उत्तर काण्ड अध्याय 72

तपस्वियों (ऋषियों) का राम के पास आना

कुछ तपस्वी राम के दरबार में आते हैं और उनसे शिकायत करते हैं कि राक्षस उनके आश्रमों में विघ्न डाल रहे हैं और यज्ञों में बाधा पहुँचा रहे हैं।

विवरण

यह सर्ग राम के राज्यकाल में ऋषियों द्वारा उनके दरबार में आकर राक्षसों की शिकायत करने का वर्णन करता है। कुछ तपस्वी, जो वनों में निवास करते थे, अयोध्या आते हैं और राम से मिलते हैं। वे राम को बताते हैं कि रावण के वध के बाद भी कुछ राक्षस अभी भी जीवित हैं और वे वनों में आश्रमों को नष्ट कर रहे हैं, यज्ञों में विघ्न डाल रहे हैं और ऋषियों को परेशान कर रहे हैं। वे राम से इन राक्षसों से रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं। राम उनकी बात सुनकर चिंतित हो जाते हैं और उन राक्षसों के विनाश का संकल्प लेते हैं। वे ऋषियों को आश्वस्त करते हैं कि वे शीघ्र ही उनकी रक्षा के लिए उचित कदम उठाएँगे। यह सर्ग राम के धर्मराज्य के कर्तव्यों और प्रजा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ७२

(तपस्वियों का राम के पास आना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम का राज्य सुख और समृद्धि से परिपूर्ण था। प्रजा धर्मपरायण और संतुष्ट थी। एक दिन कुछ तपस्वी, जो दूर-दराज के वनों में तपस्या करते थे, अयोध्या नगरी में आए और राम के दरबार में पहुँचे। उनके मुख पर चिंता और आक्रोश स्पष्ट झलक रहा था।

🧘 तपस्वियों का आगमन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः कदाचिदायातास्तपस्विनो धर्मचारिणः।
रामस्य दर्शनाकाङ्क्षी राज्ञो धर्मभृतां वराः॥
ते दृष्ट्वा राघवं राजन्सिंहासनगतं शुभम्।
उपतस्थुर्महात्मानः प्राञ्जलिः प्रणता भृशम्॥
रामः प्रोवाच तान्सर्वान्मुनिवृन्दान्कृताञ्जलिः।
स्वागतं वो महाभागाः कुशलं च तपोवने॥
आसनान्यर्घ्यपाद्यं च गवां दानं च पार्थिवम्।
गृह्यतां भगवन्तोऽत्र यथोचितमनुत्तमम्॥
ततः सुमन्त्रः शीघ्रं तु राजाज्ञां शिरसा वहन्।
आहारं विविधं स्वादु मुनिभ्यः समुपाहरत्॥
📖 भावार्थ : एक दिन कुछ तपस्वी, जो धर्म के आचरण में निरत थे, राजा राम के दर्शन की इच्छा से अयोध्या आए। वे सभी धर्म को धारण करने वालों में श्रेष्ठ थे। राजा राम को सिंहासन पर विराजमान देखकर वे महात्मा हाथ जोड़कर और भली-भाँति प्रणाम करके उनके समीप खड़े हो गए। राम ने भी हाथ जोड़कर उन सभी मुनियों से कहा, "महाभागो! आपका स्वागत है। तपोवन में आप सब कुशलपूर्वक तो हैं न? कृपया यहाँ आसन ग्रहण करें। आपके लिए अर्घ्य, पाद्य और गौदान की भी उत्तम व्यवस्था की गई है।" राजा की आज्ञा पाकर सुमन्त्र तुरन्त विविध प्रकार के स्वादिष्ट भोजन मुनियों के लिए ले आए।

😟 तपस्वियों की शिकायत (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः भुक्त्वा यथान्यायं मुनयः संशितव्रताः।
रामं परमधर्मज्ञं वाक्यमूचुरिदं तदा॥
राजन्नस्मान्महाबाहो रक्ष राक्षसतो भयात्।
त्वयि राज्यं प्रशासति हन्यन्ते स्म तपस्विनः॥
वनेषु विविधेष्वद्य राक्षसाः कामरूपिणः।
आश्रमाणि प्रध्वंसयन्ति यज्ञविघ्नं प्रकुर्वते॥
न शक्नुमो वयं राजन्यज्ञान्कर्तुं तपश्चरितुम्।
भयार्तानां हि नो रक्ष क्षत्रियाणां बलं भवान्॥
येन ते राक्षसाः सर्वे निहताः स्युर्महाबलाः।
तं विधानं विधत्स्वाशु येन शर्म लभेमहि॥
📖 भावार्थ : यथोचित रीति से भोजन करने के बाद, संयमित व्रतों का पालन करने वाले उन मुनियों ने परम धर्मज्ञ राम से इस प्रकार कहा, "हे महाबाहो राजन्! हमें राक्षसों के भय से बचाइए। आप राज्य का शासन कर रहे हैं, फिर भी हम तपस्वी मारे जाते हैं। विभिन्न वनों में कामरूपी राक्षस हमारे आश्रमों को नष्ट कर रहे हैं और यज्ञों में विघ्न डाल रहे हैं। हे राजन्! हम यज्ञ करने और तपस्या करने में समर्थ नहीं हैं। हम भय से पीड़ित हैं, आप हमारी रक्षा कीजिए। आप ही क्षत्रियों के बल हैं। ऐसा उपाय कीजिए जिससे वे सब महाबली राक्षस मारे जाएँ और हमें शांति मिले।"

😡 राम का क्रोध और संकल्प (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवः श्रीमान्क्रोधसंरक्तलोचनः।
उवाच परमक्रुद्धो मुनिवृन्दान्समागतान्॥
अहो बत महत्कष्टं यद्राक्षसाः दुरात्मानः।
मम राज्ये प्रशासति हन्युः साधून्बलाद्बली॥
नूनं रावणवधेनापि न शान्तास्ते निशाचराः।
अद्यैव तान्वधिष्यामि सत्येनायुधमालभे॥
भवन्तः शान्तिमापन्नाः स्वाश्रमेषु वसन्त्विति।
यावद्बलं ममैतद्धि स्थितं रक्षार्थमद्य वै॥
आश्वासयामास मुनीन्राघवः सत्यविक्रमः।
📖 भावार्थ : मुनियों की यह बात सुनकर श्रीराम के नेत्र क्रोध से लाल हो गए। अत्यन्त क्रोधित होकर वे एकत्रित मुनियों से बोले, "अहो! यह बड़े कष्ट की बात है कि मेरे राज्य में दुरात्मा राक्षस बलपूर्वक साधुओं को मार रहे हैं। निश्चय ही रावण के वध से भी वे राक्षस शांत नहीं हुए हैं। मैं आज ही उनका वध करूँगा, यह मैं अपने धनुष की शपथ लेकर कहता हूँ। अब आप लोग शांतिपूर्वक अपने-अपने आश्रमों में निवास करें। मेरी यह सम्पूर्ण सेना आपकी रक्षा के लिए सदा तत्पर है।" इस प्रकार सत्यविक्रम राघव ने मुनियों को आश्वासन दिया।

🙏 तपस्वियों की विदाई (श्लोक १६-२०)

॥ श्लोक १६-२० ॥
ते तु लब्ध्वा वरं राज्ञः प्रीताः संपूर्णमानसाः।
प्रशशंसुर्महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्॥
त्वयि राज्ञि धर्मात्मन्लोकाः सर्वे सुखान्विताः।
न शोचन्ति न तप्यन्ति न च व्याधिभयं क्वचित्॥
इत्युक्त्वा ते तपस्विनो रामेण समनुज्ञाताः।
प्रययुः स्वानि धिष्ण्यानि प्रहृष्टा धर्मचारिणः॥
रामोऽपि परमप्रीतः प्रतिज्ञां तामनुस्मरन्।
चिन्तयामास राक्षसानां वधोपायं सुदारुणम्॥
स तु राजा महातेजाः सभायां मन्त्रिभिः सह।
मन्त्रयामास धर्मात्मा राक्षसानां वधं प्रति॥
📖 भावार्थ : राजा से यह वरदान (आश्वासन) पाकर वे तपस्वी अत्यन्त प्रसन्न और तृप्त हृदय हुए। उन्होंने सत्यपराक्रमी महात्मा राम की बहुत प्रशंसा की। उन्होंने कहा, "हे धर्मात्मन्! आपके राज्य में सभी लोग सुखी हैं, न कोई शोक करता है, न संताप पाता है और न कहीं व्याधि का भय है।" ऐसा कहकर और राम से आज्ञा लेकर वे धर्माचरण में तत्पर तपस्वी हर्षित होकर अपने-अपने आश्रमों को लौट गए। राम भी अत्यन्त प्रसन्न हुए और अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण करते हुए उन राक्षसों के वध के लिए भयंकर उपायों पर विचार करने लगे। वे महातेजस्वी धर्मात्मा राजा सभा में मन्त्रियों के साथ राक्षसों के वध के सम्बन्ध में मन्त्रणा करने लगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राजा का कर्तव्य

यह सर्ग राजा के प्राथमिक कर्तव्य – प्रजा की रक्षा – को रेखांकित करता है। राम तुरन्त ऋषियों की पीड़ा सुनकर क्रोधित होते हैं और उनकी रक्षा का संकल्प लेते हैं। एक आदर्श राजा के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी प्रजा के कष्टों को सुने और उनका निवारण करे।

😈 राक्षसों की दुष्टता

रावण के मारे जाने के बाद भी राक्षसों का दुष्ट स्वभाव समाप्त नहीं हुआ। यह दर्शाता है कि बुराई केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होती, वरन् उसके अनुयायी भी उसी प्रवृत्ति के होते हैं।

⚔️ राम का सत्यसंकल्प

राम का धनुष की शपथ लेकर राक्षसों के वध का संकल्प करना उनके सत्यनिष्ठ और प्रतिज्ञाबद्ध स्वभाव को दर्शाता है। वे कभी भी अपनी प्रजा को दुःखी नहीं देख सकते थे।

📜 आगे की कथा का बीज

यह सर्ग आगे आने वाली कथा (शत्रुघ्न का लवणासुर वध) का आधार तैयार करता है। राक्षसों की शिकायत और राम का संकल्प ही शत्रुघ्न को मधुवन भेजने का कारण बनता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि शासक का सबसे बड़ा धर्म प्रजा की रक्षा करना है। प्रजा के कष्टों को सुनना और उनका समाधान करना ही सच्चे राजा की पहचान है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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