विष्णु और माल्यवान के बीच युद्ध
राक्षसों के एक प्रमुख योद्धा माल्यवान ने भगवान विष्णु को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में घोर संग्राम हुआ, जिसमें अंततः विष्णु विजयी रहे।
विवरण
इस सर्ग में राक्षसों के प्रमुख सेनापति माल्यवान का वर्णन है। वह अत्यंत बलवान और युद्धकला में निपुण था। पिछले युद्ध में अपने भाइयों और सेना को मरता देख वह क्रोधित हो उठा और उसने स्वयं विष्णु से युद्ध करने का निश्चय किया। माल्यवान ने विष्णु पर अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन विष्णु उसे सहजता से परास्त करते रहे। माल्यवान ने अपनी माया का भी सहारा लिया, किंतु विष्णु ने उसकी सभी मायाओं को नष्ट कर दिया। अंततः विष्णु ने अपने चक्र से माल्यवान का वध कर दिया। इस युद्ध में माल्यवान की वीरता और विष्णु के पराक्रम का सुंदर चित्रण है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ८
(विष्णु और माल्यवान के बीच युद्ध)
🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में राक्षसराज का वध हुआ। अब उसका भाई या सेनापति माल्यवान क्रोध से भरकर युद्ध के लिए आगे आता है। वह अत्यंत बलवान और मायावी है।
👹 माल्यवान का आगमन (श्लोक १-१२)
श्रुत्वा स्वबान्धवान् सर्वान् निहतान् विष्णुना रणे॥
क्रोधसंरक्तनयनो निशश्वास महाबलः।
गदामुद्यम्य घोरां तामभ्यधावत केशवम्॥
तमापतन्तं वेगेन माल्यवन्तं महाबलम्।
ददर्श गरुडारूढो विष्णुः शत्रुनिबर्हणः॥
सिंहनादं विमुञ्चन्तं कम्पयन्तं धरातलम्।
गदापाणिं महाकायं प्रलयाम्बुदनिःस्वनम्॥
विष्णुस्तमभिनिघ्नन्तं गदया मूर्ध्नि वेगितः।
ताडयामास संक्रुद्धः शार्ङ्गमुक्तैः शिलीमुखैः॥
गदाभिः परिघैः शूलैश्चक्रैर्बाणैः परस्परम्॥
जघ्नतुर्वीर्यसंपन्नौ क्षणदाचरकेशवौ।
देवदानवगन्धर्वाः सिद्धचारणपन्नगाः॥
समेतास्तत्र तद्युद्धं द्रष्टुकामाः समन्ततः।
तयोर्युद्धं महद्घोरं विस्मयं परमं गताः॥
न शेकतुस्तदान्योन्यं जेतुं युद्धे महाबलौ।
ततो माल्यवता माया प्रयुक्ता विविधा रणे॥
🪄 माल्यवान की माया और उसका निवारण (श्लोक १३-२६)
व्याघ्रसिंहांश्च शार्दूलान् गजान् क्रूरान् महोरगान्॥
ते विष्णुं सहसा सर्वे वेष्टयामासुरोजसा।
न चचाल महातेजा विष्णुः शत्रुनिबर्हणः॥
ततः प्रहस्य देवेशः शार्ङ्गचापधरो हरिः।
बाणजालेन महता तान् सर्वान् विनिवारयत्॥
ततो माया विनष्टा सा माल्यवतो दुरात्मनः।
दृष्ट्वा नष्टां तु मायां स्वां पुनरेवाभ्यधावत॥
गदां गृहीत्वा तीक्ष्णाग्रां वज्रसारमयीं दृढाम्।
जघान केशवं मूर्ध्नि गदया च महाबलः॥
गदाप्रहारसंभ्रान्तो न चचाल जनार्दनः।
ताडयामास च गदां चक्रेण च सुदर्शना॥
चक्रनुन्ना गदा तस्य खण्डशः समपद्यत।
अथ चक्रं महावेगं माल्यवति न्यपातयत्॥
हाहाकारो महानासीत्सर्वेषां तत्र पश्यताम्॥
तस्मिन्हते महावीर्ये माल्यवति महासुरे।
देवाः सर्षिगणाः सर्वे विष्णुं जयिनमैडयन्॥
ववृषुः पुष्पवर्षाणि गन्धर्वाः प्राणदन्मुदा।
दुन्दुभ्यश्च प्रणेदुश्च शङ्खाश्च विविधस्वनाः॥
विष्णुः प्रीतमनाः प्राह सुरान्सर्वानुपस्थितान्।
वरं वृणीध्वं भद्रं वो यथेष्टं प्रतिपादये॥
देवा ऊचुः प्रसन्नस्त्वं यदि नो वरदो भवान्।
रक्षां कुरु जगत्स्थस्य यथावदनुपूर्वशः॥
विष्णुरुवाच युष्माकं भक्तिरस्तु मयि नित्यदा।
लोकाश्च निरुपद्रवाः सन्तु सर्वे सुरोत्तमाः॥
इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुस्तत्रैवान्तरधीयत।
देवाश्च सर्वे सम्प्राप्ताः स्वं स्वं धाम यथाक्रमम्॥
📜 उपसंहार (श्लोक २७-४०)
वृत्तं ते सर्वमाख्यातं राम राजीवलोचन॥
तथा त्वमपि राजेन्द्र रावणं पापनाशनम्।
हत्वा धर्मेण राज्यं च प्राप्तवानसि राघव॥
यथा विष्णुर्जगद्रक्षां करोति भगवान् प्रभुः।
तथा त्वमपि राजेन्द्र लोकान् पालय धर्मतः॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्य अगस्त्यस्य महात्मनः।
रामः प्रीतमनाः प्राह धर्मज्ञः सत्यविक्रमः॥
भगवन्धन्यतां प्राप्ता अयोध्या नगरी मया।
यद् भवद्भिः कृता पूजा मुनीन्द्रैः सुरसत्तमैः॥
अद्यप्रभृति वक्ष्यामि पालयिष्ये महीमिमाम्।
धर्मेण नातिचारेण भवतामाज्ञया मुने॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा मुनीनां प्रददौ बहु।
ततस्ते मुनयः सर्वे ययुः स्वं स्वं निवेशनम्॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🦁 माल्यवान का चरित्र
माल्यवान एक वीर योद्धा था, जिसने विष्णु से युद्ध करते हुए अपनी माया और बल का पूरा प्रदर्शन किया। उसका अंत अधर्म की पराजय का प्रतीक है।
🌀 सुदर्शन चक्र की महिमा
विष्णु के चक्र ने माल्यवान की गदा और उसकी माया दोनों को नष्ट किया। यह धर्म के अस्त्र की अपराजेयता को दर्शाता है।
🔱 विष्णु का अवतारी रूप
अगस्त्य राम को विष्णु की कथा सुनाकर यह सिद्ध करते हैं कि राम स्वयं विष्णु के अवतार हैं, और उनका कार्य भी धर्मरक्षा ही है।
🙏 भक्ति का महत्त्व
देवताओं ने पुनः भक्ति की कामना की, यह बताता है कि भक्ति ही सर्वोच्च साधना है। भगवान की कृपा का पात्र वही बनता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से शिक्षा मिलती है कि अधर्मी चाहे कितने भी बलवान और मायावी क्यों न हों, अंततः उनका नाश निश्चित है। धर्म की रक्षा के लिए भगवान सदा तत्पर रहते हैं। सच्चे राजा को धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करना चाहिए, क्योंकि वह भगवान का प्रतिनिधि होता है।