पुरु द्वारा अपने पिता (ययाति) का स्थान ग्रहण करना
वृद्धावस्था से ग्रस्त ययाति ने अपने पुत्रों से युवावस्था माँगी, पर केवल सबसे छोटे पुत्र पुरु ने अपनी युवावस्था पिता को दे दी। ययाति ने पुरु को राज्य सौंपा और तपस्या के लिए चले गए।
विवरण
यह सर्ग ययाति कथा का उत्तरार्ध है। शुक्राचार्य के श्राप से ययाति वृद्ध हो गए थे। उन्होंने अपने पाँचों पुत्रों से कहा कि कोई एक अपनी युवावस्था मुझे दे दे। बड़े पुत्र यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु ने मना कर दिया। केवल सबसे छोटे पुत्र पुरु ने पिता की आज्ञा का पालन किया और अपनी युवावस्था पिता को दे दी। ययाति पुनः युवा हो गए और उन्होंने हज़ारों वर्षों तक भोग विलास किया। अन्त में उन्हें वैराग्य हुआ और उन्होंने पुरु को लौटाकर उसे राज्य सौंप दिया। पुरु के त्याग से प्रसन्न होकर ययाति ने उसे यह वरदान दिया कि उसके वंश में राजा होंगे। यह कथा त्याग और पितृभक्ति का आदर्श उदाहरण है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ६८
(पुरु द्वारा अपने पिता का स्थान ग्रहण करना)
🔆 प्रस्तावना : पिता के प्रति पुत्र के त्याग और भक्ति की अद्भुत कथा। जब सभी बड़े पुत्रों ने पिता की सहायता से मना कर दिया, तब सबसे छोटे पुरु ने अपनी युवावस्था पिता को अर्पित कर दी। यह सर्ग पुरु के त्याग की महिमा का वर्णन करता है।
📜 श्लोक १-५ : ययाति का पुत्रों से पुनः अनुरोध
पुत्र त्वं मम वृद्धत्वं गृहाण यदि शक्यते॥१॥
यदुः प्राह न शक्नोमि पितः किं ब्रूहि मां प्रति।
एवं तुर्वसुमप्याह तुर्वसुरपि नाब्रवीत्॥२॥
द्रुह्युं चानुं च राजेन्द्र सर्वे नेत्यूचिरे तदा।
ततः पुरुं महाभागं शर्मिष्ठायाः सुतं प्रियम्॥३॥
आहूय प्राह राजर्षिः पुत्र त्वं शरणं मम।
त्वं कुरुष्व मम प्रीत्यां वृद्धत्वं गृह्यतां सुत॥४॥
पुरुः प्राह कृतार्थोऽस्मि पितरं प्रति सादरम्।
गृह्णामि तव वृद्धत्वं यौवनं देहि मे पितः॥५॥
📜 श्लोक ६-१० : पुरु द्वारा युवावस्था का दान
ययातिरपि तत्प्राप्य यौवनं मुदितोऽभवत्॥६॥
स राजा यौवनं प्राप्य भोगान् भुक्त्वा यथेप्सितान्।
दिव्यवर्षसहस्राणि साग्राणि प्रमुमोद ह॥७॥
कदाचित् तु महाराज ययातिर्धर्मवत्सलः।
विचिन्त्य मनसा धर्मं विरक्तः सन् बभूव ह॥८॥
आहूय पुरुमव्यग्रं प्रोवाच वचनं नृपः।
पुत्र त्वयि कृतप्रीतिर्यौवनं प्रतिगृह्यताम्॥९॥
वृद्धत्वं मे प्रयच्छ त्वं राज्यं चापि प्रशाधि मे।
पुरुः प्राह पितुः श्रुत्वा वाक्यं धर्मार्थसंहितम्॥१०॥
📜 श्लोक ११-१५ : पुरु का उत्तर और ययाति का वरदान
त्वद्भक्तिरस्तु मे नित्यं धर्मे च रतिरस्तु मे॥११॥
ययातिः प्राह भद्रं ते पुत्र त्वं धर्मवत्सलः।
त्वयि राज्यं समस्तं मे त्वं राजा भव पालय॥१२॥
यत्त्वया पितृकार्यार्थं यौवनं मे समर्पितम्।
तेन त्वं सर्वलोकेषु कीर्तिमान् भव पुत्रक॥१३॥
तव वंशे भविष्यन्ति राजानो ब्रह्मवादिनः।
धर्मात्मानो महात्मानो यज्वानो दानशीलिनः॥१४॥
इत्युक्त्वा राजशार्दूलो ययातिः प्रददौ वरम्।
पुरवे प्रीतमनसा राज्यं च प्रददौ तदा॥१५॥
📜 श्लोक १६-२० : पुरु का राज्याभिषेक और ययाति का वनगमन
अभ्यषिञ्चन् महात्मानं राजानं धर्मवत्सलम्॥१६॥
ययातिस्तु तदा राजा पुत्रे राज्यं निवेश्य च।
वनं गन्तुं मनश्चक्रे धर्मेण संयतः सदा॥१७॥
देवयानी च शर्मिष्ठा तथा पत्न्यौ समेत्य च।
अनुजग्मतुरव्यग्रे भर्तारं धर्मसंहितम्॥१८॥
ययातिर्वनमासाद्य तपस्तेपे सुदारुणम्।
फलमूलाशनो धीरो जितेन्द्रियपरायणः॥१९॥
एवं ययातिचरितं पुरोश्चैव महात्मनः।
रामाय कथितं सर्वमगस्त्येन महात्मना॥२०॥
📜 श्लोक २१-२५ : फलश्रुति और उपदेश
सर्वपापैः प्रमुच्येत पितृभक्तिमवाप्नुयात्॥२१॥
पुत्रः पितृप्रियकरो भवेद् राजा प्रजाप्रियः।
धन्यो यशस्वी धर्मात्मा कीर्तिमान् जायते नरः॥२२॥
पितरि प्रतिपन्नं यत् पुरुणा यौवनं महत्।
तदेव धर्ममित्याहुः सन्तः सद्भिरनुष्ठितम्॥२३॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पितृभक्तिः परं मतम्।
धर्मार्थकाममोक्षाणां मूलं हि पितृसेवनम्॥२४॥
इति श्रीवाल्मीकीये रामायणे उत्तरकाण्डे अष्टषष्टितमः सर्गः॥२५॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🙏 पितृभक्ति का आदर्श
पुरु ने बिना किसी स्वार्थ के पिता के लिए अपनी युवावस्था त्याग दी। यह पितृभक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है। उसके त्याग के कारण उसे राज्य और अमर कीर्ति मिली।
🕉️ वैराग्य की शिक्षा
ययाति ने हज़ारों वर्ष भोग किए, फिर भी तृप्ति नहीं हुई। अन्त में उन्हें वैराग्य हुआ। यह दर्शाता है कि भोगों से कभी तृप्ति नहीं मिलती, वैराग्य ही मुक्ति का मार्ग है।
👑 राज्य का उत्तरदायित्व
ययाति ने पुरु को राज्य सौंपा और स्वयं तपस्या के लिए चले गए। राजा को धर्मपालन करना चाहिए और समय पर त्याग भी करना चाहिए।
📖 वंश परम्परा
पुरु के वंश में आगे चलकर महान राजा हुए, जिनमें पाण्डव और कौरव प्रमुख हैं। यह त्याग की ही देन है।
🎯 शिक्षा : पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। त्याग और भक्ति से मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर सकता है। भोगों से विरक्त होकर धर्म का पालन करना चाहिए।