उत्तर काण्ड अध्याय 66

वसिष्ठ और निमि की कहानी का समापन

राजा निमि द्वारा वसिष्ठ से यज्ञ कराने का निमंत्रण, प्रतीक्षा में विलंब, अन्य ऋतvik की नियुक्ति, पारस्परिक श्राप और अंत में दोनों के पुनर्जन्म एवं समाधान की कथा।

विवरण

राजा निमि, इक्ष्वाकुवंशी एक धर्मात्मा राजा, ने महर्षि वसिष्ठ से अपने यज्ञ का आयोजन करने का अनुरोध किया। वसिष्ठ ने कहा कि वे कुछ समय बाद आएंगे। निमि ने बहुत काल तक प्रतीक्षा की, परंतु वसिष्ठ नहीं आए। तब निमि ने गौतम ऋषि को नियुक्त कर लिया। वसिष्ठ जब लौटे और देखा कि निमि ने दूसरे ऋत्विक् रख लिए हैं, तो उन्होंने निमि को शरीरहीन होने का श्राप दे दिया। निमि ने भी प्रत्युत्तर में वसिष्ठ को शरीर त्यागने का श्राप दिया। इसके बाद वसिष्ठ ने मित्रावरुण के यज्ञ से उर्वशी के गर्भ से पुनर्जन्म लिया (अगस्त्य और वसिष्ठ के रूप में) और निमि देहत्याग के बाद निमेष (पलक) के देवता बन गए। अंत में दोनों की शापमुक्ति और सम्मान की कथा कही गई है। यह सर्ग ऋषि-राजा के आदर्श संबंधों और शाप-प्रतिशाप की घटनाओं का समापन करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ६६

(वसिष्ठ और निमि की कहानी का समापन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्षष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राजा निमि और वसिष्ठ के पारस्परिक श्राप की कथा अत्यन्त रोचक एवं नीतिप्रद है। इस सर्ग में बताया गया है कि कैसे एक छोटी सी अनबन ने दो महान विभूतियों को शरीर त्यागने पर विवश कर दिया, और अंत में कैसे उन्हें पुनः प्रतिष्ठा मिली।

📜 श्लोक १-५ : निमि का निवेदन और वसिष्ठ का वचन

निमिर्नाम नरश्रेष्ठ इक्ष्वाकुकुलनन्दनः।
वसिष्ठं समुपागम्य यज्ञार्थं प्रत्यपूजयत्॥१॥
ऋषिं दृष्ट्वा महात्मानं प्रणम्य च कृताञ्जलिः।
उवाच वचनं राजा यज्ञं कर्तुं चिकीर्षया॥२॥
भगवन् यज्ञमिच्छामि कर्तुं धर्मभृतां वर।
त्वमेव मे ऋत्विजः स्याः कुरु कार्यमनुत्तमम्॥३॥
वसिष्ठस्तु ततः प्राह राजानं धर्मवत्सलम्।
गमिष्यामि समीपं ते यदा कालो भविष्यति॥४॥
इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो राजापि स्वगृहं ययौ।
प्रतीक्षमाणस्तं काले कालं नातिव्यचिन्तयत्॥५॥
🔹 पदच्छेद : निमिः = निमि; नाम = नाम; नरश्रेष्ठः = मनुष्यों में श्रेष्ठ; इक्ष्वाकुकुलनन्दनः = इक्ष्वाकु वंश को आनन्द देने वाला; वसिष्ठम् = वसिष्ठ को; समुपागम्य = पास जाकर; यज्ञार्थम् = यज्ञ के लिए; प्रत्यपूजयत् = पूजा की। ऋषिम् = ऋषि को; दृष्ट्वा = देखकर; महात्मानम् = महान आत्मा; प्रणम्य = नमस्कार कर; च = और; कृताञ्जलिः = हाथ जोड़कर; उवाच = बोले; वचनम् = वचन; राजा = राजा; यज्ञम् = यज्ञ; कर्तुम् = करने के लिए; चिकीर्षया = इच्छा से। भगवन् = हे भगवन्; यज्ञम् = यज्ञ; इच्छामि = चाहता हूँ; कर्तुम् = करना; धर्मभृताम् वर = धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ; त्वमेव = आप ही; मे = मेरे; ऋत्विजः = ऋत्विक् (यज्ञ कराने वाले); स्याः = हों; कुरु = कीजिए; कार्यम् = कार्य; अनुत्तमम् = उत्तम। वसिष्ठः = वसिष्ठ; तु = तो; ततः = तब; प्राह = बोले; राजानम् = राजा से; धर्मवत्सलम् = धर्मप्रिय; गमिष्यामि = जाऊँगा; समीपम् = समीप; ते = तुम्हारे; यदा = जब; कालः = समय; भविष्यति = होगा। इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; प्रययौ = चले गए; विप्रः = ब्राह्मण; राजा = राजा; अपि = भी; स्वगृहम् = अपने घर; ययौ = गए; प्रतीक्षमाणः = प्रतीक्षा करते हुए; तम् = उसकी; काले = समय पर; कालम् = काल; नातिव्यचिन्तयत् = अधिक चिन्ता नहीं की।
📖 भावार्थ : राजा निमि, जो इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी राजा थे, ने वसिष्ठ ऋषि के पास जाकर उनसे यज्ञ कराने का अनुरोध किया। वसिष्ठ ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे उचित समय पर अवश्य आएंगे। राजा ने उनके वचन पर भरोसा करते हुए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना प्रारम्भ किया। इस प्रथम भाग में राजा की श्रद्धा और वसिष्ठ के प्रति उनके अटूट विश्वास का वर्णन है। निमि ने यह नहीं सोचा कि वसिष्ठ क्यों नहीं आ रहे, बल्कि वे उनके आने की प्रतीक्षा करते रहे। यह राजा के धैर्य और गुरुभक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। वसिष्ठ का यह कहना कि "जब समय होगा, तब आऊँगा" यह दर्शाता है कि ऋषि अपने वचन के स्वामी होते हैं और उचित अवसर पर ही कार्य करते हैं। इस प्रकार श्लोक १-५ में कथा का बीजारोपण हुआ है, जो आगे चलकर एक अप्रत्याशित मोड़ लेती है।

📜 श्लोक ६-१० : निमि की लंबी प्रतीक्षा और गौतम का आगमन

बहून् वर्षगणान् राजा प्रतीक्षन् वसिष्ठकम्।
न चापश्यन्महात्मानं ततश्चिन्तापरोऽभवत्॥६॥
कालोऽतिवर्तते राजन् यज्ञस्य ऋत्विजं विना।
इति संचिन्त्य मनसा गौतमं समुपाह्वयत्॥७॥
गौतमोऽपि महातेजा राज्ञः प्रियचिकीर्षया।
ऋत्विक्त्वमग्रहीद्राज्ञो यज्ञारम्भो बभूव ह॥८॥
ततः सुमहती पूजा प्रवृत्ता निमिना सह।
वसिष्ठोऽपि तदा प्राप्तो दृष्ट्वान्यं कुपितोऽभवत्॥९॥
किमिदं मेऽवमानाय कृतं राजन् मया विना।
इत्युक्त्वा कोपताम्राक्षः शापं दातुं प्रचक्रमे॥१०॥
🔹 पदच्छेद : बहून् = अनेक; वर्षगणान् = वर्षों तक; राजा = राजा; प्रतीक्षन् = प्रतीक्षा करते हुए; वसिष्ठकम् = वसिष्ठ की; न = नहीं; च = और; अपश्यन् = देखा; महात्मानम् = महात्मा को; ततः = तब; चिन्तापरः = चिन्तित; अभवत् = हुए। कालः = समय; अतिवर्तते = बीत रहा है; राजन् = हे राजा; यज्ञस्य = यज्ञ का; ऋत्विजम् = ऋत्विक्; विना = बिना; इति = इस प्रकार; संचिन्त्य = सोचकर; मनसा = मन में; गौतमम् = गौतम को; समुपाह्वयत् = बुलाया। गौतमः = गौतम; अपि = भी; महातेजाः = महान तेजस्वी; राज्ञः = राजा की; प्रियचिकीर्षया = प्रिय करने की इच्छा से; ऋत्विक्त्वम् = ऋत्विक् का पद; अग्रहीत् = ग्रहण किया; राज्ञः = राजा के; यज्ञारम्भः = यज्ञ का आरम्भ; बभूव = हुआ; ह = निश्चय। ततः = उसके बाद; सुमहती = बहुत बड़ी; पूजा = पूजा; प्रवृत्ता = शुरू हुई; निमिना = निमि के साथ; सह = साथ; वसिष्ठः = वसिष्ठ; अपि = भी; तदा = तब; प्राप्तः = आ पहुँचे; दृष्ट्वा = देखकर; अन्यम् = दूसरे (ऋत्विक्) को; कुपितः = क्रोधित; अभवत् = हुए। किम् = क्या; इदम् = यह; मे = मेरा; अवमानाय = अपमान करने के लिए; कृतम् = किया गया; राजन् = हे राजा; मया = मेरे; विना = बिना; इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; कोपताम्राक्षः = क्रोध से लाल आँखों वाले; शापम् = शाप; दातुम् = देने के लिए; प्रचक्रमे = उद्यत हुए।
📖 भावार्थ : अनेक वर्षों तक वसिष्ठ की प्रतीक्षा करते-करते राजा निमि चिन्तित हो उठे। यज्ञ का उचित समय निकला जा रहा था और ऋत्विक् के बिना यज्ञ सम्भव नहीं था। ऐसी स्थिति में राजा ने गौतम ऋषि को बुलाया और उनसे यज्ञ कराने की प्रार्थना की। गौतम ने राजा का मान रखते हुए ऋत्विक् पद स्वीकार कर लिया और यज्ञ प्रारम्भ हो गया। इधर वसिष्ठ उसी समय वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने देखा कि राजा ने उनकी प्रतीक्षा न करके किसी और को स्थान दे दिया है। यह उनके लिए अत्यन्त अपमानजनक था। वे क्रोध से तमतमा उठे और शाप देने के लिए उद्यत हो गए। इस भाग में समय की महत्ता और परिस्थितियों के दबाव में लिए गए निर्णयों के परिणामों को दर्शाया गया है। राजा ने धर्म के अनुसार यज्ञ समय पर करना चाहा, किन्तु वसिष्ठ की अनुपस्थिति में दूसरे का सहारा लेना पड़ा।

📜 श्लोक ११-१५ : वसिष्ठ का श्राप

यन्मामप्राप्तकालं त्वं प्रतीक्ष्यान्यं समाश्रितः।
तस्मात्त्वं विचरिष्यामि देहहीनः सुदुःखितः॥११॥
शरीरं त्यज राजेन्द्र क्षणेन भविता तव।
इत्युक्त्वा वसिष्ठः शापं राजानं प्रति रोषतः॥१२॥
निमिस्तु शापमाकर्ण्य वसिष्ठं प्रत्युवाच ह।
भवानपि शरीरेण हीनो भवितुमर्हति॥१३॥
यस्मात्त्वं मां शप्तवानसि हेतुना केनचित्।
तस्मात्तेऽपि भवेद्देहो नष्टः सत्यं ब्रवीमि ते॥१४॥
इति प्रतिशप्त्वा राजा तूष्णीमास महामतिः।
वसिष्ठोऽपि तदा देहं त्यक्तुकामो बभूव ह॥१५॥
🔹 पदच्छेद : यत् = जो; माम् = मुझे; अप्राप्तकालम् = समय से पहले; त्वम् = तू; प्रतीक्ष्य = प्रतीक्षा न करके; अन्यम् = दूसरे को; समाश्रितः = आश्रय लिया; तस्मात् = इसलिए; त्वम् = तू; विचरिष्यामि = विचरण करेगा; देहहीनः = शरीर रहित; सुदुःखितः = अत्यन्त दुःखी। शरीरम् = शरीर; त्यज = त्याग; राजेन्द्र = हे राजन्; क्षणेन = क्षण भर में; भविता = होगा; तव = तेरा। इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; वसिष्ठः = वसिष्ठ; शापम् = शाप; राजानम् = राजा को; प्रति = के प्रति; रोषतः = क्रोध से। निमिः = निमि; तु = तो; शापम् = शाप; आकर्ण्य = सुनकर; वसिष्ठम् = वसिष्ठ से; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; ह = निश्चय। भवान् = आप; अपि = भी; शरीरेण = शरीर से; हीनः = रहित; भवितुम् = होने के लिए; अर्हति = योग्य हैं। यस्मात् = जिस कारण; त्वम् = आप; माम् = मुझे; शप्तवान् = शाप दिया; असि = है; हेतुना = कारण; केनचित् = किसी से; तस्मात् = इसलिए; ते = आपका; अपि = भी; भवेत् = हो; देहः = शरीर; नष्टः = नष्ट; सत्यम् = सत्य; ब्रवीमि = कहता हूँ; ते = आपसे। इति = ऐसा; प्रतिशप्त्वा = प्रतिशाप देकर; राजा = राजा; तूष्णीम् = चुपचाप; आस = रहे; महामतिः = महान बुद्धि वाले; वसिष्ठः = वसिष्ठ; अपि = भी; तदा = तब; देहम् = शरीर; त्यक्तुकामः = त्यागने की इच्छा वाले; बभूव = हुए; ह = निश्चय।
📖 भावार्थ : वसिष्ठ ने क्रोध में आकर राजा निमि को शाप दे दिया कि तूने मेरी प्रतीक्षा नहीं की, इसलिए तू शरीरहीन होकर दुःख भोगेगा। क्षण भर में तेरा शरीर नष्ट हो जाएगा। निमि ने यह शाप सुना तो वे भी क्रोधित हो उठे। उन्होंने वसिष्ठ को प्रतिशाप दिया कि आपने बिना कारण मुझे शाप दिया, अतः आपका भी शरीर नष्ट हो। दोनों ने एक-दूसरे को शाप दे दिया। यहाँ शाप और प्रतिशाप की घटना अत्यन्त मार्मिक है। राजा ने केवल यज्ञ समय पर करने के लिए दूसरा ऋत्विक् रखा था, जो उचित था, किन्तु वसिष्ठ ने इसे अपना अपमान समझा। इस प्रकार एक छोटी सी गलतफहमी ने दो महान विभूतियों को शरीर त्यागने पर विवश कर दिया। यह भाग यह सिखाता है कि क्रोध में लिया गया निर्णय कितना विनाशकारी हो सकता है।

📜 श्लोक १६-२० : शाप का प्रभाव और देहत्याग

ततः क्षणेन राजेन्द्रो निमिः प्राणान् त्यजन् नृप।
देहहीनो महीपालश्चचार विपिनेष्वथ॥१६॥
वसिष्ठोऽपि तथा देहं त्यक्त्वा स्वर्गमितो गतः।
किन्तु ब्रह्मर्षिता तस्य न नष्टा पुण्यकर्मणः॥१७॥
ततस्तु ब्रह्मणः स्थाने समेताः सर्वदेवताः।
वसिष्ठस्य च निमेश्च वृत्तान्तं प्रत्यपूजयन्॥१८॥
ब्रह्मोवाच मुनीन् सर्वान् शृणुत द्विजसत्तमाः।
वसिष्ठो निमिना शप्तः पुनर्जन्म गमिष्यति॥१९॥
मित्रावरुणयोर्यज्ञे उर्वशीसम्भवः शुभः।
अगस्त्यो नाम विख्यातस्तथा वसिष्ठ एव च॥२०॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; क्षणेन = क्षण भर में; राजेन्द्रः = राजा; निमिः = निमि; प्राणान् = प्राण; त्यजन् = त्यागकर; नृप = हे राजन्; देहहीनः = शरीर रहित; महीपालः = राजा; चचार = विचरण किया; विपिनेषु = वनों में; अथ = तब। वसिष्ठः = वसिष्ठ; अपि = भी; तथा = वैसे ही; देहम् = शरीर; त्यक्त्वा = त्यागकर; स्वर्गम् = स्वर्ग; इतः = चले गए; किन्तु = परन्तु; ब्रह्मर्षिता = ब्रह्मर्षि का पद; तस्य = उनका; न = नहीं; नष्टा = नष्ट हुई; पुण्यकर्मणः = पुण्यात्मा की। ततः = उसके बाद; तु = तो; ब्रह्मणः = ब्रह्मा के; स्थाने = स्थान पर; समेताः = एकत्र हुए; सर्वदेवताः = सब देवता; वसिष्ठस्य = वसिष्ठ के; च = और; निमेः = निमि के; च = और; वृत्तान्तम् = वृत्तान्त को; प्रत्यपूजयन् = सराहा। ब्रह्मा = ब्रह्मा; उवाच = बोले; मुनीन् = मुनियों से; सर्वान् = सबसे; शृणुत = सुनो; द्विजसत्तमाः = हे द्विजश्रेष्ठो; वसिष्ठः = वसिष्ठ; निमिना = निमि द्वारा; शप्तः = शापित; पुनर्जन्म = पुनर्जन्म; गमिष्यति = प्राप्त करेंगे। मित्रावरुणयोः = मित्र और वरुण के; यज्ञे = यज्ञ में; उर्वशीसम्भवः = उर्वशी से उत्पन्न; शुभः = शुभ; अगस्त्यः = अगस्त्य; नाम = नाम; विख्यातः = प्रसिद्ध; तथा = तथा; वसिष्ठः = वसिष्ठ; एव = ही; च = और।
📖 भावार्थ : वसिष्ठ के श्राप के फलस्वरूप राजा निमि ने तुरन्त अपना शरीर त्याग दिया और वे शरीरहीन होकर वनों में विचरने लगे। वसिष्ठ ने भी निमि के प्रतिशाप से अपना शरीर त्याग दिया और स्वर्ग चले गए, किन्तु उनका ब्रह्मर्षि पद उनके पुण्य के कारण नष्ट नहीं हुआ। तत्पश्चात ब्रह्मा के लोक में सभी देवता एकत्र हुए और उन्होंने इस घटना पर विचार किया। ब्रह्मा जी ने सबको समझाया कि वसिष्ठ ने प्रतिशाप से पुनर्जन्म लेना है। वे मित्र और वरुण के यज्ञ में उर्वशी के गर्भ से अगस्त्य और वसिष्ठ के रूप में उत्पन्न होंगे। इस प्रकार देवताओं ने वसिष्ठ के पुनर्जन्म की योजना बनाई। यह भाग दर्शाता है कि महापुरुषों के श्राप भी उनके तेज को नष्ट नहीं कर पाते, और वे पुनः प्रतिष्ठित होते हैं।

📜 श्लोक २१-२५ : वसिष्ठ का पुनर्जन्म और निमि का वरदान

तथैव काल आयाते मित्रावरुणयोर्मखे।
उर्वशी ददृशे रम्या ताभ्यां दत्ता सुता तदा॥२१॥
तस्यां जज्ञाते महर्षी अगस्त्यश्च वसिष्ठकः।
वसिष्ठोऽपि स्वशापान्ते पूर्ववत् संबभूव ह॥२२॥
निमिस्तु ब्रह्मणा प्रोक्तो वरं वरय सुव्रत।
निमिः प्राह यदि प्रीतो लोके मे स्थानमुत्तमम्॥२३॥
देहहीनोऽपि यत् स्यां चक्षुषां निमिषो भवे।
प्राणिनां नेत्रवृत्तौ हि स्थितिर्मे स्यादनुत्तमा॥२४॥
तथास्त्विति ब्रह्मवचो निमिर्निमिषतां गतः।
यत्र निमेषकालेषु पूज्यते स द्विजैः सदा॥२५॥
🔹 पदच्छेद : तथैव = वैसे ही; कालः = समय; आयाते = आने पर; मित्रावरुणयोः = मित्र और वरुण के; मखे = यज्ञ में; उर्वशी = उर्वशी; ददृशे = दिखाई दी; रम्या = सुन्दर; ताभ्याम् = उन दोनों ने; दत्ता = दी; सुता = पुत्री (जैसे); तदा = तब। तस्याम् = उसके (उर्वशी के) गर्भ से; जज्ञाते = उत्पन्न हुए; महर्षी = महर्षि; अगस्त्यः = अगस्त्य; च = और; वसिष्ठकः = वसिष्ठ; वसिष्ठः = वसिष्ठ; अपि = भी; स्वशापान्ते = अपने शाप के अन्त में; पूर्ववत् = पहले की तरह; संबभूव = हो गए; ह = निश्चय। निमिः = निमि; तु = तो; ब्रह्मणा = ब्रह्मा ने; प्रोक्तः = कहा; वरम् = वर; वरय = माँगो; सुव्रत = सत्यप्रतिज्ञ। निमिः = निमि; प्राह = बोले; यदि = यदि; प्रीतः = प्रसन्न; लोके = लोक में; मे = मेरा; स्थानम् = स्थान; उत्तमम् = उत्तम हो। देहहीनः = शरीर रहित; अपि = भी; यत् = जो; स्याम् = होऊँ; चक्षुषाम् = आँखों की; निमिषः = पलक गिरने की क्रिया; भवे = बनूँ; प्राणिनाम् = प्राणियों की; नेत्रवृत्तौ = नेत्रों की क्रिया में; हि = निश्चय; स्थितिः = स्थिति; मे = मेरी; स्यात् = हो; अनुत्तमा = उत्तम। तथास्तु = ऐसा ही हो; इति = इस प्रकार; ब्रह्मवचः = ब्रह्मा के वचन; निमिः = निमि; निमिषताम् = पलक गिरने के देवता; गतः = हो गए; यत्र = जहाँ; निमेषकालेषु = पलक गिरने के समय; पूज्यते = पूजे जाते हैं; स = वे; द्विजैः = द्विजों द्वारा; सदा = सदा।
📖 भावार्थ : समय आने पर मित्र और वरुण के यज्ञ में अप्सरा उर्वशी प्रकट हुईं और उनसे दो महर्षियों का जन्म हुआ – अगस्त्य और वसिष्ठ। इस प्रकार वसिष्ठ ने पुनर्जन्म ग्रहण किया और पूर्ववत् ब्रह्मर्षि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। दूसरी ओर, ब्रह्मा जी ने शरीरहीन निमि को दर्शन देकर वर माँगने को कहा। निमि ने वर माँगा कि यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे सभी प्राणियों की आँखों की पलक गिरने की क्रिया (निमेष) में स्थान मिले। ब्रह्मा ने तथास्तु कहा और तभी से निमि निमिष (पलक) के देवता माने जाते हैं। लोग पलक गिरते समय उनका स्मरण करते हैं। यह भाग अत्यन्त रोचक है, जिसमें निमि ने देहहीन होने के बावजूद एक उपयोगी स्थान प्राप्त किया। उनकी इच्छा थी कि वे सदा लोकव्यवहार में बने रहें, और उनकी यह इच्छा पूरी हुई।

📜 श्लोक २६-३० : दोनों की महिमा और सम्मान

एवं वसिष्ठनिम्योश्च शापानुग्रहकल्पितम्।
चरितं लोकविख्यातं सर्वपापप्रणाशनम्॥२६॥
य इदं शृणुयान्नित्यं पठेद्वा भक्तिभावितः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत ब्रह्मलोके महीयते॥२७॥
निमेश्च यज्ञविघ्नो यो वसिष्ठस्य च कोपनम्।
तत्सर्वं शान्तिमापन्नं राम राज्ये प्रतिष्ठिते॥२८॥
रामः प्राह मुनीन्द्रं तमगस्त्यं धर्मकोविदम्।
धन्योऽस्मि भगवन् यन्मे पुराणं श्रावितं त्वया॥२९॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा मुनीनां पूजनं व्यधात्।
तेऽपि प्रीताः ययुः सर्वे स्वानि धामानि राघव॥३०॥
🔹 पदच्छेद : एवम् = इस प्रकार; वसिष्ठनिम्योः = वसिष्ठ और निमि के; च = और; शापानुग्रहकल्पितम् = शाप और अनुग्रह से निर्मित; चरितम् = चरित्र; लोकविख्यातम् = लोक में प्रसिद्ध; सर्वपापप्रणाशनम् = सब पापों का नाश करने वाला। यः = जो; इदम् = इस; शृणुयात् = सुने; नित्यम् = नित्य; पठेत् = पढ़े; वा = या; भक्तिभावितः = भक्तिभाव से युक्त; सर्वपापैः = सब पापों से; प्रमुच्येत = मुक्त हो जाता है; ब्रह्मलोके = ब्रह्मलोक में; महीयते = पूजित होता है। निमेः = निमि का; च = और; यज्ञविघ्नः = यज्ञ में विघ्न; यः = जो; वसिष्ठस्य = वसिष्ठ का; च = और; कोपनम् = क्रोध; तत् = वह; सर्वम् = सब; शान्तिमापन्नम् = शान्त हो गया; राम = राम के; राज्ये = राज्य में; प्रतिष्ठिते = स्थापित होने पर। रामः = राम; प्राह = बोले; मुनीन्द्रम् = मुनियों के इन्द्र; तम् = उन; अगस्त्यम् = अगस्त्य को; धर्मकोविदम् = धर्मज्ञ; धन्यः = धन्य; अस्मि = हूँ; भगवन् = हे भगवन्; यत् = जो; मे = मुझे; पुराणम् = पुरानी कथा; श्रावितम् = सुनाई; त्वया = आपने। इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; राघवः = राघव; राजा = राजा; मुनीनाम् = मुनियों का; पूजनम् = पूजन; व्यधात् = किया। ते = वे; अपि = भी; प्रीताः = प्रसन्न; ययुः = चले गए; सर्वे = सब; स्वानि = अपने; धामानि = घरों को; राघव = हे राघव।
📖 भावार्थ : इस प्रकार वसिष्ठ और निमि के शाप और अनुग्रह से उत्पन्न यह चरित्र अत्यन्त प्रसिद्ध और पापनाशक है। जो भी इसे नित्य सुनता या पढ़ता है, वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। राम के राज्य में इस कथा के श्रवण से सब विघ्न शान्त हो गए। राम ने अगस्त्य ऋषि से कहा कि हे भगवन्! आपने मुझे यह पुरातन कथा सुनाकर धन्य कर दिया। फिर राम ने सभी मुनियों का पूजन किया और वे सब प्रसन्न होकर अपने-अपने आश्रमों को लौट गए। इस भाग में कथा के श्रवण के फल का वर्णन है तथा यह संकेत मिलता है कि राम के धर्मराज्य में ऐसी कथाओं का प्रचलन था।

📜 श्लोक ३१-३५ : उपसंहार और फलश्रुति

इत्येतत् कथितं राम वसिष्ठनिमिचेष्टितम्।
यच्छ्रुत्वा पापनिर्मुक्तो धर्मनिष्ठः प्रजायते॥३१॥
निमेर्यज्ञविघ्नकर्ता वसिष्ठः कोपकारणात्।
शापं दत्त्वा स्वयं देहं त्यक्तवान् पुनराप्तवान्॥३२॥
निमिरपि शरीरं त्यक्त्वा निमिषत्वमुपागतः।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन धर्म एव परायणम्॥३३॥
राज्ञा धर्मः सदा रक्ष्यो मुनिभिश्च विशेषतः।
एतदर्थं हि भगवन् रामाय कथितं मया॥३४॥
रामोऽपि परमं प्रीतः सीतया सहितो वशी।
धर्मेण पालयामास महीमिक्ष्वाकुवर्धनः॥३५॥
🔹 पदच्छेद : इति = इस प्रकार; एतत् = यह; कथितम् = कहा गया; राम = हे राम; वसिष्ठनिमिचेष्टितम् = वसिष्ठ और निमि की चेष्टा; यत् = जिसे; श्रुत्वा = सुनकर; पापनिर्मुक्तः = पापों से मुक्त; धर्मनिष्ठः = धर्मनिष्ठ; प्रजायते = हो जाता है। निमेः = निमि का; यज्ञविघ्नकर्ता = यज्ञ में विघ्न करने वाला; वसिष्ठः = वसिष्ठ; कोपकारणात् = क्रोध के कारण; शापम् = शाप; दत्त्वा = देकर; स्वयम् = स्वयं; देहम् = शरीर; त्यक्तवान् = त्याग दिया; पुनः = फिर; आप्तवान् = प्राप्त किया। निमिः = निमि; अपि = भी; शरीरम् = शरीर; त्यक्त्वा = त्यागकर; निमिषत्वम् = पलक का देवता; उपागतः = हो गया। तस्मात् = इसलिए; सर्वप्रयत्नेन = सब प्रयत्न से; धर्मः = धर्म; एव = ही; परायणम् = परम आश्रय। राज्ञा = राजा को; धर्मः = धर्म; सदा = सदा; रक्ष्यः = रक्षा करना चाहिए; मुनिभिः = मुनियों को; च = और; विशेषतः = विशेष रूप से। एतदर्थम् = इसी अर्थ में; हि = निश्चय; भगवन् = हे भगवन्; रामाय = राम को; कथितम् = कहा; मया = मैंने। रामः = राम; अपि = भी; परमम् = अत्यधिक; प्रीतः = प्रसन्न; सीतया = सीता के साथ; सहितः = सहित; वशी = संयमी; धर्मेण = धर्म से; पालयामास = पालन किया; महीम् = पृथ्वी को; इक्ष्वाकुवर्धनः = इक्ष्वाकु वंश को बढ़ाने वाला।
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने राम से कहा कि हे राम! यह वसिष्ठ और निमि की कथा मैंने तुम्हें सुनाई। इसे सुनने से मनुष्य पापों से मुक्त होकर धर्मनिष्ठ बनता है। निमि के यज्ञ में विघ्न के कारण वसिष्ठ ने क्रोधवश शाप दिया और स्वयं भी शरीर त्यागना पड़ा, फिर पुनर्जन्म लिया। निमि ने भी शरीर त्यागकर निमिष देवता का पद पाया। इससे सिद्ध होता है कि धर्म ही सबसे बड़ा आश्रय है। राजाओं और मुनियों को विशेष रूप से धर्म की रक्षा करनी चाहिए। राम ने यह कथा सुनकर अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव किया और सीता सहित धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन किया। इस प्रकार इस सर्ग का समापन होता है, जिसमें धर्म की महिमा और शाप-प्रतिशाप के परिणामों को दर्शाया गया है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⏳ धैर्य और कालचक्र

राजा निमि की लम्बी प्रतीक्षा और वसिष्ठ के न आने से उत्पन्न परिस्थिति यह सिखाती है कि काल के आगे सबको झुकना पड़ता है। यज्ञ का समय निकलता देख निमि ने दूसरा विकल्प चुना, जो व्यावहारिक था। परन्तु वसिष्ठ ने इसे अपना अपमान समझा। यहाँ समय और व्यवहार के तालमेल की आवश्यकता रेखांकित होती है।

😤 क्रोध का परिणाम

वसिष्ठ का क्रोध और शाप देना, तथा निमि का प्रतिशाप, दोनों के लिए घातक सिद्ध हुए। क्रोध में लिए गए निर्णय कितने भयंकर हो सकते हैं, इसका यह ज्वलंत उदाहरण है। यदि वसिष्ठ ने धैर्य रखा होता, तो यह स्थिति न आती।

💫 पुनर्जन्म और प्रतिष्ठा

वसिष्ठ ने पुनर्जन्म लेकर पुनः अपना स्थान प्राप्त किया, और निमि ने निमेष देवता के रूप में अमरता पाई। यह दर्शाता है कि योग्यजन शाप के बाद भी अपनी योग्यता से पुनः प्रतिष्ठित हो जाते हैं।

📖 कथा का माहात्म्य

इस कथा के श्रवण मात्र से पापों से मुक्ति और धर्मनिष्ठा प्राप्त होती है। यह उत्तरकाण्ड की अन्य कथाओं की तरह धर्मोपदेशक है और राम जैसे धर्मात्मा राजा के लिए उपयुक्त है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि समय का ध्यान रखना, क्रोध पर नियंत्रण रखना, और धर्म का पालन करना अत्यन्त आवश्यक है। राजा और ऋषि दोनों को धर्म की रक्षा करनी चाहिए, तभी समाज सुखी रहता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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