उत्तर काण्ड अध्याय 69

द्वार पर कुत्ता (धर्म की कहानी)

एक कुत्ता राम के दरबार में आकर शिकायत करता है कि एक ब्राह्मण ने उसे बिना कारण पीटा। राम धर्म के अनुसार न्याय करते हैं और कुत्ते की बात सुनकर ब्राह्मण को दण्ड देते हैं।

विवरण

यह सर्ग राम के धर्मपरायण राजा होने का उदाहरण प्रस्तुत करता है। एक दिन एक कुत्ता राम के दरबार में आता है और उनसे न्याय की याचना करता है। वह बताता है कि एक ब्राह्मण ने उसे बिना किसी अपराध के लाठी से पीटा है। राम उस ब्राह्मण को बुलवाते हैं और पूछते हैं कि तुमने ऐसा क्यों किया। ब्राह्मण कहता है कि वह यज्ञ करने जा रहा था और कुत्ते ने उसके मार्ग में बाधा डाली, इसलिए उसने उसे पीटा। राम कुत्ते से पूछते हैं कि वह क्या दण्ड चाहता है। कुत्ता कहता है कि इस ब्राह्मण को मठ का मुखिया बना दिया जाए। राम आश्चर्यचकित होते हैं, क्योंकि यह दण्ड नहीं, वरदान प्रतीत होता है। कुत्ता समझाता है कि मठ का मुखिया बनना बड़ा दण्ड है, क्योंकि उसे अनेक प्रकार के प्रलोभनों और झंझटों का सामना करना पड़ता है, जिससे उसका धर्म भ्रष्ट हो जाता है। राम इस तर्क को स्वीकार करते हैं और ब्राह्मण को मठ का मुखिया नियुक्त कर देते हैं। यह कथा धर्म की जटिलता और न्याय के सूक्ष्म पहलुओं को दर्शाती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ६९

(द्वार पर कुत्ता – धर्म की कहानी)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के दरबार में एक दिन एक अद्भुत घटना घटी। एक कुत्ता न्याय माँगने आया। उसकी शिकायत थी कि एक ब्राह्मण ने उसे बिना कारण पीटा। राम ने धर्मपूर्वक सुनवाई की और एक अनोखा दण्ड दिया। यह सर्ग धर्म की सूक्ष्मता को उजागर करता है।

📜 श्लोक १-५ : कुत्ते का आगमन और शिकायत

एकदा राघवस्याथ सभायां धर्मसंगतः।
श्वा समायान्महाबाहो करुणं प्ररुरोद ह॥१॥
रामः पप्रच्छ तं श्वानं किमर्थं रोदिषि प्रभो।
केन तेऽपकृतं ब्रूहि करिष्यामि तव प्रियम्॥२॥
श्वा प्राह राघवं वीरं शृणु राजन् वचो मम।
ब्राह्मणेनास्मि निर्दग्धो लगुडेन निरर्थकम्॥३॥
अहं तिष्ठामि धर्मेण न कस्यापि भयं ददे।
स मामकारणाद् राजन् प्रहरद् द्विजसत्तमः॥४॥
तस्य दण्डं प्रयच्छ त्वं धर्मेण नृपसत्तम।
इति तस्य वचः श्रुत्वा रामः प्राह सभासदः॥५॥
🔹 पदच्छेद : एकदा = एक बार; राघवस्य = राघव की; अथ = तब; सभायाम् = सभा में; धर्मसंगतः = धर्म से युक्त; श्वा = कुत्ता; समायात् = आया; महाबाहो = हे महाबाहो; करुणम् = करुणापूर्वक; प्ररुरोद = रोने लगा; ह = निश्चय। रामः = राम; पप्रच्छ = पूछा; तम् = उस; श्वानम् = कुत्ते से; किमर्थम् = किसलिए; रोदिषि = रोता है; प्रभो = हे प्रभु; केन = किसने; ते = तेरा; अपकृतम् = अपराध किया; ब्रूहि = बता; करिष्यामि = करूँगा; तव = तेरा; प्रियम् = प्रिय। श्वा = कुत्ता; प्राह = बोला; राघवम् = राघव से; वीरम् = वीर; शृणु = सुन; राजन् = हे राजन्; वचः = वचन; मम = मेरा। ब्राह्मणेन = ब्राह्मण ने; अस्मि = मुझे; निर्दग्धः = पीटा; लगुडेन = लाठी से; निरर्थकम् = बिना कारण। अहम् = मैं; तिष्ठामि = रहता हूँ; धर्मेण = धर्म से; न = नहीं; कस्यापि = किसी को; भयम् = भय; ददे = देता हूँ; सः = उसने; माम् = मुझे; अकारणात् = बिना कारण; राजन् = हे राजन्; प्रहरत् = मारा; द्विजसत्तमः = ब्राह्मणश्रेष्ठ। तस्य = उसके लिए; दण्डम् = दण्ड; प्रयच्छ = दे; त्वम् = तू; धर्मेण = धर्म से; नृपसत्तम = हे राजश्रेष्ठ। इति = इस प्रकार; तस्य = उसके; वचः = वचन; श्रुत्वा = सुनकर; रामः = राम; प्राह = बोले; सभासदः = सभासदों से।
📖 भावार्थ : एक दिन राम की सभा में एक कुत्ता आया और करुण स्वर में रोने लगा। राम ने पूछा कि तुम क्यों रो रहे हो, किसने तुम्हें सताया? मैं तुम्हारी सहायता करूँगा। कुत्ते ने कहा कि हे राजन्! एक ब्राह्मण ने मुझे बिना किसी कारण लाठी से पीटा। मैं तो धर्म से रहता हूँ, किसी को भय नहीं देता। उस ब्राह्मण ने मुझे व्यर्थ ही मारा। कृपया उसे उचित दण्ड दीजिए। यह सुनकर राम ने सभासदों से विचार-विमर्श किया।

📜 श्लोक ६-१० : ब्राह्मण का बुलाया जाना और उसका कथन

ततः स राज्ञा संदिष्टो ब्राह्मणः समुपानयत्।
पृष्टः किमर्थं ते श्वानं प्रहृतं ब्रूहि सुव्रत॥६॥
ब्राह्मणः प्राह राजानं शृणु राजन् वचो मम।
यज्ञार्थं यज्ञसामग्र्यां गच्छन् मार्गे व्यलोकयम्॥७॥
श्वानं मार्गसमीपस्थं स मां दष्टुं समुद्यतः।
ततोऽहं भयसंत्रस्तो लगुडेन तमाघ्नयम्॥८॥
न मया हिंसितः पूर्वं नापराधोऽस्ति कस्यचित्।
रक्षार्थं स्वस्य च तदा प्रहृतं धर्मतः प्रभो॥९॥
रामः प्राह ततः श्वानं किं कर्तव्यं वदस्व मे।
दण्डं देहि यथाशास्त्रं त्वमेव हि विभो वद॥१०॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; सः = उस; राज्ञा = राजा द्वारा; संदिष्टः = आदेशित; ब्राह्मणः = ब्राह्मण; समुपानयत् = बुलाया गया; पृष्टः = पूछा गया; किमर्थम् = किसलिए; ते = तूने; श्वानम् = कुत्ते को; प्रहृतम् = मारा; ब्रूहि = बता; सुव्रत = हे सत्यप्रतिज्ञ। ब्राह्मणः = ब्राह्मण; प्राह = बोला; राजानम् = राजा से; शृणु = सुन; राजन् = हे राजन्; वचः = वचन; मम = मेरा। यज्ञार्थम् = यज्ञ के लिए; यज्ञसामग्र्याम् = यज्ञ की सामग्री; गच्छन् = जाते हुए; मार्गे = मार्ग में; व्यलोकयम् = देखा। श्वानम् = कुत्ते को; मार्गसमीपस्थम् = मार्ग के पास खड़ा; सः = वह; माम् = मुझे; दष्टुम् = काटने के लिए; समुद्यतः = उद्यत था; ततः = तब; अहम् = मैं; भयसंत्रस्तः = भय से त्रस्त; लगुडेन = लाठी से; तम् = उसे; आघ्नयम् = मारा। न = नहीं; मया = मैंने; हिंसितः = मारा; पूर्वम् = पहले; न = नहीं; अपराधः = अपराध; अस्ति = है; कस्यचित् = किसी का; रक्षार्थम् = रक्षा के लिए; स्वस्य = अपनी; च = और; तदा = तब; प्रहृतम् = मारा; धर्मतः = धर्म से; प्रभो = हे प्रभु। रामः = राम; प्राह = बोले; ततः = तब; श्वानम् = कुत्ते से; किम् = क्या; कर्तव्यम् = करना चाहिए; वदस्व = बताओ; मे = मुझे; दण्डम् = दण्ड; देहि = दो; यथाशास्त्रम् = शास्त्रानुसार; त्वम् = तू; एव = ही; हि = निश्चय; विभो = हे विभो; वद = बोल।
📖 भावार्थ : राम के आदेश पर ब्राह्मण को बुलाया गया। राम ने पूछा कि तूने इस कुत्ते को क्यों मारा? ब्राह्मण ने उत्तर दिया कि मैं यज्ञ के लिए जा रहा था। रास्ते में यह कुत्ता मेरे पास आया और मुझे काटने का प्रयास करने लगा। मैंने भयवश अपनी रक्षा के लिए इसे लाठी से मारा। मैंने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा, यह तो आत्मरक्षा थी। यह सुनकर राम ने कुत्ते की ओर देखा और कहा कि अब तुम बताओ कि इस ब्राह्मण को क्या दण्ड दिया जाए? तुम्हीं शास्त्रसम्मत दण्ड बताओ।

📜 श्लोक ११-१५ : कुत्ते का अद्भुत दण्ड-सुझाव

श्वा प्राह राघवं वीरं यदि मे दण्डमिच्छसि।
ब्राह्मणोऽयं मठाधीशो भवत्वत्र न संशयः॥११॥
रामः प्राह विस्मितः किमेतद् दण्डो न वरः।
कथं मठाधिपत्यं हि दण्डः स्यात् त्वन्मते सखे॥१२॥
श्वा प्राह शृणु राजेन्द्र यथा दण्डोऽयमुत्तमः।
मठाधीशो भवेद् यस्तु सर्वसंगविवर्जितः॥१३॥
तस्य भोगा बहुविधाः स्त्रियो गीतं च नित्यशः।
लोभमोहसमायुक्तो धर्माद् भ्रश्यति निश्चितम्॥१४॥
तस्माद् दण्डो ह्ययं श्रेष्ठो ब्राह्मणस्य दुरात्मनः।
रामः प्राह तथेत्युक्त्वा तं विप्रं मठिनं व्यधात्॥१५॥
🔹 पदच्छेद : श्वा = कुत्ता; प्राह = बोला; राघवम् = राघव से; वीरम् = वीर; यदि = यदि; मे = मेरे; दण्डम् = दण्ड; इच्छसि = चाहते हो; ब्राह्मणः = यह ब्राह्मण; अयम् = यह; मठाधीशः = मठ का मुखिया; भवतु = हो जाए; अत्र = इसमें; न = नहीं; संशयः = संदेह। रामः = राम; प्राह = बोले; विस्मितः = आश्चर्यचकित; किम् = क्या; एतत् = यह; दण्डः = दण्ड है; न = या; वरः = वरदान है; कथम् = कैसे; मठाधिपत्यम् = मठ का अधिपत्य; हि = निश्चय; दण्डः = दण्ड; स्यात् = हो सकता है; त्वन्मते = तुम्हारे मत में; सखे = हे सखे। श्वा = कुत्ता; प्राह = बोला; शृणु = सुन; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; यथा = जैसे; दण्डः = दण्ड; अयम् = यह; उत्तमः = उत्तम है; मठाधीशः = मठ का मुखिया; भवेत् = होता है; यः = जो; तु = तो; सर्वसंगविवर्जितः = सब संग से रहित होना चाहिए; तस्य = उसके; भोगाः = भोग; बहुविधाः = अनेक प्रकार के; स्त्रियः = स्त्रियाँ; गीतम् = गान; च = और; नित्यशः = नित्य; लोभमोहसमायुक्तः = लोभ और मोह से युक्त; धर्मात् = धर्म से; भ्रश्यति = भ्रष्ट हो जाता है; निश्चितम् = निश्चय। तस्मात् = इसलिए; दण्डः = दण्ड; हि = निश्चय; अयम् = यह; श्रेष्ठः = श्रेष्ठ है; ब्राह्मणस्य = ब्राह्मण के लिए; दुरात्मनः = दुष्टात्मा। रामः = राम; प्राह = बोले; तथा = ऐसा ही; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; तम् = उस; विप्रम् = ब्राह्मण को; मठिनम् = मठ का अधिकारी; व्यधात् = बना दिया।
📖 भावार्थ : कुत्ते ने कहा कि हे राम! यदि आप मेरी ओर से दण्ड देना चाहते हैं, तो इस ब्राह्मण को किसी मठ का मुखिया बना दीजिए। राम आश्चर्य में पड़ गए और बोले कि यह तो दण्ड नहीं, वरदान प्रतीत होता है। कुत्ते ने समझाया कि हे राजन्! सुनिए। मठ का मुखिया होने पर उसे अनेक भोग, स्त्रियाँ, गीत-संगीत आदि सुलभ हो जाते हैं। वह लोभ और मोह में फंसकर धर्म से भ्रष्ट हो जाता है। यही सबसे बड़ा दण्ड है। राम ने यह तर्क स्वीकार किया और उस ब्राह्मण को मठ का मुखिया नियुक्त कर दिया।

📜 श्लोक १६-२० : कुत्ते का वास्तविक स्वरूप और उपदेश

ततः श्वा प्राह रामं तु धर्मोऽहं तव सन्निधौ।
धर्मपरीक्षार्थमिदं कृतं मया नरेश्वर॥१६॥
त्वं धर्मज्ञो महातेजा धर्मेण पृथिवीपतिः।
तव राज्ये जनाः सर्वे धर्मनिष्ठाः सदा प्रभो॥१७॥
एवं धर्मस्य माहात्म्यं रामेण परिपालितम्।
श्वरूपेण परीक्षार्थं कृतं तेन महात्मना॥१८॥
रामः प्रीतमना भूत्वा धर्मं प्रोवाच संस्तुतम्।
धर्म त्वया सदा रक्ष्या प्रजा धर्मेण सर्वदा॥१९॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा धर्मेण सहितस्तदा।
रेमे राज्ये प्रजाः पाल्य धर्मेण चिरमादरात्॥२०॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; श्वा = कुत्ता; प्राह = बोला; रामम् = राम से; तु = तो; धर्मः = धर्म; अहम् = मैं; तव = तेरे; सन्निधौ = समीप में; धर्मपरीक्षार्थम् = धर्म की परीक्षा के लिए; इदम् = यह; कृतम् = किया; मया = मैंने; नरेश्वर = हे नरेश। त्वम् = तू; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; महातेजाः = महान तेजस्वी; धर्मेण = धर्म से; पृथिवीपतिः = पृथ्वीपति; तव = तेरे; राज्ये = राज्य में; जनाः = लोग; सर्वे = सब; धर्मनिष्ठाः = धर्मनिष्ठ; सदा = सदा; प्रभो = हे प्रभु। एवम् = इस प्रकार; धर्मस्य = धर्म का; माहात्म्यम् = माहात्म्य; रामेण = राम द्वारा; परिपालितम् = पालन किया गया; श्वरूपेण = कुत्ते के रूप में; परीक्षार्थम् = परीक्षा के लिए; कृतम् = किया; तेन = उसने; महात्मना = महात्मा ने। रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्न मन वाले; भूत्वा = होकर; धर्मम् = धर्म को; प्रोवाच = बोले; संस्तुतम् = स्तुति करते हुए; धर्म = हे धर्म; त्वया = तुम्हें; सदा = सदा; रक्ष्या = रक्षा करनी चाहिए; प्रजाः = प्रजा; धर्मेण = धर्म से; सर्वदा = सदा। इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; राघवः = राघव; राजा = राजा; धर्मेण = धर्म के साथ; सहितः = सहित; तदा = तब; रेमे = आनन्द से रहे; राज्ये = राज्य में; प्रजाः = प्रजा; पाल्य = पालन करते हुए; धर्मेण = धर्म से; चिरम् = बहुत समय तक; आदरात् = आदर सहित।
📖 भावार्थ : तब उस कुत्ते ने राम से कहा कि हे राम! मैं धर्म हूँ। मैं तुम्हारी धर्मपरायणता की परीक्षा लेने के लिए कुत्ते का रूप धारण करके आया था। तुमने धर्मपूर्वक न्याय किया, यह देखकर मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हारे राज्य में सब लोग धर्मनिष्ठ हैं। राम ने धर्म की स्तुति की और कहा कि हे धर्म! आप सदा प्रजा की रक्षा करें। तत्पश्चात् राम धर्म के साथ राज्य का पालन करते हुए आनन्द से रहे।

📜 श्लोक २१-२५ : फलश्रुति और उपदेश

य इदं शृणुयान्नित्यं धर्माख्यानमनुत्तमम्।
धर्मनिष्ठः सुखी लोके परत्र च महीयते॥२१॥
राजा भवति धर्मात्मा सत्यवादी जितेन्द्रियः।
प्रजाश्च धर्मनिष्ठाश्च सुखिनो धनिनस्तथा॥२२॥
न तस्य व्याधयः क्लेशा न दारिद्र्यं न शत्रवः।
सर्वत्र विजयी राजा धर्मेण पालयेन्महीम्॥२३॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन धर्म एव परायणम्।
रामेण यत्कृतं राज्ञा तत्कुर्यादनुमोदयेत्॥२४॥
इति श्रीवाल्मीकीये रामायणे उत्तरकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः॥२५॥
🔹 पदच्छेद : यः = जो; इदम् = इस; शृणुयात् = सुने; नित्यम् = नित्य; धर्माख्यानम् = धर्म की कथा; अनुत्तमम् = उत्तम; धर्मनिष्ठः = धर्मनिष्ठ; सुखी = सुखी; लोके = इस लोक में; परत्र = परलोक में; च = और; महीयते = पूजित होता है। राजा = राजा; भवति = होता है; धर्मात्मा = धर्मात्मा; सत्यवादी = सत्यवादी; जितेन्द्रियः = जितेन्द्रिय; प्रजाः = प्रजा; च = और; धर्मनिष्ठाः = धर्मनिष्ठ; सुखिनः = सुखी; धनिनः = धनवान; तथा = वैसे ही। न = नहीं; तस्य = उसके; व्याधयः = रोग; क्लेशाः = क्लेश; न = नहीं; दारिद्र्यम् = दरिद्रता; न = नहीं; शत्रवः = शत्रु; सर्वत्र = सर्वत्र; विजयी = विजयी; राजा = राजा; धर्मेण = धर्म से; पालयेत् = पालन करे; महीम् = पृथ्वी। तस्मात् = इसलिए; सर्वप्रयत्नेन = सब प्रयत्न से; धर्मः = धर्म; एव = ही; परायणम् = परम आश्रय; रामेण = राम ने; यत् = जो; कृतम् = किया; राज्ञा = राजा ने; तत् = वह; कुर्यात् = करे; अनुमोदयेत् = अनुमोदन करे। इति = इस प्रकार; श्रीवाल्मीकीये रामायणे = श्रीवाल्मीकीय रामायण में; उत्तरकाण्डे = उत्तरकाण्ड में; एकोनसप्ततितमः = उनहत्तरवाँ; सर्गः = सर्ग।
📖 भावार्थ : जो मनुष्य इस उत्तम धर्माख्यान को नित्य सुनता है, वह धर्मनिष्ठ, इस लोक में सुखी और परलोक में पूजित होता है। वह राजा धर्मात्मा, सत्यवादी और जितेन्द्रिय होता है। उसकी प्रजा धर्मनिष्ठ, सुखी और धनवान होती है। उसे रोग, क्लेश, दरिद्रता और शत्रु नहीं सताते। वह सर्वत्र विजयी होता है और धर्म से पृथ्वी का पालन करता है। इसलिए सब प्रयत्नों से धर्म का ही आश्रय लेना चाहिए। राम ने जो किया, उसी का अनुसरण और अनुमोदन करना चाहिए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🐕 कुत्ते के रूप में धर्म

धर्म ने कुत्ते का रूप धारण कर राम की परीक्षा ली। यह दर्शाता है कि धर्म सर्वत्र विद्यमान है और सूक्ष्म रूपों में भी परीक्षा ले सकता है।

⚖️ दण्ड की सूक्ष्मता

कुत्ते ने जो दण्ड सुझाया, वह दिखने में वरदान जैसा था, किन्तु वास्तव में वह आध्यात्मिक पतन का कारण बन सकता है। यह दण्ड की सूक्ष्मता को दर्शाता है।

🕊️ न्याय की व्यापकता

राम ने केवल मनुष्यों का ही नहीं, पशुओं का भी न्याय किया। यह उनके न्याय की व्यापकता को दर्शाता है।

📖 धर्म का माहात्म्य

इस सर्ग से स्पष्ट होता है कि धर्म का पालन करने वाले राजा के राज्य में सब सुखी रहते हैं।

🎯 शिक्षा : धर्म का पालन करना चाहिए, न्याय में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। दण्ड देते समय उसके परिणामों का सूक्ष्मता से विचार करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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