शत्रुघ्न का राज्याभिषेक
लवणासुर का वध करने के बाद शत्रुघ्न अयोध्या लौटते हैं और राम उनका भव्य स्वागत करते हैं। राम उन्हें मधुपुरी (मथुरा) का राजा घोषित करते हैं और उनका राज्याभिषेक किया जाता है।
विवरण
यह सर्ग शत्रुघ्न की विजय और उनके राज्याभिषेक का वर्णन करता है। शत्रुघ्न ने वसिष्ठ के बताए उपाय के अनुसार लवणासुर से युद्ध किया और उसका वध कर दिया। इसके बाद वे विजयी होकर अयोध्या लौटते हैं। राम उनके स्वागत के लिए स्वयं नगर से बाहर आते हैं और भव्य समारोह का आयोजन होता है। राम ने घोषणा की कि लवणासुर का राज्य मधुपुरी (जिसे आज मथुरा के नाम से जाना जाता है) अब शत्रुघ्न को सौंपा जाता है। वसिष्ठ ऋषि के मन्त्रों से शत्रुघ्न का राज्याभिषेक किया जाता है। शत्रुघ्न वहाँ के राजा बनते हैं और राम के आदेशानुसार धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते हैं। यह सर्ग राम के चारों भाइयों के राज्य विभाजन और उनके उत्तरदायित्वों को स्थापित करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ७५
(शत्रुघ्न का राज्याभिषेक)
🔆 प्रस्तावना : शत्रुघ्न ने वसिष्ठ के बताए उपाय से लवणासुर का वध कर दिया और विजयी होकर अयोध्या लौट आए। उनके आगमन की सूचना पाकर राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनके भव्य स्वागत की तैयारियाँ आरम्भ हुईं।
🎉 शत्रुघ्न की विजय और स्वागत (श्लोक १-५)
सेनया महत्या वीरो रामस्य प्रियकाम्यया॥
तमागतं समाज्ञाय रामो दाशरथिः प्रभुः।
निर्ययौ नगराद्वीरो भ्रातृभिः सहितस्तदा॥
लक्ष्मणो भरतश्चैव वानराश्च समागताः।
ऋक्षाश्च सह सुग्रीवाः प्रहृष्टाः शत्रुघ्नं प्रति॥
स दृष्ट्वा भ्रातरं वीरं रामं सत्यपराक्रमम्।
प्रणम्य शिरसा भूमौ तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः॥
रामस्तमालिलिङ्गाथ हर्षादश्रुपरिप्लुतः।
पप्रच्छ कुशलं युद्धे लवणस्य वधं प्रति॥
🙌 शत्रुघ्न का युद्ध-वृत्तांत (श्लोक ६-१०)
यथा शूलं परित्यक्तं लवणेन दुरात्मना॥
अन्नार्थिनं समालोक्य ब्राह्मणं छलरूपिणम्।
दत्तं शूलं मया चापि गृहीतं विधिवत्तदा॥
ततः शूलविहीनं तं लवणं क्रोधमूर्छितम्।
अहं रणे समासाद्य निहतवान्न संशयः॥
तस्य सेनां च सबलां निहत्य समरे बली।
आगतोऽहं महाबाहो तव पश्य प्रियं कृतम्॥
एतच्छ्रुत्वा वचः शत्रुघ्नस्य रघुनन्दनः।
प्रहर्षमतुलं लेभे पूजयामास चानुजम्॥
👑 राज्याभिषेक की घोषणा (श्लोक ११-१५)
शृण्वन्तु मम वाक्यं वै भ्रातरः ससुहृज्जनाः॥
अनेन निहतः शत्रुर्लवणो घोरविक्रमः।
तस्य राज्यमिदं सर्वं मधुपुर्या समन्वितम्॥
शत्रुघ्नाय मया दत्तं पालयिष्यति धर्मतः।
भवन्तः सानुमन्यन्तां यदि धर्मं समीक्षितुम्॥
सर्वे प्रोचुर्महात्मानः साधु साध्विति संगताः।
रामस्य वचनं श्रुत्वा प्रहृष्टा भ्रातरस्तदा॥
ततः शत्रुघ्नमाहूय वसिष्ठः प्रददे वरम्।
अभिषेचय शत्रुघ्नं राज्ये मधुपुरस्य वै॥
💧 शत्रुघ्न का राज्याभिषेक (श्लोक १६-२०)
अभ्यषिञ्चन्महात्मानं राज्ये मधुपुरस्य वै॥
मङ्गलालोकनं चक्रुः स्त्रियः सर्वाः समागताः।
वादित्राणि च दिव्यानि प्रावाद्यन्त महान्ति च॥
रामो ददौ महार्हाणि वस्त्राण्याभरणानि च।
लक्ष्मणो भरतश्चैव सुग्रीवश्च विभीषणः॥
प्रतिगृह्य तु तत्सर्वं शत्रुघ्नः प्रत्यभाषत।
रामं परमधर्मज्ञं कृताञ्जलिरिदं वचः॥
आज्ञापय महाबाहो किं करोमि तव प्रियम्।
नियोगं शिरसा वक्ष्ये यदाज्ञापयसे प्रभो॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🏛️ मथुरा की स्थापना
इस सर्ग में मथुरा (मधुपुरी) का उल्लेख है, जो आगे चलकर भगवान कृष्ण की लीलाभूमि बनी। शत्रुघ्न को मथुरा का राजा बनाया गया, जो इस नगर के ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व को दर्शाता है।
👨👩👧👦 आदर्श परिवार
राम द्वारा अपने भाइयों को राज्य देकर उनका सम्मान करना और शत्रुघ्न द्वारा राम के प्रति समर्पण भाव रखना एक आदर्श परिवारिक सम्बन्ध को दर्शाता है। राम के राज्य में भाईयों में कोई स्वार्थ नहीं था।
⚖️ धर्मपूर्वक शासन
राम का आदेश था कि शत्रुघ्न धर्मपूर्वक राज्य का पालन करें। यह रामराज्य की विशेषता थी कि सभी राजा धर्म के मार्ग पर चलते थे।
🙏 कृतज्ञता और विनम्रता
शत्रुघ्न ने राज्य पाकर भी राम के प्रति अपनी कृतज्ञता और विनम्रता प्रकट की। यह सिखाता है कि पद पाकर भी विनम्र बने रहना चाहिए।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम, विश्वास और सम्मान होना चाहिए। अपने कर्तव्यों का पालन करने वालों को उचित सम्मान और पुरस्कार मिलता है।