कुत्ते की शिकायत
कुत्ते की शिकायत के बाद राम द्वारा न्याय करने और धर्म द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप के प्रकटीकरण की कथा। इस सर्ग में कुत्ते के रूप में धर्म के प्रकट होने और राम की प्रशंसा का वर्णन है।
विवरण
यह सर्ग पिछले सर्ग की घटना का समापन है। कुत्ते ने ब्राह्मण के लिए मठाधीश पद का दण्ड माँगा, जिसे राम ने स्वीकार किया। तब कुत्ता अपने वास्तविक स्वरूप धर्म को प्रकट करता है और राम की धर्मनिष्ठा की स्तुति करता है। राम धर्म से प्रार्थना करते हैं कि वे सदा प्रजा की रक्षा करें। इसके बाद राम धर्म के साथ मिलकर राज्य का पालन करते हैं। यह सर्ग धर्म और राजा के अटूट सम्बन्ध को दर्शाता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ७०
(कुत्ते की शिकायत)
🔆 प्रस्तावना : कुत्ते ने अद्भुत दण्ड सुझाया, जिसे राम ने स्वीकार किया। अब कुत्ता अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होता है और राम की धर्मनिष्ठा की प्रशंसा करता है। यह सर्ग धर्म और राजा के संवाद पर आधारित है।
📜 श्लोक १-५ : धर्म का प्रकटीकरण
धर्मपरीक्षार्थमिदं कृतं मया नरेश्वर॥१॥
त्वं धर्मज्ञो महातेजा धर्मेण पृथिवीपतिः।
तव राज्ये जनाः सर्वे धर्मनिष्ठाः सदा प्रभो॥२॥
अद्यप्रभृति राजा त्वं धर्मेण पालयन् महीम्।
यशः प्राप्स्यसि लोकेऽस्मिन् परत्र च महीयते॥३॥
इत्युक्त्वा धर्मराजस्तु तत्रैवान्तरधीयत।
रामः प्रीतमना भूत्वा प्रशशंस पुनः पुनः॥४॥
धन्योऽस्मि भगवन् धर्म यत्त्वया परीक्षितः।
त्वत्प्रसादान्महीं सर्वां पालयिष्ये यथाविधि॥५॥
📜 श्लोक ६-१० : राम का धर्म के प्रति समर्पण
प्रजाः पालयतां तेन धर्म एव परायणम्॥६॥
नाधर्मः कश्चिदप्यासीद्रामे राज्यं प्रशासति।
सर्वे वर्णाः स्वधर्मस्थाः सुखिनः सन्मुदा युताः॥७॥
देवाः प्रीताः पितृगणाः प्रजाः सर्वाः सुखान्विताः।
न व्याधिभयं किंचिन्न चौरभयमेव च॥८॥
एवं राघवराज्ये तु सुखं परममाप्नुयुः।
धर्म एव स्थितो लोके रामेण परिपालितः॥९॥
य इदं शृणुयाद्भक्त्या पठेद्वा श्रद्धयान्वितः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत धर्मनिष्ठः सुखी भवेत्॥१०॥
📜 श्लोक ११-१५ : धर्म और राजा का संवाद
धर्म त्वया सदा रक्ष्या प्रजा मे धर्मतो भव॥११॥
धर्मः प्राह महाबाहो यत्त्वया परिपाल्यते।
धर्म एव सदा लोके त्वयि राज्ञि प्रतिष्ठितः॥१२॥
अहं त्वया सदा राम सत्यधर्मपरायण।
रक्षितः पालितश्चैव त्वयि स्थास्यामि राघव॥१३॥
यावत् त्वं पृथिवीं राजन् धर्मेण परिपालयेः।
तावत् स्थास्यामि लोकेऽस्मिन् सर्वपापहरः शुभः॥१४॥
इत्युक्त्वा धर्मराजस्तु तत्रैवान्तरधीयत।
रामोऽपि परमप्रीतः शशास पृथिवीं तदा॥१५॥
📜 श्लोक १६-२० : रामराज्य की विशेषताएँ
भयं कुतश्चिदप्यासीत् सर्वं सुखमयोऽभवत्॥१६॥
वृक्षाः फलानि पुष्पाणि धारयन्ति फलप्रदाः।
गावः प्रदुदुहे दोग्ध्र्यः क्षरन्ति सलिलं घनाः॥१७॥
नाधर्मः कश्चिदप्यासीत् प्रजानां राघवे सति।
सर्वे धर्मपरा लोकाः सर्वे सत्यपरायणाः॥१८॥
एवं दशसहस्राणि वर्षाणां रघुनन्दनः।
राज्यं कारयतां रामो धर्मेण सुसमाहितः॥१९॥
इत्याख्यानं समाप्तं ते रामस्य चरितं शुभम्।
धर्माख्यानमिदं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥२०॥
📜 श्लोक २१-२५ : फलश्रुति
सर्वपापैः प्रमुच्येत ब्रह्मलोके महीयते॥२१॥
पुत्रवान् धनवान् राजा विद्यावान् कीर्तिमान् भवेत्।
इह लोके सुखं भुक्त्वा परत्र च शुभं व्रजेत्॥२२॥
न तस्य व्याधयः क्लेशा न दारिद्र्यं न शत्रवः।
सर्वत्र विजयी राजा धर्मेण पालयेन्महीम्॥२३॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन धर्म एव परायणम्।
रामेण यत्कृतं राज्ञा तत्कुर्यादनुमोदयेत्॥२४॥
इति श्रीवाल्मीकीये रामायणे उत्तरकाण्डे सप्ततितमः सर्गः॥२५॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🕊️ धर्म और राजा का सम्बन्ध
धर्म ने कहा कि जब तक राम धर्म से राज्य करेंगे, तब तक धर्म उनमें स्थित रहेगा। यह दर्शाता है कि राजा के धर्मपालन पर ही धर्म टिका है।
🌍 रामराज्य की विशेषताएँ
राम के राज्य में सब सुखी थे, कोई भय नहीं था, प्रकृति भी सहयोग करती थी। यह आदर्श राज्य का वर्णन है।
🔁 कर्म का सिद्धान्त
धर्म ने राम की परीक्षा ली और उन्हें सफल पाया। इससे सिद्ध होता है कि धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता है।
📖 फलश्रुति का महत्त्व
इस कथा को सुनने से पापों से मुक्ति और सुख-समृद्धि मिलती है। यह उत्तरकाण्ड के अन्य सर्गों की भाँति पुण्यदायी है।
🎯 शिक्षा : धर्म का पालन करने से व्यक्ति, राजा और समाज सभी सुखी रहते हैं। धर्म ही सबसे बड़ा आश्रय है। राम के आदर्शों का अनुसरण करना चाहिए।