उत्तर काण्ड अध्याय 79

राजा मान्धाता की कहानी

अगस्त्य ऋषि राम को राजा मान्धाता की कथा सुनाते हैं, जो एक महान चक्रवर्ती सम्राट थे और उनका जन्म अद्भुत ढंग से हुआ था।

विवरण

राम की जिज्ञासा पर अगस्त्य ऋषि उन्हें राजा मान्धाता की अद्भुत कथा सुनाते हैं। मान्धाता का जन्म उनके पिता राजा युवनाश्व के पेट से हुआ था। एक बार युवनाश्व ने पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया, और रात में प्यास लगने पर यज्ञ का जल पी लिया, जिससे वे गर्भवती हो गए। समय आने पर उनके पार्श्व भाग से एक पुत्र उत्पन्न हुआ। इन्द्र ने आकर कहा, "मां धाता" (मुझे धाता (पिता) मानो), इसलिए उसका नाम मान्धाता पड़ा। वह आगे चलकर अत्यन्त प्रतापी और चक्रवर्ती सम्राट बना। उसने अनेक यज्ञ किए और तीनों लोकों में उसकी कीर्ति फैली। यह कथा अद्भुत जन्म और भाग्य के रहस्य को उद्घाटित करती है।

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ७९

(राजा मान्धाता की कहानी)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ नवसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम अगस्त्य ऋषि से पूछते हैं कि क्या कोई ऐसा राजा हुआ है जिसका जन्म अद्भुत रहा हो। तब अगस्त्य उन्हें राजा मान्धाता की कथा सुनाते हैं, जिनका जन्म उनके पिता के शरीर से हुआ था।

👑 युवनाश्व का यज्ञ और अद्भुत घटना (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-८ ॥
अगस्त्य उवाच –
शृणु राम महाबाहो कथां पापप्रणाशिनीम्।
मान्धातुश्चरितं पुण्यं यथा वृत्तं पुरातने॥
आसीद्राजा महातेजा युवनाश्व इति श्रुतः।
इक्ष्वाकुवंशजः श्रीमान् धर्मात्मा सत्यविक्रमः॥
स पुत्रार्थे महाराज यज्ञं चक्रे महामखम्।
ऋषिभिर्ब्राह्मणैः सार्धं मन्त्रवत् सम्प्रवर्तितम्॥
यज्ञे समाप्ते तु तदा रात्रौ राजा महामनाः।
तृषितः सलिलं पातुं प्रविवेश यज्ञियं गृहम्॥
तत्रास्ते कलशः पूर्णो जलेन यज्ञियेन वै।
तमपिबत् स राजर्षिर्मन्त्रपूतं जलं शुभम्॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने कहा – हे महाबाहो राम! पापनाशिनी कथा सुनो। पुरातन काल में मान्धाता का पुण्य चरित्र हुआ। इक्ष्वाकुवंशी एक महातेजस्वी राजा हुए, नाम युवनाश्व। वे धर्मात्मा और सत्यविक्रम थे। उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए एक महान यज्ञ किया, जिसमें ऋषि और ब्राह्मण सम्मिलित हुए और मन्त्रपूर्वक यज्ञ सम्पन्न हुआ। यज्ञ समाप्त होने पर उसी रात्रि में महामना राजा को प्यास लगी। वे यज्ञशाला में गए, जहाँ यज्ञ का जल भरा एक कलश रखा था। उन्होंने वह मन्त्रपूत शुभ जल पी लिया। यह जल वास्तव में देवताओं के लिए था और उसमें गर्भधारण कराने की शक्ति थी।
॥ श्लोक ९-१२ ॥
ततः प्रभाते ऋषयो ददृशुः कलशं जलम्।
न्यूनं ज्ञात्वा तदा राज्ञे शेपुरिति शुश्रुम॥
राजा तु सहसा गर्भं धारयामास भारत।
तेन गर्भेण स महान् ववृधे राज्ञ उदरे॥
सम्पूर्णे काल आयाते राज्ञः पार्श्वमभिद्यत।
ततो जातः सुतस्तस्य न मातृस्तन्यपायकः॥
📖 भावार्थ : प्रातःकाल ऋषियों ने देखा कि कलश का जल कम हो गया है। यह जानकर उन्होंने राजा को शाप दे दिया (कि वे गर्भ धारण करेंगे)। राजा युवनाश्व ने वास्तव में गर्भ धारण कर लिया। वह गर्भ राजा के उदर में बढ़ने लगा। पूर्ण काल आने पर राजा के पार्श्व भाग (कुक्षि) से एक पुत्र उत्पन्न हुआ, परन्तु वह माता का स्तनपान नहीं कर पा रहा था। यह एक अद्भुत और असम्भव सी घटना थी, जो दैवीय शक्ति से सम्भव हुई।

🌟 इन्द्र का आगमन और नामकरण (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-१९ ॥
ततः शक्रः समागम्य ददर्श मुनिसत्तमान्।
बालकं चातिदुःखार्तं रुदन्तं जलपायिनम्॥
तस्य दुःखेन महता पीडिताः सर्व एव ते।
न चैनं शेकुरुद्धर्तुं शापदोषेण मोहिताः॥
इन्द्रस्त्वाह मुनिश्रेष्ठा मा शुचः सुभगं शिशुम्।
अहमेनं धयिष्यामि मम पुत्रो भविष्यति॥
इत्युक्त्वा देवराजस्तु स्वाङ्गुलिं तस्य वक्त्रके।
प्रास्याददात् सुधापूर्णां मां धातेति च सोऽब्रवीत्॥
📖 भावार्थ : तब इन्द्र वहाँ आए और उन्होंने मुनिश्रेष्ठों को देखा, और बालक को अत्यन्त दुःखी, रोता हुआ और जल की याचना करते हुए देखा। उस बालक के दुःख से सभी बहुत पीड़ित थे, पर शाप दोष के कारण कोई उसका उपचार नहीं कर पा रहा था। इन्द्र ने कहा, "हे मुनिश्रेष्ठो! शोक मत करो। इस सुन्दर बालक को मैं दूध पिलाऊँगा, यह मेरा पुत्र होगा।" ऐसा कहकर देवराज ने अपनी अंगुली, जो अमृत से परिपूर्ण थी, उसके मुख में दे दी और कहा, "मां धाता" (मुझे पिता मानो)।
॥ श्लोक २०-२५ ॥
तेन नाम्ना च विख्यातो मान्धातेति महीतले।
ववृधे स बलोत्साहैर्देवपुत्रो महायशाः॥
स चक्रवर्ती राजासीत् सप्तद्वीपेश्वरो बली।
अश्वमेधशतैरिष्ट्वा बहुभिर्भूरिदक्षिणैः॥
त्रयो लोका यशो वीर्यैर्व्याप्तास्तेन महात्मना।
न तस्य द्वेष्टि कश्चिच्च सर्वभूतहिते रतः॥
इति मान्धातृचरितं कथितं तव राघव।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार उस बालक का नाम "मान्धाता" (मां धाता) पड़ा और वह पृथ्वी पर विख्यात हुआ। वह देवपुत्र के समान बल और उत्साह से बढ़ने लगा। वह महायशस्वी चक्रवर्ती राजा बना, सप्तद्वीपों का स्वामी, बलशाली। उसने अनेक अश्वमेध यज्ञ किए, जिनमें अपार दक्षिणा दीं। उस महात्मा के यश और वीर्य से तीनों लोक व्याप्त हो गए। कोई भी उससे द्वेष नहीं करता था, वह सब भूतों के हित में रत था। हे राघव! इस प्रकार मान्धाता का चरित्र तुमसे कहा गया। जो इसे पढ़े या सुने, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

✨ अद्भुत जन्म और दैवीय कृपा

मान्धाता का जन्म असम्भव-सा था, फिर भी इन्द्र की कृपा से वे जीवित रहे और महान बने। यह दर्शाता है कि ईश्वर की इच्छा के आगे सब सम्भव है।

👑 आदर्श राजा के लक्षण

मान्धाता ने अनेक यज्ञ किए, प्रजापालन किया और सबके हित में कार्य किया। वे एक चक्रवर्ती सम्राट के आदर्श गुणों से युक्त थे।

🧘 शाप और वरदान का रहस्य

युवनाश्व को शाप मिला, पर वही शाप उनके पुत्र के लिए वरदान बन गया। यह बताता है कि भाग्य का लेखा कभी-कभी अप्रत्याशित मोड़ लेता है।

📖 प्रेरणादायक आख्यान

यह कथा राम को प्रेरणा देती है कि राजा का जन्म कैसा भी हो, उसके कर्म ही उसकी पहचान बनाते हैं। मान्धाता ने अपने कर्मों से तीनों लोकों में कीर्ति प्राप्त की।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और दैवीय कृपा से असम्भव कार्य सम्भव हो जाते हैं। राजा को सदा प्रजाहित में रत रहना चाहिए और यज्ञादि धार्मिक कार्य करते रहने चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे नवसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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