र = वहाँ; पश्यताम् = देखते हुए; तस्मिन् = उसके; हते = मारे जाने पर; महावीर्ये = महान पराक्रमी; माल्यवति = माल्यवान के; महासुरे = महान राक्षस के; देवाः = देवता; सर्षिगणाः = ऋषियों के समूह सहित; सर्वे = सब; विष्णुम् = विष्णु की; जयिनम् = विजयी की; ऐडयन् = स्तुति की; ववृषुः = बरसाए; पुष्पवर्षाणि = पुष्पों की वर्षा; गन्धर्वाः = गन्धर्वों ने; प्राणदन् = गाया; मुदा = आनंद से; दुन्दुभ्यः = दुन्दुभि; च = और; प्रणेदुः = बजाईं; च = और; शङ्खाः = शंख; च = और; विविधस्वनाः = अनेक प्रकार की ध्वनियाँ; विष्णुः = विष्णु; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; प्राह = बोले; सुरान् = देवताओं से; सर्वान् = सबसे; उपस्थितान् = उपस्थित; वरम् = वरदान; वृणीध्वम् = माँगो; भद्रम् = कल्याण; वः = तुम्हारा; यथेष्टम् = इच्छानुसार; प्रतिपादये = दूँगा; देवाः = देवता; ऊचुः = बोले; प्रसन्नः = प्रसन्न; त्वम् = आप; यदि = यदि; नः = हमें; वरदः = वरदाता; भवान् = आप; रक्षाम् = रक्षा; कुरु = करो; जगत्स्थस्य = जगत की स्थिति की; यथावत् = यथार्थ; अनुपूर्वशः = क्रम से; विष्णुः = विष्णु ने; उवाच = कहा; युष्माकम् = तुम्हारी; भक्तिः = भक्ति; अस्तु = हो; मयि = मुझमें; नित्यदा = सदा; लोकाः = लोक; च = और; निरुपद्रवाः = बिना उपद्रव के; सन्तु = हों; सर्वे = सब; सुरोत्तमाः = हे श्रेष्ठ देवताओ; इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; भगवान् = भगवान; विष्णुः = विष्णु; तत्रैव = वहीं; अन्तरधीयत = अंतर्धान हो गए; देवाः = देवता; च = और; सर्वे = सब; सम्प्राप्ताः = प्राप्त हुए; स्वम् = अपने; स्वम् = अपने; धाम = धाम; यथाक्रमम् = क्रमानुसार।
📖 भावार्थ : चक्र से पीड़ित होकर वह राक्षस माल्यवान भूमि पर गिर पड़ा। वहाँ उपस्थित सभी लोगों को देखते हुए उसकी मृत्यु पर हाहाकार मच गया। उस महापराक्रमी महाराक्षस माल्यवान के मारे जाने पर सभी देवताओं और ऋषियों ने विजयी विष्णु की स्तुति की। गन्धर्वों ने आनंद से गान किया और पुष्पों की वर्षा की। दुन्दुभियाँ और शंख अनेक प्रकार की ध्वनियों से बज उठे। प्रसन्नचित्त विष्णु ने वहाँ उपस्थित सभी देवताओं से कहा, "तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हें वरदान देना चाहता हूँ। तुम जो चाहो माँग लो।" देवताओं ने कहा, "हे प्रभो! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं, तो हमें यह वरदान दीजिए कि आप इस जगत की रक्षा यथावत् करते रहें।" विष्णु ने कहा, "हे श्रेष्ठ देवताओ! तुम्हारी मुझमें सदा भक्ति बनी रहे और सभी लोक निरुपद्रव रहें।" ऐसा कहकर भगवान विष्णु वहीं अंतर्धान हो गए। तब सभी देवता क्रमानुसार अपने-अपने धाम को लौट गए। माल्यवान का वध इस महासंग्राम की समाप्ति का सूचक है। अब सभी राक्षस मारे जा चुके थे। विष्णु ने देवताओं को भक्ति और संसार की रक्षा का वरदान दिया। यह सर्ग भी धर्म की विजय और अधर्म के विनाश की कथा है।

📜 उपसंहार (श्लोक २७-४०)

॥ श्लोक २७-३३ ॥
एवं माल्यवता सार्धं युद्धं विष्णोर्महात्मनः।
वृत्तं ते सर्वमाख्यातं राम राजीवलोचन॥
तथा त्वमपि राजेन्द्र रावणं पापनाशनम्।
हत्वा धर्मेण राज्यं च प्राप्तवानसि राघव॥
यथा विष्णुर्जगद्रक्षां करोति भगवान् प्रभुः।
तथा त्वमपि राजेन्द्र लोकान् पालय धर्मतः॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्य अगस्त्यस्य महात्मनः।
रामः प्रीतमनाः प्राह धर्मज्ञः सत्यविक्रमः॥
भगवन्धन्यतां प्राप्ता अयोध्या नगरी मया।
यद् भवद्भिः कृता पूजा मुनीन्द्रैः सुरसत्तमैः॥
अद्यप्रभृति वक्ष्यामि पालयिष्ये महीमिमाम्।
धर्मेण नातिचारेण भवतामाज्ञया मुने॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा मुनीनां प्रददौ बहु।
ततस्ते मुनयः सर्वे ययुः स्वं स्वं निवेशनम्॥
🔹 पदच्छेद : एवम् = इस प्रकार; माल्यवता = माल्यवान के साथ; सार्धम् = सहित; युद्धम् = युद्ध; विष्णोः = विष्णु का; महात्मनः = महात्मा का; वृत्तम् = वृत्तांत; ते = तुम्हें; सर्वम् = सब; आख्यातम् = कहा; राम = हे राम; राजीवलोचन = कमल नेत्र; तथा = वैसे ही; त्वम् = तुम; अपि = भी; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; रावणम् = रावण को; पापनाशनम् = पापनाशक; हत्वा = मारकर; धर्मेण = धर्म से; राज्यम् = राज्य; च = और; प्राप्तवान् = प्राप्त किया; असि = तुमने; राघव = हे राघव; यथा = जैसे; विष्णुः = विष्णु; जगत् = जगत की; रक्षाम् = रक्षा; करोति = करते हैं; भगवान् = भगवान; प्रभुः = प्रभु; तथा = वैसे ही; त्वम् = तुम; अपि = भी; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; लोकान् = लोकों की; पालय = पालना करो; धर्मतः = धर्म से; इति = इस प्रकार; श्रुत्वा = सुनकर; वचः = वचन; तस्य = उनके; अगस्त्यस्य = अगस्त्य के; महात्मनः = महात्मा के; रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; प्राह = बोले; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; सत्यविक्रमः = सत्य पराक्रमी; भगवन् = हे भगवन्; धन्यताम् = धन्यता; प्राप्ता = प्राप्त हुई; अयोध्या = अयोध्या; नगरी = नगरी; मया = मेरे द्वारा; यत् = जो; भवद्भिः = आपके द्वारा; कृता = की गई; पूजा = पूजा; मुनीन्द्रैः = मुनियों के इन्द्र; सुरसत्तमैः = श्रेष्ठ देवताओं द्वारा; अद्यप्रभृति = आज से; वक्ष्यामि = कहूँगा; पालयिष्ये = पालन करूँगा; महीम् = पृथ्वी को; इमाम् = इस; धर्मेण = धर्म से; नातिचारेण = अतिचार न करते हुए; भवताम् = आपकी; आज्ञया = आज्ञा से; मुने = हे मुने; इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; राघवः = राघव; राजा = राजा; मुनीनाम् = मुनियों को; प्रददौ = दिया; बहु = बहुत कुछ; ततः = तब; ते = वे; मुनयः = मुनि; सर्वे = सब; ययुः = गए; स्वम् = अपने; स्वम् = अपने; निवेशनम् = आश्रम को।
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने राम से कहा, "हे कमल नेत्र राम! इस प्रकार मैंने तुम्हें महात्मा विष्णु का माल्यवान के साथ हुआ युद्ध का सारा वृत्तांत सुना दिया। हे राजेन्द्र राघव! उसी प्रकार तुमने भी पापनाशक रावण का वध करके धर्म से राज्य प्राप्त किया है। जैसे भगवान विष्णु जगत की रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम भी हे राजेन्द्र! धर्मपूर्वक लोकों का पालन करो।" महात्मा अगस्त्य के ये वचन सुनकर धर्मज्ञ और सत्यविक्रम राम प्रसन्नचित्त होकर बोले, "हे भगवन्! आप मुनिश्रेष्ठों और श्रेष्ठ देवताओं ने मेरी जो पूजा की है, उससे मेरी अयोध्या नगरी धन्य हो गई है। हे मुने! आज से मैं आपकी आज्ञा से धर्म का उल्लंघन किए बिना इस पृथ्वी का पालन करूँगा।" ऐसा कहकर राजा राघव ने मुनियों को बहुत कुछ दान दिया। तब वे सभी मुनि अपने-अपने आश्रमों को चले गए। यहाँ अगस्त्य राम को विष्णु के युद्ध की कथा सुनाकर यह संदेश देते हैं कि राम का कार्य भी विष्णु के समान ही धर्मरक्षा के लिए है। राम को उनके दिव्य स्वरूप का स्मरण कराया जाता है। राम का उत्तर उनकी विनम्रता और धर्मपरायणता को दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦁 माल्यवान का चरित्र

माल्यवान एक वीर योद्धा था, जिसने विष्णु से युद्ध करते हुए अपनी माया और बल का पूरा प्रदर्शन किया। उसका अंत अधर्म की पराजय का प्रतीक है।

🌀 सुदर्शन चक्र की महिमा

विष्णु के चक्र ने माल्यवान की गदा और उसकी माया दोनों को नष्ट किया। यह धर्म के अस्त्र की अपराजेयता को दर्शाता है।

🔱 विष्णु का अवतारी रूप

अगस्त्य राम को विष्णु की कथा सुनाकर यह सिद्ध करते हैं कि राम स्वयं विष्णु के अवतार हैं, और उनका कार्य भी धर्मरक्षा ही है।

🙏 भक्ति का महत्त्व

देवताओं ने पुनः भक्ति की कामना की, यह बताता है कि भक्ति ही सर्वोच्च साधना है। भगवान की कृपा का पात्र वही बनता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से शिक्षा मिलती है कि अधर्मी चाहे कितने भी बलवान और मायावी क्यों न हों, अंततः उनका नाश निश्चित है। धर्म की रक्षा के लिए भगवान सदा तत्पर रहते हैं। सच्चे राजा को धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करना चाहिए, क्योंकि वह भगवान का प्रतिनिधि होता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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