उत्तर काण्ड अध्याय 70

कुत्ते की शिकायत

कुत्ते की शिकायत के बाद राम द्वारा न्याय करने और धर्म द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप के प्रकटीकरण की कथा। इस सर्ग में कुत्ते के रूप में धर्म के प्रकट होने और राम की प्रशंसा का वर्णन है।

विवरण

यह सर्ग पिछले सर्ग की घटना का समापन है। कुत्ते ने ब्राह्मण के लिए मठाधीश पद का दण्ड माँगा, जिसे राम ने स्वीकार किया। तब कुत्ता अपने वास्तविक स्वरूप धर्म को प्रकट करता है और राम की धर्मनिष्ठा की स्तुति करता है। राम धर्म से प्रार्थना करते हैं कि वे सदा प्रजा की रक्षा करें। इसके बाद राम धर्म के साथ मिलकर राज्य का पालन करते हैं। यह सर्ग धर्म और राजा के अटूट सम्बन्ध को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ७०

(कुत्ते की शिकायत)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : कुत्ते ने अद्भुत दण्ड सुझाया, जिसे राम ने स्वीकार किया। अब कुत्ता अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होता है और राम की धर्मनिष्ठा की प्रशंसा करता है। यह सर्ग धर्म और राजा के संवाद पर आधारित है।

📜 श्लोक १-५ : धर्म का प्रकटीकरण

ततः श्वा प्राह रामं तु धर्मोऽहं तव सन्निधौ।
धर्मपरीक्षार्थमिदं कृतं मया नरेश्वर॥१॥
त्वं धर्मज्ञो महातेजा धर्मेण पृथिवीपतिः।
तव राज्ये जनाः सर्वे धर्मनिष्ठाः सदा प्रभो॥२॥
अद्यप्रभृति राजा त्वं धर्मेण पालयन् महीम्।
यशः प्राप्स्यसि लोकेऽस्मिन् परत्र च महीयते॥३॥
इत्युक्त्वा धर्मराजस्तु तत्रैवान्तरधीयत।
रामः प्रीतमना भूत्वा प्रशशंस पुनः पुनः॥४॥
धन्योऽस्मि भगवन् धर्म यत्त्वया परीक्षितः।
त्वत्प्रसादान्महीं सर्वां पालयिष्ये यथाविधि॥५॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; श्वा = कुत्ता; प्राह = बोला; रामम् = राम से; तु = तो; धर्मः = धर्म; अहम् = मैं; तव = तेरे; सन्निधौ = समीप में; धर्मपरीक्षार्थम् = धर्म की परीक्षा के लिए; इदम् = यह; कृतम् = किया; मया = मैंने; नरेश्वर = हे नरेश। त्वम् = तू; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; महातेजाः = महान तेजस्वी; धर्मेण = धर्म से; पृथिवीपतिः = पृथ्वीपति; तव = तेरे; राज्ये = राज्य में; जनाः = लोग; सर्वे = सब; धर्मनिष्ठाः = धर्मनिष्ठ; सदा = सदा; प्रभो = हे प्रभु। अद्यप्रभृति = आज से; राजा = राजा; त्वम् = तू; धर्मेण = धर्म से; पालयन् = पालन करते हुए; महीम् = पृथ्वी; यशः = यश; प्राप्स्यसि = प्राप्त करेगा; लोके = लोक में; अस्मिन् = इस; परत्र = परलोक में; च = और; महीयते = पूजित होगा। इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; धर्मराजः = धर्मराज; तत्रैव = वहीं; अन्तरधीयत = अन्तर्धान हो गए। रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्न मन वाले; भूत्वा = होकर; प्रशशंस = स्तुति की; पुनः पुनः = बार-बार। धन्यः = धन्य; अस्मि = हूँ; भगवन् = हे भगवन्; धर्म = हे धर्म; यत् = जो; त्वया = आपने; परीक्षितः = परीक्षा ली; त्वत्प्रसादात् = आपकी कृपा से; महीम् = पृथ्वी; सर्वाम् = सम्पूर्ण; पालयिष्ये = पालन करूँगा; यथाविधि = विधिपूर्वक।
📖 भावार्थ : तब कुत्ते ने राम से कहा कि हे राम! मैं धर्म हूँ। मैं तुम्हारी धर्मपरायणता की परीक्षा लेने के लिए कुत्ते के रूप में आया था। तुम धर्मज्ञ हो, तुम्हारे राज्य में सब लोग धर्मनिष्ठ हैं। आज से तुम धर्मपूर्वक राज्य करोगे तो इस लोक में यश प्राप्त करोगे और परलोक में पूजित होगे। ऐसा कहकर धर्म वहीं अन्तर्धान हो गए। राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने धर्म की स्तुति की – हे भगवन् धर्म! मैं धन्य हूँ कि आपने मेरी परीक्षा ली। आपकी कृपा से मैं इस पृथ्वी का विधिपूर्वक पालन करूँगा।

📜 श्लोक ६-१० : राम का धर्म के प्रति समर्पण

एवं रामः स्थितो राज्ये धर्ममेवान्वचिन्तयत्।
प्रजाः पालयतां तेन धर्म एव परायणम्॥६॥
नाधर्मः कश्चिदप्यासीद्रामे राज्यं प्रशासति।
सर्वे वर्णाः स्वधर्मस्थाः सुखिनः सन्मुदा युताः॥७॥
देवाः प्रीताः पितृगणाः प्रजाः सर्वाः सुखान्विताः।
न व्याधिभयं किंचिन्न चौरभयमेव च॥८॥
एवं राघवराज्ये तु सुखं परममाप्नुयुः।
धर्म एव स्थितो लोके रामेण परिपालितः॥९॥
य इदं शृणुयाद्भक्त्या पठेद्वा श्रद्धयान्वितः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत धर्मनिष्ठः सुखी भवेत्॥१०॥
🔹 पदच्छेद : एवम् = इस प्रकार; रामः = राम; स्थितः = स्थित; राज्ये = राज्य में; धर्मम् = धर्म; एव = ही; अन्वचिन्तयत् = चिन्तन करते रहे; प्रजाः = प्रजा; पालयताम् = पालन करते समय; तेन = उनके द्वारा; धर्मः = धर्म; एव = ही; परायणम् = परम आश्रय। न = नहीं; अधर्मः = अधर्म; कश्चित् = कोई भी; अपि = भी; आसीत् = था; रामे = राम के; राज्यम् = राज्य; प्रशासति = शासन करते समय; सर्वे = सब; वर्णाः = वर्ण; स्वधर्मस्थाः = अपने-अपने धर्म में स्थित; सुखिनः = सुखी; सत् = सज्जन; मुदा = आनन्द; युताः = युक्त। देवाः = देवता; प्रीताः = प्रसन्न; पितृगणाः = पितर; प्रजाः = प्रजा; सर्वाः = सब; सुखान्विताः = सुख से युक्त; न = नहीं; व्याधिभयम् = रोग का भय; किंचित् = कुछ भी; न = नहीं; चौरभयम् = चोरों का भय; एव = ही; च = और। एवम् = इस प्रकार; राघवराज्ये = राघव के राज्य में; तु = तो; सुखम् = सुख; परमम् = परम; आप्नुयुः = प्राप्त होता था; धर्मः = धर्म; एव = ही; स्थितः = स्थित; लोके = लोक में; रामेण = राम द्वारा; परिपालितः = पालित। यः = जो; इदम् = इस; शृणुयात् = सुने; भक्त्या = भक्ति से; पठेत् = पढ़े; वा = या; श्रद्धयान्वितः = श्रद्धा से युक्त; सर्वपापैः = सब पापों से; प्रमुच्येत = मुक्त हो जाता है; धर्मनिष्ठः = धर्मनिष्ठ; सुखी = सुखी; भवेत् = होता है।
📖 भावार्थ : इस प्रकार राम धर्म में स्थित होकर राज्य का पालन करते रहे। उनके शासन में कहीं भी अधर्म नहीं था। सभी वर्ण अपने-अपने धर्म में स्थित थे, सब सुखी थे। देवता और पितर प्रसन्न थे। प्रजा में न रोग का भय था, न चोरों का। राम के राज्य में सबको परम सुख प्राप्त हुआ। धर्म की सर्वत्र स्थापना हुई। जो इस कथा को भक्तिपूर्वक सुनता या पढ़ता है, वह सब पापों से मुक्त होकर धर्मनिष्ठ और सुखी होता है।

📜 श्लोक ११-१५ : धर्म और राजा का संवाद

रामः प्राह ततः प्रीत्या धर्मं संपूज्य भक्तितः।
धर्म त्वया सदा रक्ष्या प्रजा मे धर्मतो भव॥११॥
धर्मः प्राह महाबाहो यत्त्वया परिपाल्यते।
धर्म एव सदा लोके त्वयि राज्ञि प्रतिष्ठितः॥१२॥
अहं त्वया सदा राम सत्यधर्मपरायण।
रक्षितः पालितश्चैव त्वयि स्थास्यामि राघव॥१३॥
यावत् त्वं पृथिवीं राजन् धर्मेण परिपालयेः।
तावत् स्थास्यामि लोकेऽस्मिन् सर्वपापहरः शुभः॥१४॥
इत्युक्त्वा धर्मराजस्तु तत्रैवान्तरधीयत।
रामोऽपि परमप्रीतः शशास पृथिवीं तदा॥१५॥
🔹 पदच्छेद : रामः = राम; प्राह = बोले; ततः = तब; प्रीत्या = प्रेम से; धर्मम् = धर्म को; संपूज्य = पूजन करके; भक्तितः = भक्तिपूर्वक; धर्म = हे धर्म; त्वया = तुम्हें; सदा = सदा; रक्ष्या = रक्षा करनी चाहिए; प्रजा = प्रजा की; मे = मेरी; धर्मतः = धर्म से; भव = हो। धर्मः = धर्म; प्राह = बोले; महाबाहो = हे महाबाहो; यत् = जो; त्वया = तुम्हारे द्वारा; परिपाल्यते = पालन किया जाता है; धर्मः = धर्म; एव = ही; सदा = सदा; लोके = लोक में; त्वयि = तुममें; राज्ञि = राजा में; प्रतिष्ठितः = स्थित है। अहम् = मैं; त्वया = तुम्हारे द्वारा; सदा = सदा; राम = हे राम; सत्यधर्मपरायण = सत्य और धर्म में तत्पर; रक्षितः = रक्षित; पालितः = पालित; च = और; एव = ही; त्वयि = तुममें; स्थास्यामि = स्थित रहूँगा; राघव = हे राघव। यावत् = जब तक; त्वम् = तू; पृथिवीम् = पृथ्वी; राजन् = हे राजन्; धर्मेण = धर्म से; परिपालयेः = पालन करेगा; तावत् = तब तक; स्थास्यामि = रहूँगा; लोके = लोक में; अस्मिन् = इस; सर्वपापहरः = सब पापों को हरने वाला; शुभः = शुभ। इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; धर्मराजः = धर्मराज; तत्रैव = वहीं; अन्तरधीयत = अन्तर्धान हो गए। रामः = राम; अपि = भी; परमप्रीतः = अत्यन्त प्रसन्न; शशास = शासन किया; पृथिवीम् = पृथ्वी; तदा = तब।
📖 भावार्थ : राम ने धर्म की भक्तिपूर्वक पूजा की और प्रार्थना की कि हे धर्म! तुम सदा मेरी प्रजा की रक्षा करो। धर्म ने उत्तर दिया कि हे महाबाहो! तुम धर्म का पालन कर रहे हो, इसलिए धर्म तुममें स्थित है। जब तक तुम धर्म से पृथ्वी का पालन करोगे, तब तक मैं इस लोक में स्थित रहूँगा और सब पापों का हरण करूँगा। ऐसा कहकर धर्म अन्तर्धान हो गया। राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और धर्मपूर्वक पृथ्वी का शासन करते रहे।

📜 श्लोक १६-२० : रामराज्य की विशेषताएँ

रामे राज्यं प्रशासति न दुर्भिक्षं न मृत्युजम्।
भयं कुतश्चिदप्यासीत् सर्वं सुखमयोऽभवत्॥१६॥
वृक्षाः फलानि पुष्पाणि धारयन्ति फलप्रदाः।
गावः प्रदुदुहे दोग्ध्र्यः क्षरन्ति सलिलं घनाः॥१७॥
नाधर्मः कश्चिदप्यासीत् प्रजानां राघवे सति।
सर्वे धर्मपरा लोकाः सर्वे सत्यपरायणाः॥१८॥
एवं दशसहस्राणि वर्षाणां रघुनन्दनः।
राज्यं कारयतां रामो धर्मेण सुसमाहितः॥१९॥
इत्याख्यानं समाप्तं ते रामस्य चरितं शुभम्।
धर्माख्यानमिदं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥२०॥
🔹 पदच्छेद : रामे = राम के; राज्यम् = राज्य; प्रशासति = शासन करते समय; न = नहीं; दुर्भिक्षम् = अकाल; न = नहीं; मृत्युजम् = अकाल मृत्यु; भयम् = भय; कुतश्चित् = कहीं से; अपि = भी; आसीत् = था; सर्वम् = सब; सुखमयः = सुखमय; अभवत् = हो गया। वृक्षाः = वृक्ष; फलानि = फल; पुष्पाणि = फूल; धारयन्ति = धारण करते हैं; फलप्रदाः = फल देने वाले; गावः = गायें; प्रदुदुहे = दूध देती थीं; दोग्ध्र्यः = दुहने योग्य; क्षरन्ति = बरसते हैं; सलिलम् = जल; घनाः = बादल। न = नहीं; अधर्मः = अधर्म; कश्चित् = कोई भी; अपि = भी; आसीत् = था; प्रजानाम् = प्रजा में; राघवे = राघव के; सति = होने पर; सर्वे = सब; धर्मपराः = धर्मपरायण; लोकाः = लोग; सर्वे = सब; सत्यपरायणाः = सत्यनिष्ठ। एवम् = इस प्रकार; दशसहस्राणि = दस हजार; वर्षाणाम् = वर्षों तक; रघुनन्दनः = रघुनन्दन; राज्यम् = राज्य; कारयताम् = करते हुए; रामः = राम; धर्मेण = धर्म से; सुसमाहितः = समाहितचित्त। इति = इस प्रकार; आख्यानम् = आख्यान; समाप्तम् = समाप्त हुआ; ते = तुम्हारे लिए; रामस्य = राम का; चरितम् = चरित्र; शुभम् = शुभ; धर्माख्यानम् = धर्म की कथा; इदम् = यह; पुण्यम् = पुण्यमय; सर्वपापप्रणाशनम् = सब पापों का नाश करने वाला।
📖 भावार्थ : राम के राज्य में न कहीं अकाल था, न अकाल मृत्यु, न किसी प्रकार का भय। सब कुछ सुखमय था। वृक्ष यथासमय फल-फूल देते थे, गायें दूध देती थीं, बादल समय पर वर्षा करते थे। प्रजा में कोई अधर्म नहीं था, सब धर्मपरायण और सत्यनिष्ठ थे। राम ने दस हज़ार वर्षों तक धर्मपूर्वक राज्य किया। इस प्रकार यह धर्माख्यान समाप्त होता है, जो अत्यन्त पुण्यमय और सब पापों का नाश करने वाला है।

📜 श्लोक २१-२५ : फलश्रुति

य इदं शृणुयाद्भक्त्या पठेद्वा श्रद्धयान्वितः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत ब्रह्मलोके महीयते॥२१॥
पुत्रवान् धनवान् राजा विद्यावान् कीर्तिमान् भवेत्।
इह लोके सुखं भुक्त्वा परत्र च शुभं व्रजेत्॥२२॥
न तस्य व्याधयः क्लेशा न दारिद्र्यं न शत्रवः।
सर्वत्र विजयी राजा धर्मेण पालयेन्महीम्॥२३॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन धर्म एव परायणम्।
रामेण यत्कृतं राज्ञा तत्कुर्यादनुमोदयेत्॥२४॥
इति श्रीवाल्मीकीये रामायणे उत्तरकाण्डे सप्ततितमः सर्गः॥२५॥
🔹 पदच्छेद : यः = जो; इदम् = इस; शृणुयात् = सुने; भक्त्या = भक्ति से; पठेत् = पढ़े; वा = या; श्रद्धयान्वितः = श्रद्धा से युक्त; सर्वपापैः = सब पापों से; प्रमुच्येत = मुक्त हो जाता है; ब्रह्मलोके = ब्रह्मलोक में; महीयते = पूजित होता है। पुत्रवान् = पुत्रवान्; धनवान् = धनवान्; राजा = राजा (के समान); विद्यावान् = विद्यावान्; कीर्तिमान् = कीर्तिमान्; भवेत् = होता है; इह लोके = इस लोक में; सुखम् = सुख; भुक्त्वा = भोगकर; परत्र = परलोक में; च = और; शुभम् = शुभ; व्रजेत् = जाता है। न = नहीं; तस्य = उसके; व्याधयः = रोग; क्लेशाः = क्लेश; न = नहीं; दारिद्र्यम् = दरिद्रता; न = नहीं; शत्रवः = शत्रु; सर्वत्र = सर्वत्र; विजयी = विजयी; राजा = राजा; धर्मेण = धर्म से; पालयेत् = पालन करे; महीम् = पृथ्वी। तस्मात् = इसलिए; सर्वप्रयत्नेन = सब प्रयत्न से; धर्मः = धर्म; एव = ही; परायणम् = परम आश्रय; रामेण = राम ने; यत् = जो; कृतम् = किया; राज्ञा = राजा ने; तत् = वह; कुर्यात् = करे; अनुमोदयेत् = अनुमोदन करे। इति = इस प्रकार; श्रीवाल्मीकीये रामायणे = श्रीवाल्मीकीय रामायण में; उत्तरकाण्डे = उत्तरकाण्ड में; सप्ततितमः = सत्तरवाँ; सर्गः = सर्ग।
📖 भावार्थ : जो इस कथा को भक्तिपूर्वक सुनता या पढ़ता है, वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में पूजित होता है। वह पुत्रवान्, धनवान्, विद्यावान् और कीर्तिमान् होता है। इस लोक में सुख भोगकर परलोक में शुभ गति प्राप्त करता है। उसे रोग, क्लेश, दरिद्रता या शत्रु नहीं सताते। वह सर्वत्र विजयी होता है और धर्म से पृथ्वी का पालन करता है। इसलिए धर्म ही परम आश्रय है। राम ने जो किया, उसी का अनुसरण और अनुमोदन करना चाहिए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🕊️ धर्म और राजा का सम्बन्ध

धर्म ने कहा कि जब तक राम धर्म से राज्य करेंगे, तब तक धर्म उनमें स्थित रहेगा। यह दर्शाता है कि राजा के धर्मपालन पर ही धर्म टिका है।

🌍 रामराज्य की विशेषताएँ

राम के राज्य में सब सुखी थे, कोई भय नहीं था, प्रकृति भी सहयोग करती थी। यह आदर्श राज्य का वर्णन है।

🔁 कर्म का सिद्धान्त

धर्म ने राम की परीक्षा ली और उन्हें सफल पाया। इससे सिद्ध होता है कि धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता है।

📖 फलश्रुति का महत्त्व

इस कथा को सुनने से पापों से मुक्ति और सुख-समृद्धि मिलती है। यह उत्तरकाण्ड के अन्य सर्गों की भाँति पुण्यदायी है।

🎯 शिक्षा : धर्म का पालन करने से व्यक्ति, राजा और समाज सभी सुखी रहते हैं। धर्म ही सबसे बड़ा आश्रय है। राम के आदर्शों का अनुसरण करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।