उत्तर काण्ड अध्याय 71

गिद्ध और उल्लू की कहानी

राम के पूछने पर अगस्त्य ऋषि उन्हें गिद्धों और उल्लुओं के बीच के प्राचीन वैर की कथा सुनाते हैं, जिसमें बताया गया है कि कैसे उल्लुओं ने गिद्धों के राजा मेघवर्ण से बदला लिया था।

विवरण

यह सर्ग अगस्त्य ऋषि द्वारा राम को सुनाई गई एक शिक्षाप्रद कथा है। राम के पूछने पर कि राक्षसों का स्वभाव दुष्ट क्यों होता है, अगस्त्य उन्हें गिद्धों (सुपर्णा) और उल्लुओं (उलूक) के बीच के प्राचीन वैर की कथा सुनाते हैं। कथा के अनुसार, समस्त पक्षियों का राजा चुनने के लिए एक सम्मेलन हुआ। सभी पक्षी गरुड़ को अपना राजा चुनना चाहते थे, किंतु उल्लू ने अपने मित्र गिद्ध मेघवर्ण का नाम प्रस्तावित किया। इस पर गिद्ध ने स्वयं को राजा घोषित करा लिया, जिससे उल्लू अपमानित महसूस करने लगा। रात्रि के समय जब सब सो रहे थे, उल्लू ने अपने साथियों से कहा कि अब वे गिद्धों पर आक्रमण करें। एक बुद्धिमान उल्लू ने कहा कि रात्रि में आक्रमण करना उचित है क्योंकि गिद्ध रात में देख नहीं सकते। तभी से उल्लू और गिद्धों में वैर चला आ रहा है। यह कथा बताती है कि कैसे मित्रता में दरार पड़ने से शत्रुता उत्पन्न हो जाती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ७१

(गिद्ध और उल्लू की कहानी)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने अगस्त्य ऋषि से पूछा, "भगवन! राक्षसों का स्वभाव इतना दुष्ट और क्रूर क्यों होता है?" तब अगस्त्य ऋषि ने उन्हें गिद्ध और उल्लू के वैर की यह प्राचीन कथा सुनाई, जो मित्रता और शत्रुता के मूल कारणों को समझाती है।

🦅 प्रश्न और कथा का आरम्भ (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः कदाचिद्रामेण पृष्टोऽगस्त्यो महामुनिः।
किमर्थं राक्षसाः पापा नित्यं क्रूराः सुदारुणाः॥
अगस्त्यः प्राह राम त्वं शृणु वैरं पुरातनम्।
सुपर्णानां च संग्रामं शाखामृगविहंगमैः॥
पुरा कृतयुगे राम पक्षिणः सर्व एव हि।
समेत्य मन्त्रयामासुः पतिं कर्तुं तदा नृपम्॥
गरुड़ं वै पतिं कर्तुं सर्वे ते समकाङ्क्षिणः।
उलूकस्त्वब्रवीद्वाक्यं मेघवर्णं पतिं कुरु॥
सुपर्णानां तदा राजा मेघवर्णोऽभवद्बली।
तेन राज्यं कृतं सर्वैः पक्षिभिः समुदायतः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कदाचित् = किसी समय; रामेण = राम ने; पृष्टः = पूछा; अगस्त्यः = अगस्त्य से; महामुनिः = महामुनि; किमर्थम् = किसलिए; राक्षसाः = राक्षस; पापाः = पापी; नित्यम् = सदा; क्रूराः = क्रूर; सुदारुणाः = अत्यन्त भयानक; अगस्त्यः = अगस्त्य ने; प्राह = कहा; राम = हे राम; त्वम् = तुम; शृणु = सुनो; वैरम् = वैर; पुरातनम् = पुराना; सुपर्णानाम् = गरुड़ के वंशजों (गिद्धों) का; च = और; संग्रामम् = युद्ध; शाखामृगविहंगमैः = उल्लुओं के साथ; पुरा = पूर्वकाल में; कृतयुगे = सतयुग में; राम = हे राम; पक्षिणः = पक्षी; सर्व = सभी; एव = ही; हि = निश्चय; समेत्य = एकत्र होकर; मन्त्रयामासुः = मन्त्रणा की; पतिम् = राजा; कर्तुम् = करने के लिए; तदा = तब; नृपम् = राजा; गरुड़म् = गरुड़ को; वै = ही; पतिम् = राजा; कर्तुम् = करने के; सर्वे = सभी; ते = वे; समकाङ्क्षिणः = इच्छुक थे; उलूकः = उल्लू; तु = परन्तु; अब्रवीत् = बोला; वाक्यम् = वचन; मेघवर्णम् = मेघवर्ण को; पतिम् = राजा; कुरु = करो; सुपर्णानाम् = गिद्धों में; तदा = तब; राजा = राजा; मेघवर्णः = मेघवर्ण; अभवत् = हुआ; बली = बलवान; तेन = उसके द्वारा; राज्यम् = राज्य; कृतम् = किया गया; सर्वैः = सभी; पक्षिभिः = पक्षियों द्वारा; समुदायतः = मिलकर।
📖 भावार्थ : एक समय की बात है, राम ने महामुनि अगस्त्य से प्रश्न किया कि राक्षसों का स्वभाव इतना पापी और क्रूर क्यों होता है। तब अगस्त्य ऋषि ने उन्हें एक प्राचीन कथा सुनानी आरम्भ की। उन्होंने बताया कि सतयुग में सभी पक्षियों ने एकत्रित होकर अपना राजा चुनने का निर्णय लिया। सभी पक्षी गरुड़ को अपना राजा बनाना चाहते थे, लेकिन एक उल्लू ने यह प्रस्ताव रखा कि गिद्धों के वंशज मेघवर्ण को राजा बनाया जाना चाहिए। चूँकि उल्लू का यह प्रस्ताव था और अन्य पक्षियों ने भी उसका समर्थन किया, इसलिए बलशाली मेघवर्ण को गिद्धों का राजा घोषित कर दिया गया। इस प्रकार सभी पक्षियों के सहयोग से मेघवर्ण का राज्य स्थापित हुआ।

🦉 उल्लू का अपमान (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
राज्येऽभिषिक्ते मेघवर्णे सुपर्णा मुदिता भृशम्।
उलूकस्तु तदा दीनो नित्यं संचिन्तयन्मनः॥
अहमेव नियुक्तस्तु राज्ये येन सुपर्णपः।
स मां नाभिनन्देत कथं राजा भविष्यति॥
एवं संचिन्तयन्नित्यमुलूको व्यथितेन्द्रियः।
न प्रीतिमधिगच्छति स्वभावादेव दुःखितः॥
ततः कदाचिदुलूको मेघवर्णं ददर्श ह।
समृद्धं राज्यमासीनं सुपर्णैः परिवारितम्॥
दृष्ट्वा तु मन्युना युक्त उलूकः प्राह सत्वरम्।
अहो राज्यं मया दत्तं मेघवर्णाय धीमते॥
📖 भावार्थ : जब मेघवर्ण का राज्याभिषेक हुआ तो समस्त गिद्ध अत्यन्त प्रसन्न हुए। किन्तु उस उल्लू का मन बहुत दुःखी और व्यथित था, जिसने मेघवर्ण का नाम राजा के लिए प्रस्तावित किया था। वह सोचने लगा कि मैंने ही उसे राजा बनवाया था, परन्तु अब वह मेरा कोई आदर-सत्कार नहीं करता। यदि वह राजा बनकर भी मेरी उपेक्षा कर रहा है, तो फिर उसका राजा होना कैसा? इस प्रकार निरन्तर चिन्ता में डूबा रहने के कारण उल्लू की इन्द्रियाँ व्यथित हो गईं और उसे कहीं भी प्रसन्नता का अनुभव नहीं हो रहा था। उसका स्वभाव ही दुःखी हो गया। एक दिन उसने मेघवर्ण को देखा, जो अपनी समृद्ध राजगद्दी पर विराजमान था और चारों ओर से गिद्धों से घिरा हुआ था। यह दृश्य देखकर उल्लू के मन में क्रोध उत्पन्न हुआ और वह तुरन्त बोल उठा, "अहा! मैंने ही इस बुद्धिमान मेघवर्ण को यह राज्य दिया था।"

💔 मित्रता में दरार (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तच्छ्रुत्वा मेघवर्णस्तु प्रहस्येदमथाब्रवीत्।
किं त्वया दत्तमस्माकं येन राज्यं प्रशास्महे॥
बलेन वयमेवैतत्प्राप्तवन्तो न केनचित्।
त्वया तु व्याहृतं मिथ्या मा वदस्व पुनर्वचः॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं मेघवर्णेन भाषितम्।
उलूकः क्रोधताम्राक्षः प्रतोदं समगृह्यत॥
ततः प्रहृत्य मेघवर्णं तुदन्वाक्यमथाब्रवीत्।
राज्यं ते नश्यतामद्य यस्मान्मामवमन्यसे॥
एवमुक्त्वा ततो राजन्नुलूकोऽन्तरधीयत।
📖 भावार्थ : उल्लू की यह बात सुनकर मेघवर्ण जोर से हँसा और बोला, "तुमने हमें क्या दिया है, जिसके बदले में हम राज्य कर रहे हैं? हमने यह राज्य अपने बल से प्राप्त किया है, किसी और के कारण नहीं। तुम झूठ बोल रहे हो। ऐसी बात फिर कभी मत कहना।" मेघवर्ण के इन कठोर वचनों को सुनकर उल्लू की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। उसने तुरन्त एक प्रतोद (चाबुक) उठा लिया और मेघवर्ण पर प्रहार करते हुए कहा, "तूने मेरा अपमान किया है, इसलिए तेरा यह राज्य आज ही नष्ट हो जाए।" यह कहकर उल्लू वहाँ से अन्तर्ध्यान हो गया।

⚔️ वैर का प्रारम्भ (श्लोक १६-२०)

॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः प्रभृति तद्वैरमुलूकसुपर्णयोः।
अन्योन्यं घातयामासुर्नित्यं क्रोधवशानुगाः॥
उलूका रात्रौ सुपर्णान्हन्युर्दिवसकालतः।
सुपर्णाश्च दिवा रात्रौ न हि शक्ताः प्रहारिणः॥
एवं वैरं समुत्पन्नं पुराणं पापनाशनम्।
राक्षसानामपि तथा स्वभावः क्रूर एव हि॥
अत एव हि राम त्वं राक्षसान्निजघानिथ।
धर्मेण पालयन्सर्वान्प्रजाः पुत्रानिवौरसान्॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने कहा, "हे राम! उसी दिन से उल्लुओं और गिद्धों के बीच यह वैर चला आ रहा है। क्रोध के वशीभूत होकर वे एक-दूसरे को निरन्तर मारते रहते हैं। उल्लू रात्रि के समय गिद्धों पर आक्रमण करते हैं, क्योंकि गिद्ध रात में नहीं देख सकते। इसी प्रकार गिद्ध दिन के समय उल्लुओं पर प्रहार करते हैं, क्योंकि उल्लू दिन में अंधे होते हैं और देख नहीं पाते। इस प्रकार यह प्राचीन और पापनाशक वैर उत्पन्न हुआ। ठीक इसी प्रकार राक्षसों का स्वभाव भी सहज ही क्रूर होता है। इसी कारण, हे राम, तुमने उन राक्षसों का वध किया और धर्मपूर्वक अपनी समस्त प्रजा का पुत्रों की भाँति पालन किया।"

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤝 मित्रता और कृतघ्नता

यह कथा मित्रता के महत्व और कृतघ्नता के दुष्परिणामों को दर्शाती है। उल्लू ने मेघवर्ण को राजा बनवाया, किन्तु मेघवर्ण ने उसके योगदान को स्वीकार नहीं किया और उसका अपमान किया। इससे मित्रता शत्रुता में बदल गई। यह सिखाता है कि मित्र के उपकार को कभी नहीं भूलना चाहिए।

🦉 स्वभाव का प्रभाव

उल्लू का रात्रिचर स्वभाव और गिद्ध का दिवाचर स्वभाव ही उनके वैर का कारण बना। यह दर्शाता है कि प्राणियों के सहज स्वभाव को बदलना कठिन होता है। राक्षसों का क्रूर स्वभाव भी इसी प्रकार उनके जन्मजात गुणों के कारण है।

⚖️ धर्म की विजय

राम ने राक्षसों का वध करके धर्म की स्थापना की। यह कथा बताती है कि क्रूर स्वभाव के लोगों का दमन करना राजा का कर्तव्य है, ठीक वैसे ही जैसे गिद्ध दिन में उल्लुओं का दमन करते हैं।

📚 नीति की शिक्षा

यह कथा एक नीतिपरक उपदेश है कि अपने हितैषी को कभी अपमानित नहीं करना चाहिए। राजनीति में भी यह सिद्धान्त महत्वपूर्ण है कि मित्रों के योगदान को सदैव स्वीकार किया जाना चाहिए।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मित्रता में दरार नहीं आने देनी चाहिए और मित्र के उपकार को सदैव स्मरण रखना चाहिए। कृतघ्नता सबसे बड़ा पाप है, जो मित्र को भी शत्रु बना सकती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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