उत्तर काण्ड अध्याय 74

शत्रुघ्न का लवणासुर से युद्ध करने की अनुमति माँगना

राक्षसों के अत्याचारों से पीड़ित ऋषियों की रक्षा के लिए शत्रुघ्न राम से लवणासुर से युद्ध करने की अनुमति माँगते हैं। राम उन्हें अनुमति प्रदान करते हैं और विजय का आशीर्वाद देते हैं।

विवरण

यह सर्ग उत्तरकाण्ड का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसमें शत्रुघ्न का वीरता और भक्ति का परिचय मिलता है। पिछले सर्गों में ऋषियों ने राक्षसों के अत्याचारों की शिकायत की थी और वसिष्ठ ने मधु एवं उसके पुत्र लवणासुर की कथा सुनाई थी। अब राम अपने भाइयों और मन्त्रियों के साथ विचार कर रहे हैं कि लवणासुर का वध कैसे किया जाए। तब शत्रुघ्न खड़े होते हैं और राम से निवेदन करते हैं कि उन्हें लवणासुर से युद्ध करने की अनुमति दी जाए। राम पहले तो संकोच करते हैं, किन्तु शत्रुघ्न के आग्रह और वसिष्ठ के कथनानुसार लवणासुर के वध का उपाय (त्रिशूल से रहित होने पर) जानकर वे शत्रुघ्न को अनुमति प्रदान करते हैं। शत्रुघ्न को विजयी होने का आशीर्वाद दिया जाता है और युद्ध की तैयारियाँ आरम्भ होती हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ७४

(शत्रुघ्न का लवणासुर से युद्ध करने की अनुमति माँगना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुस्सप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : मधु की कथा सुनने और ऋषियों की शिकायत के बाद राम ने लवणासुर नामक राक्षस के वध का निश्चय किया। वे अपने भाइयों और मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा कर रहे थे कि किसे यह कठिन कार्य सौंपा जाए। तभी शत्रुघ्न ने खड़े होकर यह अवसर माँगा।

🗣️ मन्त्रणा और शत्रुघ्न का आग्रह (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः सभायां धर्मात्मा रामो वाक्यमथाब्रवीत्।
को वध्यो राक्षसो राजन्नस्माभिर्घोरविक्रमः॥
शत्रुघ्नस्त्वब्रवीद्वाक्यं रामं परमधार्मिकम्।
अहं तं निहनिष्यामि राक्षसं घोरविक्रमम्॥
आज्ञापय महाबाहो मामनुज्ञातुमर्हसि।
गमिष्यामि स्वयं तत्र यत्रास्ते स निशाचरः॥
रामः प्रोवाच शत्रुघ्नं परिष्वज्य महाबलम्।
भवान्वीरो महातेजाः शक्तो हन्तुं निशाचरम्॥
किं तु ते शूलमत्युग्रं पितृपैतामहं महत्।
तदेवास्य बलं राजन्येन दुष्टो दुरासदः॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा राम ने सभा में यह वचन कहा, "हमारे द्वारा उस घोर पराक्रमी राक्षस का वध कैसे किया जाए?" तब शत्रुघ्न ने परम धार्मिक राम से यह वचन कहा, "मैं उस घोर पराक्रमी राक्षस का वध करूँगा। हे महाबाहो! आज्ञा दीजिए, मुझे अनुमति दीजिए। मैं स्वयं वहाँ जाऊँगा, जहाँ वह निशाचर रहता है।" राम ने महाबलशाली शत्रुघ्न को गले लगाकर कहा, "आप वीर और महातेजस्वी हैं, निशाचर को मारने में समर्थ हैं। किन्तु उसके पास उसका पितृपैतामह (पिता और दादा का) वह अत्यन्त उग्र त्रिशूल है, जो उसका बल है। उसी के कारण वह दुष्ट दुर्गम (जिसका सामना करना कठिन हो) है।"

🛡️ वसिष्ठ का उपदेश और युद्ध-नीति (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
वसिष्ठस्त्वब्रवीद्वाक्यं रामं सत्यपराक्रमम्।
शृणु राजन्वधोपायं लवणस्य दुरात्मनः॥
यावच्छूलं धरिष्यति तावन्मृत्युर्न विद्यते।
शूलं त्याजयितुं शक्यं छलेनैव न संशयः॥
अन्नार्थिने यदा शूलं दास्यत्येष निशाचरः।
तदा छलेन तद्ग्राह्यं विना शूलं वधस्ततः॥
एतत्कृत्यं विधातव्यं शत्रुघ्नेन महात्मना।
छलेन शूलं गृह्णीयाल्लवणं च विनिर्दहेत्॥
इत्युक्तः स तु धर्मात्मा शत्रुघ्नः प्रत्युवाच ह।
करिष्ये वचनं ब्रह्मन्यथाज्ञापयते भवान्॥
📖 भावार्थ : वसिष्ठ ऋषि ने सत्यपराक्रमी राम से यह वचन कहा, "हे राजन्! दुरात्मा लवण के वध का उपाय सुनो। जब तक वह उस त्रिशूल को धारण किए रहेगा, तब तक उसकी मृत्यु नहीं हो सकती। उस त्रिशूल को उससे केवल छल से ही छुड़ाया जा सकता है, इसमें संशय नहीं। जब वह निशाचर किसी भिक्षा माँगने वाले (अन्नार्थी) को अपना त्रिशूल देगा, तब उसे छल से ग्रहण कर लेना चाहिए। त्रिशूल से रहित होने पर उसका वध किया जा सकता है। यह कार्य महात्मा शत्रुघ्न को करना चाहिए। वे छल से त्रिशूल को ग्रहण करें और फिर लवण का दहन कर दें।" इस प्रकार कहे जाने पर धर्मात्मा शत्रुघ्न ने उत्तर दिया, "हे ब्रह्मन्! मैं आपके वचन का पालन करूँगा, जैसा आप आज्ञा देते हैं।"

🙏 राम की अनुमति और आशीर्वाद (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
रामः प्रोवाच शत्रुघ्नं गच्छ वीर यथासुखम्।
जहि शत्रुं दुराधर्षं लवणं पापनाशनम्॥
इमां सेनां समादाय गच्छ त्वं रिपुसूदन।
अहं त्वनुगमिष्यामि मनसा सत्यविक्रम॥
लक्ष्मणो भरतश्चैव त्वामनुज्ञाप्य संयुगे।
प्रहृष्टमनसो वीराः सर्व एवाभिनन्दिताः॥
ततः शत्रुघ्न आदाय सेनां च विपुलां तदा।
प्रययौ मधुवनं घोरं यत्रास्ते स निशाचरः॥
रामोऽपि परमप्रीतः प्रेषयित्वा स्वमनुजम्।
विवेश भवनं श्रीमान्पूजितः सर्वदेवतैः॥
📖 भावार्थ : राम ने शत्रुघ्न से कहा, "हे वीर! सुखपूर्वक जाओ। दुराधर्ष शत्रु पापनाशक लवण का वध करो। हे रिपुसूदन! तुम इस सेना को लेकर जाओ। हे सत्यविक्रम! मैं अपने मन से तुम्हारा अनुसरण करूँगा। लक्ष्मण और भरत भी युद्ध में तुम्हें अनुमति देकर हर्षित मन से तुम्हारा अभिनन्दन कर रहे हैं।" तब शत्रुघ्न उस विशाल सेना को लेकर उस भयानक मधुवन की ओर चल पड़े, जहाँ वह निशाचर रहता था। राम भी अपने अनुज को विदा करके अत्यन्त प्रसन्न हुए और समस्त देवताओं द्वारा पूजित होकर अपने भवन में प्रवेश किया।

⚔️ शत्रुघ्न का प्रस्थान (श्लोक १६-२०)

॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः शत्रुघ्न आदाय सेनां परमदारुणाम्।
प्रययौ मधुवनं घोरं वानरर्क्षसमाकुलम्॥
स गत्वा दूरमध्वानं रात्रौ दिवसे तथा।
आससाद वनं घोरं मधोरेव निवेशनम्॥
तत्र दृष्ट्वा महाबाहुर्लवणं घोरदर्शनम्।
स्थितं शूलकरं रौद्रं मेघस्तनितनिःस्वनम्॥
उवाच भ्रातरं वीरो रामं स्मृत्वा महाबलः।
अद्य पश्यन्तु मां देवाः शत्रुघ्नं रणमूर्धनि॥
यथा वध्यो दुराधर्षो लवणः पापनाशनः।
इति संचिन्त्य मनसा युद्धाय समुपस्थितः॥
📖 भावार्थ : तब शत्रुघ्न उस परम भयानक सेना को लेकर उस घोर मधुवन की ओर चल पड़े, जो वानरों और ऋक्षों (भालुओं) से व्याप्त था। वे रात-दिन लम्बा मार्ग तय करके मधु के उस भयानक निवास स्थान के पास पहुँचे। वहाँ महाबाहु शत्रुघ्न ने उस घोरदर्शन लवण को देखा, जो त्रिशूल धारण किए हुए, मेघ की गर्जना के समान भयानक गर्जना करता हुआ स्थित था। उस वीर ने अपने महाबलशाली भाई राम का स्मरण करते हुए कहा, "आज रणभूमि में देवता मुझ शत्रुघ्न को देखें, कि कैसे दुराधर्ष पापनाशक लवण वध्य होता है।" मन में ऐसा विचार करके वे युद्ध के लिए तैयार हो गए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👨‍👦 भ्रातृप्रेम

शत्रुघ्न का राम के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण इस सर्ग में दिखता है। वे स्वेच्छा से इस कठिन कार्य को हाथ में लेते हैं। राम का उन्हें आलिंगन करना और मन से उनका अनुसरण करना भाइयों के अटूट प्रेम को दर्शाता है।

🧠 बुद्धि और बल का समन्वय

वसिष्ठ द्वारा बताया गया उपाय – त्रिशूल को छल से प्राप्त करना – यह सिखाता है कि केवल बल से नहीं, बुद्धि से भी शत्रु को परास्त किया जा सकता है। शत्रुघ्न ने इसे स्वीकार करके विनम्रता और बुद्धिमत्ता का परिचय दिया।

👑 राम का नेतृत्व

राम ने स्वयं न जाकर अपने भाई को भेजा, जो एक कुशल नेता का गुण है – दूसरों को अवसर देना और उन्हें प्रोत्साहित करना। उन्होंने शत्रुघ्न की क्षमता पर विश्वास जताया और उनका मनोबल बढ़ाया।

⚔️ युद्ध की तैयारी

शत्रुघ्न का सेना सहित प्रस्थान यह दर्शाता है कि वे युद्ध को हल्के में नहीं ले रहे थे। वे पूरी तैयारी के साथ और रणनीति समझकर युद्धभूमि की ओर बढ़े।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम और विश्वास होना चाहिए। कठिन कार्यों को करने के लिए आगे आना चाहिए और बुद्धि एवं बल का समुचित प्रयोग करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे चतुस्सप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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