विष्णु और राक्षसों के बीच युद्ध

यह सर्ग विष्णु और राक्षसों के बीच हुए घमासान युद्ध का विस्तृत वर्णन करता है। दोनों ओर के वीर योद्धा अनेक प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते हैं।

विवरण

इस सर्ग में भगवान विष्णु और राक्षसों के बीच युद्ध और भी भयंकर रूप धारण कर लेता है। पिछले सर्ग में युद्ध का आरंभ हुआ था, अब यह चरम पर पहुँच जाता है। राक्षस अपनी माया और अनेक अस्त्रों का प्रयोग करते हैं, लेकिन विष्णु उन सभी का सहजता से निवारण करते हैं। इस सर्ग में विष्णु के विभिन्न रूपों और उनकी अद्भुत शक्तियों का वर्णन है। राक्षसगण सामूहिक रूप से विष्णु पर आक्रमण करते हैं, परंतु विष्णु अपने चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और अन्य अस्त्रों से उनका संहार करते हैं। अंततः राक्षस सेना छिन्न-भिन्न हो जाती है और उनके प्रमुख योद्धा मारे जाते हैं। यह सर्ग विष्णु की अपराजेयता का प्रतीक है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ७

(विष्णु और राक्षसों के बीच युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में युद्ध का प्रारंभ हुआ। अब यह युद्ध अत्यंत विकराल रूप धारण कर लेता है। राक्षस अपनी माया और अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग करते हैं, लेकिन भगवान विष्णु अडिग रहते हैं।

⚔️ राक्षसों का आक्रमण (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो राक्षससेनाभिः सर्वतो विष्णुरर्द्यत।
शूलैः प्रासैः परिघैः खड्गैर्मुद्गरपट्टिशैः॥
न चचाल महातेजा विष्णुः शत्रुनिबर्हणः।
गरुडस्थो महावीर्यो ददाहास्त्रैर्निशाचरान्॥
ते भग्नाश्च विद्राव्य राक्षसाः क्रोधमूर्छिताः।
पुनरेवाभ्यवर्तन्त विष्णुं जित्वा निवर्तितुम्॥
तानापतत एवाशु शार्ङ्गमुक्तैर्महेषुभिः।
न्यवारयन्महातेजा विष्णुः क्रोधसमन्वितः॥
ते वार्यमाणा विष्णुना राक्षसा युद्धदुर्मदाः।
न शेकुर्विष्णुमासाद्य स्थातुं वै रणमूर्धनि॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; राक्षससेनाभिः = राक्षस सेनाओं द्वारा; सर्वतः = चारों ओर से; विष्णुः = विष्णु; अर्द्यत = पीड़ित किए गए; शूलैः = शूलों से; प्रासैः = प्रास नामक अस्त्रों से; परिघैः = परिघों से; खड्गैः = तलवारों से; मुद्गरपट्टिशैः = मुद्गर और पट्टिश से; न चचाल = नहीं डिगे; महातेजाः = महान तेजस्वी; विष्णुः = विष्णु; शत्रुनिबर्हणः = शत्रुओं का नाश करने वाले; गरुडस्थः = गरुड़ पर सवार; महावीर्यः = महान पराक्रमी; ददाह = जलाया; अस्त्रैः = अस्त्रों से; निशाचरान् = राक्षसों को; ते = वे; भग्नाः = पराजित; च = और; विद्राव्य = भगाकर; राक्षसाः = राक्षस; क्रोधमूर्छिताः = क्रोध से मूर्छित; पुनरेव = फिर से; अभ्यवर्तन्त = लौटे; विष्णुम् = विष्णु पर; जित्वा = जीतकर; निवर्तितुम् = लौटने के लिए; तान् = उन्हें; आपततः = आक्रमण करते हुए; एव = ही; आशु = शीघ्र; शार्ङ्गमुक्तैः = शार्ङ्ग धनुष से छोड़े गए; महेषुभिः = महान बाणों से; न्यवारयत् = रोका; महातेजाः = महान तेजस्वी; विष्णुः = विष्णु ने; क्रोधसमन्वितः = क्रोध से युक्त होकर; ते = वे; वार्यमाणाः = रोके जाते हुए; विष्णुना = विष्णु द्वारा; राक्षसाः = राक्षस; युद्धदुर्मदाः = युद्ध के मद में चूर; न शेकुः = समर्थ नहीं हुए; विष्णुम् = विष्णु के; आसाद्य = पास जाकर; स्थातुम् = ठहरने के लिए; वै = ही; रणमूर्धनि = युद्ध के मैदान में।
📖 भावार्थ : तब राक्षस सेना ने चारों ओर से भगवान विष्णु पर शूलों, प्रासों, परिघों, तलवारों, मुद्गरों और पट्टिशों से आक्रमण कर दिया। किंतु शत्रुओं का नाश करने वाले महातेजस्वी विष्णु तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे गरुड़ पर आरूढ़ थे और अपने अस्त्रों से राक्षसों को भस्म करने लगे। पराजित और भगाए हुए राक्षस क्रोध में आकर फिर से विष्णु पर आक्रमण करने के लिए लौट पड़े, क्योंकि वे उन्हें जीतकर ही लौटना चाहते थे। उन्हें आक्रमण करते देख महातेजस्वी क्रोधित विष्णु ने शार्ङ्ग धनुष से छोड़े गए भयंकर बाणों द्वारा उन्हें रोक दिया। इस प्रकार विष्णु के द्वारा रोके जाने पर भी वे युद्ध के मद में चूर राक्षस उनके समक्ष ठहर न सके। यहाँ भगवान विष्णु का अदम्य साहस और अस्त्र-कौशल देखते ही बनता है। राक्षसों के अनेक प्रहारों के बावजूद वे स्थिर रहे और उनके प्रत्येक आक्रमण का उचित प्रत्युत्तर दिया। यह युद्ध केवल बल का ही नहीं, बल्कि सामरिक कौशल का भी प्रदर्शन था। विष्णु ने राक्षसों के सामूहिक आक्रमण को अकेले ही विफल कर दिया, जो उनकी अपराजेयता का प्रमाण है।
॥ श्लोक ६-१२ ॥
ततः प्रगृह्य चक्रं स चक्रपाणिर्महाबलः।
जघान राक्षसान् सर्वान् गदया च महाबलः॥
केचिन्निष्पिष्टगात्रास्तु गदया चक्रपीडिताः।
पेतुर्भुवि शरीरेभ्यो विमुक्तप्राणवृत्तयः॥
केचिद्भिन्नशिरःखड्गाः केचिच्छिन्नभुजा रणे।
केचिन्निकृत्तचरणाः केचिद्धस्तैः सकुण्डलाः॥
अपरे बाणविद्धाङ्गा विष्णुबाणप्रपीडिताः।
व्यसुः पेतुर्महीपृष्ठे चक्रबाणाग्नितापिताः॥
एवं ते राक्षसाः सर्वे हता विष्णुना रणे।
निर्विशेषा विनिहता देवेन परमेष्ठिना॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; प्रगृह्य = उठाकर; चक्रम् = चक्र; स = वे; चक्रपाणिः = हाथ में चक्र लिए; महाबलः = महान बलशाली; जघान = मारा; राक्षसान् = राक्षसों को; सर्वान् = सब; गदया = गदा से; च = और; महाबलः = महान बलशाली; केचित् = कुछ; निष्पिष्टगात्राः = कुचले हुए शरीर वाले; तु = तो; गदया = गदा से; चक्रपीडिताः = चक्र से पीड़ित; पेतुः = गिरे; भुवि = भूमि पर; शरीरेभ्यः = शरीरों से; विमुक्तप्राणवृत्तयः = प्राणों से रहित होकर; केचित् = कुछ; भिन्नशिरःखड्गाः = टूटे सिर और खड्ग वाले; केचित् = कुछ; छिन्नभुजाः = कटी हुई भुजा वाले; रणे = युद्ध में; केचित् = कुछ; निकृत्तचरणाः = कटे हुए पैर वाले; केचित् = कुछ; हस्तैः = हाथों सहित; सकुण्डलाः = कुंडल सहित; अपरे = अन्य; बाणविद्धाङ्गा = बाणों से बिंधे अंग वाले; विष्णुबाणप्रपीडिताः = विष्णु के बाणों से पीड़ित; व्यसुः = मृत; पेतुः = गिरे; महीपृष्ठे = भूमि पर; चक्रबाणाग्नितापिताः = चक्र, बाण और अग्नि से तपाए गए; एवम् = इस प्रकार; ते = वे; राक्षसाः = राक्षस; सर्वे = सब; हताः = मारे गए; विष्णुना = विष्णु द्वारा; रणे = युद्ध में; निर्विशेषाः = कोई विशेषता न रखते हुए; विनिहताः = पूर्ण रूप से मारे गए; देवेन = देव द्वारा; परमेष्ठिना = परम स्थान देने वाले।
📖 भावार्थ : तब महाबली चक्रधारी भगवान विष्णु ने अपना चक्र और गदा उठाकर सभी राक्षसों का संहार कर दिया। कुछ राक्षस गदा से कुचलकर और चक्र से पीड़ित होकर प्राणहीन हो भूमि पर गिर पड़े। कुछ के सिर और खड्ग टूट गए थे, कुछ की भुजाएँ कट गई थीं, कुछ के पैर कट गए थे और कुछ हाथों सहित कुंडलों से युक्त होकर धराशायी हुए। अन्य राक्षस विष्णु के बाणों से बिंधे हुए और उनसे पीड़ित होकर भूमि पर गिरे, मानो चक्र, बाण और अग्नि से उन्हें तपाया गया हो। इस प्रकार वे सभी राक्षस युद्ध में परम देव विष्णु के हाथों मारे गए और उनकी कोई विशेषता न रह गई। यहाँ युद्ध का अत्यंत भीषण और वीभत्स रूप चित्रित किया गया है। विष्णु के अस्त्रों ने राक्षसों को ऐसे नष्ट किया मानो वे तिनके हों। उनके शरीर के अंग-प्रत्यंग कट-फट गए। यह दृश्य विष्णु की प्रचंड शक्ति को दर्शाता है, जिसके सामने राक्षसों का कोई बल न चला। यह युद्ध धर्म की विजय का सजीव चित्रण है।

🪄 राक्षसों की माया और उसका निवारण (श्लोक १३-२६)

॥ श्लोक १३-१८ ॥
ततो राक्षससेनानीः क्रोधाद् विष्णुं महाबलः।
मायामास्थाय दुर्धर्षो युद्धाय समुपस्थितः॥
स मायया महाघोर्या राक्षसान् सृजते बहून्।
विष्णुं जिघांसुर्बलवान् सर्वास्त्रगणसंवृतः॥
ते राक्षसा महाकाया विष्णुमभ्यद्रवन् रणे।
नानाप्रहरणैर्घोरैर्वेष्टयामासुरच्युतम्॥
विष्णुस्तान् राक्षसान् दृष्ट्वा मायया निर्मितान् बहून्।
प्रहस्य देवदेवेशः शार्ङ्गमाज्ञापयच्छरान्॥
ततो बाणसहस्राणि शार्ङ्गमुक्तानि सर्वतः।
राक्षसांस्तान् विनिर्भिद्य नेशुस्ते राक्षसा द्रुतम्॥
माया विष्णुप्रणुन्ना सा राक्षसेन्द्रस्य धीमतः।
क्षयं याता महावेगा नष्टसंज्ञा निशाचराः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; राक्षससेनानीः = राक्षसों का सेनापति; क्रोधात् = क्रोध से; विष्णुम् = विष्णु पर; महाबलः = महान बलशाली; मायाम् = माया; आस्थाय = धारण करके; दुर्धर्षः = दुर्धर्ष; युद्धाय = युद्ध के लिए; समुपस्थितः = उपस्थित हुआ; स = उसने; मायया = माया से; महाघोर्या = अत्यंत भयंकर; राक्षसान् = राक्षसों को; सृजते = उत्पन्न किया; बहून् = बहुत से; विष्णुम् = विष्णु को; जिघांसुः = मारने की इच्छा वाला; बलवान् = बलवान; सर्वास्त्रगणसंवृतः = सभी अस्त्रों के समूह से युक्त; ते = वे; राक्षसाः = राक्षस; महाकायाः = विशाल शरीर वाले; विष्णुम् = विष्णु पर; अभ्यद्रवन् = दौड़े; रणे = युद्ध में; नानाप्रहरणैः = अनेक प्रकार के अस्त्रों से; घोरैः = भयंकर; वेष्टयामासुः = घेर लिया; अच्युतम् = अच्युत को; विष्णुः = विष्णु ने; तान् = उन; राक्षसान् = राक्षसों को; दृष्ट्वा = देखकर; मायया = माया से; निर्मितान् = निर्मित किए हुए; बहून् = बहुत से; प्रहस्य = हँसकर; देवदेवेशः = देवताओं के भी देव; शार्ङ्गम् = शार्ङ्ग धनुष; आज्ञापयत् = आज्ञा दी; शरान् = बाणों को; ततः = तब; बाणसहस्राणि = हजारों बाण; शार्ङ्गमुक्तानि = शार्ङ्ग से छोड़े गए; सर्वतः = चारों ओर से; राक्षसान् = राक्षसों को; तान् = उन; विनिर्भिद्य = भेदकर; नेशुः = नष्ट हो गए; ते = वे; राक्षसाः = राक्षस; द्रुतम् = शीघ्र; माया = माया; विष्णुप्रणुन्ना = विष्णु द्वारा प्रेरित (नष्ट); सा = वह; राक्षसेन्द्रस्य = राक्षसेन्द्र की; धीमतः = बुद्धिमान की; क्षयम् = नाश; याता = प्राप्त हुई; महावेगा = महान वेग वाली; नष्टसंज्ञाः = होश खो बैठे; निशाचराः = राक्षस।
📖 भावार्थ : तब राक्षसों के सेनापति ने क्रोधित होकर माया का सहारा लिया। वह दुर्धर्ष और महाबली था। उसने अत्यंत भयंकर माया से असंख्य राक्षसों की सृष्टि की और वह स्वयं सभी अस्त्रों से सुसज्जित होकर विष्णु का वध करने के लिए युद्ध में उतर आया। उन माया-रचित विशालकाय राक्षसों ने अच्युत भगवान विष्णु को चारों ओर से घेर लिया और भयंकर अस्त्रों से आक्रमण कर दिया। भगवान विष्णु ने उन माया से निर्मित राक्षसों को देखकर मुस्कुराते हुए अपने शार्ङ्ग धनुष से हजारों बाणों की वर्षा कर दी। वे बाण उन सभी राक्षसों को भेदते हुए उन्हें क्षणभर में नष्ट कर गए। उस बुद्धिमान राक्षस सेनापति की महावेगशाली माया विष्णु के प्रभाव से नष्ट हो गई और राक्षस होश खो बैठे। इस घटना में राक्षसों की माया का प्रयोग और विष्णु द्वारा उसका सहज निवारण अत्यंत रोचक है। माया का अर्थ है छल, जो अधर्म का आधार है। विष्णु ने अपने सत्य और धर्म के बल से उस माया को तत्काल नष्ट कर दिया। यह संदेश देता है कि सत्य और धर्म के आगे छल-कपट टिक नहीं सकते।
॥ श्लोक १९-२६ ॥
हतेषु तेषु रक्षःसु मायया निर्मितेषु च।
राक्षसेन्द्रः स्वयं क्रुद्धो विष्णुमभ्यद्रवद्बली॥
गदां गृहीत्वा तीक्ष्णाग्रां वज्रसारमयीं दृढाम्।
प्रगृह्य च चक्रं घोरं जग्राह विविधानि च॥
ततो युद्धं समभवद्विष्णोस्तस्य च रक्षसः।
अतिभीमं सुसंरब्धं देवदानवदुर्जयम्॥
गदाभिः परिघैः शूलैश्चक्रैर्बाणैः परस्परम्।
अन्योन्यं जघ्नतुर्वीरौ सिंहवद्विनदन्त्युत॥
ततः क्रुद्धो महाविष्णुश्चक्रमुद्यम्य वेगितः।
राक्षसेन्द्रस्य चिच्छेद शिरस्तीक्ष्णेन चक्रतः॥
स पपात हतः श्रीमान् राक्षसेन्द्रो महीतले।
चक्रनुन्नशिरा राजन् प्राणांस्तत्याज दुर्मतिः॥
देवाः सम्पूजयामासुर्विष्णुं जयिनमच्युतम्।
ववृषुः पुष्पवर्षाणि गन्धर्वा ननृतुर्मुदा॥
🔹 पदच्छेद : हतेषु = मारे जाने पर; तेषु = उन; रक्षःसु = राक्षसों के; मायया = माया से; निर्मितेषु = निर्मित; च = भी; राक्षसेन्द्रः = राक्षसों का राजा; स्वयम् = स्वयं; क्रुद्धः = क्रोधित; विष्णुम् = विष्णु पर; अभ्यद्रवत् = दौड़ा; बली = बलवान; गदाम् = गदा; गृहीत्वा = लेकर; तीक्ष्णाग्राम् = तीखे अग्रभाग वाली; वज्रसारमयीम् = वज्र के समान सार वाली; दृढाम् = मजबूत; प्रगृह्य = उठाकर; च = और; चक्रम् = चक्र; घोरम् = भयंकर; जग्राह = लिया; विविधानि = विविध; च = भी; ततः = तब; युद्धम् = युद्ध; समभवत् = हुआ; विष्णोः = विष्णु का; तस्य = उस; च = और; रक्षसः = राक्षस का; अतिभीमम् = अत्यंत भयंकर; सुसंरब्धम् = अत्यंत क्रोधपूर्ण; देवदानवदुर्जयम् = देवताओं और दानवों के लिए भी दुर्जय; गदाभिः = गदाओं से; परिघैः = परिघों से; शूलैः = शूलों से; चक्रैः = चक्रों से; बाणैः = बाणों से; परस्परम् = परस्पर; अन्योन्यम् = एक दूसरे को; जघ्नतुः = मारा; वीरौ = दोनों वीर; सिंहवत् = सिंह की तरह; विनदन्तौ = गर्जना करते हुए; उत = भी; ततः = तब; क्रुद्धः = क्रोधित; महाविष्णुः = महाविष्णु; चक्रम् = चक्र; उद्यम्य = उठाकर; वेगितः = वेग से; राक्षसेन्द्रस्य = राक्षसराज का; चिच्छेद = काट डाला; शिरः = सिर; तीक्ष्णेन = तीक्ष्ण; चक्रतः = चक्र से; स = वह; पपात = गिरा; हतः = मारा गया; श्रीमान् = श्रीमान्; राक्षसेन्द्रः = राक्षसराज; महीतले = भूमि पर; चक्रनुन्नशिराः = चक्र से कटे सिर वाला; राजन् = हे राजन्; प्राणान् = प्राणों को; तत्याज = त्याग दिया; दुर्मतिः = दुर्बुद्धि; देवाः = देवता; सम्पूजयामासुः = पूजा की; विष्णुम् = विष्णु की; जयिनम् = विजयी; अच्युतम् = अच्युत की; ववृषुः = बरसाए; पुष्पवर्षाणि = पुष्पों की वर्षा; गन्धर्वाः = गन्धर्व; ननृतुः = नाचे; मुदा = आनंद से।
📖 भावार्थ : माया से उत्पन्न राक्षसों के मारे जाने पर, राक्षसराज स्वयं अत्यंत क्रोधित होकर युद्ध के लिए आगे बढ़ा। उसने तीक्ष्ण अग्रभाग वाली वज्र के समान मजबूत गदा उठाई, भयंकर चक्र और अन्य अनेक अस्त्र धारण किए। तब भगवान विष्णु और उस राक्षस के बीच अत्यंत भीम, क्रोधपूर्ण और देवताओं-दानवों के लिए भी दुर्जय युद्ध आरंभ हुआ। दोनों वीर सिंह की भाँति गर्जना करते हुए गदाओं, परिघों, शूलों, चक्रों और बाणों से एक दूसरे पर प्रहार करने लगे। तब क्रोधित महाविष्णु ने वेग से अपना चक्र उठाया और उस तीक्ष्ण चक्र से राक्षसराज का सिर धड़ से अलग कर दिया। हे राजन्! वह श्रीमान् राक्षसराज चक्र से कटे सिर के साथ भूमि पर गिर पड़ा और उस दुर्बुद्धि ने अपने प्राण त्याग दिए। तब सभी देवताओं ने विजयी अच्युत भगवान विष्णु की पूजा की और उन पर पुष्पों की वर्षा की। गन्धर्व आनंद से नाच उठे। यहाँ राक्षसराज का वध युद्ध की समाप्ति का सूचक है। विष्णु की विजय धर्म की विजय है। देवताओं की प्रसन्नता इस बात का प्रतीक है कि अधर्म के नाश से सृष्टि में पुनः शांति और सुख का संचार होता है।

🏆 युद्ध की समाप्ति और देवताओं की स्तुति (श्लोक २७-३८)

॥ श्लोक २७-३२ ॥
विष्णुं संपूज्य देवेशं देवाः सर्षिगणास्तदा।
ऊचुः प्राञ्जलयो वाक्यं स्तुत्वा विविधया गिरा॥
त्वया देव जगन्नाथ रक्षिताः स्म सुराः परैः।
राक्षसा निहताः सर्वे त्वत्प्रसादान्महाबलाः॥
नमस्ते देवदेवेश नमस्ते जगतां पते।
नमः परमकल्याण नमः परमकारक॥
इति स्तुतो महादेवो विष्णुः परमपूरुषः।
प्रोवाच देवताः सर्वा वरदोऽस्मि वृणीष्व च॥
देवा ऊचुः प्रसन्नस्त्वं यदि नो वरदो भवान्।
भक्त्या त्वां सततं देव सेवामहे वयं प्रभो॥
त्वत्प्रसादाद्वयं देव निर्वृता राक्षसार्दिताः।
राज्यं च विपुलं प्राप्ताः स्वर्गे निरुपप्लवम्॥
🔹 पदच्छेद : विष्णुम् = विष्णु को; संपूज्य = पूजा करके; देवेशम् = देवताओं के ईश; देवाः = देवता; सर्षिगणाः = ऋषियों के समूह सहित; तदा = तब; ऊचुः = बोले; प्राञ्जलयः = हाथ जोड़कर; वाक्यम् = वचन; स्तुत्वा = स्तुति करके; विविधया = अनेक प्रकार की; गिरा = वाणी से; त्वया = आपके द्वारा; देव = हे देव; जगन्नाथ = जगत के नाथ; रक्षिताः = रक्षित किए गए; स्म = हम; सुराः = देवता; परैः = शत्रुओं से; राक्षसाः = राक्षस; निहताः = मारे गए; सर्वे = सब; त्वत्प्रसादात् = आपकी कृपा से; महाबलाः = महान बलशाली; नमस्ते = नमस्कार; देवदेवेश = देवताओं के देव; नमस्ते = नमस्कार; जगताम् = जगत के; पते = स्वामी; नमः = नमस्कार; परमकल्याण = परम कल्याणकारी; नमः = नमस्कार; परमकारक = परम कार्य करने वाले; इति = इस प्रकार; स्तुतः = स्तुति किए गए; महादेवः = महादेव; विष्णुः = विष्णु; परमपूरुषः = परम पुरुष; प्रोवाच = बोले; देवताः = देवताओं से; सर्वाः = सबसे; वरदः = वरदाता; अस्मि = हूँ; वृणीष्व = माँगो; च = और; देवाः = देवता; ऊचुः = बोले; प्रसन्नः = प्रसन्न; त्वम् = आप; यदि = यदि; नः = हमें; वरदः = वरदाता; भवान् = आप; भक्त्या = भक्ति से; त्वाम् = आपकी; सततम् = सदा; देव = हे देव; सेवामहे = सेवा करते हैं; वयम् = हम; प्रभो = हे प्रभु; त्वत्प्रसादात् = आपकी कृपा से; वयम् = हम; देव = हे देव; निर्वृताः = सुखी; राक्षसार्दिताः = राक्षसों से पीड़ित; राज्यम् = राज्य; च = और; विपुलम् = विशाल; प्राप्ताः = प्राप्त किया; स्वर्गे = स्वर्ग में; निरुपप्लवम् = बिना उपद्रव के।
📖 भावार्थ : तब सभी देवता और ऋषिगण भगवान विष्णु की पूजा करके हाथ जोड़कर विविध प्रकार की वाणी से उनकी स्तुति करने लगे। उन्होंने कहा, "हे देव, हे जगन्नाथ! आपने हम देवताओं की शत्रुओं से रक्षा की। आपकी कृपा से सभी महाबली राक्षस मारे गए। हे देवदेवेश, आपको नमस्कार है। हे जगत के स्वामी, आपको नमस्कार है। हे परमकल्याणकारी, परम कार्य करने वाले, आपको नमस्कार है।" इस प्रकार स्तुति किए जाने पर परमपुरुष भगवान विष्णु ने सभी देवताओं से कहा, "मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, मैं वरदाता हूँ। तुम जो चाहो माँग लो।" देवताओं ने कहा, "हे प्रभो! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं और वरदान देना चाहते हैं, तो हम आपसे यही वरदान चाहते हैं कि हम सदा भक्तिपूर्वक आपकी सेवा करते रहें। हे देव! आपकी कृपा से हम, जो राक्षसों से पीड़ित थे, अब सुखी हो गए हैं और स्वर्ग में बिना किसी उपद्रव के विशाल राज्य प्राप्त कर चुके हैं।" देवताओं ने भौतिक सुखों की नहीं, बल्कि भगवान की भक्ति की कामना की। यह उनके वैराग्य और भगवद्भक्ति का सूचक है। उन्होंने जो प्राप्त किया, उसके लिए कृतज्ञता व्यक्त की और और कुछ नहीं माँगा। यह आदर्श भक्ति का उदाहरण है।
॥ श्लोक ३३-३८ ॥
विष्णुरुवाच युष्माकं भक्तिरस्तु मयि नित्यदा।
लोकाश्च निरुपद्रवाः सन्तु सर्वे सुरोत्तमाः॥
इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुस्तत्रैवान्तरधीयत।
देवाश्च सर्वे साम्प्राप्ताः स्वं स्वं धाम यथाक्रमम्॥
एवमेतत्पुरावृत्तं विष्णो राक्षसयो रणे।
राम त्वं शृणु धर्मज्ञ यथावदनुपूर्वशः॥
तथा त्वमपि राजेन्द्र रावणं पापनाशनम्।
हत्वा धर्मेण राज्यं च प्राप्तवानसि राघव॥
इत्याख्यानं समाकर्ण्य रामः प्रीतमनाः सुखी।
उवाच मुनिशार्दूलं कृतज्ञः सत्यविक्रमः॥
🔹 पदच्छेद : विष्णुः = विष्णु ने; उवाच = कहा; युष्माकम् = तुम्हारी; भक्तिः = भक्ति; अस्तु = हो; मयि = मुझमें; नित्यदा = सदा; लोकाः = लोक; च = और; निरुपद्रवाः = बिना उपद्रव के; सन्तु = हों; सर्वे = सब; सुरोत्तमाः = हे श्रेष्ठ देवताओ; इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; भगवान् = भगवान; विष्णुः = विष्णु; तत्रैव = वहीं; अन्तरधीयत = अंतर्धान हो गए; देवाः = देवता; च = और; सर्वे = सब; सम्प्राप्ताः = प्राप्त किए; स्वम् = अपने; स्वम् = अपने; धाम = धाम; यथाक्रमम् = क्रमानुसार; एवम् = इस प्रकार; एतत् = यह; पुरावृत्तम् = पुराना वृत्तांत; विष्णोः = विष्णु का; राक्षसयोः = राक्षसों के साथ; रणे = युद्ध में; राम = हे राम; त्वम् = तुम; शृणु = सुनो; धर्मज्ञ = हे धर्मज्ञ; यथावत् = यथार्थ; अनुपूर्वशः = क्रम से; तथा = वैसे ही; त्वम् = तुम; अपि = भी; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; रावणम् = रावण को; पापनाशनम् = पापनाशक; हत्वा = मारकर; धर्मेण = धर्म से; राज्यम् = राज्य; च = और; प्राप्तवान् = प्राप्त किया; असि = तुमने; राघव = हे राघव; इति = इस प्रकार; आख्यानम् = आख्यान; समाकर्ण्य = सुनकर; रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; सुखी = सुखी; उवाच = बोले; मुनिशार्दूलम् = श्रेष्ठ मुनि से; कृतज्ञः = कृतज्ञ; सत्यविक्रमः = सत्य पराक्रमी।
📖 भावार्थ : भगवान विष्णु ने देवताओं को आशीर्वाद दिया, "हे श्रेष्ठ देवताओ! तुम्हारी मुझमें सदा भक्ति बनी रहे। और सभी लोक निरुपद्रव रहें।" ऐसा कहकर भगवान विष्णु वहीं अंतर्धान हो गए। तब सभी देवता क्रमानुसार अपने-अपने धाम को लौट गए। अगस्त्य ऋषि राम से कहते हैं, "हे धर्मज्ञ राम! इस प्रकार यह पुरातन वृत्तांत है कि कैसे विष्णु का राक्षसों के साथ युद्ध हुआ। तुम इसे यथार्थ और क्रम से सुनो। हे राजेन्द्र राघव! वैसे ही तुमने भी पापनाशक रावण का वध करके धर्म से राज्य प्राप्त किया है।" यह आख्यान सुनकर प्रसन्नचित्त और सुखी राम ने उस श्रेष्ठ मुनि अगस्त्य से कृतज्ञतापूर्वक कहा... यहाँ अगस्त्य ऋषि राम को विष्णु के इस युद्ध की कथा सुनाकर उन्हें यह बताना चाहते हैं कि जिस प्रकार विष्णु ने देवताओं की रक्षा के लिए राक्षसों का संहार किया, उसी प्रकार राम ने भी धर्म की रक्षा के लिए रावण का वध किया। राम स्वयं विष्णु के अवतार हैं, इसलिए उनका यह कार्य भी विष्णु के उसी पराक्रम की पुनरावृत्ति है। यह सर्ग राम को उनके दिव्य स्वरूप का स्मरण कराता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌀 माया का निवारण

राक्षसों की माया का विष्णु द्वारा नाश यह बताता है कि छल-कपट अंततः सत्य के आगे टिक नहीं पाते। सत्य ही सदा विजयी होता है।

🔱 विष्णु का चक्र

सुदर्शन चक्र विष्णु के समय चक्र का प्रतीक है, जो सब कुछ नष्ट करने की शक्ति रखता है। यह धर्म की रक्षा के लिए अधर्म का संहार करता है।

🙏 भक्ति की श्रेष्ठता

देवताओं द्वारा वरदान में भक्ति की कामना करना यह दर्शाता है कि भौतिक सुखों से बढ़कर भगवद्भक्ति है। सच्ची भक्ति ही परम कल्याणकारी है।

🔄 राम और विष्णु का संबंध

अगस्त्य राम को विष्णु की यह कथा सुनाकर उनके अवतारी होने का संकेत देते हैं। राम का कार्य भी विष्णु के समान ही धर्मरक्षा के लिए है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से यह शिक्षा मिलती है कि धर्म की रक्षा के लिए युद्ध आवश्यक हो जाता है। भगवान अपने भक्तों की रक्षा स्वयं करते हैं। छल-कपट का सहारा लेने वाले अंततः नष्ट हो जाते हैं। सच्चे भक्त भौतिक सुखों की नहीं, बल्कि भगवद्भक्ति की कामना करते हैं, जो सर्वोपरि है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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