उत्तर काण्ड अध्याय 68

पुरु द्वारा अपने पिता (ययाति) का स्थान ग्रहण करना

वृद्धावस्था से ग्रस्त ययाति ने अपने पुत्रों से युवावस्था माँगी, पर केवल सबसे छोटे पुत्र पुरु ने अपनी युवावस्था पिता को दे दी। ययाति ने पुरु को राज्य सौंपा और तपस्या के लिए चले गए।

विवरण

यह सर्ग ययाति कथा का उत्तरार्ध है। शुक्राचार्य के श्राप से ययाति वृद्ध हो गए थे। उन्होंने अपने पाँचों पुत्रों से कहा कि कोई एक अपनी युवावस्था मुझे दे दे। बड़े पुत्र यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु ने मना कर दिया। केवल सबसे छोटे पुत्र पुरु ने पिता की आज्ञा का पालन किया और अपनी युवावस्था पिता को दे दी। ययाति पुनः युवा हो गए और उन्होंने हज़ारों वर्षों तक भोग विलास किया। अन्त में उन्हें वैराग्य हुआ और उन्होंने पुरु को लौटाकर उसे राज्य सौंप दिया। पुरु के त्याग से प्रसन्न होकर ययाति ने उसे यह वरदान दिया कि उसके वंश में राजा होंगे। यह कथा त्याग और पितृभक्ति का आदर्श उदाहरण है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ६८

(पुरु द्वारा अपने पिता का स्थान ग्रहण करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिता के प्रति पुत्र के त्याग और भक्ति की अद्भुत कथा। जब सभी बड़े पुत्रों ने पिता की सहायता से मना कर दिया, तब सबसे छोटे पुरु ने अपनी युवावस्था पिता को अर्पित कर दी। यह सर्ग पुरु के त्याग की महिमा का वर्णन करता है।

📜 श्लोक १-५ : ययाति का पुत्रों से पुनः अनुरोध

ययातिः पुत्रमाहूय ज्येष्ठं यदुमथाब्रवीत्।
पुत्र त्वं मम वृद्धत्वं गृहाण यदि शक्यते॥१॥
यदुः प्राह न शक्नोमि पितः किं ब्रूहि मां प्रति।
एवं तुर्वसुमप्याह तुर्वसुरपि नाब्रवीत्॥२॥
द्रुह्युं चानुं च राजेन्द्र सर्वे नेत्यूचिरे तदा।
ततः पुरुं महाभागं शर्मिष्ठायाः सुतं प्रियम्॥३॥
आहूय प्राह राजर्षिः पुत्र त्वं शरणं मम।
त्वं कुरुष्व मम प्रीत्यां वृद्धत्वं गृह्यतां सुत॥४॥
पुरुः प्राह कृतार्थोऽस्मि पितरं प्रति सादरम्।
गृह्णामि तव वृद्धत्वं यौवनं देहि मे पितः॥५॥
🔹 पदच्छेद : ययातिः = ययाति; पुत्रम् = पुत्र को; आहूय = बुलाकर; ज्येष्ठम् = बड़े; यदुम् = यदु से; अथ = तब; अब्रवीत् = बोले। पुत्र = हे पुत्र; त्वम् = तू; मम = मेरी; वृद्धत्वम् = वृद्धावस्था; गृहाण = ग्रहण कर; यदि = यदि; शक्यते = सम्भव हो। यदुः = यदु; प्राह = बोला; न = नहीं; शक्नोमि = सकता हूँ; पितः = हे पिता; किम् = क्या; ब्रूहि = कहो; माम् = मुझसे; प्रति = प्रति। एवम् = इस प्रकार; तुर्वसुम् = तुर्वसु को; अपि = भी; आह = कहा; तुर्वसुः = तुर्वसु; अपि = भी; न = नहीं; अब्रवीत् = बोला। द्रुह्युम् = द्रुह्यु को; च = और; अनुम् = अनु को; च = और; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; सर्वे = सब; न = नहीं; इति = ऐसा; ऊचिरे = कहा; तदा = तब। ततः = तब; पुरुम् = पुरु को; महाभागम् = महाभाग; शर्मिष्ठायाः = शर्मिष्ठा के; सुतम् = पुत्र; प्रियम् = प्रिय; आहूय = बुलाकर; प्राह = बोले; राजर्षिः = राजर्षि; पुत्र = हे पुत्र; त्वम् = तू; शरणम् = शरण; मम = मेरी। त्वम् = तू; कुरुष्व = कर; मम = मेरे; प्रीत्याम् = प्रेम के लिए; वृद्धत्वम् = वृद्धावस्था; गृह्यताम् = ग्रहण कर; सुत = पुत्र। पुरुः = पुरु; प्राह = बोला; कृतार्थः = कृतार्थ; अस्मि = हूँ; पितरम् = पिता के; प्रति = प्रति; सादरम् = आदर सहित। गृह्णामि = लेता हूँ; तव = तेरी; वृद्धत्वम् = वृद्धावस्था; यौवनम् = युवावस्था; देहि = दो; मे = मुझे; पितः = हे पिता।
📖 भावार्थ : ययाति ने पहले अपने बड़े पुत्र यदु से वृद्धावस्था लेने का अनुरोध किया, पर यदु ने मना कर दिया। फिर उन्होंने तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु से कहा, किन्तु उन सब ने इनकार कर दिया। अन्त में ययाति ने शर्मिष्ठा के पुत्र पुरु को बुलाया, जो सबसे छोटा था। पुरु ने पिता की बात सुनकर आदरपूर्वक कहा कि मैं आपका कार्य करने के लिए कृतार्थ हूँ। आप मेरी युवावस्था लीजिए और मुझे अपनी वृद्धावस्था दीजिए। इस प्रकार पुरु ने पिता की प्रार्थना स्वीकार कर ली। यहाँ पुरु के त्याग और पितृभक्ति की भावना स्पष्ट होती है।

📜 श्लोक ६-१० : पुरु द्वारा युवावस्था का दान

इत्युक्त्वा प्रतिजग्राह पितुर्वृद्धत्वमात्मनः।
ययातिरपि तत्प्राप्य यौवनं मुदितोऽभवत्॥६॥
स राजा यौवनं प्राप्य भोगान् भुक्त्वा यथेप्सितान्।
दिव्यवर्षसहस्राणि साग्राणि प्रमुमोद ह॥७॥
कदाचित् तु महाराज ययातिर्धर्मवत्सलः।
विचिन्त्य मनसा धर्मं विरक्तः सन् बभूव ह॥८॥
आहूय पुरुमव्यग्रं प्रोवाच वचनं नृपः।
पुत्र त्वयि कृतप्रीतिर्यौवनं प्रतिगृह्यताम्॥९॥
वृद्धत्वं मे प्रयच्छ त्वं राज्यं चापि प्रशाधि मे।
पुरुः प्राह पितुः श्रुत्वा वाक्यं धर्मार्थसंहितम्॥१०॥
🔹 पदच्छेद : इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; प्रतिजग्राह = ग्रहण किया; पितुः = पिता की; वृद्धत्वम् = वृद्धावस्था; आत्मनः = अपने ऊपर। ययातिः = ययाति; अपि = भी; तत् = वह; प्राप्य = प्राप्त करके; यौवनम् = युवावस्था; मुदितः = प्रसन्न; अभवत् = हुआ। सः = वह; राजा = राजा; यौवनम् = युवावस्था; प्राप्य = पाकर; भोगान् = भोगों को; भुक्त्वा = भोगकर; यथेप्सितान् = जैसे चाहा; दिव्यवर्षसहस्राणि = हज़ारों दिव्य वर्ष; साग्राणि = कुछ अधिक; प्रमुमोद = आनन्दित रहा; ह = निश्चय। कदाचित् = कभी; तु = तो; महाराज = महाराज; ययातिः = ययाति; धर्मवत्सलः = धर्मप्रिय; विचिन्त्य = विचार करके; मनसा = मन से; धर्मम् = धर्म को; विरक्तः = विरक्त; सन् = हुआ; बभूव = हो गया; ह = निश्चय। आहूय = बुलाकर; पुरुम् = पुरु को; अव्यग्रम् = शान्त; प्रोवाच = बोले; वचनम् = वचन; नृपः = राजा। पुत्र = हे पुत्र; त्वयि = तुझ पर; कृतप्रीतिः = प्रसन्न होकर; यौवनम् = युवावस्था; प्रतिगृह्यताम् = वापस ले लो। वृद्धत्वम् = वृद्धावस्था; मे = मुझे; प्रयच्छ = दो; त्वम् = तू; राज्यम् = राज्य; च = और; अपि = भी; प्रशाधि = शासन करो; मे = मेरा। पुरुः = पुरु; प्राह = बोला; पितुः = पिता का; श्रुत्वा = सुनकर; वाक्यम् = वचन; धर्मार्थसंहितम् = धर्म और अर्थ से युक्त।
📖 भावार्थ : पुरु ने पिता की वृद्धावस्था ग्रहण कर ली और ययाति पुनः युवा हो गए। अब ययाति ने हज़ारों वर्षों तक इच्छित भोगों का उपभोग किया और अत्यन्त प्रसन्न रहे। किन्तु एक दिन उन्हें वैराग्य हुआ। उन्होंने धर्म का चिन्तन किया और समझ गए कि भोगों से तृप्ति नहीं मिलती। तब उन्होंने पुरु को बुलाकर कहा कि पुत्र, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ, तू अपनी युवावस्था वापस ले ले और मुझे वृद्धावस्था दे दे। मैं अब राज्य तुझे सौंपता हूँ, तू इसका शासन कर। पुरु ने पिता के ये धर्मयुक्त वचन सुने।

📜 श्लोक ११-१५ : पुरु का उत्तर और ययाति का वरदान

पुरुः प्राह पितर्मे त्वं प्रीतो यदि वरं वृणे।
त्वद्भक्तिरस्तु मे नित्यं धर्मे च रतिरस्तु मे॥११॥
ययातिः प्राह भद्रं ते पुत्र त्वं धर्मवत्सलः।
त्वयि राज्यं समस्तं मे त्वं राजा भव पालय॥१२॥
यत्त्वया पितृकार्यार्थं यौवनं मे समर्पितम्।
तेन त्वं सर्वलोकेषु कीर्तिमान् भव पुत्रक॥१३॥
तव वंशे भविष्यन्ति राजानो ब्रह्मवादिनः।
धर्मात्मानो महात्मानो यज्वानो दानशीलिनः॥१४॥
इत्युक्त्वा राजशार्दूलो ययातिः प्रददौ वरम्।
पुरवे प्रीतमनसा राज्यं च प्रददौ तदा॥१५॥
🔹 पदच्छेद : पुरुः = पुरु; प्राह = बोला; पितः = हे पिता; मे = मुझे; त्वम् = आप; प्रीतः = प्रसन्न; यदि = यदि; वरम् = वर; वृणे = माँगता हूँ। त्वद्भक्तिः = आपकी भक्ति; अस्तु = हो; मे = मुझमें; नित्यम् = नित्य; धर्मे = धर्म में; च = और; रतिः = रति; अस्तु = हो; मे = मुझमें। ययातिः = ययाति; प्राह = बोले; भद्रम् = कल्याण; ते = तुम्हारा; पुत्र = हे पुत्र; त्वम् = तू; धर्मवत्सलः = धर्मप्रिय है; त्वयि = तुझे; राज्यम् = राज्य; समस्तम् = सम्पूर्ण; मे = मेरा; त्वम् = तू; राजा = राजा; भव = हो; पालय = पालन कर। यत् = जो; त्वया = तुमने; पितृकार्यार्थम् = पिता के कार्य के लिए; यौवनम् = युवावस्था; मे = मुझे; समर्पितम् = अर्पित की; तेन = उससे; त्वम् = तू; सर्वलोकेषु = सब लोकों में; कीर्तिमान् = कीर्तिमान्; भव = हो; पुत्रक = हे पुत्र। तव = तेरे; वंशे = वंश में; भविष्यन्ति = होंगे; राजानः = राजा; ब्रह्मवादिनः = ब्रह्मवादी; धर्मात्मानः = धर्मात्मा; महात्मानः = महात्मा; यज्वानः = यज्ञ करने वाले; दानशीलिनः = दानशील। इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; राजशार्दूलः = राजशार्दूल; ययातिः = ययाति; प्रददौ = दिया; वरम् = वर; पुरवे = पुरु को; प्रीतमनसा = प्रसन्न मन से; राज्यम् = राज्य; च = और; प्रददौ = दिया; तदा = तब।
📖 भावार्थ : पुरु ने पिता से कहा कि यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं यह वर माँगता हूँ कि मेरी आपमें नित्य भक्ति बनी रहे और धर्म में मेरी रति हो। ययाति ने प्रसन्न होकर कहा कि तुम धर्मात्मा हो, मैं तुम्हें अपना सम्पूर्ण राज्य सौंपता हूँ, तुम राजा बनो और धर्म से पृथ्वी का पालन करो। तुमने पिता के लिए अपनी युवावस्था अर्पित की, इसलिए तुम सब लोकों में कीर्तिमान् रहोगे। तुम्हारे वंश में ब्रह्मवादी, धर्मात्मा, महात्मा, यज्ञ करने वाले और दानशील राजा होंगे। ऐसा वरदान देकर ययाति ने पुरु को राज्य सौंप दिया।

📜 श्लोक १६-२० : पुरु का राज्याभिषेक और ययाति का वनगमन

ततः पुरुं समानीय ब्राह्मणैः सह राघव।
अभ्यषिञ्चन् महात्मानं राजानं धर्मवत्सलम्॥१६॥
ययातिस्तु तदा राजा पुत्रे राज्यं निवेश्य च।
वनं गन्तुं मनश्चक्रे धर्मेण संयतः सदा॥१७॥
देवयानी च शर्मिष्ठा तथा पत्न्यौ समेत्य च।
अनुजग्मतुरव्यग्रे भर्तारं धर्मसंहितम्॥१८॥
ययातिर्वनमासाद्य तपस्तेपे सुदारुणम्।
फलमूलाशनो धीरो जितेन्द्रियपरायणः॥१९॥
एवं ययातिचरितं पुरोश्चैव महात्मनः।
रामाय कथितं सर्वमगस्त्येन महात्मना॥२०॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; पुरुम् = पुरु को; समानीय = लाकर; ब्राह्मणैः = ब्राह्मणों के साथ; सह = साथ; राघव = हे राघव; अभ्यषिञ्चन् = राज्याभिषेक किया; महात्मानम् = महात्मा को; राजानम् = राजा के रूप में; धर्मवत्सलम् = धर्मप्रिय। ययातिः = ययाति; तु = तो; तदा = तब; राजा = राजा; पुत्रे = पुत्र को; राज्यम् = राज्य; निवेश्य = स्थापित करके; च = और; वनम् = वन; गन्तुम् = जाने के लिए; मनःचक्रे = मन बनाया; धर्मेण = धर्म से; संयतः = संयमित; सदा = सदा। देवयानी = देवयानी; च = और; शर्मिष्ठा = शर्मिष्ठा; तथा = तथा; पत्न्यौ = दोनों पत्नियाँ; समेत्य = एकत्र होकर; च = और; अनुजग्मतुः = पीछे-पीछे गईं; अव्यग्रे = बिना किसी विघ्न के; भर्तारम् = पति के; धर्मसंहितम् = धर्मयुक्त। ययातिः = ययाति; वनम् = वन को; आसाद्य = पहुँचकर; तपः = तप; तेपे = किया; सुदारुणम् = अत्यन्त कठोर; फलमूलाशनः = फल-मूल खाने वाले; धीरः = धीर; जितेन्द्रियपरायणः = इन्द्रियों पर विजय पाने में तत्पर। एवम् = इस प्रकार; ययातिचरितम् = ययाति का चरित्र; पुरोः = पुरु का; च = और; एव = ही; महात्मनः = महात्मा का; रामाय = राम को; कथितम् = कहा; सर्वम् = सब; अगस्त्येन = अगस्त्य ने; महात्मना = महात्मा ने।
📖 भावार्थ : तब ययाति ने ब्राह्मणों के साथ पुरु का राज्याभिषेक किया और उसे धर्मात्मा राजा घोषित किया। स्वयं ययाति वन जाने के लिए तैयार हुए। उनकी दोनों पत्नियाँ देवयानी और शर्मिष्ठा भी उनके साथ वन गईं। वन में पहुँचकर ययाति ने कठोर तपस्या की, फल-मूल खाकर रहे और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त की। अगस्त्य ऋषि ने राम से कहा कि इस प्रकार ययाति और पुरु का चरित्र मैंने तुम्हें सुनाया।

📜 श्लोक २१-२५ : फलश्रुति और उपदेश

य इदं शृणुयान्नित्यं पुरोश्चरितमुत्तमम्।
सर्वपापैः प्रमुच्येत पितृभक्तिमवाप्नुयात्॥२१॥
पुत्रः पितृप्रियकरो भवेद् राजा प्रजाप्रियः।
धन्यो यशस्वी धर्मात्मा कीर्तिमान् जायते नरः॥२२॥
पितरि प्रतिपन्नं यत् पुरुणा यौवनं महत्।
तदेव धर्ममित्याहुः सन्तः सद्भिरनुष्ठितम्॥२३॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पितृभक्तिः परं मतम्।
धर्मार्थकाममोक्षाणां मूलं हि पितृसेवनम्॥२४॥
इति श्रीवाल्मीकीये रामायणे उत्तरकाण्डे अष्टषष्टितमः सर्गः॥२५॥
🔹 पदच्छेद : यः = जो; इदम् = इस; शृणुयात् = सुने; नित्यम् = नित्य; पुरोः = पुरु का; चरितम् = चरित्र; उत्तमम् = उत्तम; सर्वपापैः = सब पापों से; प्रमुच्येत = मुक्त हो जाता है; पितृभक्तिम् = पितृभक्ति; अवाप्नुयात् = प्राप्त करता है। पुत्रः = पुत्र; पितृप्रियकरः = पिता को प्रिय करने वाला; भवेत् = होता है; राजा = राजा; प्रजाप्रियः = प्रजाप्रिय; धन्यः = धन्य; यशस्वी = यशस्वी; धर्मात्मा = धर्मात्मा; कीर्तिमान् = कीर्तिमान्; जायते = होता है; नरः = मनुष्य। पितरि = पिता के प्रति; प्रतिपन्नम् = किया गया; यत् = जो; पुरुणा = पुरु ने; यौवनम् = युवावस्था का दान; महत् = महान्; तत् = वह; एव = ही; धर्मम् = धर्म; इति = इस प्रकार; आहुः = कहते हैं; सन्तः = सज्जन; सद्भिः = सत्पुरुषों द्वारा; अनुष्ठितम् = आचरित। तस्मात् = इसलिए; सर्वप्रयत्नेन = सब प्रयत्न से; पितृभक्तिः = पिता की भक्ति; परम् = परम; मतम् = माना गया; धर्मार्थकाममोक्षाणाम् = धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का; मूलम् = मूल; हि = निश्चय; पितृसेवनम् = पिता की सेवा। इति = इस प्रकार; श्रीवाल्मीकीये रामायणे = श्रीवाल्मीकीय रामायण में; उत्तरकाण्डे = उत्तरकाण्ड में; अष्टषष्टितमः = अड़सठवाँ; सर्गः = सर्ग।
📖 भावार्थ : जो मनुष्य नित्य पुरु के इस उत्तम चरित्र को सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर पितृभक्ति को प्राप्त करता है। वह पुत्र पिता का प्रिय होता है और राजा प्रजा का प्रिय होता है। वह धन्य, यशस्वी, धर्मात्मा और कीर्तिमान् होता है। पुरु ने पिता के लिए जो युवावस्था का त्याग किया, वही सच्चा धर्म है, ऐसा सज्जन कहते हैं। इसलिए सब प्रयत्नों से पितृभक्ति को ही परम मानना चाहिए। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का मूल पिता की सेवा ही है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙏 पितृभक्ति का आदर्श

पुरु ने बिना किसी स्वार्थ के पिता के लिए अपनी युवावस्था त्याग दी। यह पितृभक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है। उसके त्याग के कारण उसे राज्य और अमर कीर्ति मिली।

🕉️ वैराग्य की शिक्षा

ययाति ने हज़ारों वर्ष भोग किए, फिर भी तृप्ति नहीं हुई। अन्त में उन्हें वैराग्य हुआ। यह दर्शाता है कि भोगों से कभी तृप्ति नहीं मिलती, वैराग्य ही मुक्ति का मार्ग है।

👑 राज्य का उत्तरदायित्व

ययाति ने पुरु को राज्य सौंपा और स्वयं तपस्या के लिए चले गए। राजा को धर्मपालन करना चाहिए और समय पर त्याग भी करना चाहिए।

📖 वंश परम्परा

पुरु के वंश में आगे चलकर महान राजा हुए, जिनमें पाण्डव और कौरव प्रमुख हैं। यह त्याग की ही देन है।

🎯 शिक्षा : पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। त्याग और भक्ति से मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर सकता है। भोगों से विरक्त होकर धर्म का पालन करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे अष्टषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।