विष्णु और राक्षसों के बीच युद्ध
यह सर्ग विष्णु और राक्षसों के बीच हुए घमासान युद्ध का विस्तृत वर्णन करता है। दोनों ओर के वीर योद्धा अनेक प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते हैं।
विवरण
इस सर्ग में भगवान विष्णु और राक्षसों के बीच युद्ध और भी भयंकर रूप धारण कर लेता है। पिछले सर्ग में युद्ध का आरंभ हुआ था, अब यह चरम पर पहुँच जाता है। राक्षस अपनी माया और अनेक अस्त्रों का प्रयोग करते हैं, लेकिन विष्णु उन सभी का सहजता से निवारण करते हैं। इस सर्ग में विष्णु के विभिन्न रूपों और उनकी अद्भुत शक्तियों का वर्णन है। राक्षसगण सामूहिक रूप से विष्णु पर आक्रमण करते हैं, परंतु विष्णु अपने चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और अन्य अस्त्रों से उनका संहार करते हैं। अंततः राक्षस सेना छिन्न-भिन्न हो जाती है और उनके प्रमुख योद्धा मारे जाते हैं। यह सर्ग विष्णु की अपराजेयता का प्रतीक है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ७
(विष्णु और राक्षसों के बीच युद्ध)
🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में युद्ध का प्रारंभ हुआ। अब यह युद्ध अत्यंत विकराल रूप धारण कर लेता है। राक्षस अपनी माया और अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग करते हैं, लेकिन भगवान विष्णु अडिग रहते हैं।
⚔️ राक्षसों का आक्रमण (श्लोक १-१२)
शूलैः प्रासैः परिघैः खड्गैर्मुद्गरपट्टिशैः॥
न चचाल महातेजा विष्णुः शत्रुनिबर्हणः।
गरुडस्थो महावीर्यो ददाहास्त्रैर्निशाचरान्॥
ते भग्नाश्च विद्राव्य राक्षसाः क्रोधमूर्छिताः।
पुनरेवाभ्यवर्तन्त विष्णुं जित्वा निवर्तितुम्॥
तानापतत एवाशु शार्ङ्गमुक्तैर्महेषुभिः।
न्यवारयन्महातेजा विष्णुः क्रोधसमन्वितः॥
ते वार्यमाणा विष्णुना राक्षसा युद्धदुर्मदाः।
न शेकुर्विष्णुमासाद्य स्थातुं वै रणमूर्धनि॥
जघान राक्षसान् सर्वान् गदया च महाबलः॥
केचिन्निष्पिष्टगात्रास्तु गदया चक्रपीडिताः।
पेतुर्भुवि शरीरेभ्यो विमुक्तप्राणवृत्तयः॥
केचिद्भिन्नशिरःखड्गाः केचिच्छिन्नभुजा रणे।
केचिन्निकृत्तचरणाः केचिद्धस्तैः सकुण्डलाः॥
अपरे बाणविद्धाङ्गा विष्णुबाणप्रपीडिताः।
व्यसुः पेतुर्महीपृष्ठे चक्रबाणाग्नितापिताः॥
एवं ते राक्षसाः सर्वे हता विष्णुना रणे।
निर्विशेषा विनिहता देवेन परमेष्ठिना॥
🪄 राक्षसों की माया और उसका निवारण (श्लोक १३-२६)
मायामास्थाय दुर्धर्षो युद्धाय समुपस्थितः॥
स मायया महाघोर्या राक्षसान् सृजते बहून्।
विष्णुं जिघांसुर्बलवान् सर्वास्त्रगणसंवृतः॥
ते राक्षसा महाकाया विष्णुमभ्यद्रवन् रणे।
नानाप्रहरणैर्घोरैर्वेष्टयामासुरच्युतम्॥
विष्णुस्तान् राक्षसान् दृष्ट्वा मायया निर्मितान् बहून्।
प्रहस्य देवदेवेशः शार्ङ्गमाज्ञापयच्छरान्॥
ततो बाणसहस्राणि शार्ङ्गमुक्तानि सर्वतः।
राक्षसांस्तान् विनिर्भिद्य नेशुस्ते राक्षसा द्रुतम्॥
माया विष्णुप्रणुन्ना सा राक्षसेन्द्रस्य धीमतः।
क्षयं याता महावेगा नष्टसंज्ञा निशाचराः॥
राक्षसेन्द्रः स्वयं क्रुद्धो विष्णुमभ्यद्रवद्बली॥
गदां गृहीत्वा तीक्ष्णाग्रां वज्रसारमयीं दृढाम्।
प्रगृह्य च चक्रं घोरं जग्राह विविधानि च॥
ततो युद्धं समभवद्विष्णोस्तस्य च रक्षसः।
अतिभीमं सुसंरब्धं देवदानवदुर्जयम्॥
गदाभिः परिघैः शूलैश्चक्रैर्बाणैः परस्परम्।
अन्योन्यं जघ्नतुर्वीरौ सिंहवद्विनदन्त्युत॥
ततः क्रुद्धो महाविष्णुश्चक्रमुद्यम्य वेगितः।
राक्षसेन्द्रस्य चिच्छेद शिरस्तीक्ष्णेन चक्रतः॥
स पपात हतः श्रीमान् राक्षसेन्द्रो महीतले।
चक्रनुन्नशिरा राजन् प्राणांस्तत्याज दुर्मतिः॥
देवाः सम्पूजयामासुर्विष्णुं जयिनमच्युतम्।
ववृषुः पुष्पवर्षाणि गन्धर्वा ननृतुर्मुदा॥
🏆 युद्ध की समाप्ति और देवताओं की स्तुति (श्लोक २७-३८)
ऊचुः प्राञ्जलयो वाक्यं स्तुत्वा विविधया गिरा॥
त्वया देव जगन्नाथ रक्षिताः स्म सुराः परैः।
राक्षसा निहताः सर्वे त्वत्प्रसादान्महाबलाः॥
नमस्ते देवदेवेश नमस्ते जगतां पते।
नमः परमकल्याण नमः परमकारक॥
इति स्तुतो महादेवो विष्णुः परमपूरुषः।
प्रोवाच देवताः सर्वा वरदोऽस्मि वृणीष्व च॥
देवा ऊचुः प्रसन्नस्त्वं यदि नो वरदो भवान्।
भक्त्या त्वां सततं देव सेवामहे वयं प्रभो॥
त्वत्प्रसादाद्वयं देव निर्वृता राक्षसार्दिताः।
राज्यं च विपुलं प्राप्ताः स्वर्गे निरुपप्लवम्॥
लोकाश्च निरुपद्रवाः सन्तु सर्वे सुरोत्तमाः॥
इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुस्तत्रैवान्तरधीयत।
देवाश्च सर्वे साम्प्राप्ताः स्वं स्वं धाम यथाक्रमम्॥
एवमेतत्पुरावृत्तं विष्णो राक्षसयो रणे।
राम त्वं शृणु धर्मज्ञ यथावदनुपूर्वशः॥
तथा त्वमपि राजेन्द्र रावणं पापनाशनम्।
हत्वा धर्मेण राज्यं च प्राप्तवानसि राघव॥
इत्याख्यानं समाकर्ण्य रामः प्रीतमनाः सुखी।
उवाच मुनिशार्दूलं कृतज्ञः सत्यविक्रमः॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🌀 माया का निवारण
राक्षसों की माया का विष्णु द्वारा नाश यह बताता है कि छल-कपट अंततः सत्य के आगे टिक नहीं पाते। सत्य ही सदा विजयी होता है।
🔱 विष्णु का चक्र
सुदर्शन चक्र विष्णु के समय चक्र का प्रतीक है, जो सब कुछ नष्ट करने की शक्ति रखता है। यह धर्म की रक्षा के लिए अधर्म का संहार करता है।
🙏 भक्ति की श्रेष्ठता
देवताओं द्वारा वरदान में भक्ति की कामना करना यह दर्शाता है कि भौतिक सुखों से बढ़कर भगवद्भक्ति है। सच्ची भक्ति ही परम कल्याणकारी है।
🔄 राम और विष्णु का संबंध
अगस्त्य राम को विष्णु की यह कथा सुनाकर उनके अवतारी होने का संकेत देते हैं। राम का कार्य भी विष्णु के समान ही धर्मरक्षा के लिए है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से यह शिक्षा मिलती है कि धर्म की रक्षा के लिए युद्ध आवश्यक हो जाता है। भगवान अपने भक्तों की रक्षा स्वयं करते हैं। छल-कपट का सहारा लेने वाले अंततः नष्ट हो जाते हैं। सच्चे भक्त भौतिक सुखों की नहीं, बल्कि भगवद्भक्ति की कामना करते हैं, जो सर्वोपरि है।