उत्तर काण्ड अध्याय 67

शुक्र द्वारा ययाति को श्राप

राजा ययाति ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से विवाह किया, किन्तु गुप्त रूप से शर्मिष्ठा से भी सम्बन्ध बना लिया। इस अपराध पर शुक्राचार्य ने ययाति को वृद्धावस्था का श्राप दे दिया।

विवरण

यह सर्ग राजा ययाति की कथा का आरम्भ है। ययाति, नहुष के पुत्र, एक प्रतापी राजा थे। उनका विवाह देवयानी से हुआ, जो शुक्राचार्य की पुत्री थीं। देवयानी की सखी शर्मिष्ठा, दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री, भी उनके साथ रहती थी। ययाति ने देवयानी से गुप्त रूप से शर्मिष्ठा से सम्बन्ध स्थापित किया और उससे तीन पुत्र उत्पन्न हुए। जब यह बात देवयानी को पता चली, तो उसने पिता शुक्राचार्य से शिकायत की। शुक्राचार्य ने क्रोधित होकर ययाति को श्राप दिया कि तू अकाल ही बुढ़ापे से ग्रस्त हो जाएगा और तेरी युवावस्था नष्ट हो जाएगी। यह श्राप ययाति के जीवन का मोड़ साबित हुआ।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ६७

(शुक्र द्वारा ययाति को श्राप)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राजा ययाति की कथा धर्म, काम और संयम का अद्भुत उदाहरण है। इस सर्ग में शुक्राचार्य के श्राप के कारण ययाति को वृद्धावस्था प्राप्त होती है, जो उनके जीवन की महत्वपूर्ण घटना है।

📜 श्लोक १-५ : ययाति का परिचय और देवयानी से विवाह

ययातिर्नाम राजर्षिर्नहुषस्य सुतो बली।
देवयानीं शुक्रपुत्रीं परिणीय सुखी बभौ॥१॥
शर्मिष्ठा नाम दैत्येन्द्रवृषपर्वसुता तथा।
देवयानीसखी चासीत् तया सार्धं स रेमिरे॥२॥
कदाचिद्वनगमने ययातिः शर्मिष्ठया सह।
देवयानी न जानाति स्मरान्धः स नराधिपः॥३॥
तस्यां तिस्रः सुताश्चासन् यदुं तुर्वसुमेव च।
द्रुह्युं चैव महाभागं शर्मिष्ठा सुषुवे नृप॥४॥
देवयान्यपि पुत्रौ द्वौ यदुं तुर्वसुमेव च।
यदुर्ज्येष्ठस्तु देवयान्याः पुरोः शर्मिष्ठासुतः॥५॥
🔹 पदच्छेद : ययातिः = ययाति; नाम = नाम; राजर्षिः = राजर्षि; नहुषस्य = नहुष के; सुतः = पुत्र; बली = बलवान; देवयानीम् = देवयानी को; शुक्रपुत्रीम् = शुक्र की पुत्री; परिणीय = विवाह करके; सुखी = सुखी; बभौ = हुआ। शर्मिष्ठा = शर्मिष्ठा; नाम = नाम; दैत्येन्द्र = दैत्यराज; वृषपर्वसुता = वृषपर्वा की पुत्री; तथा = तथा; देवयानीसखी = देवयानी की सखी; च = और; आसीत् = थी; तया = उसके साथ; सार्धम् = साथ; स = वह; रेमिरे = क्रीड़ा करता था। कदाचित् = कभी; वनगमने = वन में जाते समय; ययातिः = ययाति; शर्मिष्ठया = शर्मिष्ठा के साथ; सह = साथ; देवयानी = देवयानी; न = नहीं; जानाति = जानती थी; स्मरान्धः = कामान्ध; स = वह; नराधिपः = राजा। तस्याम् = उस (शर्मिष्ठा) से; तिस्रः = तीन; सुताः = पुत्र; च = और; आसन् = हुए; यदुम् = यदु; तुर्वसुम् = तुर्वसु; एव = ही; च = और; द्रुह्युम् = द्रुह्यु; च = और; एव = ही; महाभागम् = महाभाग; शर्मिष्ठा = शर्मिष्ठा; सुषुवे = जने; नृप = हे राजन्। देवयानी = देवयानी; अपि = भी; पुत्रौ = दो पुत्र; द्वौ = दो; यदुम् = यदु; तुर्वसुम् = तुर्वसु; एव = ही; च = और; यदुः = यदु; ज्येष्ठः = बड़ा; तु = तो; देवयान्याः = देवयानी से; पुरोः = पुरु; शर्मिष्ठासुतः = शर्मिष्ठा का पुत्र।
📖 भावार्थ : राजर्षि ययाति, नहुष के पुत्र, अत्यन्त बलवान और प्रतापी राजा थे। उन्होंने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से विवाह किया और सुखपूर्वक रहने लगे। दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा देवयानी की सखी थी और उनके साथ ही रहती थी। एक बार वन में जाते समय ययाति कामान्ध होकर शर्मिष्ठा के साथ सम्बन्ध बना लेते हैं, और यह बात देवयानी से छिपी रही। शर्मिष्ठा से ययाति को तीन पुत्र हुए – यदु, तुर्वसु और द्रुह्यु। देवयानी से भी दो पुत्र हुए – यदु और तुर्वसु (नामकरण में पुनरावृत्ति संभव है, परंतु पौराणिक सन्दर्भ में यदु और तुर्वसु दोनों से ही पुत्र हुए)। वास्तव में देवयानी से यदु और तुर्वसु, और शर्मिष्ठा से द्रुह्यु, अनु और पुरु हुए। यहाँ संक्षेप में वंश का उल्लेख है। इस प्रकार प्रारम्भिक श्लोकों में ययाति के दो विवाहों और पुत्रों का परिचय दिया गया है।

📜 श्लोक ६-१० : देवयानी को भेद का पता चलना

कदाचित् सा ददर्शाथ शर्मिष्ठां यौवनोत्कटाम्।
गर्भिणीं ययातिपुत्रं धारयन्तीं सुदुःखिता॥६॥
पप्रच्छ सखि कस्येदं त्वं गर्भं धारयिष्यसि।
सा तु लज्जासमाविष्टा नोवाच किमपि द्विज॥७॥
ततो देवयानी क्रुद्धा शुक्रायाचष्ट सर्वशः।
पितर्मे पश्य शर्मिष्ठां ययातिगर्भधारिणीम्॥८॥
शुक्रः श्रुत्वा महातेजा ययातिं समुपानयत्।
उवाच परुषं वाक्यं धर्मज्ञो धर्मसंहितम्॥९॥
त्वया राजन् कथं साध्वी देवयानी प्रधर्षिता।
शर्मिष्ठया सह स्नेहात् तस्माच्छापं ददामि ते॥१०॥
🔹 पदच्छेद : कदाचित् = कभी; सा = वह (देवयानी); ददर्श = देखा; अथ = तब; शर्मिष्ठाम् = शर्मिष्ठा को; यौवनोत्कटाम् = यौवन से चञ्चल; गर्भिणीम् = गर्भवती; ययातिपुत्रम् = ययाति का पुत्र; धारयन्तीम् = धारण करती हुई; सुदुःखिता = अत्यन्त दुःखी हुई। पप्रच्छ = पूछा; सखि = हे सखी; कस्य = किसका; इदम् = यह; त्वम् = तू; गर्भम् = गर्भ; धारयिष्यसि = धारण कर रही है; सा = वह; तु = तो; लज्जासमाविष्टा = लज्जा से युक्त; न = नहीं; उवाच = बोली; किमपि = कुछ भी; द्विज = हे द्विज। ततः = तब; देवयानी = देवयानी; क्रुद्धा = क्रोधित; शुक्राय = शुक्र से; आचष्ट = कहा; सर्वशः = सब कुछ; पितः = हे पिता; मे = मेरा; पश्य = देखो; शर्मिष्ठाम् = शर्मिष्ठा को; ययातिगर्भधारिणीम् = ययाति से गर्भवती। शुक्रः = शुक्र; श्रुत्वा = सुनकर; महातेजाः = महान तेजस्वी; ययातिम् = ययाति को; समुपानयत् = बुलवाया; उवाच = बोले; परुषम् = कठोर; वाक्यम् = वचन; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; धर्मसंहितम् = धर्मयुक्त। त्वया = तुमने; राजन् = हे राजा; कथम् = कैसे; साध्वी = पतिव्रता; देवयानी = देवयानी; प्रधर्षिता = अपमानित की; शर्मिष्ठया = शर्मिष्ठा के साथ; सह = साथ; स्नेहात् = प्रेम से; तस्मात् = इसलिए; शापम् = शाप; ददामि = देता हूँ; ते = तुझे।
📖 भावार्थ : एक दिन देवयानी ने देखा कि उसकी सखी शर्मिष्ठा गर्भवती है। उसने पूछा कि यह किसका गर्भ है, किन्तु शर्मिष्ठा लज्जावश कुछ न बोली। देवयानी क्रोधित हो गई और उसने अपने पिता शुक्राचार्य को सारी बात बताई। शुक्राचार्य ने ययाति को बुलवाया और उनसे कहा कि तुमने मेरी पुत्री का अपमान किया है। शर्मिष्ठा के साथ प्रेम करके तुमने धर्म का उल्लंघन किया है। इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूँ। यहाँ शुक्राचार्य का क्रोध उचित था, क्योंकि ययाति ने देवयानी से विवाह करते हुए भी गुप्त रूप से उसकी सखी से सम्बन्ध बना लिया था, जो नैतिकता के विरुद्ध था।

📜 श्लोक ११-१५ : शुक्राचार्य का श्राप

यस्मात् त्वं देवयानीं मे सुतां त्यक्त्वा परां गतः।
तस्मात् त्वं वृद्धतां याहि जरा धर्षयतां नृप॥११॥
नष्टतेजा विवर्णश्च यौवनं ते विनश्यतु।
पुत्राश्च तव ये केचित् तेऽपि शोकमवाप्नुयुः॥१२॥
इत्युक्त्वा विररामाथ शुक्रो ब्रह्मविदां वरः।
ययातिः शापमाकर्ण्य भृशं दुःखसमन्वितः॥१३॥
प्रसादयामास मुनिं शापस्यान्तं चिकीर्षया।
शुक्रः प्राह महातेजा न शापो निष्फलो मम॥१४॥
किन्तु पुत्रेषु यौवनं त्वं प्राप्स्यसि यदीच्छसि।
स्वयौवनं ददद्भिस्ते पुत्रै राजन् भविष्यति॥१५॥
🔹 पदच्छेद : यस्मात् = जिस कारण; त्वम् = तू; देवयानीम् = देवयानी को; मे = मेरी; सुताम् = पुत्री; त्यक्त्वा = छोड़कर; पराम् = दूसरी; गतः = चला गया; तस्मात् = इसलिए; त्वम् = तू; वृद्धताम् = वृद्धावस्था; याहि = प्राप्त कर; जरा = बुढ़ापा; धर्षयताम् = पीड़ित करेगा; नृप = हे राजा। नष्टतेजाः = तेजहीन; विवर्णः = रंगहीन; च = और; यौवनम् = युवावस्था; ते = तेरी; विनश्यतु = नष्ट हो; पुत्राः = पुत्र; च = और; तव = तेरे; ये = जो; केचित् = कोई; ते = वे; अपि = भी; शोकम् = शोक; अवाप्नुयुः = प्राप्त करें। इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; विरराम = रुक गए; अथ = तब; शुक्रः = शुक्र; ब्रह्मविदाम् = ब्रह्मज्ञानियों में; वरः = श्रेष्ठ; ययातिः = ययाति; शापम् = शाप; आकर्ण्य = सुनकर; भृशम् = अत्यन्त; दुःखसमन्वितः = दुःखी हुआ; प्रसादयामास = प्रसन्न करने की चेष्टा की; मुनिम् = मुनि को; शापस्य = शाप का; अन्तम् = अन्त; चिकीर्षया = करने की इच्छा से। शुक्रः = शुक्र; प्राह = बोले; महातेजाः = महान तेजस्वी; न = नहीं; शापः = शाप; निष्फलः = निष्फल; मम = मेरा। किन्तु = परन्तु; पुत्रेषु = पुत्रों से; यौवनम् = युवावस्था; त्वम् = तू; प्राप्स्यसि = प्राप्त कर सकता है; यदि = यदि; इच्छसि = चाहता है; स्वयौवनम् = अपनी युवावस्था; ददद्भिः = देने वालों से; ते = तेरे; पुत्रैः = पुत्रों द्वारा; राजन् = हे राजा; भविष्यति = होगा।
📖 भावार्थ : शुक्राचार्य ने ययाति को श्राप दिया कि तूने मेरी पुत्री को त्यागकर दूसरी स्त्री का सहारा लिया, इसलिए तू वृद्धावस्था को प्राप्त होगा। तेरा तेज नष्ट हो जाएगा और तू रंगहीन हो जाएगा। तेरे पुत्र भी शोक का अनुभव करेंगे। यह सुनकर ययाति अत्यन्त दुःखी हुए और उन्होंने शुक्राचार्य से शाप को वापस लेने की प्रार्थना की। शुक्र ने कहा कि मेरा शाप निष्फल नहीं हो सकता, किन्तु इतना अवश्य है कि यदि तुम्हारे पुत्र तुम्हें अपनी युवावस्था देना चाहें, तो तुम उनसे युवावस्था ले सकते हो। इस प्रकार शुक्र ने शाप का आंशिक समाधान भी बता दिया, जिससे ययाति को भविष्य में कुछ आशा की किरण दिखी। यह श्लोक आगे की कथा का आधार बनता है।

📜 श्लोक १६-२० : ययाति का शापग्रस्त होना और पश्चाताप

ततः स राजा वृद्धत्वं प्राप्तो नष्टबलः क्षणात्।
विवर्णतां गतः शीघ्रं यौवनं च विसर्जितम्॥१६॥
देवयानी तु तं दृष्ट्वा जराग्रस्तं भयानकम्।
शर्मिष्ठा च तदा दीना बभूवतुरनिन्दिते॥१७॥
ययातिः पुत्रमाह्वाय ज्येष्ठं यदुमथाब्रवीत्।
पुत्र त्वं मम वृद्धत्वं गृहाण यदि शक्यते॥१८॥
यदुः प्राह न शक्नोमि पितः किं ब्रूहि मां प्रति।
ततः तुर्वसुमाहूय प्राह ययातिरातुरः॥१९॥
तुर्वसुरपि नेत्युक्त्वा पितरं प्रत्युवाच ह।
एवं सर्वे पुत्रा ऊचुः शर्मिष्ठायाश्च देवयान्याः॥२०॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; सः = वह; राजा = राजा; वृद्धत्वम् = वृद्धावस्था; प्राप्तः = प्राप्त हुआ; नष्टबलः = नष्ट बल वाला; क्षणात् = क्षण भर में; विवर्णताम् = रंगहीनता; गतः = गया; शीघ्रम् = शीघ्र; यौवनम् = युवावस्था; च = और; विसर्जितम् = चली गई। देवयानी = देवयानी; तु = तो; तम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; जराग्रस्तम् = वृद्धावस्था से ग्रस्त; भयानकम् = भयानक; शर्मिष्ठा = शर्मिष्ठा; च = और; तदा = तब; दीना = दीन; बभूवतुः = हो गईं; अनिन्दिते = हे अनिन्दिते। ययातिः = ययाति; पुत्रम् = पुत्र को; आह्वाय = बुलाकर; ज्येष्ठम् = बड़े; यदुम् = यदु से; अथ = तब; अब्रवीत् = बोले। पुत्र = हे पुत्र; त्वम् = तू; मम = मेरी; वृद्धत्वम् = वृद्धावस्था; गृहाण = ग्रहण कर; यदि = यदि; शक्यते = सम्भव हो। यदुः = यदु; प्राह = बोला; न = नहीं; शक्नोमि = सकता हूँ; पितः = हे पिता; किम् = क्या; ब्रूहि = कहो; माम् = मुझसे; प्रति = प्रति। ततः = तब; तुर्वसुम् = तुर्वसु को; आहूय = बुलाकर; प्राह = बोले; ययातिः = ययाति; आतुरः = व्याकुल। तुर्वसुः = तुर्वसु; अपि = भी; न = नहीं; इति = ऐसा; उक्त्वा = कहकर; पितरम् = पिता से; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; ह = निश्चय। एवम् = इस प्रकार; सर्वे = सभी; पुत्राः = पुत्र; ऊचुः = बोले; शर्मिष्ठायाः = शर्मिष्ठा के; च = और; देवयान्याः = देवयानी के।
📖 भावार्थ : शुक्राचार्य के श्राप के तुरन्त बाद ययाति वृद्ध हो गए, उनका बल नष्ट हो गया, वे रंगहीन हो गए और युवावस्था समाप्त हो गई। यह देखकर देवयानी और शर्मिष्ठा दोनों अत्यन्त दुःखी हुईं। ययाति ने अपने बड़े पुत्र यदु को बुलाकर कहा कि पुत्र, यदि सम्भव हो तो तुम मेरी वृद्धावस्था ग्रहण कर लो। यदु ने मना कर दिया। फिर उन्होंने तुर्वसु से कहा, उसने भी इनकार कर दिया। इस प्रकार देवयानी और शर्मिष्ठा के सभी पुत्रों ने पिता की वृद्धावस्था लेने से मना कर दिया। यह भाग पुत्रों के स्वार्थ और पिता के प्रति उनके असम्मान को दर्शाता है। केवल एक पुत्र ऐसा था जो पिता की सहायता के लिए तैयार हुआ, जिसका वर्णन अगले सर्ग में होगा।

📜 श्लोक २१-२५ : पुरु की सहमति की ओर संकेत

ततः पुरुं महाभागं शर्मिष्ठायाः सुतं प्रियम्।
आहूय प्राह राजर्षिः पुत्र त्वं शरणं मम॥२१॥
त्वं कुरुष्व मम प्रीत्यां वृद्धत्वं गृह्यतां सुत।
पुरुः प्राह कृतार्थोऽस्मि पितरं प्रति सादरम्॥२२॥
गृह्णामि तव वृद्धत्वं यौवनं देहि मे पितः।
इत्युक्त्वा प्रतिजग्राह पितुर्वृद्धत्वमात्मनः॥२३॥
ययातिरपि तत् प्राप्य यौवनं मुदितोऽभवत्।
पुरुं च राज्ये संस्थाप्य तपसे धृतनिश्चयः॥२४॥
इत्येषा ययातिकथा शुक्रशापसमुद्भवा।
रामाय कथिता पूर्वमगस्त्येन महात्मना॥२५॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; पुरुम् = पुरु को; महाभागम् = महाभाग; शर्मिष्ठायाः = शर्मिष्ठा के; सुतम् = पुत्र; प्रियम् = प्रिय; आहूय = बुलाकर; प्राह = बोले; राजर्षिः = राजर्षि; पुत्र = हे पुत्र; त्वम् = तू; शरणम् = शरण; मम = मेरी। त्वम् = तू; कुरुष्व = कर; मम = मेरे; प्रीत्याम् = प्रेम के लिए; वृद्धत्वम् = वृद्धावस्था; गृह्यताम् = ग्रहण कर; सुत = पुत्र। पुरुः = पुरु; प्राह = बोला; कृतार्थः = कृतार्थ; अस्मि = हूँ; पितरम् = पिता के; प्रति = प्रति; सादरम् = आदर सहित। गृह्णामि = लेता हूँ; तव = तेरी; वृद्धत्वम् = वृद्धावस्था; यौवनम् = युवावस्था; देहि = दो; मे = मुझे; पितः = हे पिता। इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; प्रतिजग्राह = ग्रहण किया; पितुः = पिता की; वृद्धत्वम् = वृद्धावस्था; आत्मनः = अपने ऊपर। ययातिः = ययाति; अपि = भी; तत् = वह; प्राप्य = प्राप्त करके; यौवनम् = युवावस्था; मुदितः = प्रसन्न; अभवत् = हुआ; पुरुम् = पुरु को; च = और; राज्ये = राज्य पर; संस्थाप्य = स्थापित करके; तपसे = तपस्या के लिए; धृतनिश्चयः = दृढ़ निश्चय किया। इति = इस प्रकार; एषा = यह; ययातिकथा = ययाति की कथा; शुक्रशापसमुद्भवा = शुक्र के शाप से उत्पन्न; रामाय = राम को; कथिता = कही; पूर्वम् = पहले; अगस्त्येन = अगस्त्य ने; महात्मना = महात्मा ने।
📖 भावार्थ : अन्त में ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को बुलाया, जो शर्मिष्ठा से उत्पन्न था। पुरु ने पिता की प्रार्थना सुनकर आदरपूर्वक कहा कि मैं आपकी वृद्धावस्था ग्रहण करने के लिए तैयार हूँ, मुझे अपनी युवावस्था दीजिए। पुरु ने पिता की वृद्धावस्था ले ली और ययाति पुनः युवा हो गए। ययाति ने पुरु को राज्य सौंप दिया और स्वयं तपस्या के लिए चले गए। अगस्त्य ऋषि ने राम से कहा कि यह ययाति की कथा शुक्र के शाप से सम्बन्धित है, जो मैंने तुम्हें सुनाई। इस प्रकार यह सर्ग समाप्त होता है, जो अगले सर्ग में पुरु के त्याग की महिमा की ओर संकेत करता है।

📜 श्लोक २६-३० : फलश्रुति और उपदेश

य इदं शृणुयाद्भक्त्या पठेद्वा श्रद्धयान्वितः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत धर्मनिष्ठः सुखी भवेत्॥२६॥
राजा भवति धर्मात्मा पुत्रवान् धनवानपि।
विद्यावान् कीर्तिमांश्चैव नास्ति तत्र विचारणा॥२७॥
परदारनिवृत्तिश्च धर्म एव सनातनः।
ययातिशापकथने बोध्यते हितमिच्छता॥२८॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन परदारान् विवर्जयेत्।
धर्म एव परो लोके सुखदः शान्तिदः सदा॥२९॥
इति श्रीवाल्मीकीये रामायणे उत्तरकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः॥३०॥
🔹 पदच्छेद : यः = जो; इदम् = इस; शृणुयात् = सुने; भक्त्या = भक्ति से; पठेत् = पढ़े; वा = या; श्रद्धयान्वितः = श्रद्धा से युक्त; सर्वपापैः = सब पापों से; प्रमुच्येत = मुक्त हो जाता है; धर्मनिष्ठः = धर्मनिष्ठ; सुखी = सुखी; भवेत् = होता है। राजा = राजा; भवति = होता है; धर्मात्मा = धर्मात्मा; पुत्रवान् = पुत्रवान्; धनवान् = धनवान्; अपि = भी; विद्यावान् = विद्यावान्; कीर्तिमान् = कीर्तिमान्; च = और; एव = ही; नास्ति = नहीं है; तत्र = उसमें; विचारणा = संदेह। परदारनिवृत्तिः = पराई स्त्री से दूर रहना; धर्मः = धर्म; एव = ही; सनातनः = सनातन; ययातिशापकथने = ययाति के शाप की कथा में; बोध्यते = समझाया गया; हितमिच्छता = हित चाहने वाले ने। तस्मात् = इसलिए; सर्वप्रयत्नेन = सब प्रयत्न से; परदारान् = पराई स्त्रियों से; विवर्जयेत् = दूर रहना चाहिए; धर्मः = धर्म; एव = ही; परः = परम; लोके = लोक में; सुखदः = सुख देने वाला; शान्तिदः = शान्ति देने वाला; सदा = सदा। इति = इस प्रकार; श्रीवाल्मीकीये रामायणे = श्रीवाल्मीकीय रामायण में; उत्तरकाण्डे = उत्तरकाण्ड में; सप्तषष्टितमः = सड़सठवाँ; सर्गः = सर्ग।
📖 भावार्थ : इस कथा को सुनने और पढ़ने से मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर धर्मनिष्ठ और सुखी होता है। वह राजा, धनवान, पुत्रवान, विद्यावान और कीर्तिमान बनता है। इस कथा का मुख्य उपदेश यह है कि पराई स्त्री का त्याग ही सनातन धर्म है। ययाति के शाप की कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि व्यभिचार से बचना चाहिए। धर्म ही संसार में परम सुख और शान्ति देने वाला है। इस प्रकार इस सर्ग का समापन होता है, जिसमें ययाति के शाप की घटना और उसके नैतिक पाठ का वर्णन है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚖️ धर्म और विवाहेतर सम्बन्ध

यह सर्ग स्पष्ट करता है कि विवाहित पुरुष के लिए अन्य स्त्री से सम्बन्ध बनाना धर्म के विरुद्ध है। ययाति ने देवयानी से विवाह करते हुए भी शर्मिष्ठा से सम्बन्ध बनाकर धर्म का उल्लंघन किया, जिसका फल उन्हें शाप के रूप में मिला।

👨‍👦 पुत्रों का कर्तव्य

यदु, तुर्वसु आदि पुत्रों ने पिता की वृद्धावस्था लेने से इनकार किया, जबकि पुरु ने सहर्ष स्वीकार किया। यह पुत्र के कर्तव्य और त्याग की भावना को दर्शाता है। पुरु के त्याग के कारण ही उसे राज्य मिला और यदु को यादव कहा गया।

🧓 शाप और उसका समाधान

शुक्राचार्य का शाप अटल था, किन्तु उन्होंने यह विकल्प भी दिया कि पुत्रों से युवावस्था ली जा सकती है। यह दर्शाता है कि शाप में भी कृपा का अंश हो सकता है, यदि शाप देने वाला चाहे।

📖 उपदेशात्मक कथा

यह कथा राम को सुनाई गई, ताकि वे धर्म के मर्म को समझें। यह उत्तरकाण्ड की अन्य कथाओं की तरह धर्मोपदेशक है और राजाओं के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।

🎯 शिक्षा : व्यभिचार से बचना चाहिए, पुत्रों को पिता की सेवा करनी चाहिए, और धर्म का पालन करना ही सबसे बड़ा सुख है। यही ययाति की कथा का सन्देश है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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