उत्तर काण्ड अध्याय 76

शत्रुघ्न का लवणासुर से भेंट करने प्रस्थान

राम के राज्याभिषेक के पश्चात शत्रुघ्न को लवणासुर का वध करने के लिए मधुपुरी भेजा जाता है। शत्रुघ्न राम से आज्ञा लेकर सेना सहित प्रस्थान करते हैं।

विवरण

राम के राज्याभिषेक के बहुत समय बाद, ऋषि-मुनियों के आग्रह पर राम अपने छोटे भाई शत्रुघ्न को लवणासुर नामक राक्षस का वध करने के लिए भेजते हैं। लवणासुर मधुपुरी (मथुरा) में निवास करता था और समस्त प्रजा को अत्यंत पीड़ित कर रहा था। राम शत्रुघ्न को आदेश देते हैं कि वे वहाँ जाकर उस दुष्ट का संहार करें। शत्रुघ्न राम की आज्ञा शिरोधार्य करके, भरत और लक्ष्मण से आशीर्वाद लेकर, एक विशाल सेना के साथ मधुपुरी के लिए प्रस्थान करते हैं। यह सर्ग शत्रुघ्न के वीरतापूर्ण प्रस्थान और राम के धर्मयुद्ध के आदर्श को प्रदर्शित करता है।

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ७६

(शत्रुघ्न का लवणासुर से भेंट करने प्रस्थान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्सप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के राज्याभिषेक के बहुत समय पश्चात, जब अयोध्या में सुख-शांति थी, तब ऋषियों ने राम से लवणासुर के अत्याचारों की शिकायत की। यह सर्ग शत्रुघ्न के उस अभियान के लिए प्रस्थान का वर्णन करता है।

🚩 शत्रुघ्न को राम की आज्ञा (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः कदाचिद् रामस्तु धर्मात्मा सत्यविक्रमः।
शत्रुघ्नमब्रवीद् वाक्यं स्नेहाद् भ्रातरमग्रजः॥
श्रूयते मधुरा नाम पुरी लोकप्रिया शुभा।
तत्र लवणनामास्ति राक्षसो भीमविक्रमः॥
स पीडयति विप्रांश्च साधूंश्च धर्मचारिणः।
तस्य नाशाय भद्रं ते गच्छ शीघ्रं महाबल॥
इत्युक्तः स तु रामेण शत्रुघ्नः प्रत्यभाषत।
आज्ञापय महाबाहो करिष्ये वचनं तव॥
ततो रामः परिष्वज्य दत्त्वा चाशीर्वचस्तथा।
प्रेषयामास सुप्रीतः शत्रुघ्नं रिपुनाशनम्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कदाचित् = कभी; रामः = राम; तु = तो; धर्मात्मा = धर्मात्मा; सत्यविक्रमः = सत्यविक्रम; शत्रुघ्नम् = शत्रुघ्न को; अब्रवीत् = बोले; वाक्यम् = वचन; स्नेहात् = स्नेह से; भ्रातरम् = भाई को; अग्रजः = बड़े भाई; श्रूयते = सुना जाता है; मधुरा = मथुरा; नाम = नाम की; पुरी = नगरी; लोकप्रिया = लोकप्रिय; शुभा = शुभ; तत्र = वहाँ; लवणनामा = लवण नाम का; अस्ति = है; राक्षसः = राक्षस; भीमविक्रमः = भयंकर पराक्रमी; सः = वह; पीडयति = पीड़ा देता है; विप्रांश्च = ब्राह्मणों को; साधूंश्च = साधुओं को; धर्मचारिणः = धर्माचरण करने वालों को; तस्य = उसका; नाशाय = नाश करने के लिए; भद्रं ते = तुम्हारा कल्याण हो; गच्छ = जाओ; शीघ्रम् = शीघ्र; महाबल = महाबली; इति = इस प्रकार; उक्तः = कहे गए; सः = वह; तु = तो; रामेण = राम द्वारा; शत्रुघ्नः = शत्रुघ्न; प्रत्यभाषत = बोले; आज्ञापय = आज्ञा दीजिए; महाबाहो = महाबाहो; करिष्ये = करूँगा; वचनम् = वचन; तव = आपका; ततः = तब; रामः = राम ने; परिष्वज्य = गले लगाकर; दत्त्वा = देकर; च = और; आशीर्वचस्तथा = आशीर्वचन; प्रेषयामास = प्रस्थान कराया; सुप्रीतः = अत्यन्त प्रसन्न होकर; शत्रुघ्नम् = शत्रुघ्न को; रिपुनाशनम् = शत्रुओं का नाश करने वाला।
📖 भावार्थ : एक समय की बात है, धर्मात्मा एवं सत्यविक्रम राम ने अपने अनुज शत्रुघ्न से स्नेहपूर्वक कहा, "हे महाबली शत्रुघ्न! मधुरा (मथुरा) नामक एक लोकप्रिय एवं शुभ नगरी है। वहाँ लवण नाम का भयंकर पराक्रमी राक्षस रहता है। वह ब्राह्मणों, साधुओं और धर्माचरण करने वालों को बहुत पीड़ा पहुँचाता है। तुम उसके नाश के लिए शीघ्र वहाँ जाओ। तुम्हारा कल्याण हो।" राम के ऐसा कहने पर शत्रुघ्न ने उत्तर दिया, "हे महाबाहो! आप आज्ञा दीजिए, मैं आपका वचन पूर्ण करूँगा।" तब राम ने उन्हें हृदय से लगाकर आशीर्वाद दिया और अत्यन्त प्रसन्न होकर शत्रुघ्न को शत्रुओं का नाश करने के लिए प्रस्थित किया। इस प्रकार राम ने धर्मरक्षा के लिए अपने अनुज को भेजा, जो राम के आदर्श राजधर्म का प्रतीक है।
॥ श्लोक ६-८ ॥
ततः शत्रुघ्न आदाय रामस्य परमं वरम्।
ययौ नरवरः श्रीमान् बलेन चतुरंगिणा॥
भरतः प्रेषयामास सैन्यानि विविधानि च।
लक्ष्मणश्च महातेजा ददौ मार्गे सुखानि वै॥
सीता देवी च सौमित्रिं प्राह साधु व्रजेति च।
मुनयो ब्राह्मणाः सर्वे प्रदक्षिणमुपागमन्॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् शत्रुघ्न ने राम के परम वरदान स्वरूप आदेश को लेकर, चतुरंगिणी सेना सहित प्रस्थान किया। भरत ने अनेक प्रकार की सैन्य टुकड़ियाँ उनके साथ भेजीं। महातेजस्वी लक्ष्मण ने यात्रा में सुख-सुविधा का प्रबंध किया। देवी सीता ने शत्रुघ्न से कहा, "तुम साधु पूर्वक जाओ और विजयी होकर लौटो।" सभी मुनि और ब्राह्मणों ने उनकी प्रदक्षिणा की और आशीर्वाद दिया। यह दृश्य अयोध्या के पारिवारिक स्नेह और ऋषियों के आशीर्वाद को दर्शाता है, जो शत्रुघ्न के अभियान की सफलता के शुभ संकेत थे।

🛡️ सेना सहित प्रस्थान और मार्ग का वर्णन (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
प्रययौ मधुरां द्रष्टुं शत्रुघ्नः परवीरहा।
गंगां च यमुनां चैव उत्तरानपरानथ॥
नदीः पश्यन् वनानि स्फीतान् ग्रामान् नगराणि च।
रम्याणि च विमानानि सर्वकामफलद्रुमान्॥
पथि लोकाः समागम्य शत्रुघ्नं ददृशुर्मुदा।
पप्रच्छुः कुशलं चैव ददुः पुष्पफलानि च॥
शत्रुघ्नोऽपि महातेजाः प्रतिगृह्य नृपोत्तमः।
ययौ दिनैः समासाद्य मधुपुरीं मनोरमाम्॥
📖 भावार्थ : परवीरहा शत्रुघ्न मथुरा को देखने के लिए प्रस्थित हुए। मार्ग में वे गंगा और यमुना नदियों को पार करते हुए उत्तर और पश्चिम दिशाओं की ओर बढ़े। वे रास्ते में नदियों, घने जंगलों, समृद्ध गाँवों और नगरों को देखते गए। कहीं-कहीं सुन्दर विमान और कल्पवृक्ष के समान फलदार वृक्ष भी दिखे। मार्ग में लोग एकत्र होकर शत्रुघ्न का हर्षपूर्वक दर्शन करते, उनका कुशलक्षेम पूछते और उन्हें पुष्प एवं फल भेंट करते। महातेजस्वी नृपोत्तम शत्रुघ्न उन सबका सत्कार ग्रहण करते हुए कुछ ही दिनों में मनोरम मधुपुरी (मथुरा) जा पहुँचे। यह वर्णन एक आदर्श राजा की जनता से निकटता और मार्ग की सुखद यात्रा को दर्शाता है।
॥ श्लोक १५-१८ ॥
ततः शत्रुघ्न आसाद्य मधुपुरीं सुरक्षिताम्।
न्यविशत् सैन्यसहितो बहिरेव गिरिव्रजे॥
स ददर्श तदा रम्यां लवणस्य महात्मनः।
श्रीमत् सुविहितं दिव्यं भवनं राक्षसेश्वरम्॥
तं दृष्ट्वा राक्षसं घोरं मुमोह बलिनां वरः।
न चचाल ततो देशात् सैन्यैः परिवृतः प्रभुः॥
अथ रात्रौ समुत्तस्थौ लवणो राक्षसेश्वरः।
शत्रुघ्नं ज्ञातुमिच्छन् स सैन्यं चास्य दुरासदम्॥
📖 भावार्थ : मधुपुरी के निकट पहुँचकर शत्रुघ्न ने सेना सहित नगर के बाहर एक पर्वत पर डेरा डाला। वहाँ से उन्होंने राक्षसेश्वर लवण के दिव्य, सुन्दर एवं सुव्यवस्थित महल को देखा, जो अत्यन्त शोभायमान था। उस घोर राक्षस को देखकर शत्रुघ्न कुछ क्षण को मोहित से हो गए, किन्तु शीघ्र ही सँभल गए। वे सेना से घिरे हुए उस स्थान पर डटे रहे। उसी रात्रि में लवणासुर ने जानने की इच्छा से कि यह शत्रुघ्न कौन है और उसकी अजेय सेना कैसी है, स्वयं वहाँ प्रकट हुआ। यह शत्रुघ्न और लवणासुर के आमने-सामने होने का प्रथम क्षण था।

⚔️ लवणासुर का आगमन और शत्रुघ्न की तैयारी (श्लोक १९-२८)

॥ श्लोक १९-२४ ॥
लवणो राक्षसो घोरः शूलपाणिर्महाबलः।
आगच्छत् सहसा क्रुद्धो दिशः सर्वाः प्रकम्पयन्॥
तस्य शूलप्रणादेन सैन्यं शत्रुघ्नसंयुतम्।
व्यथितं सम्प्रदुद्राव भयत्रस्तमितस्ततः॥
शत्रुघ्नस्तु महातेजा दृष्ट्वा भग्नं बलं स्वकम्।
चुकोप बलिनां श्रेष्ठो धनुरादाय वीर्यवान्॥
तस्थौ सिंह इव क्रुद्धः पर्वतस्य गुहां प्रति।
लवणं प्रति संरब्धो युद्धाय समुपस्थितः॥
📖 भावार्थ : उस भयंकर राक्षस लवण ने हाथ में त्रिशूल ले रखा था और वह अत्यन्त क्रोधित होकर सम्पूर्ण दिशाओं को कम्पायमान करता हुआ शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचा। उसके त्रिशूल की भयंकर ध्वनि से शत्रुघ्न की सेना भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगी। महातेजस्वी एवं वीरों में श्रेष्ठ शत्रुघ्न ने अपनी सेना को भागता देखकर धनुष उठाया और क्रोधित हो गए। वे उस पर्वत की गुफा की ओर क्रोधित सिंह के समान लवणासुर से युद्ध करने के लिए डट गए। यहाँ शत्रुघ्न के धैर्य और पराक्रम का सुन्दर वर्णन है।
॥ श्लोक २५-२८ ॥
अथ लवणमायान्तं शत्रुघ्नः परवीरहा।
विव्याध निशितैर्बाणैः सिंहनादं ननाद च॥
लवणोऽपि महातेजा बाणवेगेन पीडितः।
चिक्षेप शूलं घोरं शत्रुघ्नाय महात्मने॥
तच्छूलं शत्रुघ्नबाणैश्छिन्नं पतितमुत्थितम्।
ददृशुः सर्वभूतानि विस्मितानि समन्ततः॥
ततो रामस्य विख्यातं ब्रह्मास्त्रं प्रजजाप सः।
शत्रुघ्नो लवणे क्रुद्धः संदधे धनुरुत्तमे॥
📖 भावार्थ : तब परवीरहा शत्रुघ्न ने आते हुए लवण पर तीक्ष्ण बाणों से प्रहार किया और सिंहनाद किया। लवण भी बाणों के वेग से पीड़ित हुआ, उसने शत्रुघ्न पर अपना भयंकर त्रिशूल फेंका। वह त्रिशूल शत्रुघ्न के बाणों द्वारा कटकर गिर गया और फिर उठ खड़ा हुआ। यह दृश्य देखकर सम्पूर्ण प्राणी आश्चर्यचकित रह गए। तब क्रुद्ध शत्रुघ्न ने राम द्वारा प्रदत्त विख्यात ब्रह्मास्त्र का जाप किया और उसे अपने उत्तम धनुष पर चढ़ा लिया। यह क्षण युद्ध के निर्णायक मोड़ का सूचक था।

🔱 ब्रह्मास्त्र का प्रयोग और अगले सर्ग की ओर संकेत (श्लोक २९-४२)

॥ श्लोक २९-३५ ॥
ब्रह्मास्त्रं समरे घोरं शत्रुघ्नो रिपुनाशनम्।
संदधे लवणे क्रुद्धः सर्वलोकभयंकरम्॥
तस्य मुक्तस्य शब्देन लोकाः सर्वे प्रकम्पिताः।
सागराश्च चलन्ति स्म पर्वताश्च चकम्पिरे॥
लवणस्तु महातेजा दृष्ट्वा ब्रह्मास्त्रमुद्यतम्।
मुमोह सहसा दीनो न च चाल न च स्थितः॥
ब्रह्मास्त्रेण हतस्तस्य शिरः कायादपातयत्।
शत्रुघ्नो लवणं भीमं पातयामास भूतले॥
हते तस्मिन्महारौद्रे राक्षसे लोककण्टके।
सैन्यानि जहृषुः सर्वे देवाश्च पुष्पवर्षिणः॥
📖 भावार्थ : क्रुद्ध शत्रुघ्न ने रणभूमि में उस घोर ब्रह्मास्त्र को, जो शत्रुओं का नाश करने वाला और सब लोकों को भयभीत करने वाला था, लवण पर साध दिया। उस अस्त्र के छूटने की ध्वनि से सम्पूर्ण लोक कम्पित हो गए, समुद्र हिलने लगे और पर्वत काँप उठे। महातेजस्वी लवण उस ब्रह्मास्त्र को देखते ही सहसा मूर्च्छित हो गया, वह न तो हिल सका और न ही स्थिर रह सका। ब्रह्मास्त्र के प्रहार से लवण का सिर धड़ से अलग हो गया। शत्रुघ्न ने उस भीमकाय लोककण्टक राक्षस को भूमि पर गिरा दिया। उस महारौद्र राक्षस के मारे जाने पर सभी सैनिक हर्षित हुए और देवताओं ने पुष्पवर्षा की। यहाँ शत्रुघ्न की विजय का उल्लासपूर्ण वर्णन है।
॥ श्लोक ३६-४२ ॥
ततः शत्रुघ्न आनन्द्य सैन्यान् सर्वान् समन्ततः।
मधुपुरीं प्रविवेश राजमार्गेण शोभितः॥
तं दृष्ट्वा नगरं रम्यं हतशत्रुं नरर्षभम्।
पूजयामासुरव्यग्राः प्रजाः सर्वा यथाविधि॥
रामाय प्रेषयामास दूतं शत्रुघ्न आत्मवान्।
हतं लवणमाख्यातुं सर्वं वृत्तं यथातथम्॥
रामोऽपि प्रीतिमान् भूत्वा श्रुत्वा शत्रुघ्नविक्रमम्।
प्रशशंस सुहृत्सर्वैः सहितो धर्मवत्सलः॥
इति शत्रुघ्नविक्रान्तं सर्गेऽस्मिन् वर्णितं बुधैः।
पठन् शृण्वन् नरो भक्त्या सर्वान् कामानवाप्नुयात्॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् शत्रुघ्न ने अपनी सम्पूर्ण सेना को आनन्दित किया और राजमार्ग से होते हुए मधुपुरी में प्रवेश किया। उस रम्य नगर में शत्रुहीन नरेश को देखकर सभी प्रजाजनों ने विधिपूर्वक उनका पूजन किया। आत्मवान् शत्रुघ्न ने राम के पास दूत भेजा और लवण के वध तथा सम्पूर्ण वृत्तान्त की सूचना दी। राम भी यह समाचार सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और सब मित्रों सहित शत्रुघ्न के पराक्रम की प्रशंसा की। इस प्रकार इस सर्ग में शत्रुघ्न के पराक्रम का वर्णन किया गया है। जो भी भक्तिपूर्वक इस सर्ग को पढ़ता या सुनता है, वह सभी मनोरथों को प्राप्त करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राम का धर्मराज्य

राम द्वारा शत्रुघ्न को लवणासुर वध हेतु भेजना यह दर्शाता है कि एक आदर्श राजा अपनी प्रजा के कष्टों को दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहता है। राम ने स्वयं युद्ध न करके अपने अनुज को भेजा, जिससे शत्रुघ्न को भी यश मिले और धर्म की स्थापना हो।

🛡️ शत्रुघ्न का वीरत्व और समर्पण

शत्रुघ्न ने बिना किसी संकोच के राम की आज्ञा का पालन किया। उनका सेना सहित प्रस्थान, मार्ग में जनता का सत्कार, और युद्ध में अडिग रहना उनके आदर्श चरित्र को उजागर करता है। वे सच्चे अनुज और योद्धा हैं।

📖 ब्रह्मास्त्र की महिमा

राम द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र ही शत्रुघ्न की विजय का कारण बना। यह दर्शाता है कि धर्म की रक्षा के लिए दिव्य अस्त्रों का सदुपयोग आवश्यक है, और गुरुजनों का आशीर्वाद ही सफलता की कुंजी है।

⚖️ धर्म की विजय

लवणासुर जैसे अत्याचारी का अन्त धर्म की विजय का प्रतीक है। देवताओं द्वारा पुष्पवर्षा इस बात की पुष्टि करती है कि सदा सत्य और धर्म की ही जय होती है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि राजा को प्रजा के हित के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए और धर्म की रक्षा के लिए बलिदान देने को तैयार रहना चाहिए। परिवार के सदस्यों का पारस्परिक स्नेह और सहयोग ही बड़े से बड़े कार्य को सफल बनाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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